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शान्ति पर्व · अध्याय 94

वामदेव: बिना युद्ध के विजय

वामदेव राजा वसुमना को अपना उपदेश जारी रखते हैं। राजा को बिना युद्ध के ही अपनी विजय बढ़ानी चाहिए, क्योंकि युद्ध से मिली विजय निकृष्ट है; उसका बल समृद्ध और सन्तुष्ट राज्य तथा अनुरक्त सैनिकों और मन्त्रियों पर टिका है। साम, दान, भेद और दण्ड का प्रयोग क्रम से होता है और उपेक्षा पाँचवाँ उपाय है; उद्दण्डों, म्लेच्छों और बुरे अधिकारियों को कठोर उपायों से वश में रखना चाहिए। अन्त में भीष्म युधिष्ठिर से कहते हैं कि उस राजा ने यह सब किया और तुम भी ऐसा करके दोनों लोक जीतोगे।

अध्याय 93अध्याय-सूचीअध्याय 95

वामदेव उवाच

श्लोक 1 (12.94.1)

अयुद्धेनैव विजयं वर्धयेद्वसुधाधिपः । जघन्यमाहुर्विजयं युद्धेन च नराधिप ॥

ayuddhenaiva vijayaṃ vardhayedvasudhādhipaḥ | jaghanyamāhurvijayaṃ yuddhena ca narādhipa

राजा को चाहिए कि बिना युद्ध के ही अपनी विजय बढ़ाए। हे नराधिप, युद्ध से प्राप्त विजय को लोग निकृष्ट विजय कहते हैं।

श्लोक 2 (12.94.2)

न चाप्यलब्धं लिप्सेत मूले नातिदृढे सति । न हि दुर्बलमूलस्य राज्ञो लाभो विवर्धते ॥

na cāpyalabdhaṃ lipseta mūle nātidṛḍhe sati | na hi durbalamūlasya rājño lābho vivardhate

जब अपनी जड़ बहुत दृढ़ न हो, तब जो अभी प्राप्त नहीं हुआ है, उसे पाने की चाह भी न करे; क्योंकि जिस राजा की जड़ दुर्बल है, उसका लाभ बढ़ता नहीं।

श्लोक 3 (12.94.3)

यस्य स्फीतो जनपदः संपन्नप्रियराजकः । संतुष्टः पुष्टसचिवो दृढमूलः स पार्थिवः ॥

yasya sphīto janapadaḥ saṃpannapriyarājakaḥ | saṃtuṣṭaḥ puṣṭasacivo dṛḍhamūlaḥ sa pārthivaḥ

जिसका देश समृद्ध और सम्पन्न है, जो प्रजा को प्रिय है, जो स्वयं सन्तुष्ट है और जिसके मन्त्री भलीभाँति पोषित हैं, वह राजा दृढ़ जड़ वाला है।

श्लोक 4 (12.94.4)

यस्य योधाः सुसंतुष्टाः स्वनुरक्ताः सुपूजिताः । अल्पेनापि स दण्डेन महीं जयति पार्थिवः ॥

yasya yodhāḥ susaṃtuṣṭāḥ svanuraktāḥ supūjitāḥ | alpenāpi sa daṇḍena mahīṃ jayati pārthivaḥ

जिस राजा के योद्धा भलीभाँति सन्तुष्ट, उसके प्रति अनुरक्त और सम्मानित हैं, वह थोड़ी-सी सेना से भी पृथ्वी को जीत लेता है।

श्लोक 5 (12.94.5)

दण्डो हि बलवान्यत्र तत्र साम प्रयुज्यते । प्रदानं सामपूर्वं च भेदमूलं प्रशस्यते ॥

daṇḍo hi balavānyatra tatra sāma prayujyate | pradānaṃ sāmapūrvaṃ ca bhedamūlaṃ praśasyate

जहाँ दण्ड (बल) प्रबल हो, वहाँ भी सामनीति का प्रयोग किया जाता है; साम से आरम्भ होने वाला दान तथा भेद पर आधारित नीति प्रशंसित है।

श्लोक 6 (12.94.6)

त्रयाणां विफलं कर्म यदा पश्येत भूमिपः । रन्ध्रं ज्ञात्वा ततो दण्डं प्रयुञ्जीताविचारयन् ॥

trayāṇāṃ viphalaṃ karma yadā paśyeta bhūmipaḥ | randhraṃ jñātvā tato daṇḍaṃ prayuñjītāvicārayan

