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शान्ति पर्व · अध्याय 93

वामदेव का राजा के आचरण पर उपदेश

वामदेव राजा वसुमना को अपना उपदेश जारी रखते हैं। अन्याय या दुस्साहस करने वाला राजा अपने राज्य का नाश करता है; उसे जीते हुओं और शत्रुओं के साथ क्षत्रिय के योग्य व्यवहार करना चाहिए, अपराध के बदले उपकार करना चाहिए, ऊँचे पदों पर स्वामिभक्त और समर्थ लोगों को रखना चाहिए, दूसरे राजाओं पर दृष्टि रखनी चाहिए और मित्रवत् तथा दुर्बल लोगों पर भी अन्धविश्वास नहीं करना चाहिए। अन्त में वे इसे ययाति द्वारा कही गई राजाओं की गुप्त विद्या बताते हैं।

अध्याय 92अध्याय-सूचीअध्याय 94

वामदेव उवाच

श्लोक 1 (12.93.1)

यत्राधर्मं प्रणयते दुर्बले बलवत्तरः । तां वृत्तिमुपजीवन्ति ये भवन्ति तदन्वयाः ॥

yatrādharmaṃ praṇayate durbale balavattaraḥ | tāṃ vṛttimupajīvanti ye bhavanti tadanvayāḥ

जहाँ अधिक बलवान् दुर्बल पर अधर्म थोपता है, वहाँ उसके अनुयायी उसी आचरण के सहारे जीते हैं।

श्लोक 2 (12.93.2)

राजानमनुवर्तन्ते तं पापाभिप्रवर्तकम् । अविनीतमनुष्यं तत्क्षिप्रं राष्ट्रं विनश्यति ॥

rājānamanuvartante taṃ pāpābhipravartakam | avinītamanuṣyaṃ tatkṣipraṃ rāṣṭraṃ vinaśyati

वे उसी राजा का अनुसरण करते हैं जो उन्हें पाप की ओर प्रवृत्त करता है; जिस राज्य के लोग अनुशासनहीन हैं, वह शीघ्र नष्ट हो जाता है।

श्लोक 3 (12.93.3)

यद्वृत्तमुपजीवन्ति प्रकृतिस्थस्य मानवाः । तदेव विषमस्थस्य स्वजनोऽपि न मृष्यते ॥

yadvṛttamupajīvanti prakṛtisthasya mānavāḥ | tadeva viṣamasthasya svajano'pi na mṛṣyate

राजा अपने स्वभाव में स्थित रहता है तो लोग उसके जिस आचरण के सहारे जीते हैं, वही आचरण यदि वह विषम मार्ग पर खड़ा हो तो उसके अपने लोग भी सहन नहीं करते।

श्लोक 4 (12.93.4)

साहसप्रवृत्तेर्यत्र किंचिदुल्वणमाचरेत् । अशास्त्रलक्षणो राजा क्षिप्रमेव विनश्यति ॥

sāhasapravṛtteryatra kiṃcidulvaṇamācaret | aśāstralakṣaṇo rājā kṣiprameva vinaśyati

जहाँ दुस्साहस के कारण वह कोई उग्र कार्य कर बैठता है, वहाँ शास्त्र के लक्षणों का पालन न करने वाला राजा शीघ्र ही नष्ट हो जाता है।

श्लोक 5 (12.93.5)

सद्वृत्ताचरितां वृत्तिं क्षत्रियो नानुवर्तते । जितानामजितानां च क्षत्रधर्मादपैति सः ॥

sadvṛttācaritāṃ vṛttiṃ kṣatriyo nānuvartate | jitānāmajitānāṃ ca kṣatradharmādapaiti saḥ

जो क्षत्रिय सज्जनों द्वारा आचरित वृत्ति का, जीते हुओं और न जीते हुओं के प्रति, पालन नहीं करता, वह क्षत्रिय धर्म से गिर जाता है।

श्लोक 6 (12.93.6)

द्विषन्तं कृतकल्याणं गृहीत्वा नृपतिं रणे । यो न नयते द्वेषात्क्षत्रधर्मादपैति सः ॥

dviṣantaṃ kṛtakalyāṇaṃ gṛhītvā nṛpatiṃ raṇe | yo na nayate dveṣātkṣatradharmādapaiti saḥ

