शान्ति पर्व · अध्याय 98
अम्बरीष, इन्द्र और युद्ध-यज्ञ
युधिष्ठिर पूछते हैं कि पीछे न हटकर युद्ध में मरने वाले शूरों को कौन-से लोक मिलते हैं। भीष्म इसके उत्तर में स्वर्ग में राजा अम्बरीष और इन्द्र का संवाद सुनाते हैं। अम्बरीष अपने पूर्व सेनापति सुदेव को अपने से ऊँचे लोक में देखकर चकित होते हैं, और इन्द्र बताते हैं कि तीन राक्षस भाइयों के विरुद्ध भेजे गए सुदेव को शिव ने शस्त्र-सज्जित किया और वे उन्हें मारकर स्वयं वीरगति को प्राप्त हुए। फिर इन्द्र युद्ध को यज्ञ के रूप में समझाते हैं, जिसमें हाथी, घोड़े, शस्त्र और रक्त ऋत्विज, हवि और स्रुवा हैं, और कभी न भागने वाले योद्धा के लोकों का वर्णन करते हैं।
युधिष्ठिर उवाच
श्लोक 1 (12.98.1)
के लोका युध्यमानानां शूराणामनिवर्तिनाम् । भवन्ति निधनं प्राप्य तन्मे ब्रूहि पितामह ॥
ke lokā yudhyamānānāṃ śūrāṇāmanivartinām | bhavanti nidhanaṃ prāpya tanme brūhi pitāmaha
पितामह, जो शूर युद्ध करते हुए कभी पीछे नहीं हटते, मृत्यु पाकर उन्हें कौन-से लोक प्राप्त होते हैं? यह मुझे बताइए।
भीष्म उवाच
श्लोक 2 (12.98.2)
अत्राप्युदाहरन्तीममितिहासं पुरातनम् । अम्बरीषस्य संवादमिन्द्रस्य च युधिष्ठिर ॥
atrāpyudāharantīmamitihāsaṃ purātanam | ambarīṣasya saṃvādamindrasya ca yudhiṣṭhira
युधिष्ठिर, इस विषय में लोग एक पुराना इतिहास सुनाते हैं: अम्बरीष और इन्द्र का संवाद।
श्लोक 3 (12.98.3)
अम्बरीषो हि नाभागः स्वर्गं गत्वा सुदुर्लभम् । ददर्श सुरलोकस्थं शक्रेण सचिवैः सह ॥
ambarīṣo hi nābhāgaḥ svargaṃ gatvā sudurlabham | dadarśa suralokasthaṃ śakreṇa sacivaiḥ saha
नाभाग के पुत्र अम्बरीष अत्यन्त दुर्लभ स्वर्ग में पहुँचे, और वहाँ देवलोक में शक्र (इन्द्र) तथा उनके सचिवों के साथ उन्होंने देखा,
श्लोक 4 (12.98.4)
सर्वतेजोमयं दिव्यं विमानवरमास्थितम् । उपर्युपरि गच्छन्तं स्थानं सेनापतिं शुभम् ॥
sarvatejomayaṃ divyaṃ vimānavaramāsthitam | uparyupari gacchantaṃ sthānaṃ senāpatiṃ śubham
एक तेजस्वी सेनापति को, जो सर्वथा तेज से बने उत्तम दिव्य विमान में बैठा हुआ अपने स्थान की ओर ऊपर-ही-ऊपर चला जा रहा था।
श्लोक 5 (12.98.5)
स दृष्ट्वोपरि गच्छन्तं सेनापतिमुदारधीः । शूरस्थानमनुप्राप्तं सुदेवं नाम नामतः । ऋद्धिं दृष्ट्वा सुदेवस्य विस्मितः प्राह वासवम् ॥
sa dṛṣṭvopari gacchantaṃ senāpatimudāradhīḥ | śūrasthānamanuprāptaṃ sudevaṃ nāma nāmataḥ | ṛddhiṃ dṛṣṭvā sudevasya vismitaḥ prāha vāsavam