जब राजा देखे कि तीनों उपायों (साम, दान, भेद) का प्रयत्न निष्फल हो गया है, तब शत्रु की दुर्बलता जानकर बिना हिचक दण्ड का प्रयोग करे।

श्लोक 7 (12.94.7)

अभिभूतो यदा शत्रुः शत्रुभिर्बलवत्तरैः । उपेक्षा तत्र कर्तव्या वध्यता बलिनां बलम् ॥

abhibhūto yadā śatruḥ śatrubhirbalavattaraiḥ | upekṣā tatra kartavyā vadhyatā balināṃ balam

जब कोई शत्रु अपने से अधिक बलवान् शत्रुओं से दबा दिया गया हो, तब वहाँ उपेक्षा करनी चाहिए; दुर्बल का वध के योग्य होना ही बलवानों का बल है।

श्लोक 8 (12.94.8)

दुर्बलो हि महीपालो यदा भवति भारत । उपेक्षा तत्र कर्तव्या चतुर्णामविरोधिनी । उपायः पञ्चमः सोऽपि सर्वेषां बलवत्तरः ॥

durbalo hi mahīpālo yadā bhavati bhārata | upekṣā tatra kartavyā caturṇāmavirodhinī | upāyaḥ pañcamaḥ so'pi sarveṣāṃ balavattaraḥ

हे भारत! जब कोई राजा दुर्बल हो, तब वहाँ उपेक्षा करनी चाहिए; वह चारों उपायों की विरोधी नहीं है, और पाँचवें उपाय के रूप में वह सबसे अधिक बलशाली है।

श्लोक 9 (12.94.9)

भार्गवेण च गीतानां श्लोकानां कोसलाधिप । विज्ञाय तत्वं तत्वज्ञ तत्वतस्तत्करिष्यति ॥

bhārgaveṇa ca gītānāṃ ślokānāṃ kosalādhipa | vijñāya tatvaṃ tatvajña tatvatastatkariṣyati

हे कोसलनरेश! हे तत्त्वज्ञ! भार्गव द्वारा गाए गए श्लोकों का तत्त्व जानकर वह उसके अनुसार यथार्थ रूप में आचरण करेगा।

श्लोक 10 (12.94.10)

यदि रक्षःपिशाचेन हन्यते यत्रकुत्रचित् । उपेक्षा तत्र कर्तव्या वाच्यतां बलिनां बलम् ॥

yadi rakṣaḥpiśācena hanyate yatrakutracit | upekṣā tatra kartavyā vācyatāṃ balināṃ balam

यदि कहीं कोई राक्षस या पिशाच के हाथों मारा जा रहा हो, तो वहाँ उपेक्षा करनी चाहिए; कहा जाए कि यही बलवानों का बल है।

श्लोक 11 (12.94.11)

दुर्बलोऽपि महीपाल शत्रूणां शत्रुमुद्धरेत् । पादलग्नं करस्थेन कण्टकेनैव कण्टकम् ॥

durbalo'pi mahīpāla śatrūṇāṃ śatrumuddharet | pādalagnaṃ karasthena kaṇṭakenaiva kaṇṭakam

हे पृथ्वीपाल! दुर्बल राजा भी अपने शत्रुओं में से शत्रु को उखाड़ फेंके, जैसे पैर में धँसे काँटे को हाथ में पकड़े काँटे से निकाला जाता है।

श्लोक 12 (12.94.12)

शठानां सचिवानां च म्लेच्छानां च महीपते । एष उक्त उपायानामुपेक्षा बलवत्तम ॥

śaṭhānāṃ sacivānāṃ ca mlecchānāṃ ca mahīpate | eṣa ukta upāyānāmupekṣā balavattama

हे पृथ्वीपते! दुष्टों, मन्त्रियों और म्लेच्छों के लिए उपायों में यह उपेक्षा ही कही गई है, हे बलवानों में श्रेष्ठ!