जो क्षत्रिय युद्ध में ऐसे शत्रु राजा को पकड़कर, जिसने कभी उसका उपकार किया हो, द्वेष के कारण उसके साथ भला व्यवहार नहीं करता, वह क्षत्रिय धर्म से गिर जाता है।

श्लोक 7 (12.93.7)

शक्तः स्यात्सुमुखो राजा कुर्यात्तारणमापदि । प्रियो भवति भूतानां न च विभ्रश्यते श्रियः ॥

śaktaḥ syātsumukho rājā kuryāttāraṇamāpadi | priyo bhavati bhūtānāṃ na ca vibhraśyate śriyaḥ

राजा समर्थ और प्रसन्नमुख हो और आपत्ति में दूसरों का उद्धार करे; वह प्राणियों का प्रिय बनता है और श्री से भ्रष्ट नहीं होता।

श्लोक 8 (12.93.8)

अप्रियं यस्य कुर्वीत भूयस्तस्य प्रियं चरेत् । अचिरेण प्रियः स स्याद्योऽप्रिये प्रियमाचरेत् ॥

apriyaṃ yasya kurvīta bhūyastasya priyaṃ caret | acireṇa priyaḥ sa syādyo'priye priyamācaret

जिसका उसने अप्रिय किया हो, उसका बाद में प्रिय करे। जो अप्रिय व्यक्ति के प्रति भी प्रिय आचरण करता है, वह शीघ्र ही प्रिय हो जाता है।

श्लोक 9 (12.93.9)

मृषावादं परिहरेत्कुर्यात्प्रियमयाचितः । न कामान्न च संरम्भान्न द्वेषाद्धर्ममुत्सृजेत् ॥

mṛṣāvādaṃ pariharetkuryātpriyamayācitaḥ | na kāmānna ca saṃrambhānna dveṣāddharmamutsṛjet

वह झूठ से बचे और बिना माँगे ही प्रिय करे; काम, क्रोध या द्वेष के कारण धर्म को न छोड़े।

श्लोक 10 (12.93.10)

अमाययैव वर्तेत न च सत्यं त्यजेद्बुधः । दमं धर्मं च शीलं च क्षत्रधर्मं प्रजाहितम् ॥

amāyayaiva varteta na ca satyaṃ tyajedbudhaḥ | damaṃ dharmaṃ ca śīlaṃ ca kṣatradharmaṃ prajāhitam

बुद्धिमान् छल-रहित होकर चले और सत्य को न छोड़े — दम, धर्म, शील और प्रजा के हित वाला क्षत्रिय धर्म।

श्लोक 11 (12.93.11)

नापत्रपेत प्रश्नेषु नाभिभाविगिरं सृजेत् । न त्वरेत न चासूयेत्तथा संगृह्यते परः ॥

nāpatrapeta praśneṣu nābhibhāvigiraṃ sṛjet | na tvareta na cāsūyettathā saṃgṛhyate paraḥ

प्रश्नों से वह लज्जित न हो, दबाने वाली वाणी न बोले; जल्दबाज़ी और ईर्ष्या न करे। इस प्रकार दूसरा वश में किया जाता है।

श्लोक 12 (12.93.12)

प्रिये नातिभृशं हृष्येदप्रिये न च संज्वरेत् । न तप्येदर्थकृच्छ्रेषु प्रजाहितमनुस्मरन् ॥

priye nātibhṛśaṃ hṛṣyedapriye na ca saṃjvaret | na tapyedarthakṛcchreṣu prajāhitamanusmaran

प्रिय में अति हर्षित न हो और अप्रिय में जले नहीं; धन के संकटों में प्रजा के हित का स्मरण करते हुए दुखी न हो।

श्लोक 13 (12.93.13)

यः प्रियं कुरुते नित्यं गुणतो वसुधाधिपः । तस्य कर्माणि सिद्ध्यन्ति न च संत्यज्यते श्रिया ॥

yaḥ priyaṃ kurute nityaṃ guṇato vasudhādhipaḥ | tasya karmāṇi siddhyanti na ca saṃtyajyate śriyā

