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शान्ति पर्व · अध्याय 91

उचथ्य का मान्धाता को राजधर्म का उपदेश

भीष्म युधिष्ठिर को वह उपदेश सुनाते हैं जो ऋषि उचथ्य ने राजा मान्धाता को दिया था। राजा ही जगत् की व्यवस्था और उसके विनाश का कारण है; उसे दुर्बल के साथ कभी अन्याय नहीं करना चाहिए, क्योंकि दुर्बल का क्रोध बलवान् को भी भस्म कर देता है। उचथ्य यम और इन्द्र को आदर्श मानकर राजधर्म के कर्म गिनाते हैं। अन्त में भीष्म बताते हैं कि मान्धाता ने इसी उपदेश पर चलकर पृथ्वी पाई, और युधिष्ठिर को भी वैसा ही करने को कहते हैं।

अध्याय 90अध्याय-सूचीअध्याय 92

उतथ्य उवाच

श्लोक 1 (12.91.1)

कालवर्षी च पर्जन्यो धर्मचारी च पार्थिवः । संपद्यदेषा भवति सा बिभर्ति सुखं प्रजाः ॥

kālavarṣī ca parjanyo dharmacārī ca pārthivaḥ | saṃpadyadeṣā bhavati sā bibharti sukhaṃ prajāḥ

समय पर बरसने वाला मेघ और धर्म का आचरण करने वाला राजा — जब ऐसी सम्पदा प्राप्त होती है, तब वह प्रजा का सुखपूर्वक पालन करती है।

श्लोक 2 (12.91.2)

यो न जानाति निर्हर्तुं वस्त्राणां रजको मलम् । रत्नानि वा शोधयितुं यथा नास्ति तथैव सः ॥

yo na jānāti nirhartuṃ vastrāṇāṃ rajako malam | ratnāni vā śodhayituṃ yathā nāsti tathaiva saḥ

जो धोबी वस्त्रों का मैल छुड़ाना या रत्नों को शुद्ध करना नहीं जानता, वह वैसा ही है मानो हो ही नहीं।

श्लोक 3 (12.91.3)

एवमेतद्द्विजेन्द्राणां क्षत्रियाणां विशां तथा । शूद्रश्चतुर्थो वर्णानां नानाकर्मस्ववस्थितः ॥

evametaddvijendrāṇāṃ kṣatriyāṇāṃ viśāṃ tathā | śūdraścaturtho varṇānāṃ nānākarmasvavasthitaḥ

यही बात श्रेष्ठ द्विजों (ब्राह्मणों), क्षत्रियों और वैश्यों के विषय में है, और चौथे वर्ण शूद्र के विषय में भी, जो सब अपने-अपने भिन्न-भिन्न कर्मों में स्थित हैं।

श्लोक 4 (12.91.4)

कर्म शूद्रे कृषिर्वैश्ये दण्डनीतिश्च राजनि । ब्रह्मचर्यं तपो मन्त्राः सत्यं चापि द्विजातिषु ॥

karma śūdre kṛṣirvaiśye daṇḍanītiśca rājani | brahmacaryaṃ tapo mantrāḥ satyaṃ cāpi dvijātiṣu

शूद्र का कर्म सेवा है, वैश्य का कृषि और राजा का दण्डनीति; ब्रह्मचर्य, तप, मन्त्र और सत्य द्विजातियों में प्रतिष्ठित हैं।

श्लोक 5 (12.91.5)

तेषां यः क्षत्रियो वेद पात्राणामिव शोधनम् । शीलदोषान्विनिर्हर्तुं स पिता स प्रजापतिः ॥

teṣāṃ yaḥ kṣatriyo veda pātrāṇāmiva śodhanam | śīladoṣānvinirhartuṃ sa pitā sa prajāpatiḥ

इनमें जो क्षत्रिय पात्रों की सफ़ाई की तरह शील के दोषों को दूर करना जानता है, वह पिता है, वही प्रजापति है।

श्लोक 6 (12.91.6)

कृतं त्रेता द्वापरश्च कलिश्च भरतर्षभ । राजवृत्तानि सर्वाणि राजैव युगमुच्यते ॥

kṛtaṃ tretā dvāparaśca kaliśca bharatarṣabha | rājavṛttāni sarvāṇi rājaiva yugamucyate

हे भरतश्रेष्ठ! कृत, त्रेता, द्वापर और कलि — ये सब राजा के ही आचरण हैं; राजा ही युग कहलाता है।

श्लोक 7 (12.91.7)