श्लोक 13 (12.94.13)

अश्मना नाशयेल्लोहं लोहेनाश्मानमेव तु । बिल्वानि वा परैर्बिल्वैर्म्लेच्छैर्म्लेच्छान्प्रसादयेत् ॥

aśmanā nāśayellohaṃ lohenāśmānameva tu | bilvāni vā parairbilvairmlecchairmlecchānprasādayet

जैसे पत्थर से लोहे को और लोहे से पत्थर को तोड़ा जाता है, अथवा जैसे बेल के फल बेल के फलों से (तोड़े जाते हैं), वैसे ही म्लेच्छों को म्लेच्छों के द्वारा वश में करना चाहिए।

श्लोक 14 (12.94.14)

दासानां च प्रदृप्तानामेतदेव हि कारयेत् । चण्डालम्लेच्छजातीनां दण्डेनैव निवारणम् । शठानां दुर्विनीतैश्च पूर्वमुक्तं समाचरेत् ॥

dāsānāṃ ca pradṛptānāmetadeva hi kārayet | caṇḍālamlecchajātīnāṃ daṇḍenaiva nivāraṇam | śaṭhānāṃ durvinītaiśca pūrvamuktaṃ samācaret

उद्दण्ड बने हुए दासों के साथ भी यही करना चाहिए। चाण्डाल और म्लेच्छ जातियों का निवारण दण्ड से ही होता है; और दुष्टों तथा उद्दण्डों के साथ वैसा ही आचरण करे जैसा पहले कहा गया।

श्लोक 15 (12.94.15)

अन्त्याः शठाश्च सचिवास्तथा कुब्राह्मणादयः । उपायैः पञ्चभिः साध्याश्चतुर्वर्गविरोधिनः ॥

antyāḥ śaṭhāśca sacivāstathā kubrāhmaṇādayaḥ | upāyaiḥ pañcabhiḥ sādhyāścaturvargavirodhinaḥ

नीच जन, दुष्ट, मन्त्री तथा कुब्राह्मण आदि, जो चारों पुरुषार्थों के विरोधी हैं, पाँचों उपायों से वश में किए जाने योग्य हैं।

श्लोक 16 (12.94.16)

पौरजानपदा यस्य स्वनुरक्ता अपीडिताः । राष्ट्रकर्मकरा ह्येते राष्ट्रस्य च विरोधिनः ॥

paurajānapadā yasya svanuraktā apīḍitāḥ | rāṣṭrakarmakarā hyete rāṣṭrasya ca virodhinaḥ

जिस राजा के नगरवासी और देशवासी उसके प्रति अनुरक्त और अपीड़ित हैं, वे ही राष्ट्र के कार्य करने वाले हैं और वे ही राष्ट्र के विरोधी भी हो सकते हैं।

श्लोक 17 (12.94.17)

दुर्विनीता विनीताश्च सर्वे साध्याः प्रयत्नतः । चण्डालम्लेच्छजात्याश्च पाषण्डाश्च विकर्मिणः । बलिनश्चाश्रमाश्चैव तथा गायकनर्तकाः ॥

durvinītā vinītāśca sarve sādhyāḥ prayatnataḥ | caṇḍālamlecchajātyāśca pāṣaṇḍāśca vikarmiṇaḥ | balinaścāśramāścaiva tathā gāyakanartakāḥ

अनुशासित और अनुशासनहीन सभी लोगों को प्रयत्नपूर्वक वश में रखना चाहिए — चाण्डाल और म्लेच्छ जातियों के लोग, पाखण्डी, निषिद्ध कर्म करने वाले, बलवान्, आश्रमों में रहने वाले तथा गायक और नर्तक भी।

श्लोक 18 (12.94.18)

पौरजानपदा यस्य भूतेषु च दयालवः । सधना धान्यवन्तश्च दृढमूलः स पार्थिवः ॥

paurajānapadā yasya bhūteṣu ca dayālavaḥ | sadhanā dhānyavantaśca dṛḍhamūlaḥ sa pārthivaḥ

जिस राजा के नगरवासी और देशवासी प्राणियों पर दयालु, धनवान् और अन्न से सम्पन्न हैं, वह राजा दृढ़ जड़ वाला है।

श्लोक 19 (12.94.19)

प्रतापकालमधिकं यदा मन्येत चात्मनः । तदा लिप्सेत मेधावी परभूमिधनान्युत ॥

pratāpakālamadhikaṃ yadā manyeta cātmanaḥ | tadā lipseta medhāvī parabhūmidhanānyuta