जो भूपति गुण के अनुसार सदा लोगों का प्रिय करता है, उसके कार्य सिद्ध होते हैं और लक्ष्मी उसे नहीं छोड़ती।

श्लोक 14 (12.93.14)

निवृत्तं प्रतिकूलेभ्यो वर्तमानमनुप्रिये । भक्तं भजेत नृपतिस्तद्वै वृत्तं सतामिह ॥

nivṛttaṃ pratikūlebhyo vartamānamanupriye | bhaktaṃ bhajeta nṛpatistadvai vṛttaṃ satāmiha

राजा को चाहिए कि जो प्रतिकूल बातों से दूर रहकर प्रिय करने में लगा रहता है, उस भक्त को अपनाए; यही यहाँ सज्जनों का आचरण है।

श्लोक 15 (12.93.15)

अप्रकीर्णेन्द्रियग्राममत्यन्तानुगतं शुचिम् । शक्तं चैवानुरक्तं च युञ्ज्यान्महति कर्मणि ॥

aprakīrṇendriyagrāmamatyantānugataṃ śucim | śaktaṃ caivānuraktaṃ ca yuñjyānmahati karmaṇi

जिसकी इन्द्रियाँ संयत हैं, जो पूर्णतः अनुगत, पवित्र, समर्थ और अनुरागी है — ऐसे व्यक्ति को वह बड़े कार्य में नियुक्त करे।

श्लोक 16 (12.93.16)

श्रेयसो लक्षणं चैतद्विक्रमो यत्र दृश्यते । कीर्तिप्रधानो यश्च स्यात्समये यश्च तिष्ठति । समर्थान्पूजयेद्यश्च न च स्पर्धेत यश्च तैः ॥

śreyaso lakṣaṇaṃ caitadvikramo yatra dṛśyate | kīrtipradhāno yaśca syātsamaye yaśca tiṣṭhati | samarthānpūjayedyaśca na ca spardheta yaśca taiḥ

श्रेष्ठ पुरुष के ये लक्षण हैं: उसमें पराक्रम दिखता है, वह कीर्ति को प्रधान मानता है और समय (मर्यादा) में स्थित रहता है, समर्थों का आदर करता है और उनसे स्पर्धा नहीं करता।

श्लोक 17 (12.93.17)

एवमेतैर्गुणैर्युक्तो योऽनुरज्यति भूमिपम् । भर्तुरर्थेष्वप्रमत्तं नियुञ्ज्यादर्थकर्मणि ॥

evametairguṇairyukto yo'nurajyati bhūmipam | bharturartheṣvapramattaṃ niyuñjyādarthakarmaṇi

इन गुणों से युक्त जो राजा का अनुरागी और स्वामी के कार्यों में सावधान है, उसे वह अर्थ-सम्बन्धी कार्य में नियुक्त करे।

श्लोक 18 (12.93.18)

मूढमैन्द्रियकं लुब्धमनार्यचरितं शठम् । अनतीतोपधं हिंस्रं दुर्बुद्धिमबहुश्रुतम् ॥

mūḍhamaindriyakaṃ lubdhamanāryacaritaṃ śaṭham | anatītopadhaṃ hiṃsraṃ durbuddhimabahuśrutam

जो मूढ़ है, इन्द्रियों के वश में है, लोभी है, नीच आचरण वाला है, शठ है, छल से कभी पार नहीं पाता, हिंसक है, दुर्बुद्धि और अल्पशिक्षित है,

श्लोक 19 (12.93.19)

त्यक्तोपात्तं मद्यरतं द्यूतस्त्रीमृगयापरम् । कार्ये महति युञ्जानो हीयते नृपतिः श्रिया ॥

tyaktopāttaṃ madyarataṃ dyūtastrīmṛgayāparam | kārye mahati yuñjāno hīyate nṛpatiḥ śriyā

जो पाए हुए को उड़ा देता है, मद्य में रत है और जुए, स्त्रियों तथा शिकार में लगा रहता है — ऐसे को बड़े कार्य में लगाने वाला राजा श्री से हीन हो जाता है।

श्लोक 20 (12.93.20)

रक्षितात्मा च यो राजा रक्ष्यान्यश्चानुरक्षति । प्रजाश्च तस्य वर्धन्ते सुखं च महदश्नुते ॥

rakṣitātmā ca yo rājā rakṣyānyaścānurakṣati | prajāśca tasya vardhante sukhaṃ ca mahadaśnute