चातुर्वर्ण्यं तथा वेदाश्चातुराश्रम्यमेव च । सर्वमेतत्प्रमुह्येत यदा राजा प्रमाद्यति ॥

cāturvarṇyaṃ tathā vedāścāturāśramyameva ca | sarvametatpramuhyeta yadā rājā pramādyati

चारों वर्ण, वेद और चारों आश्रम — यह सब भ्रम में पड़ जाता है, जब राजा प्रमाद करता है।

श्लोक 8 (12.91.8)

अग्नित्रेता त्रयी विद्या यज्ञाश्च सहदक्षिणाः । सर्व एव प्रमुह्यन्ते यदा राजा प्रमाद्यति ॥

agnitretā trayī vidyā yajñāśca sahadakṣiṇāḥ | sarva eva pramuhyante yadā rājā pramādyati

तीनों अग्नियाँ, त्रयी विद्या और दक्षिणा सहित यज्ञ — सब भ्रम में पड़ जाते हैं, जब राजा प्रमाद करता है।

श्लोक 9 (12.91.9)

राजैव कर्ता भूतानां राजैव च विनाशकः । धर्मात्मा यः स कर्ता स्यादधर्मात्मा विनाशकः ॥

rājaiva kartā bhūtānāṃ rājaiva ca vināśakaḥ | dharmātmā yaḥ sa kartā syādadharmātmā vināśakaḥ

राजा ही प्राणियों का रचयिता है और राजा ही उनका विनाशक। जो धर्मात्मा है वह रचयिता होता है, और जो अधर्मात्मा है वह विनाशक।

श्लोक 10 (12.91.10)

राज्ञो भार्याश्च पुत्राश्च बान्धवाः सुहृदस्तथा । समेत्य सर्वे शोचन्ति यदा राजा प्रमाद्यति ॥

rājño bhāryāśca putrāśca bāndhavāḥ suhṛdastathā | sametya sarve śocanti yadā rājā pramādyati

जब राजा प्रमाद करता है, तब राजा की पत्नियाँ, पुत्र, बन्धु और मित्र सब मिलकर शोक करते हैं।

श्लोक 11 (12.91.11)

हस्तिनोऽश्वाश्च गावश्चाप्युष्ट्राश्वतरगर्दभाः । अधर्मवृत्ते नृपतौ सर्वे सीदन्ति जन्तवः ॥

hastino'śvāśca gāvaścāpyuṣṭrāśvataragardabhāḥ | adharmavṛtte nṛpatau sarve sīdanti jantavaḥ

हाथी, घोड़े, गायें, ऊँट, खच्चर और गधे — सभी प्राणी दुःख में डूब जाते हैं, जब राजा अधर्म के मार्ग पर चलता है।

श्लोक 12 (12.91.12)

दुर्बलार्थं बलं सृष्टं धात्रा मान्धातरुच्यते । अबलं तु महद्भूतं यस्मिन्सर्वं प्रतिष्ठितम् ॥

durbalārthaṃ balaṃ sṛṣṭaṃ dhātrā māndhātarucyate | abalaṃ tu mahadbhūtaṃ yasminsarvaṃ pratiṣṭhitam

हे मान्धाता! कहा जाता है कि बल को विधाता ने दुर्बल की रक्षा के लिए रचा है; और दुर्बल एक महान् शक्ति है, जिसमें सब कुछ प्रतिष्ठित है।

श्लोक 13 (12.91.13)

यश्च भूतं संभजते ये च भूतास्तदन्वयाः । अधर्मस्थे हि नृपतौ सर्वे शोचन्ति पार्थिव ॥

yaśca bhūtaṃ saṃbhajate ye ca bhūtāstadanvayāḥ | adharmasthe hi nṛpatau sarve śocanti pārthiva

हे राजन्! जो किसी प्राणी का आश्रय लेकर जीता है और जो उसके वंश के हैं — वे सब शोक करते हैं, जब राजा अधर्म में स्थित होता है।

श्लोक 14 (12.91.14)

दुर्बलस्य च यच्चक्षुर्मुनेराशीविषस्य च । अविषह्यतमं मन्ये मा स्म दुर्बलमासदः ॥

durbalasya ca yaccakṣurmunerāśīviṣasya ca | aviṣahyatamaṃ manye mā sma durbalamāsadaḥ

दुर्बल की, मुनि की और विषैले सर्प की दृष्टि को मैं सबसे अधिक असह्य मानता हूँ। कभी दुर्बल पर आक्रमण मत करना।

श्लोक 15 (12.91.15)