उस उदार बुद्धिवाले सेनापति को, जिसका नाम सुदेव था और जो शूरों के स्थान को प्राप्त हुआ था, अपने ऊपर से जाते देखकर तथा सुदेव का वैभव देखकर वे चकित हुए और वासव (इन्द्र) से बोले।
अम्बरीष उवाच
श्लोक 6 (12.98.6)
सागरान्तां महीं कृत्स्नामनुशास्य यथाविधि । चातुर्वर्ण्ये यथाशास्त्रं प्रवृत्तो धर्मकाम्यया ॥
sāgarāntāṃ mahīṃ kṛtsnāmanuśāsya yathāvidhi | cāturvarṇye yathāśāstraṃ pravṛtto dharmakāmyayā
मैंने समुद्र तक फैली सारी पृथ्वी पर विधिपूर्वक शासन किया, और धर्म की इच्छा से शास्त्र के अनुसार चारों वर्णों को उनके कर्तव्य में लगाए रखा।
श्लोक 7 (12.98.7)
ब्रह्मचर्येण घोरेण गुर्वाचारेण सेवया । वेदानधीत्य धर्मेण राजशास्त्रं च केवलम् ॥
brahmacaryeṇa ghoreṇa gurvācāreṇa sevayā | vedānadhītya dharmeṇa rājaśāstraṃ ca kevalam
कठोर ब्रह्मचर्य से, गुरु के आचार और सेवा से, मैंने धर्मपूर्वक वेदों का अध्ययन किया और राजशास्त्र का भी पूर्ण अध्ययन किया।
श्लोक 8 (12.98.8)
अतिथीनन्नपानेन पितॄंश्च स्वधया तथा । ऋषीन्स्वाध्यायदीक्षाभिर्देवान्यज्ञैरनुत्तमैः ॥
atithīnannapānena pitṝṃśca svadhayā tathā | ṛṣīnsvādhyāyadīkṣābhirdevānyajñairanuttamaiḥ
मैंने अतिथियों को अन्न-जल से, पितरों को स्वधा से, ऋषियों को स्वाध्याय और दीक्षाओं से तथा देवताओं को श्रेष्ठतम यज्ञों से तृप्त किया।
श्लोक 9 (12.98.9)
क्षत्रधर्मे स्थितो भूत्वा यथाशास्त्रं यथाविधि । उदीक्षमाणः पृतनां जयामि युधि वासव ॥
kṣatradharme sthito bhūtvā yathāśāstraṃ yathāvidhi | udīkṣamāṇaḥ pṛtanāṃ jayāmi yudhi vāsava
हे वासव, क्षत्रिय-धर्म में स्थित रहकर, शास्त्र और विधि के अनुसार, शत्रु-सेनाओं की प्रतीक्षा करता हुआ मैं युद्ध में विजय पाता रहा।
श्लोक 10 (12.98.10)
देवराज सुदेवोऽयं मम सेनापतिः पुरा । आसीद्योधः प्रशान्तात्मा सोऽयं कस्मादतीव माम् । विमानं सूर्यसङ्काशमास्थितो मोदते दिवि ॥
devarāja sudevo'yaṃ mama senāpatiḥ purā | āsīdyodhaḥ praśāntātmā so'yaṃ kasmādatīva mām | vimānaṃ sūryasaṅkāśamāsthito modate divi
हे देवराज, यह सुदेव पहले मेरा सेनापति था, शान्त मन का योद्धा। फिर वह मुझसे इतना ऊपर क्यों है, और सूर्य के समान दीप्त विमान में बैठकर स्वर्ग में आनन्द क्यों कर रहा है?
श्लोक 11 (12.98.11)
अनेन क्रतुभिर्मुख्यैर्नेष्टं नापि द्विजातयः । तर्पिता विधिवच्छक्र सोऽयं कस्मादतीत्य माम् ॥
anena kratubhirmukhyairneṣṭaṃ nāpi dvijātayaḥ | tarpitā vidhivacchakra so'yaṃ kasmādatītya mām
हे शक्र, इसने न तो मुख्य यज्ञ किए, न ब्राह्मणों को विधिपूर्वक तृप्त किया। फिर यह मुझसे आगे कैसे निकल गया?
