शान्ति पर्व · अध्याय 90
उतथ्य का मान्धाता को उपदेश: राजा और धर्म
भीष्म वह उपदेश सुनाना आरम्भ करते हैं जो उतथ्य ने युवनाश्व के पुत्र राजा मान्धाता को दिया था। राजा धर्म के लिए होता है और उसके आचरण पर सारा लोक टिका है: जब वह पापियों को नहीं रोकता, तब सम्पत्ति, पूजा, यज्ञ और व्यवस्था सब नष्ट हो जाते हैं। धर्म वृष (बैल) है और उसका नाश करने वाला वृषल है। उतथ्य ब्राह्मणों से ईर्ष्या के विरुद्ध चेताते हैं और बलि का उदाहरण देते हैं जिसे श्री छोड़ गई थी, श्री के पुत्र दर्प से सावधान करते हैं, कुछ भयों और दोषों की सूची देते हैं, तथा प्रमादी राजा पर आने वाली विपत्तियों का वर्णन करते हैं।
भीष्म उवाच
श्लोक 1 (12.90.1)
यानङ्गिराः क्षत्रधर्मानुतथ्यो ब्रह्मवित्तमः । मान्धात्रे यौवनाश्चाय प्रीतिमानभ्यभाषत ॥
yānaṅgirāḥ kṣatradharmānutathyo brahmavittamaḥ | māndhātre yauvanāścāya prītimānabhyabhāṣata
क्षत्रियों के जिन धर्मों का उपदेश अंगिरा-वंशी, ब्रह्मवेत्ताओं में श्रेष्ठ उतथ्य ने प्रसन्न होकर युवनाश्व के पुत्र मान्धाता को दिया था —
श्लोक 2 (12.90.2)
स यथाऽनुशशासैनमुतथ्यो ब्रह्मवित्तमः । तत्तेऽहं संप्रवक्ष्यामि निखिलेन युधिष्ठिर ॥
sa yathā'nuśaśāsainamutathyo brahmavittamaḥ | tatte'haṃ saṃpravakṣyāmi nikhilena yudhiṣṭhira
जैसा उस ब्रह्मवेत्ता उतथ्य ने उसे उपदेश दिया, वह सब मैं तुम्हें पूर्ण रूप से बताऊँगा, हे युधिष्ठिर।
उतथ्य उवाच
श्लोक 3 (12.90.3)
धर्माय राजा भवति न कामकरणाय तु । मान्धातरभिजानीहि राजा लोकस्य रक्षिता ॥
dharmāya rājā bhavati na kāmakaraṇāya tu | māndhātarabhijānīhi rājā lokasya rakṣitā
राजा धर्म के लिए होता है, मनमानी करने के लिए नहीं; हे मान्धाता, जान लो कि राजा लोक का रक्षक है।
श्लोक 4 (12.90.4)
राजा चरति चेद्धर्मं देवत्वायैव कल्पते । स चेदधर्मं चरति नरकायैव गच्छति ॥
rājā carati ceddharmaṃ devatvāyaiva kalpate | sa cedadharmaṃ carati narakāyaiva gacchati
यदि राजा धर्म का आचरण करता है तो देवत्व के योग्य हो जाता है, और यदि अधर्म का आचरण करता है तो नरक को ही जाता है।
श्लोक 5 (12.90.5)
धर्मे तिष्ठन्ति भूतानि धर्मो राजनि तिष्ठति । तं राजा साधु यः शास्ति स राजा श्रियमश्नुते ॥
dharme tiṣṭhanti bhūtāni dharmo rājani tiṣṭhati | taṃ rājā sādhu yaḥ śāsti sa rājā śriyamaśnute
प्राणी धर्म में स्थित हैं, धर्म राजा में स्थित है; जो राजा उसका भली-भाँति शासन करता है, वह राजा श्री (लक्ष्मी) प्राप्त करता है।
श्लोक 6 (12.90.6)
राजापराधान्मान्धातर्लक्ष्मीवान्पाप उच्यते । देवाश्च गर्हां गच्छन्ति धर्मो नास्तीति चोच्यते ॥