दुर्बलांस्तात मन्येथा नित्यमेवाविमानितान् । मा त्वां दुर्बलचक्षूंषि प्रदहेयुः सबान्धवम् ॥

durbalāṃstāta manyethā nityamevāvimānitān | mā tvāṃ durbalacakṣūṃṣi pradaheyuḥ sabāndhavam

तात! दुर्बलों को सदा ऐसा मानना जिनका अपमान नहीं करना चाहिए। दुर्बलों की दृष्टि तुम्हें बन्धुओं सहित भस्म न कर दे।

श्लोक 16 (12.91.16)

न हि दुर्बलदग्धस्य कुले किंचित्प्ररोहति । आमूलं निर्दहन्त्येव मा स्म दुर्बलमासदः ॥

na hi durbaladagdhasya kule kiṃcitprarohati | āmūlaṃ nirdahantyeva mā sma durbalamāsadaḥ

जिस कुल को दुर्बल ने जला दिया हो, उसमें कुछ भी फिर नहीं उगता; वे उसे जड़ तक जला डालते हैं। दुर्बल पर आक्रमण मत करना।

श्लोक 17 (12.91.17)

अबलं वै बलाच्छ्रेयो यच्चातिबलवद्बलम् । बलस्याबलदग्धस्य न किंचिदवशिष्यते ॥

abalaṃ vai balācchreyo yaccātibalavadbalam | balasyābaladagdhasya na kiṃcidavaśiṣyate

दुर्बल का बल हर बल से श्रेष्ठ है, क्योंकि वह प्रबलतम बल से भी प्रबल है; दुर्बल से जले हुए बलवान् का कुछ भी शेष नहीं रहता।

श्लोक 18 (12.91.18)

विमानितो हतः क्लिष्टस्त्रातारं चेन्न विन्दति । अमानुषकृतस्तत्र दण्डो हन्ति नराधिपम् ॥

vimānito hataḥ kliṣṭastrātāraṃ cenna vindati | amānuṣakṛtastatra daṇḍo hanti narādhipam

यदि अपमानित, पीड़ित और मारा हुआ मनुष्य कोई रक्षक न पाए, तो वहाँ मनुष्य से नहीं, किसी और से आया हुआ दण्ड राजा को मार डालता है।

श्लोक 19 (12.91.19)

मा स्म तात बलस्थस्त्वं भुञ्जीथा दुर्बलं जनम् । मा त्वां दुर्बलचक्षूंषि दहन्त्वग्निरिवाशयम् ॥

mā sma tāta balasthastvaṃ bhuñjīthā durbalaṃ janam | mā tvāṃ durbalacakṣūṃṣi dahantvagnirivāśayam

तात! अपने बल के भरोसे दुर्बल जन को मत सताना। दुर्बलों की दृष्टि तुम्हें वैसे न जला दे जैसे आग घर को जला देती है।

श्लोक 20 (12.91.20)

यानि मिथ्याभिशस्तानां पतन्त्यश्रूणि रोदताम् । तानि पुत्रान्पशून्घ्नन्ति तेषां मिथ्याभिशंसिनां ॥

yāni mithyābhiśastānāṃ patantyaśrūṇi rodatām | tāni putrānpaśūnghnanti teṣāṃ mithyābhiśaṃsināṃ

झूठा दोष लगाए जाने पर रोते हुए लोगों के जो आँसू गिरते हैं, वे झूठा दोष लगाने वालों के पुत्रों और पशुओं का नाश कर देते हैं।

श्लोक 21 (12.91.21)

यदि नात्मनि पुत्रेषु न चेत्पौत्रेषु नप्तृषु । न हि पापं कृतं कर्म सद्यः फलति गौरिब ॥

yadi nātmani putreṣu na cetpautreṣu naptṛṣu | na hi pāpaṃ kṛtaṃ karma sadyaḥ phalati gauriba

यदि पाप का फल उस मनुष्य पर नहीं पड़ता, तो उसके पुत्रों पर पड़ता है; पुत्रों पर नहीं तो पौत्रों और प्रपौत्रों पर। किया हुआ पाप पृथ्वी की तरह तुरन्त फल नहीं देता।

श्लोक 22 (12.91.22)

यत्राबलो वध्यमानस्त्रातारं नाधिगच्छति । महान्दैवकृतस्तत्र दण्डः पतति दारुणः ॥

yatrābalo vadhyamānastrātāraṃ nādhigacchati | mahāndaivakṛtastatra daṇḍaḥ patati dāruṇaḥ

जहाँ मारे जाते हुए दुर्बल को कोई रक्षक नहीं मिलता, वहाँ दैव का रचा हुआ बड़ा और भयंकर दण्ड आ पड़ता है।