जब बुद्धिमान राजा अपने प्रताप का समय पूर्ण रूप से आया हुआ माने, तब वह दूसरे की भूमि और धन को पाने की इच्छा करे।

श्लोक 20 (12.94.20)

भोगेष्वदयमानस्य भूतेषु च दयावतः । वर्धते त्वरमाणस्य विषयो रक्षितात्मनः ॥

bhogeṣvadayamānasya bhūteṣu ca dayāvataḥ | vardhate tvaramāṇasya viṣayo rakṣitātmanaḥ

जो भोगों के प्रति ढील नहीं देता, प्राणियों पर दयालु है, फुर्तीला है और अपनी रक्षा किए रहता है, उसका राज्य बढ़ता है।

श्लोक 21 (12.94.21)

तक्षेदात्मानमेवं स वनं परशुना यथा । यः सम्यग्वर्तमानेषु स्वेषु मिथ्या प्रवर्तते ॥

takṣedātmānamevaṃ sa vanaṃ paraśunā yathā | yaḥ samyagvartamāneṣu sveṣu mithyā pravartate

जो अपने उन जनों के साथ, जो ठीक आचरण कर रहे हैं, छल का व्यवहार करता है, वह मानो कुल्हाड़ी से वन को काटने के समान अपने आपको ही काट डालता है।

श्लोक 22 (12.94.22)

नैव द्विषन्तो हीयन्ते राज्ञो नित्यमनिघ्नतः । क्रोधं निहन्तुं यो वेद तस्य द्वेष्टा न विद्यते ॥

naiva dviṣanto hīyante rājño nityamanighnataḥ | krodhaṃ nihantuṃ yo veda tasya dveṣṭā na vidyate

जो राजा शत्रुओं को कभी नहीं मारता, उसके शत्रु घटते नहीं; किन्तु जो क्रोध को मार डालना जानता है, उसका कोई शत्रु नहीं रहता।

श्लोक 23 (12.94.23)

यदार्यजनविद्विष्टं कर्म तन्नाचरेद्बुधः । यत्कल्याणमभिध्यायेत्तत्रात्मानं नियोजयेत् ॥

yadāryajanavidviṣṭaṃ karma tannācaredbudhaḥ | yatkalyāṇamabhidhyāyettatrātmānaṃ niyojayet

जिस कर्म से श्रेष्ठ जन द्वेष करते हैं, बुद्धिमान उसे न करे; जिसे कल्याणकारी समझे, उसी में स्वयं को लगाए।

श्लोक 24 (12.94.24)

नैवमन्येऽवजानन्ति नात्मना परितप्यते । कृत्यशेषेण यो राजा सुखान्यनुबुभूषति ॥

naivamanye'vajānanti nātmanā paritapyate | kṛtyaśeṣeṇa yo rājā sukhānyanububhūṣati

ऐसे राजा को दूसरे तिरस्कृत नहीं करते और वह स्वयं भी सन्तप्त नहीं होता — जो राजा कर्तव्य का कुछ भाग शेष रखकर सुख भोगना चाहता है।

श्लोक 25 (12.94.25)

इदं वृत्तं मनुष्येषु वर्तते यो महीपतिः । उभौ लोकौ विनिर्जित्य विजये संप्रतिष्ठते ॥

idaṃ vṛttaṃ manuṣyeṣu vartate yo mahīpatiḥ | ubhau lokau vinirjitya vijaye saṃpratiṣṭhate

जो राजा मनुष्यों के बीच इस आचरण के अनुसार चलता है, वह दोनों लोकों को जीतकर विजय में प्रतिष्ठित होता है।

भीष्म उवाच

श्लोक 26 (12.94.26)

इत्युक्तो वामदेवेन सर्वं तत्कृतवान्नृपः । तथा कुर्वंस्त्वमप्येतौ लोकौ जेता न संशयः ॥

ityukto vāmadevena sarvaṃ tatkṛtavānnṛpaḥ | tathā kurvaṃstvamapyetau lokau jetā na saṃśayaḥ

वामदेव के ऐसा कहने पर राजा ने वह सब किया। यदि तुम भी वैसा ही करोगे, तो निस्सन्देह इन दोनों लोकों के विजेता बनोगे।

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