rājāparādhānmāndhātarlakṣmīvānpāpa ucyate | devāśca garhāṃ gacchanti dharmo nāstīti cocyate
हे मान्धाता, राजा के अपराध से ऐश्वर्यवान मनुष्य भी पापी कहा जाता है; देवताओं की निन्दा होती है और कहा जाता है कि धर्म नहीं है।
श्लोक 7 (12.90.7)
अधर्मे वर्तमानानामर्थसिद्धिः प्रदृश्यते । तदेव मङ्गलं लोकः सर्वः समनुवर्तते ॥
adharme vartamānānāmarthasiddhiḥ pradṛśyate | tadeva maṅgalaṃ lokaḥ sarvaḥ samanuvartate
अधर्म में चलने वालों की अर्थसिद्धि दिखाई देती है, और सारा संसार उसी को मंगल मानकर उसका अनुसरण करता है।
श्लोक 8 (12.90.8)
उच्छिद्यते धर्मवृत्तमधर्मो वर्तते महान् । भयमाहुर्दिवारात्रं यदा पापो न वार्यते ॥
ucchidyate dharmavṛttamadharmo vartate mahān | bhayamāhurdivārātraṃ yadā pāpo na vāryate
धर्म का आचरण उच्छिन्न हो जाता है और महान अधर्म चल पड़ता है; जब पापी को रोका नहीं जाता, तब दिन-रात भय बना रहता है, ऐसा कहते हैं।
श्लोक 9 (12.90.9)
इदं मम इदं नेति साधूनां तात धर्मतः । न वै व्यवस्था भवति यदा पापो न वार्यते ॥
idaṃ mama idaṃ neti sādhūnāṃ tāta dharmataḥ | na vai vyavasthā bhavati yadā pāpo na vāryate
"यह मेरा है, यह नहीं" — हे तात, जब पापी को रोका नहीं जाता, तब सज्जनों के लिए धर्म के अनुसार ऐसी व्यवस्था नहीं रहती।
श्लोक 10 (12.90.10)
नैव भार्या न पशवो न क्षेत्रं न निवेशनम् । संदृश्येत मनुष्याणां यदा पापबलं भवेत् ॥
naiva bhāryā na paśavo na kṣetraṃ na niveśanam | saṃdṛśyeta manuṣyāṇāṃ yadā pāpabalaṃ bhavet
जब पाप का बल बढ़ जाता है, तब मनुष्यों के पास न पत्नी, न पशु, न खेत और न घर सुरक्षित दिखाई देता है।
श्लोक 11 (12.90.11)
देवाः पूजां न जानन्ति न स्वधां पितरस्तदा । न पूज्यन्ते ह्यतिथयो यदा पापो न वार्यते ॥
devāḥ pūjāṃ na jānanti na svadhāṃ pitarastadā | na pūjyante hyatithayo yadā pāpo na vāryate
जब पापी को रोका नहीं जाता, तब देवता पूजा नहीं पाते, पितर स्वधा नहीं पाते और अतिथियों का सम्मान नहीं होता।
श्लोक 12 (12.90.12)
न वेदानधिगच्छन्ति व्रतवन्तो द्विजातयः । न यज्ञांस्तन्वते विप्रा यदा पापो न वार्यते ॥
na vedānadhigacchanti vratavanto dvijātayaḥ | na yajñāṃstanvate viprā yadā pāpo na vāryate
जब पापी को रोका नहीं जाता, तब व्रतधारी द्विज वेदों को प्राप्त नहीं करते और ब्राह्मण यज्ञ नहीं करते।
श्लोक 13 (12.90.13)
वध्यानामिव सत्वानां मनो भवति विह्वलम् । मनुष्याणां महाराज यदा पापो न वार्यते ॥
vadhyānāmiva satvānāṃ mano bhavati vihvalam | manuṣyāṇāṃ mahārāja yadā pāpo na vāryate