श्लोक 23 (12.91.23)

युक्ता यदा जानपदा भिक्षन्ते ब्राह्मणा इव । अभीक्ष्णं भिक्षुरूपेण राजानं घ्नन्ति तादृशाः ॥

yuktā yadā jānapadā bhikṣante brāhmaṇā iva | abhīkṣṇaṃ bhikṣurūpeṇa rājānaṃ ghnanti tādṛśāḥ

जब विवश होकर देहात के लोग ब्राह्मणों की तरह बार-बार भीख माँगते हैं, तब भिखारी का रूप धरे वे लोग राजा का नाश कर देते हैं।

श्लोक 24 (12.91.24)

राज्ञो यदा जनपदे बहवो राजपूरुषाः । अनयेनोपवर्तन्ते तद्राज्ञः किल्बिषं महत् ॥

rājño yadā janapade bahavo rājapūruṣāḥ | anayenopavartante tadrājñaḥ kilbiṣaṃ mahat

जब राजा के राज्य में उसके बहुत-से कर्मचारी अन्याय से बरतते हैं, तब वह राजा का बड़ा पाप होता है।

श्लोक 25 (12.91.25)

यदा युक्त्या नयेदर्थान्कामादर्थवशेन वा । कृपणं याचमानानां तद्राज्ञो वैशसं महत् ॥

yadā yuktyā nayedarthānkāmādarthavaśena vā | kṛpaṇaṃ yācamānānāṃ tadrājño vaiśasaṃ mahat

जब दीन होकर गिड़गिड़ाने वालों से कामना या धन के लोभ से छल-कौशल द्वारा धन छीना जाता है, तब वह राजा की बड़ी क्रूरता होती है।

श्लोक 26 (12.91.26)

महान्वृक्षो जायते वर्धते च । तं चैव भूतानि समाश्रयन्ति । यदा वृक्षश्छिद्यते दह्यते च । तदाश्रया अनिकेता भवन्ति ॥

mahānvṛkṣo jāyate vardhate ca | taṃ caiva bhūtāni samāśrayanti | yadā vṛkṣaśchidyate dahyate ca | tadāśrayā aniketā bhavanti

एक विशाल वृक्ष उगता और बढ़ता है, और प्राणी उसका आश्रय लेते हैं; जब वह वृक्ष काट दिया या जला दिया जाता है, तब उस पर आश्रित जीव बेघर हो जाते हैं।

श्लोक 27 (12.91.27)

यदा राष्ट्रे धर्ममग्र्यं चरन्ति । संस्कारं वा राजगुणं ब्रुवाणाः । तैश्चाधर्मश्चरितो धर्ममोहा । त्तूर्णं जह्यात्सुकृतं दुष्कृतं च ॥

yadā rāṣṭre dharmamagryaṃ caranti | saṃskāraṃ vā rājaguṇaṃ bruvāṇāḥ | taiścādharmaścarito dharmamohā | ttūrṇaṃ jahyātsukṛtaṃ duṣkṛtaṃ ca

जब राज्य में लोग परम धर्म का आचरण करते हैं, उसे संस्कार या राजा का गुण बताते हुए, और उन्हीं के द्वारा धर्म के भ्रम से अधर्म का आचरण होता है, तब वह शीघ्र ही अपना पुण्य और पाप दोनों खो बैठता है।

श्लोक 28 (12.91.28)

यत्र पापा ज्ञायमानाश्चरन्ति । सभां कलिर्विन्दते तत्र राज्ञः । यत्र राजा शास्ति नरान्न शक्त्या । न तद्राज्यं वर्धते भूमिपस्य ॥

yatra pāpā jñāyamānāścaranti | sabhāṃ kalirvindate tatra rājñaḥ | yatra rājā śāsti narānna śaktyā | na tadrājyaṃ vardhate bhūmipasya

जहाँ पापी जाने-पहचाने होकर भी खुले घूमते हैं, वहाँ राजा की सभा में कलह घुस आता है; जहाँ राजा सामर्थ्य से प्रजा पर शासन नहीं करता, उस भूपति का राज्य नहीं बढ़ता।

श्लोक 29 (12.91.29)

यश्चामात्यान्मानयित्वा यथा हि । मन्त्रे च युद्धे च नृपोऽनुयुञ्ज्यात् । विवर्धते तस्य राष्ट्रं नृपस्य । भुङ्क्ते महीं चाप्यखिलां चिराय ॥

yaścāmātyānmānayitvā yathā hi | mantre ca yuddhe ca nṛpo'nuyuñjyāt | vivardhate tasya rāṣṭraṃ nṛpasya | bhuṅkte mahīṃ cāpyakhilāṃ cirāya

