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शान्ति पर्व · अध्याय 88

प्रजा को पीड़ित किए बिना कर-ग्रहण

युधिष्ठिर पूछते हैं कि कोश की आवश्यकता होने पर राजा कर कैसे लगाए। भीष्म धीरे-धीरे और कोमलता से कर लेने का उपदेश देते हैं — जैसे भौंरों को गिराए बिना मधु लिया जाता है या बछड़े का ध्यान रखकर गाय दुही जाती है — और पहले प्रमुख जनों को अपने पक्ष में करने को कहते हैं। मदिरालय, वेश्याओं, जुआरियों आदि जैसे राष्ट्र को हानि पहुँचाने वालों को नियन्त्रण में रखना चाहिए, क्योंकि उन्हें न रोकने वाला राजा उनके पाप का भागी होता है। धनिकों को राज्य का प्रमुख अंग मानकर सम्मान देना चाहिए, और राजा को सत्य तथा सरलता में दृढ़ रहने की सीख दी जाती है।

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युधिष्ठिर उवाच

श्लोक 1 (12.88.1)

यदा राजा समर्थोऽपि कोशार्थी स्यान्महामते । कथं प्रवर्तेत करस्तन्मे ब्रूहि पितामह ॥

yadā rājā samartho'pi kośārthī syānmahāmate | kathaṃ pravarteta karastanme brūhi pitāmaha

हे महामति पितामह! राजा समर्थ होने पर भी जब कोश का इच्छुक हो, तब कर किस प्रकार लगाया जाए, यह मुझे बताइए।

भीष्म उवाच

श्लोक 2 (12.88.2)

यथादेशं यथाकालं यथाबुद्धि यथाबलम् । अनुशिष्यात्प्रजा राजा धर्मार्थी तद्धिते रतः ॥

yathādeśaṃ yathākālaṃ yathābuddhi yathābalam | anuśiṣyātprajā rājā dharmārthī taddhite rataḥ

धर्म चाहने वाला और प्रजा के हित में रत राजा देश, काल, बुद्धि और बल के अनुसार प्रजा को शिक्षा दे।

श्लोक 3 (12.88.3)

यथा तासां च मन्येत श्रेय आत्मन एव च । तथा धर्माणि सर्वाणि राजा राष्ट्रेषु वर्तयेत् ॥

yathā tāsāṃ ca manyeta śreya ātmana eva ca | tathā dharmāṇi sarvāṇi rājā rāṣṭreṣu vartayet

प्रजा का और अपना कल्याण जिस प्रकार हो, ऐसा वह समझे, उसी प्रकार राजा अपने राज्यों में सब धर्मकार्यों को चलाए।

श्लोक 4 (12.88.4)

मधुदोहं दुहेद्राष्ट्रं भ्रमरान्न प्रपातयेत् । वत्सापेक्षी दुहेच्चैव स्तनांश्च न विकुट्टयेत् ॥

madhudohaṃ duhedrāṣṭraṃ bhramarānna prapātayet | vatsāpekṣī duheccaiva stanāṃśca na vikuṭṭayet

वह राष्ट्र को उसी प्रकार दुहे जैसे मधु लिया जाता है, भौंरों को गिराए नहीं; बछड़े का ध्यान रखकर दुहे और थनों को कुचले नहीं।

श्लोक 5 (12.88.5)

जलौकावत्पिबेद्राष्ट्रं मृदुनैव नराधिपः । व्याघ्रीव च हरेत्पुत्रान्संदशेन्न च पीडयेत् ॥

jalaukāvatpibedrāṣṭraṃ mṛdunaiva narādhipaḥ | vyāghrīva ca haretputrānsaṃdaśenna ca pīḍayet

राजा जोंक की तरह राष्ट्र का रस कोमलता से ही पिए; बाघिन की तरह अपने बच्चों को उठा ले जाए — न दाँत गड़ाए, न पीड़ा पहुँचाए।

श्लोक 6 (12.88.6)