हे महाराज, जब पापी को रोका नहीं जाता, तब मनुष्यों का मन वध के लिए ले जाए जाते प्राणियों के मन के समान व्याकुल हो उठता है।
श्लोक 14 (12.90.14)
उभौ लोकावभिप्रेक्ष्य राजानमसृजंस्तथा । मुनयोऽथ महद्भूतमयं धर्मो भविष्यति ॥
ubhau lokāvabhiprekṣya rājānamasṛjaṃstathā | munayo'tha mahadbhūtamayaṃ dharmo bhaviṣyati
दोनों लोकों को ध्यान में रखकर मुनियों ने राजा की सृष्टि की — "यह एक महान भूत है, यह धर्म होगा।"
श्लोक 15 (12.90.15)
यस्मिन्धर्मो विराजेत तं राजानं प्रचक्षते । यस्मिन्विलीयते धर्मस्तं देवा वृषलं विदुः ॥
yasmindharmo virājeta taṃ rājānaṃ pracakṣate | yasminvilīyate dharmastaṃ devā vṛṣalaṃ viduḥ
जिसमें धर्म शोभित होता है, उसे लोग राजा कहते हैं; जिसमें धर्म का लय हो जाता है, उसे देवता वृषल जानते हैं।
श्लोक 16 (12.90.16)
वृषो हि भगवान्धर्मो यस्तस्य कुरुते लयम् । वृषलं तं विदुर्देवास्तस्माद्धर्मं न लोपयेत् ॥
vṛṣo hi bhagavāndharmo yastasya kurute layam | vṛṣalaṃ taṃ vidurdevāstasmāddharmaṃ na lopayet
धर्म ही भगवान वृष है; जो उसका लय करता है, उसे देवता वृषल कहते हैं। इसलिए धर्म का लोप न होने दे।
श्लोक 17 (12.90.17)
धर्मे वर्धति वर्धन्ति सर्वभूतानि सर्वदा । तस्मिन्ह्रसति हीयन्ते तस्माद्धर्मं विवर्धयेत् ॥
dharme vardhati vardhanti sarvabhūtāni sarvadā | tasminhrasati hīyante tasmāddharmaṃ vivardhayet
धर्म बढ़ता है तो सब प्राणी सदा बढ़ते हैं; वह घटता है तो वे क्षीण होते हैं; इसलिए धर्म को बढ़ाना चाहिए।
श्लोक 18 (12.90.18)
धनानि स्रवति धर्मो हि धारणाद्वेति निश्चयः । मानवान् मनुष्येन्द्र स सीमान्तकरः स्मृतः ॥
dhanāni sravati dharmo hi dhāraṇādveti niścayaḥ | mānavān manuṣyendra sa sīmāntakaraḥ smṛtaḥ
धर्म धन की वर्षा करता है, और धारण करने के कारण भी धर्म कहलाता है — यह निश्चित है। हे मनुष्येन्द्र, वह मनुष्यों के लिए सीमा बाँधने वाला कहा गया है।
श्लोक 19 (12.90.19)
प्रभवार्थं हि भूतानां धर्मः सृष्टः स्वयंभुवा । तस्मात्प्रवर्धयेद्धर्मं प्रजानुग्रहकारणात् ॥
prabhavārthaṃ hi bhūtānāṃ dharmaḥ sṛṣṭaḥ svayaṃbhuvā | tasmātpravardhayeddharmaṃ prajānugrahakāraṇāt
प्राणियों की उत्पत्ति और वृद्धि के लिए स्वयम्भू ने धर्म की रचना की; इसलिए प्रजा पर अनुग्रह के लिए धर्म को बढ़ाए।
श्लोक 20 (12.90.20)
तस्माद्धि राजशार्दूल धर्मः श्रेष्ठतरः स्मृतः । स राजायः प्रजाः शास्ति साधुकृत्पुरुषर्षभ ॥
tasmāddhi rājaśārdūla dharmaḥ śreṣṭhataraḥ smṛtaḥ | sa rājāyaḥ prajāḥ śāsti sādhukṛtpuruṣarṣabha