जो राजा अपने अमात्यों का यथोचित सम्मान करके उन्हें मन्त्रणा और युद्ध में लगाता है, उसका राज्य बढ़ता है और वह चिरकाल तक सारी पृथ्वी का भोग करता है।

श्लोक 30 (12.91.30)

अत्रापि सुकृतं कर्म वाचं चैव सुभाषिताम् । समीक्ष्य पूजयन्राजा धर्मं प्राप्नोत्यनुत्तमम् ॥

atrāpi sukṛtaṃ karma vācaṃ caiva subhāṣitām | samīkṣya pūjayanrājā dharmaṃ prāpnotyanuttamam

इस विषय में भी, जो राजा सत्कर्म और सुभाषित वाणी को देखकर उनका आदर करता है, वह परम धर्म को प्राप्त होता है।

श्लोक 31 (12.91.31)

संविभज्य यदा भुङ्क्ते नचान्यानवमन्यते । निहन्ति बलिनं दृप्तं स राज्ञो धर्म उच्यते ॥

saṃvibhajya yadā bhuṅkte nacānyānavamanyate | nihanti balinaṃ dṛptaṃ sa rājño dharma ucyate

जब वह बाँटकर खाता है, दूसरों का तिरस्कार नहीं करता और बलवान् तथा घमण्डी को मारता है, तब उसे राजा का धर्म कहा जाता है।

श्लोक 32 (12.91.32)

त्रायते हि यदा सर्वं वाचा कायेन कर्मणा । पुत्रस्यापि न मृष्येच्च स राज्ञो धर्म उच्यते ॥

trāyate hi yadā sarvaṃ vācā kāyena karmaṇā | putrasyāpi na mṛṣyecca sa rājño dharma ucyate

जब वह वाणी, शरीर और कर्म से सबकी रक्षा करता है और अपने पुत्र का भी अपराध सहन नहीं करता, तब उसे राजा का धर्म कहा जाता है।

श्लोक 33 (12.91.33)

संविभज्य यदा भुङ्क्ते नृपतिर्दुर्बलान्नरान् । तदा भवन्ति बलिनः स राज्ञो धर्म उच्यते ॥

saṃvibhajya yadā bhuṅkte nṛpatirdurbalānnarān | tadā bhavanti balinaḥ sa rājño dharma ucyate

जब राजा दुर्बल जनों को बाँटकर भोग करता है और इस प्रकार वे बलवान् बनते हैं, तब उसे राजा का धर्म कहा जाता है।

श्लोक 34 (12.91.34)

यदा रक्षति राष्ट्राणि यदा दस्यूनपोहति । यदा जयति संग्रामे स राज्ञो धर्म उच्यते ॥

yadā rakṣati rāṣṭrāṇi yadā dasyūnapohati | yadā jayati saṃgrāme sa rājño dharma ucyate

जब वह राज्यों की रक्षा करता है, लुटेरों को भगाता है और युद्ध में विजय पाता है, तब उसे राजा का धर्म कहा जाता है।

श्लोक 35 (12.91.35)

पापमाचरतो यत्र कर्मणा व्याहृतेन वा । प्रियस्यापि न मृष्येत स राज्ञो धर्म उच्यते ॥

pāpamācarato yatra karmaṇā vyāhṛtena vā | priyasyāpi na mṛṣyeta sa rājño dharma ucyate

जब वह कर्म से या कहे हुए वचन से पाप करने वाले को, प्रिय हो तब भी, क्षमा नहीं करता, तब उसे राजा का धर्म कहा जाता है।

श्लोक 36 (12.91.36)

यदा सारणिकान्राजा पुत्रवत्परिरक्षति । भिनत्ति न च मर्यादां स राज्ञो धर्म उच्यते ॥

yadā sāraṇikānrājā putravatparirakṣati | bhinatti na ca maryādāṃ sa rājño dharma ucyate

जब राजा व्यापारियों की पुत्रों की तरह रक्षा करता है और मर्यादा नहीं तोड़ता, तब उसे राजा का धर्म कहा जाता है।

श्लोक 37 (12.91.37)

यदाप्तदक्षिणैर्यज्ञैर्यजते श्रद्धयाऽन्वितः । कामद्वेषावनादृत्य स राज्ञो धर्म उच्यते ॥

yadāptadakṣiṇairyajñairyajate śraddhayā'nvitaḥ | kāmadveṣāvanādṛtya sa rājño dharma ucyate