यथा शल्यकवानाखुः पदं धूनयते सदा । अतीक्ष्णेनाभ्युपायेन तथा राष्ट्रं समापिबेत् ॥

yathā śalyakavānākhuḥ padaṃ dhūnayate sadā | atīkṣṇenābhyupāyena tathā rāṣṭraṃ samāpibet

जैसे शल्यक-आखु (एक प्रकार का चूहा) तीखे उपाय का सहारा लिए बिना सदा पैर को कुतरता रहता है, वैसे ही राजा राष्ट्र का रस पिए।

श्लोक 7 (12.88.7)

अल्पेनाल्पेन देयेन वर्धमानं प्रदापयेत् । ततो भूयस्ततो भूयः क्रमवृद्धिं समाचरेत् ॥

alpenālpena deyena vardhamānaṃ pradāpayet | tato bhūyastato bhūyaḥ kramavṛddhiṃ samācaret

थोड़े-थोड़े देय से आरम्भ कर बढ़ाते हुए कर दिलवाए; फिर और अधिक, फिर और अधिक — इस प्रकार क्रम से वृद्धि करे।

श्लोक 8 (12.88.8)

दमयन्निव दम्यानि शश्वद्भारं विवर्धयेत् । मृदुपूर्वं प्रयत्नेन पाशानभ्यवहारयेत् ॥

damayanniva damyāni śaśvadbhāraṃ vivardhayet | mṛdupūrvaṃ prayatnena pāśānabhyavahārayet

जैसे सधाने योग्य पशुओं को सधाने वाला उन पर लगातार भार बढ़ाता है, वैसे ही वह भार बढ़ाए; आरम्भ में कोमलता से और यत्नपूर्वक उन्हें पाश (रस्सियाँ) पहनने का अभ्यासी बनाए।

श्लोक 9 (12.88.9)

सकृत्पाशावकीर्णास्ते न भविष्यन्ति दुर्दमाः । उचितेनैव भोक्तव्यास्ते भविष्यन्त्ययत्नतः ॥

sakṛtpāśāvakīrṇāste na bhaviṣyanti durdamāḥ | ucitenaiva bhoktavyāste bhaviṣyantyayatnataḥ

एक बार पाशों में बँध जाने पर वे कठिनाई से वश में आने वाले नहीं रहेंगे; तब उचित रीति से, बिना प्रयास के उनका उपभोग हो सकेगा।

श्लोक 10 (12.88.10)

तस्मात्सर्वसमारम्भो दुर्लभः पुरुषं प्रति । यथा मुख्यान्सान्त्वयित्वा भोक्तव्या इतरे जनाः ॥

tasmātsarvasamārambho durlabhaḥ puruṣaṃ prati | yathā mukhyānsāntvayitvā bhoktavyā itare janāḥ

इसलिए प्रत्येक पुरुष से एक साथ सब कुछ लेने का आरम्भ करना कठिन है; मुखियाओं को सान्त्वना देकर ही शेष जनों से कर लेना चाहिए।

श्लोक 11 (12.88.11)

ततस्तान्भेदयित्वा तु परस्परविवक्षितान् । भुञ्जीत सान्त्वयंश्चैव यथासुखमयत्नतः ॥

tatastānbhedayitvā tu parasparavivakṣitān | bhuñjīta sāntvayaṃścaiva yathāsukhamayatnataḥ

फिर उन्हें आपस में एक-दूसरे के विरुद्ध बोलने वाला बनाकर, सान्त्वना देते हुए, अपनी सुविधा से बिना प्रयास के उनका उपभोग करे।

श्लोक 12 (12.88.12)

न चास्थाने न चाकाले करांस्तेभ्यो निपातयेत् । आनुपूर्व्येण सान्त्वेन यथाकालं यथाविधि ॥

na cāsthāne na cākāle karāṃstebhyo nipātayet | ānupūrvyeṇa sāntvena yathākālaṃ yathāvidhi

अनुचित स्थान पर और अनुचित समय पर उन पर कर न डाले; क्रम से, सान्त्वना के साथ, समय और विधि के अनुसार डाले।