जो राजा स्वयं की रक्षा करता है और जिनकी रक्षा करनी चाहिए उनकी भी रक्षा करता है, उसकी प्रजा बढ़ती है और वह बड़ा सुख पाता है।

श्लोक 21 (12.93.21)

ये केचिद्भूमिपतयः सर्वांस्तानन्ववेक्षयेत् । सुहृद्भिरनभिख्यातैस्तेन राजा न रिष्यते ॥

ye kecidbhūmipatayaḥ sarvāṃstānanvavekṣayet | suhṛdbhiranabhikhyātaistena rājā na riṣyate

जो कोई भी राजा हों, उन सब पर वह ऐसे सुहृदों के द्वारा दृष्टि रखे जिन्हें वे जानते नहीं; इससे राजा की हानि नहीं होती।

श्लोक 22 (12.93.22)

अपकृत्य बलस्थस्य दूरस्थोऽस्मीति नाश्वसेत् । श्येनाभिपतनैरेते निपतन्ति प्रमाद्यतः ॥

apakṛtya balasthasya dūrastho'smīti nāśvaset | śyenābhipatanairete nipatanti pramādyataḥ

किसी बलवान् का अपकार करके 'मैं दूर हूँ' यह सोचकर निश्चिन्त न हो; ये लोग असावधान पर बाज़ की तरह टूट पड़ते हैं।

श्लोक 23 (12.93.23)

दृढमूलस्त्वदुष्टात्मा विदित्वा बलमात्मनः । अबलानभियुञ्जीत न तु ये बलवत्तराः ॥

dṛḍhamūlastvaduṣṭātmā viditvā balamātmanaḥ | abalānabhiyuñjīta na tu ye balavattarāḥ

जिसकी जड़ें दृढ़ हैं और जिसका मन दुष्टता से रहित है, वह अपना बल जानकर दुर्बलों पर चढ़ाई करे, उन पर नहीं जो अधिक बलवान् हैं।

श्लोक 24 (12.93.24)

विक्रमेण महीं लब्ध्वा प्रजा धर्मेण पालयेत् । आहवे निधनं कुर्याद्राजा धर्मपरायणः ॥

vikrameṇa mahīṃ labdhvā prajā dharmeṇa pālayet | āhave nidhanaṃ kuryādrājā dharmaparāyaṇaḥ

पराक्रम से पृथ्वी जीतकर वह प्रजा का धर्म से पालन करे; धर्म में तत्पर राजा युद्ध में प्राण त्यागे।

श्लोक 25 (12.93.25)

मरणान्तमिदं सर्वं नेह किंचिदनामयम् । तस्माद्धर्मे स्थितो राजा प्रजा धर्मेण पालयेत् ॥

maraṇāntamidaṃ sarvaṃ neha kiṃcidanāmayam | tasmāddharme sthito rājā prajā dharmeṇa pālayet

यह सब मृत्यु पर समाप्त होता है; यहाँ कुछ भी निर्विघ्न नहीं है। इसलिए धर्म में स्थित राजा प्रजा का धर्म से पालन करे।

श्लोक 26 (12.93.26)

रक्षाधिकरणं युद्धं तथा धर्मानुशासनम् । मन्त्रचिन्ता सुखं काले पञ्चभिर्वर्धते मही ॥

rakṣādhikaraṇaṃ yuddhaṃ tathā dharmānuśāsanam | mantracintā sukhaṃ kāle pañcabhirvardhate mahī

रक्षा का साधन, युद्ध, धर्म का शासन, मन्त्रणा और समय पर सुख का दान — इन पाँच से पृथ्वी बढ़ती है।

श्लोक 27 (12.93.27)

एतानि यस्य गुप्तानि स राजा राजसत्तम । सततं वर्तमानोऽत्र राजा भुङ्क्ते महीमिमाम् ॥

etāni yasya guptāni sa rājā rājasattama | satataṃ vartamāno'tra rājā bhuṅkte mahīmimām

हे राजाओं में श्रेष्ठ! जिस राजा के ये पाँच सुरक्षित हैं और जो इनमें सदा लगा रहता है, वही इस पृथ्वी का भोग करता है।