जब वह श्रद्धा से युक्त होकर, काम और द्वेष को छोड़कर, पूरी दक्षिणा वाले यज्ञों से यजन करता है, तब उसे राजा का धर्म कहा जाता है।

श्लोक 38 (12.91.38)

कृपणानाथवृद्धानां यदाऽश्रु परिमार्जति । हर्षं संजनयन्नॄणां स राज्ञो धर्म उच्यते ॥

kṛpaṇānāthavṛddhānāṃ yadā'śru parimārjati | harṣaṃ saṃjanayannṝṇāṃ sa rājño dharma ucyate

जब वह दीनों, अनाथों और वृद्धों के आँसू पोंछता है और लोगों में हर्ष उत्पन्न करता है, तब उसे राजा का धर्म कहा जाता है।

श्लोक 39 (12.91.39)

विवर्धयति मित्राणि तथाऽरींश्चापि कर्षति । संपूजयति साधूंश्च स राज्ञो धर्म उच्यते ॥

vivardhayati mitrāṇi tathā'rīṃścāpi karṣati | saṃpūjayati sādhūṃśca sa rājño dharma ucyate

जब वह मित्रों को बढ़ाता है, शत्रुओं को नीचे खींचता है और साधुओं का सम्मान करता है, तब उसे राजा का धर्म कहा जाता है।

श्लोक 40 (12.91.40)

सत्यं पालयति प्रीत्या नित्यं भूमिं प्रयच्छति । पूजयेदतिथीन्भृत्यान्स राज्ञो धर्म उच्यते ॥

satyaṃ pālayati prītyā nityaṃ bhūmiṃ prayacchati | pūjayedatithīnbhṛtyānsa rājño dharma ucyate

जब वह प्रेम से सत्य का पालन करता है, निरन्तर भूमि का दान करता है और अतिथियों तथा सेवकों का सत्कार करता है, तब उसे राजा का धर्म कहा जाता है।

श्लोक 41 (12.91.41)

निग्रहानुग्रहौ चोभौ यत्र स्यातां प्रतिष्ठितौ । अस्मिँल्लोके परे चैव राजा स प्राप्नुते फलम् ॥

nigrahānugrahau cobhau yatra syātāṃ pratiṣṭhitau | asmim̐lloke pare caiva rājā sa prāpnute phalam

जहाँ निग्रह और अनुग्रह दोनों दृढ़ता से स्थित हों, वहाँ राजा इस लोक और परलोक में फल पाता है।

श्लोक 42 (12.91.42)

यमो राजा धार्मिकाणां मान्धातः परमेश्वरः । संयच्छन्यमवत्प्राणानसंयच्छंस्तु पावकः ॥

yamo rājā dhārmikāṇāṃ māndhātaḥ parameśvaraḥ | saṃyacchanyamavatprāṇānasaṃyacchaṃstu pāvakaḥ

हे मान्धाता! यम धर्मात्माओं के राजा और उनके परम स्वामी हैं। जो अपनी इन्द्रियों को संयम में रखता है वह यम के समान है, और जो नहीं रखता वह अग्नि के समान।

श्लोक 43 (12.91.43)

ऋत्विक्पुरोहिताचार्यान्सत्कृत्यानवमत्य च । यदा सम्यक्प्रगृह्णाति स राज्ञो धर्म उच्यते ॥

ṛtvikpurohitācāryānsatkṛtyānavamatya ca | yadā samyakpragṛhṇāti sa rājño dharma ucyate

जब वह ऋत्विजों, पुरोहित और आचार्य का सत्कार करके, उनका अनादर न करते हुए, उनके साथ ठीक व्यवहार करता है, तब उसे राजा का धर्म कहा जाता है।

श्लोक 44 (12.91.44)

यमो यच्छति भूतानि सर्वाण्येवाविशेषतः । तथा राज्ञाऽनुकर्तव्यं यन्तव्या विधिवत्प्रजाः ॥

yamo yacchati bhūtāni sarvāṇyevāviśeṣataḥ | tathā rājñā'nukartavyaṃ yantavyā vidhivatprajāḥ

यम सभी प्राणियों को बिना भेद के नियन्त्रित करते हैं। उसी प्रकार राजा को भी उनका अनुकरण करना चाहिए और प्रजा को विधिपूर्वक नियन्त्रण में रखना चाहिए।

श्लोक 45 (12.91.45)

सहस्राक्षेण राजा हि सर्वथैवोपमीयते । स पश्यति च यं धर्मं स धर्मः पुरुषर्षभ ॥

sahasrākṣeṇa rājā hi sarvathaivopamīyate | sa paśyati ca yaṃ dharmaṃ sa dharmaḥ puruṣarṣabha