श्लोक 13 (12.88.13)

उपायान्प्रब्रवीम्येतान्न मे माया विवक्षिता । अनुपायेन दमयन्प्रकोपयति वाजिनः ॥

upāyānprabravīmyetānna me māyā vivakṣitā | anupāyena damayanprakopayati vājinaḥ

मैं ये उपाय बता रहा हूँ; मेरा कपट करने का इरादा नहीं है। क्योंकि उचित उपाय के बिना घोड़ों को सधाने वाला उन्हें भड़का ही देता है।

श्लोक 14 (12.88.14)

पानागारनिवेशाश्च वेश्याः प्रापणिकास्तथा । कुशीलवाः सकितवा ये चान्ये केचिदीदृशाः ॥

pānāgāraniveśāśca veśyāḥ prāpaṇikāstathā | kuśīlavāḥ sakitavā ye cānye kecidīdṛśāḥ

मदिरालय और ठिकाने, वेश्याएँ और दुकानदार, नट-गायक और जुआरी, तथा ऐसे ही जो अन्य कोई हों —

श्लोक 15 (12.88.15)

नियम्याः सर्व एवैते ये राष्ट्रस्योपघातकाः । एते राष्ट्रेऽभितिष्ठन्तो बाधन्ते भद्रिकाः प्रजाः ॥

niyamyāḥ sarva evaite ye rāṣṭrasyopaghātakāḥ | ete rāṣṭre'bhitiṣṭhanto bādhante bhadrikāḥ prajāḥ

ये सभी, जो राष्ट्र को हानि पहुँचाने वाले हैं, नियन्त्रण में रखे जाने योग्य हैं; राज्य में रहकर ये भले प्रजाजनों को सताते हैं।

श्लोक 16 (12.88.16)

न केनचिद्याचितव्यः कश्चित्किंचिदनापदि । इति व्यवस्था भूतानां पुरस्तान्मनुना कृता ॥

na kenacidyācitavyaḥ kaścitkiṃcidanāpadi | iti vyavasthā bhūtānāṃ purastānmanunā kṛtā

आपत्ति के बिना कोई किसी से कुछ न माँगे — प्राणियों के लिए यह मर्यादा बहुत पहले मनु ने बाँधी थी।

श्लोक 17 (12.88.17)

सर्वे तथाऽनुजीवेयुर्न कुर्युः कर्म चेदिह । सर्व एव इमे लोका न भवेयुरसंशयम् ॥

sarve tathā'nujīveyurna kuryuḥ karma cediha | sarva eva ime lokā na bhaveyurasaṃśayam

यदि सब इस प्रकार दूसरों के सहारे जीने लगें और यहाँ कर्म न करें, तो ये सब लोक निस्सन्देह नष्ट हो जाएँगे।

श्लोक 18 (12.88.18)

प्रभुर्नियमने राजा य एतान्न नियच्छति । भुङ्क्ते स तस्य पापस्य चतुर्भागमिति श्रुतिः ॥

prabhurniyamane rājā ya etānna niyacchati | bhuṅkte sa tasya pāpasya caturbhāgamiti śrutiḥ

जो राजा इन्हें नियन्त्रित करने में समर्थ होकर भी इन्हें नियन्त्रित नहीं करता, वह इनके पाप का चौथा भाग भोगता है — ऐसी श्रुति है।

श्लोक 19 (12.88.19)

भोक्ता तस्य तु पापस्य सुकृतस्य यथातथा । नियन्तव्याः सदा राज्ञा पापा ये स्युर्नराधिप ॥

bhoktā tasya tu pāpasya sukṛtasya yathātathā | niyantavyāḥ sadā rājñā pāpā ye syurnarādhipa

वह उनके पाप का भी भागी होता है और पुण्य का भी, जैसा हो वैसा। इसलिए हे नरेश्वर, जो पापी हों, उन्हें राजा सदा नियन्त्रण में रखे।

श्लोक 20 (12.88.20)