हे राजशार्दूल, इसी कारण धर्म श्रेष्ठतर माना गया है। हे पुरुषश्रेष्ठ, वही राजा है जो भलाई करता हुआ प्रजा का शासन करता है।
श्लोक 21 (12.90.21)
कामक्रोधावनादृत्य धर्ममेवानुपालयेत् । धर्मः श्रेयस्करतमो राज्ञां भरतसत्तम ॥
kāmakrodhāvanādṛtya dharmamevānupālayet | dharmaḥ śreyaskaratamo rājñāṃ bharatasattama
काम और क्रोध की उपेक्षा करके धर्म का ही पालन करे; हे भरतश्रेष्ठ, राजाओं के लिए धर्म ही सबसे अधिक कल्याणकारी है।
श्लोक 22 (12.90.22)
धर्मस्य ब्राह्मणे योनिस्तस्मात्तान्पूजयेत्सदा । ब्राह्मणानां च मान्धातः कुर्यात्कामानमत्सरी ॥
dharmasya brāhmaṇe yonistasmāttānpūjayetsadā | brāhmaṇānāṃ ca māndhātaḥ kuryātkāmānamatsarī
धर्म की योनि (उत्पत्ति-स्थान) ब्राह्मण हैं, इसलिए सदा उनका सत्कार करे; और हे मान्धाता, ईर्ष्या छोड़कर ब्राह्मणों की इच्छाएँ पूरी करे।
श्लोक 23 (12.90.23)
तेषां ह्यकामकरणाद्राज्ञः संजायते भयम् । मित्राणि न च वर्धन्ते तथाऽमित्रीभवन्त्यपि ॥
teṣāṃ hyakāmakaraṇādrājñaḥ saṃjāyate bhayam | mitrāṇi na ca vardhante tathā'mitrībhavantyapi
उनकी इच्छा पूरी न करने से राजा पर भय आता है; उसके मित्र नहीं बढ़ते और वे शत्रु भी बन जाते हैं।
श्लोक 24 (12.90.24)
ब्राह्मणानां सदासूयन्बाल्याद्वैरोचनिर्बलिः । अथास्माच्छ्रीरपाक्रामद्याऽस्मिन्नासीत्प्रतापिनी ॥
brāhmaṇānāṃ sadāsūyanbālyādvairocanirbaliḥ | athāsmācchrīrapākrāmadyā'sminnāsītpratāpinī
विरोचन का पुत्र बलि युवावस्था की नादानी में ब्राह्मणों से सदा ईर्ष्या करता रहा; तब वह प्रतापिनी श्री, जो उसमें निवास करती थी, उसे छोड़कर चली गई।
श्लोक 25 (12.90.25)
ततस्तस्मादपाक्रम्य साऽगच्छत्पाकशासनम् । अथ सोऽन्वतपत्पश्चाच्छ्रियं दृष्ट्वा पुरंदरे ॥
tatastasmādapākramya sā'gacchatpākaśāsanam | atha so'nvatapatpaścācchriyaṃ dṛṣṭvā puraṃdare
उसे छोड़कर वह पाकशासन इन्द्र के पास गई; तब पुरन्दर में श्री को देखकर बलि बाद में बहुत संतप्त हुआ।
श्लोक 26 (12.90.26)
एतत्फलमसूयाया अभिमानस्य चाभिभो । तस्माद्बुध्यस्व मान्धातर्मा त्वां जह्यात्प्रतापिनी ॥
etatphalamasūyāyā abhimānasya cābhibho | tasmādbudhyasva māndhātarmā tvāṃ jahyātpratāpinī
हे प्रभु, यह ईर्ष्या और अभिमान का फल है; इसलिए हे मान्धाता, सावधान हो जाओ कि वह प्रतापिनी श्री तुम्हें न छोड़ दे।
श्लोक 27 (12.90.27)
दर्पोनाम श्रियः पुत्रो जज्ञेऽधर्मादिति श्रुतिः । तेन देवासुरा राजन्नीताः सुबहवो व्ययम् ॥
darponāma śriyaḥ putro jajñe'dharmāditi śrutiḥ | tena devāsurā rājannītāḥ subahavo vyayam