राजा को सब प्रकार से सहस्र नेत्रों वाले इन्द्र की उपमा दी जाती है। हे पुरुषश्रेष्ठ! वह जिस धर्म को देखता है, वही धर्म है।

श्लोक 46 (12.91.46)

अप्रमादेन शिक्षेथाः क्षमां बुद्धिं धृतिं मतिम् । भूतानां तत्त्वजिज्ञासा साध्वसाधु च सर्वदा ॥

apramādena śikṣethāḥ kṣamāṃ buddhiṃ dhṛtiṃ matim | bhūtānāṃ tattvajijñāsā sādhvasādhu ca sarvadā

अप्रमाद से क्षमा, बुद्धि, धृति और विवेक सीखो, और प्राणियों के विषय में, भले-बुरे के विषय में, सदा सत्य को जानने की जिज्ञासा रखो।

श्लोक 47 (12.91.47)

संग्रहः सर्वभूतानां दानं च मधुरा च वाक् । पौरजानपदाश्चैव गोप्तव्याः स्वप्रजा यथा ॥

saṃgrahaḥ sarvabhūtānāṃ dānaṃ ca madhurā ca vāk | paurajānapadāścaiva goptavyāḥ svaprajā yathā

सब प्राणियों को अपनाना, दान और मधुर वाणी; और नगरवासियों तथा देहातियों की अपनी प्रजा की तरह रक्षा करनी चाहिए।

श्लोक 48 (12.91.48)

न जात्वदक्षो नृपतिः प्रजाः शक्नोति रक्षितुम् । भारो हि सुमहांस्तात राज्यं नाम सुदुर्वहम् ॥

na jātvadakṣo nṛpatiḥ prajāḥ śaknoti rakṣitum | bhāro hi sumahāṃstāta rājyaṃ nāma sudurvaham

अकुशल राजा प्रजा की रक्षा कभी नहीं कर सकता। तात! राज्य नाम का भार बहुत बड़ा है और उसे उठाना अत्यन्त कठिन है।

श्लोक 49 (12.91.49)

तद्दण्डविन्नृपः प्राज्ञः शूरः शक्नोति रक्षितुम् । न हि शक्यमदण्डेन क्लीबेनाबुद्धिनाऽपि वा ॥

taddaṇḍavinnṛpaḥ prājñaḥ śūraḥ śaknoti rakṣitum | na hi śakyamadaṇḍena klībenābuddhinā'pi vā

इसलिए दण्ड को जानने वाला बुद्धिमान् और शूर राजा ही रक्षा कर सकता है; बिना दण्ड के, या नपुंसक अथवा मूर्ख द्वारा यह नहीं हो सकता।

श्लोक 50 (12.91.50)

अभिरूपैः कुले जातैर्दक्षैर्भक्तैर्बहुश्रुतैः । सर्वं बुद्ध्या परीक्षेथास्तापसाश्रमिणामपि ॥

abhirūpaiḥ kule jātairdakṣairbhaktairbahuśrutaiḥ | sarvaṃ buddhyā parīkṣethāstāpasāśramiṇāmapi

सुयोग्य, कुलीन, दक्ष, भक्त और बहुश्रुत अमात्यों के साथ अपनी बुद्धि से सब कुछ परखो — तपस्वियों और आश्रमवासियों के विषय में भी।

श्लोक 51 (12.91.51)

अतस्त्वं सर्वभूतानां धर्मं वेत्स्यसि वै परम् । स्वदेशे परदेशे वा न ते धर्मो विनङ्क्ष्यति ॥

atastvaṃ sarvabhūtānāṃ dharmaṃ vetsyasi vai param | svadeśe paradeśe vā na te dharmo vinaṅkṣyati

इस प्रकार तुम सब प्राणियों का परम धर्म जान लोगे, और अपने देश में या परदेश में तुम्हारा धर्म नष्ट नहीं होगा।

श्लोक 52 (12.91.52)

धर्मेचार्थे च कामे च धर्म एवोत्तरो भवेत् । अस्मिंल्लोके परे चैव धर्मात्मा सुखमेधते ॥

dharmecārthe ca kāme ca dharma evottaro bhavet | asmiṃlloke pare caiva dharmātmā sukhamedhate

धर्म, अर्थ और काम में धर्म ही सर्वोपरि हो। धर्मात्मा इस लोक और परलोक में सुख पाता है।

श्लोक 53 (12.91.53)