श्लोक 28 (12.93.28)

नैतान्येकेन शक्यानि सातत्येनानुवीक्षितुम् । एतेष्वाप्तान्प्रतिष्ठाप्य राजा भुङ्क्ते चिरं महीम् ॥

naitānyekena śakyāni sātatyenānuvīkṣitum | eteṣvāptānpratiṣṭhāpya rājā bhuṅkte ciraṃ mahīm

अकेला व्यक्ति इन पर निरन्तर दृष्टि नहीं रख सकता; जो राजा इन पर विश्वस्त जनों को नियुक्त करता है, वह चिरकाल तक पृथ्वी का भोग करता है।

श्लोक 29 (12.93.29)

दातारं संविभक्तारं मार्दवोपगतं शुचिम् । असंत्यक्तमनुष्यं च तं जनाः कुर्वते नृपम् ॥

dātāraṃ saṃvibhaktāraṃ mārdavopagataṃ śucim | asaṃtyaktamanuṣyaṃ ca taṃ janāḥ kurvate nṛpam

जो दाता है, बाँटकर भोगने वाला है, कोमल और पवित्र है और अपने लोगों को नहीं छोड़ता, उसे लोग राजा बनाते हैं।

श्लोक 30 (12.93.30)

यस्तु नैःश्रेयसं श्रुत्वा ज्ञानं तत्प्रतिपद्यते । आत्मनो मतमुत्सृज्य तं लोकोऽनुविधीयते ॥

yastu naiḥśreyasaṃ śrutvā jñānaṃ tatpratipadyate | ātmano matamutsṛjya taṃ loko'nuvidhīyate

जो परम कल्याण की बात सुनकर अपना मत छोड़कर उस ज्ञान को अपनाता है, लोक उसका अनुसरण करता है।

श्लोक 31 (12.93.31)

योऽर्थकामस्य वचनं प्रातिकूल्यान्न मृष्यते । शृणोति प्रतिकूलानि सर्वदा विमना इव ॥

yo'rthakāmasya vacanaṃ prātikūlyānna mṛṣyate | śṛṇoti pratikūlāni sarvadā vimanā iva

जो अपने हितैषी की बात को, प्रतिकूल लगने के कारण, सहन नहीं करता और जो विरुद्ध बातें सदा खिन्न मन से सुनता है,

श्लोक 32 (12.93.32)

अग्राम्यचरितां वृत्तिं यो न सेवेत नित्यदा । जितानामजितानां च क्षत्रधर्मादपैति सः ॥

agrāmyacaritāṃ vṛttiṃ yo na seveta nityadā | jitānāmajitānāṃ ca kṣatradharmādapaiti saḥ

जो विवेकी जनों द्वारा आचरित वृत्ति का, जीते हुओं और न जीते हुओं के प्रति, सदा पालन नहीं करता, वह क्षत्रिय धर्म से गिर जाता है।

श्लोक 33 (12.93.33)

निगृहीतादमात्याच्च स्त्रीभ्यश्चैव विशेषतः । पर्वताद्विषमाद्दुर्गाद्धस्तिनोऽश्वात्सरीसृपात् । एतेभ्यो नित्ययुक्तः सन्रक्षेदात्मानमेव तु ॥

nigṛhītādamātyācca strībhyaścaiva viśeṣataḥ | parvatādviṣamāddurgāddhastino'śvātsarīsṛpāt | etebhyo nityayuktaḥ sanrakṣedātmānameva tu

दण्डित अमात्य से, और विशेषकर स्त्रियों से, पर्वत से, विषम स्थान से, दुर्ग से, हाथी, घोड़े और रेंगने वाले जीव से — इन सबसे वह सदा सावधान रहकर अपनी ही रक्षा करे।

श्लोक 34 (12.93.34)

मुख्यानमात्यान्यो हित्वा निहीनान्कुरुते प्रियान् । स वै व्यसनमासाद्य साधुमार्गं न विन्दति ॥

mukhyānamātyānyo hitvā nihīnānkurute priyān | sa vai vyasanamāsādya sādhumārgaṃ na vindati