श्रुति है कि श्री का पुत्र दर्प अधर्म से उत्पन्न हुआ; हे राजन्, उसके द्वारा बहुत-से देवता और असुर विनाश को पहुँचा दिए गए।
श्लोक 28 (12.90.28)
राजर्षयश्च बहवस्तथा बुध्यस्व पार्थिव । राजा भवति तं जित्वा दासस्तेन पराजितः ॥
rājarṣayaśca bahavastathā budhyasva pārthiva | rājā bhavati taṃ jitvā dāsastena parājitaḥ
और बहुत-से राजर्षि भी; हे पार्थिव, यह समझ लो — जो उसे जीत लेता है वह राजा होता है, और जो उससे पराजित होता है वह उसका दास बन जाता है।
श्लोक 29 (12.90.29)
स यथा दर्पसहितमधर्मं नानुसेवते । तथा वर्तस्व मान्धातश्चिरं चेत्स्थातुमिच्छसि ॥
sa yathā darpasahitamadharmaṃ nānusevate | tathā vartasva māndhātaściraṃ cetsthātumicchasi
हे मान्धाता, ऐसा आचरण करो कि राजा दर्प से युक्त अधर्म का सेवन न करे, यदि तुम चिरकाल तक टिकना चाहते हो।
श्लोक 30 (12.90.30)
मत्तात्प्रमत्तात्पौगण्डादुन्मत्ताच्च विशेषतः । निन्दिताच्चासदाचाराद्दुर्हृदां चापि सेवनात् ॥
mattātpramattātpaugaṇḍādunmattācca viśeṣataḥ | ninditāccāsadācārāddurhṛdāṃ cāpi sevanāt
मतवाले, असावधान, अनुभवहीन और विशेषकर पागल से; निन्दित और दुराचारी से; और दुर्हृदों की संगति से —
श्लोक 31 (12.90.31)
निगृहीतादमात्याच्च स्त्रीभ्यश्चैव विशेषतः । पर्वताद्विषमाद्दुर्गाद्धस्तिनोऽश्वात्सरीसृपात् ॥
nigṛhītādamātyācca strībhyaścaiva viśeṣataḥ | parvatādviṣamāddurgāddhastino'śvātsarīsṛpāt
दण्डित अमात्य से और विशेषकर स्त्रियों से; पर्वत, ऊबड़-खाबड़ भूमि और दुर्गम स्थान से; हाथी, घोड़े और रेंगने वाले जन्तु से —
श्लोक 32 (12.90.32)
एतेभ्योऽनित्ययुक्तः स्यान्नक्तं चर्यां च वर्जयेत् । अत्याशां चाभिमानं च दम्भं क्रोधं च वर्जयेत् ॥
etebhyo'nityayuktaḥ syānnaktaṃ caryāṃ ca varjayet | atyāśāṃ cābhimānaṃ ca dambhaṃ krodhaṃ ca varjayet
इन सबसे वह सदा अलग रहे और रात में घूमना छोड़े; अत्यधिक आशा (लोभ), अभिमान, दम्भ और क्रोध को भी त्याग दे।
श्लोक 33 (12.90.33)
अविज्ञातासु च स्त्रीषु क्लीबासु स्वैरिणीषु च । परभार्यासु कन्यासु नाचरेन्मैथुनं नृप ॥
avijñātāsu ca strīṣu klībāsu svairiṇīṣu ca | parabhāryāsu kanyāsu nācarenmaithunaṃ nṛpa
हे राजन्, अज्ञात स्त्रियों, नपुंसक स्त्रियों, स्वेच्छाचारिणियों, पराई स्त्रियों और कन्याओं के साथ वह मैथुन न करे।
श्लोक 34 (12.90.34)
कुलेषु पापरक्षांसि जायन्ते वर्णसंकरात् । अपुमांसोऽङ्गहीनाश्च स्थूलजिह्वा विचेतसः ॥
kuleṣu pāparakṣāṃsi jāyante varṇasaṃkarāt | apumāṃso'ṅgahīnāśca sthūlajihvā vicetasaḥ
वर्णसंकर से कुलों में पापी राक्षस उत्पन्न होते हैं, तथा नपुंसक, अंगहीन, मोटी जीभ वाले और मूढ़ बुद्धि वाले भी।