त्यजन्ति दारान्पुत्रांश्च मनुष्याः परिपूजिताः । संग्रहश्चैव भूतानां दानं च मधुरा च वाक् ॥

tyajanti dārānputrāṃśca manuṣyāḥ paripūjitāḥ | saṃgrahaścaiva bhūtānāṃ dānaṃ ca madhurā ca vāk

भलीभाँति सम्मानित मनुष्य पत्नियों और पुत्रों तक को त्याग देते हैं; वैसे ही प्राणियों को अपनाना, दान और मधुर वाणी भी यही फल देते हैं।

श्लोक 54 (12.91.54)

अप्रमादश्च शौचं च राज्ञो भूतिकरं महत् । एतेभ्यश्चैव मान्धातः सततं मा प्रमादिथाः ॥

apramādaśca śaucaṃ ca rājño bhūtikaraṃ mahat | etebhyaścaiva māndhātaḥ satataṃ mā pramādithāḥ

अप्रमाद और पवित्रता राजा के लिए बड़ी समृद्धि लाते हैं। हे मान्धाता! इनके विषय में कभी प्रमाद मत करना।

श्लोक 55 (12.91.55)

अप्रमत्तो भवेद्राजा छिद्रदर्शी परात्मनोः । नास्य च्छिद्रं परः पश्येच्छिद्रेषु परमन्वियात् ॥

apramatto bhavedrājā chidradarśī parātmanoḥ | nāsya cchidraṃ paraḥ paśyecchidreṣu paramanviyāt

राजा को सावधान रहना चाहिए और अपने तथा शत्रु के छिद्रों (दुर्बलताओं) को देखते रहना चाहिए। उसका छिद्र शत्रु न देख पाए, और वह शत्रु के छिद्रों में उसका पीछा करे।

श्लोक 56 (12.91.56)

एतद्वृत्तं वासवस्य यमस्य वरुणस्य च । राजर्षीणां च सर्वेषां तत्त्वमप्यनुपालय ॥

etadvṛttaṃ vāsavasya yamasya varuṇasya ca | rājarṣīṇāṃ ca sarveṣāṃ tattvamapyanupālaya

यह वासव (इन्द्र), यम, वरुण और सभी राजर्षियों का आचरण है; तुम भी इसे यथार्थ रूप से निभाओ।

श्लोक 57 (12.91.57)

तत्कुरुष्व महाराज वृत्तं राजर्षिसेवितम् । आतिष्ठ दिव्यं पन्थानमह्नाय पुरुषर्षभ ॥

tatkuruṣva mahārāja vṛttaṃ rājarṣisevitam | ātiṣṭha divyaṃ panthānamahnāya puruṣarṣabha

हे महाराज! वही करो — राजर्षियों द्वारा सेवित आचरण अपनाओ। हे पुरुषश्रेष्ठ! शीघ्र ही दिव्य मार्ग पर चलो।

श्लोक 58 (12.91.58)

धर्मवृत्तं हि राजानं प्रेत्य चेह च भारत । देवर्षिपितृगन्धर्वाः कीर्तयन्ति महौजसः ॥

dharmavṛttaṃ hi rājānaṃ pretya ceha ca bhārata | devarṣipitṛgandharvāḥ kīrtayanti mahaujasaḥ

हे भारत! महातेजस्वी देवता, ऋषि, पितर और गन्धर्व धर्म का पालन करने वाले राजा की इस लोक में और मरने के बाद भी स्तुति करते हैं।

भीष्म उवाच

श्लोक 59 (12.91.59)

स एवमुक्तो मान्धाता तेनोचथ्येन भारत । कृतवानविशङ्कश्च एकः प्राप च मेदिनीम् ॥

sa evamukto māndhātā tenocathyena bhārata | kṛtavānaviśaṅkaśca ekaḥ prāpa ca medinīm

हे भारत! उचथ्य के ऐसा कहने पर मान्धाता ने निःशंक होकर वैसा ही किया और अकेले ही पृथ्वी को प्राप्त कर लिया।

श्लोक 60 (12.91.60)

भवानपि तथा सम्यङ्मान्धातेव महीपते । धर्मं कृत्वा महीं रक्ष स्वर्गे स्थानमवाप्स्यसि ॥

bhavānapi tathā samyaṅmāndhāteva mahīpate | dharmaṃ kṛtvā mahīṃ rakṣa svarge sthānamavāpsyasi

हे महीपति! तुम भी मान्धाता की तरह भलीभाँति धर्म का पालन करके पृथ्वी की रक्षा करो; तुम्हें स्वर्ग में स्थान मिलेगा।

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