कृतपापस्त्वसौ राजा य एतान्न नियच्छति । तथा कृतस्य धर्मस्य चतुर्भागमुपाश्नुते ॥

kṛtapāpastvasau rājā ya etānna niyacchati | tathā kṛtasya dharmasya caturbhāgamupāśnute

जो राजा इन्हें नियन्त्रित नहीं करता, वह स्वयं पाप का करने वाला ही है; और उसी प्रकार वह किए हुए धर्म का भी चौथा भाग पाता है।

श्लोक 21 (12.88.21)

स्थानान्येतानि संयम्य प्रसङ्गो भूतिनाशनः । कामे प्रसक्तः पुरुषः किमकार्यं विवर्जयेत् ॥

sthānānyetāni saṃyamya prasaṅgo bhūtināśanaḥ | kāme prasaktaḥ puruṣaḥ kimakāryaṃ vivarjayet

इन अड्डों को रोककर रखे, क्योंकि आसक्ति ऐश्वर्य का नाश करती है; काम में फँसा हुआ मनुष्य कौन-सा न करने योग्य कर्म छोड़ेगा?

श्लोक 22 (12.88.22)

मद्यमांसपरस्वानि तथा दारधनानि च । आहरेद्रागवशगस्तथा शास्त्रं प्रदर्शयेत् ॥

madyamāṃsaparasvāni tathā dāradhanāni ca | āharedrāgavaśagastathā śāstraṃ pradarśayet

राग के वश में हुए ये लोग मद्य, मांस, पराया धन, स्त्रियाँ और धन छीन लेंगे; इसलिए राजा शास्त्र की आज्ञा को स्पष्ट रूप से लागू करे।

श्लोक 23 (12.88.23)

आपद्येव तु याचन्ते येषां नास्ति परिग्रहः । दातव्यं धर्मतस्तेभ्यस्त्वनुक्रोशाद्भयान्न तु ॥

āpadyeva tu yācante yeṣāṃ nāsti parigrahaḥ | dātavyaṃ dharmatastebhyastvanukrośādbhayānna tu

जो केवल आपत्ति में ही माँगते हैं और जिनके पास कोई संग्रह नहीं है, उन्हें धर्म के अनुसार, करुणा से देना चाहिए, भय से नहीं।

श्लोक 24 (12.88.24)

मा ते राष्ट्रे याचनका भवेयुर्मा च दस्यवः । उपादातार एवैते नैते भूतस्य भावकाः ॥

mā te rāṣṭre yācanakā bhaveyurmā ca dasyavaḥ | upādātāra evaite naite bhūtasya bhāvakāḥ

तुम्हारे राष्ट्र में न भिखारी हों, न डाकू; ये केवल लेने वाले हैं, प्राणियों की वृद्धि करने वाले नहीं।

श्लोक 25 (12.88.25)

ये भूतान्यनुगृह्णन्ति वर्धयन्ति च ये प्रजाः । तेते राष्ट्रेषु वर्तन्तां मा भूतानां प्रबाधकाः ॥

ye bhūtānyanugṛhṇanti vardhayanti ca ye prajāḥ | tete rāṣṭreṣu vartantāṃ mā bhūtānāṃ prabādhakāḥ

जो प्राणियों पर अनुग्रह करते हैं और प्रजा को बढ़ाते हैं, वे ही राष्ट्रों में रहें; प्राणियों को पीड़ा देने वाले न रहें।

श्लोक 26 (12.88.26)

दण्ड्यास्ते च महाराज धनादानप्रयोजकाः । प्रयोगं कारयेथास्ते यथा दद्युः करांस्तथा ॥

daṇḍyāste ca mahārāja dhanādānaprayojakāḥ | prayogaṃ kārayethāste yathā dadyuḥ karāṃstathā

और हे महाराज, जो दूसरों का धन हड़पने में लगे हैं, वे दण्डनीय हैं; उन्हें ऐसे कार्यों में लगवाओ कि वे कर देने लगें।

श्लोक 27 (12.88.27)