श्लोक 35 (12.90.35)
एते चान्ये च जायन्ते यदा राजा प्रमाद्यति । तस्माद्राज्ञा विशेषेण वर्तितव्यं प्रजाहिते ॥
ete cānye ca jāyante yadā rājā pramādyati | tasmādrājñā viśeṣeṇa vartitavyaṃ prajāhite
जब राजा प्रमाद करता है, तब ये और अन्य भी उत्पन्न होते हैं; इसलिए राजा को प्रजा के हित में विशेष सावधानी से बर्ताव करना चाहिए।
श्लोक 36 (12.90.36)
क्षत्रियस्य प्रमत्तस्य दोषः संजायते महान् । अधर्माः संप्रवर्धन्ते प्रजासंकरकारकाः ॥
kṣatriyasya pramattasya doṣaḥ saṃjāyate mahān | adharmāḥ saṃpravardhante prajāsaṃkarakārakāḥ
प्रमादी क्षत्रिय में बड़ा दोष उत्पन्न होता है; प्रजा में वर्णसंकर करने वाले अधर्म बढ़ते हैं।
श्लोक 37 (12.90.37)
अशीते विद्यते शीतं शीते शीतं न विद्यते । अवृष्टिरतिवृष्टिश्च व्याधिश्चाप्याविशेत्प्रजाः ॥
aśīte vidyate śītaṃ śīte śītaṃ na vidyate | avṛṣṭirativṛṣṭiśca vyādhiścāpyāviśetprajāḥ
जहाँ शीत नहीं होना चाहिए वहाँ शीत मिलता है और शीत में शीत नहीं रहता; अनावृष्टि, अतिवृष्टि और रोग प्रजा में घुस आते हैं।
श्लोक 38 (12.90.38)
नक्षत्राण्युपतिष्ठन्ति ग्रहा घोरास्तथापरे । उत्पाताश्चात्र दृश्यन्ते बहवो राजनाशनाः ॥
nakṣatrāṇyupatiṣṭhanti grahā ghorāstathāpare | utpātāścātra dṛśyante bahavo rājanāśanāḥ
अशुभ नक्षत्र (धूमकेतु आदि) उदित होते हैं, भयंकर ग्रह तथा अन्य भी; यहाँ बहुत-से उत्पात दिखाई देते हैं जो राजाओं का नाश करने वाले हैं।
श्लोक 39 (12.90.39)
अरक्षितात्मा यो राजा प्रजाश्चापि न रक्षति । प्रजाश्च तस्य क्षीयन्ते ततः सोऽनु विनश्यति ॥
arakṣitātmā yo rājā prajāścāpi na rakṣati | prajāśca tasya kṣīyante tataḥ so'nu vinaśyati
जो राजा अपनी रक्षा नहीं करता और प्रजा की भी रक्षा नहीं करता, उसकी प्रजा क्षीण होती जाती है और फिर वह भी नष्ट हो जाता है।
श्लोक 40 (12.90.40)
द्वावाददाते ह्येकस्य द्वयोः सुबहवोऽपरे । कुमार्यः संप्रलुप्यन्ते तदाहुर्नृपदूषणम् ॥
dvāvādadāte hyekasya dvayoḥ subahavo'pare | kumāryaḥ saṃpralupyante tadāhurnṛpadūṣaṇam
दो मनुष्य एक का धन छीन लेते हैं और बहुत-से दूसरे उन दोनों का; कुमारियाँ उजाड़ी जाती हैं — इसे लोग राजा का दोष कहते हैं।
श्लोक 41 (12.90.41)
ममैतदिति नैतच्च मनुष्येष्ववतिष्ठति । त्यक्त्वा धर्मं यदा राजा प्रमादमनुतिष्ठति ॥
mamaitaditi naitacca manuṣyeṣvavatiṣṭhati | tyaktvā dharmaṃ yadā rājā pramādamanutiṣṭhati
"यह मेरा है" — यह भाव भी मनुष्यों में नहीं टिकता, जब राजा धर्म त्यागकर प्रमाद में लग जाता है।