जो प्रमुख अमात्यों को छोड़कर हीन जनों को प्रिय बनाता है, वह संकट में पड़कर सज्जनों का मार्ग नहीं पाता।

श्लोक 35 (12.93.35)

यः कल्याणगुणाञ्ज्ञातीन्प्रद्वेषान्नो बुभूषति । अदृढात्मा दृढक्रोधः नास्यार्थो वसतेऽन्तिके ॥

yaḥ kalyāṇaguṇāñjñātīnpradveṣānno bubhūṣati | adṛḍhātmā dṛḍhakrodhaḥ nāsyārtho vasate'ntike

जो द्वेष के कारण गुणवान् जाति-बन्धुओं को बढ़ाना नहीं चाहता, जो दुर्बल मन और प्रचण्ड क्रोध वाला है, उसके पास धन नहीं टिकता।

श्लोक 36 (12.93.36)

अथ यो गुणसंपन्नान्हृदयस्य प्रियानपि । प्रियेण कुरुते वश्यांश्चिरं यशसि तिष्ठति ॥

atha yo guṇasaṃpannānhṛdayasya priyānapi | priyeṇa kurute vaśyāṃściraṃ yaśasi tiṣṭhati

परन्तु जो हृदय के प्रिय गुणवान् जनों को भी प्रेम से अपने वश में करता है, वह चिरकाल तक यश में स्थित रहता है।

श्लोक 37 (12.93.37)

नाकाले प्रणयेदर्थान्नाप्रिये जातु संज्वरेत् । प्रिये नातिभृशं तुष्येद्युञ्जीतारोग्यकर्मणि ॥

nākāle praṇayedarthānnāpriye jātu saṃjvaret | priye nātibhṛśaṃ tuṣyedyuñjītārogyakarmaṇi

वह असमय कार्यों को आरम्भ न करे, अप्रिय पर कभी जले नहीं और प्रिय पर अत्यधिक प्रसन्न न हो; निर्दोष कर्म में लगे।

श्लोक 38 (12.93.38)

के वाऽनुरक्ता राजानः के भयात्समुपाश्रिताः । मध्यस्थदोषाः के चैषामिति नित्यं विचिन्तयेत् ॥

ke vā'nuraktā rājānaḥ ke bhayātsamupāśritāḥ | madhyasthadoṣāḥ ke caiṣāmiti nityaṃ vicintayet

कौन राजा अनुरक्त हैं, कौन भय से शरण में आए हैं, और इनमें कौन तटस्थ रहकर दोषी हैं — यह वह सदा विचारता रहे।

श्लोक 39 (12.93.39)

न जातु बलवान्भूत्वा दुर्बले विश्वसेत्क्वचित् । भारुण्डसदृशा ह्येते निपतन्ति प्रमाद्यतः ॥

na jātu balavānbhūtvā durbale viśvasetkvacit | bhāruṇḍasadṛśā hyete nipatanti pramādyataḥ

बलवान् होकर भी कभी दुर्बल पर विश्वास न करे; ये भारुण्ड पक्षियों की तरह असावधान पर टूट पड़ते हैं।

श्लोक 40 (12.93.40)

अपि सर्वगुणैर्युक्तं भर्तारं प्रियवादिनम् । अभिद्रुह्यति पापात्मा न तस्माद्विश्वसेज्जनान् ॥

api sarvaguṇairyuktaṃ bhartāraṃ priyavādinam | abhidruhyati pāpātmā na tasmādviśvasejjanān

सब गुणों से युक्त और प्रिय बोलने वाले स्वामी से भी कोई पापात्मा द्रोह कर बैठता है; इसलिए लोगों पर विश्वास न करे।

श्लोक 41 (12.93.41)

एतद्राजोपनिषदं ययातिः स्माह नाहुषः । मनुष्यविषये युक्तो हन्ति शत्रून्सवासवान् ॥

etadrājopaniṣadaṃ yayātiḥ smāha nāhuṣaḥ | manuṣyaviṣaye yukto hanti śatrūnsavāsavān

राजाओं की इस गुप्त विद्या को नहुषपुत्र ययाति ने कहा था: मनुष्यों के विषय में सावधान रहने वाला राजा इन्द्र सहित शत्रुओं को भी मार डालता है।

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