कृषिगोरक्ष्यवाणिज्यं यच्चान्यत्किंचिदीदृशम् । पुरुषैः कारयेत्कर्म बहुभिः कर्मभेदतः ॥

kṛṣigorakṣyavāṇijyaṃ yaccānyatkiṃcidīdṛśam | puruṣaiḥ kārayetkarma bahubhiḥ karmabhedataḥ

खेती, गोरक्षा, वाणिज्य और इसी प्रकार का जो अन्य कर्म हो, उसे कर्म के भेद से बहुत-से पुरुषों से करवाए।

श्लोक 28 (12.88.28)

नरश्चेत्कृषिगोरक्ष्यं वाणिज्यं चाप्यनुष्ठितः । संशयं लभते किंचित्तेन राजा विगर्ह्यते ॥

naraścetkṛṣigorakṣyaṃ vāṇijyaṃ cāpyanuṣṭhitaḥ | saṃśayaṃ labhate kiṃcittena rājā vigarhyate

यदि कोई मनुष्य खेती, गोरक्षा या वाणिज्य में लगा हो और उसे कुछ संकट हो जाए, तो उसके कारण राजा की निन्दा होती है।

श्लोक 29 (12.88.29)

धनिनः पूजयेन्नित्यं पानाच्छादनभोजनैः । वक्तव्याश्चानुगृह्णीध्वं प्रजाः सह मयेति वै ॥

dhaninaḥ pūjayennityaṃ pānācchādanabhojanaiḥ | vaktavyāścānugṛhṇīdhvaṃ prajāḥ saha mayeti vai

वह धनवानों का सदा पान, वस्त्र और भोजन से सत्कार करे, और प्रजा से कहे — "मेरे साथ मिलकर तुम भी इन पर कृपा करो।"

श्लोक 30 (12.88.30)

अङ्गमेतन्महद्राज्ये धनिनो नाम भारत । ककुदं सर्वभूतानां धनस्थो नात्र संशयः ॥

aṅgametanmahadrājye dhanino nāma bhārata | kakudaṃ sarvabhūtānāṃ dhanastho nātra saṃśayaḥ

हे भारत, राज्य में धनी लोग एक बड़ा अंग हैं; धन में स्थित मनुष्य सब प्राणियों का ककुद (शिखर) है, इसमें संशय नहीं।

श्लोक 31 (12.88.31)

प्राज्ञः शूरो धनस्थश्च स्वामी धार्मिक एव च । तपस्वी सत्यवादी च बुद्धिमांश्चापि रक्षति ॥

prājñaḥ śūro dhanasthaśca svāmī dhārmika eva ca | tapasvī satyavādī ca buddhimāṃścāpi rakṣati

बुद्धिमान, शूर, धनवान, स्वामी, धार्मिक, तपस्वी, सत्यवादी और विवेकी पुरुष रक्षा करता है।

श्लोक 32 (12.88.32)

तस्मात्सर्वेषु भूतेषु प्रीतिमान्भव पार्थिव । सत्यमार्जवमक्रोधमानृशंस्यं च पालय ॥

tasmātsarveṣu bhūteṣu prītimānbhava pārthiva | satyamārjavamakrodhamānṛśaṃsyaṃ ca pālaya

इसलिए हे राजन्, सब प्राणियों पर स्नेह रखो; सत्य, सरलता, अक्रोध और दयालुता का पालन करो।

श्लोक 33 (12.88.33)

एवं दण्डं च कोशं च मित्रं भूमिं च लप्स्यसि । सत्यार्जवपरो राजन्मित्रकोशबलान्वितः ॥

evaṃ daṇḍaṃ ca kośaṃ ca mitraṃ bhūmiṃ ca lapsyasi | satyārjavaparo rājanmitrakośabalānvitaḥ

हे राजन्, इस प्रकार तुम दण्ड, कोश, मित्र और भूमि प्राप्त करोगे; सत्य और सरलता में लगे रहकर तुम मित्र, कोश और बल से सम्पन्न होगे।

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