श्लोक 12 (12.98.12)
ऐश्वर्यमीदृशं प्राप्तः सर्वदेवैः सुदुर्लभम् ॥
aiśvaryamīdṛśaṃ prāptaḥ sarvadevaiḥ sudurlabham
उसने ऐसा ऐश्वर्य पाया है जो सब देवताओं के लिए भी अत्यन्त दुर्लभ है।
इन्द्र उवाच
श्लोक 13 (12.98.13)
यदनेन कृतं कर्म प्रत्यक्षं ते महीपते । पुरा पालयतः सम्यक्पृथिवीं धर्मतो नृप ॥
yadanena kṛtaṃ karma pratyakṣaṃ te mahīpate | purā pālayataḥ samyakpṛthivīṃ dharmato nṛpa
हे राजन्, इसने जो कर्म किया, जिसे तुमने स्वयं अपनी आँखों से देखा था, जब तुम धर्म से और भली-भाँति पृथ्वी का पालन कर रहे थे, हे नरेश,
श्लोक 14 (12.98.14)
शत्रवो निर्जिताः सर्वे ये तवाहितकारिणः । संयमो वियमश्चैव सुयमश्च महाबलः ॥
śatravo nirjitāḥ sarve ye tavāhitakāriṇaḥ | saṃyamo viyamaścaiva suyamaśca mahābalaḥ
तुम्हारे जितने शत्रु तुम्हारा अहित चाहते थे, वे सब जीत लिए गए थे, केवल संयम, वियम और महाबली सुयम को छोड़कर:
श्लोक 15 (12.98.15)
राक्षसा दुर्जया लोके त्रयस्ते युद्धदुर्मदाः । पुत्रास्ते शतशृङ्गस्य राक्षसस्य महीपतेः ॥
rākṣasā durjayā loke trayaste yuddhadurmadāḥ | putrāste śataśṛṅgasya rākṣasasya mahīpateḥ
तीन राक्षस, जो संसार में दुर्जेय थे और युद्ध के मद से उन्मत्त थे, राक्षसराज शतशृङ्ग के पुत्र।
श्लोक 16 (12.98.16)
तथा तस्मिञ्शुभे काले तव यज्ञं वितन्वतः । अश्वमेधं महायागं देवानां हितकाम्यया ॥
tathā tasmiñśubhe kāle tava yajñaṃ vitanvataḥ | aśvamedhaṃ mahāyāgaṃ devānāṃ hitakāmyayā
फिर उस शुभ समय में, जब तुम देवताओं के हित की इच्छा से अश्वमेध नामक महायज्ञ कर रहे थे,
श्लोक 17 (12.98.17)
तस्य ते खलु विघ्नार्थमागता राक्षसास्त्रयः । कोटीशतपरीवारां राक्षसानां महाचमूम् । परिगृह्य ततः सर्वाः प्रजा वन्दीकृतास्तव ॥
tasya te khalu vighnārthamāgatā rākṣasāstrayaḥ | koṭīśataparīvārāṃ rākṣasānāṃ mahācamūm | parigṛhya tataḥ sarvāḥ prajā vandīkṛtāstava
वे तीनों राक्षस उसमें विघ्न डालने आए। सौ करोड़ राक्षसों की विशाल सेना साथ लेकर उन्होंने तुम्हारी सारी प्रजा को पकड़कर बन्दी बना लिया।
श्लोक 18 (12.98.18)
विह्वलाश्च प्रजाः सर्वाः सर्वे च तव सैनिकाः । निराकृतस्तु यच्चासीत्सुदेवः सैन्यनायकः ॥
vihvalāśca prajāḥ sarvāḥ sarve ca tava sainikāḥ | nirākṛtastu yaccāsītsudevaḥ sainyanāyakaḥ
तुम्हारी सारी प्रजा और तुम्हारे सब सैनिक घबरा उठे; और तुम्हारी सेना के नायक सुदेव को तुमने अलग कर दिया था।
श्लोक 19 (12.98.19)
तत्रामात्यवचः श्रुत्वा निरस्तः सर्वकर्मसु । श्रुत्वा तेषां वचो भूयः सोपधं वसुधाधिपः ॥
tatrāmātyavacaḥ śrutvā nirastaḥ sarvakarmasu | śrutvā teṣāṃ vaco bhūyaḥ sopadhaṃ vasudhādhipaḥ
तब मन्त्रियों की बात सुनकर उसे सब कार्यों से हटा दिया गया; और राजा ने उनकी कपटभरी बातें फिर सुनीं।
श्लोक 20 (12.98.20)
सर्वसैन्यसमायुक्तः सुदेवः प्रेरितस्त्वया । राक्षसानां वधार्थाय दुर्जयानां नराधिप ॥
sarvasainyasamāyuktaḥ sudevaḥ preritastvayā | rākṣasānāṃ vadhārthāya durjayānāṃ narādhipa
फिर भी, हे राजन्, तुमने सुदेव को पूरी सेना के साथ उन दुर्जेय राक्षसों का वध करने के लिए भेजा।
श्लोक 21 (12.98.21)
नाजित्वा राक्षसीं सेनां पुनरागमनं तव । बन्दीमोक्षमकृत्वा च न चागमनमिष्यते ॥
nājitvā rākṣasīṃ senāṃ punarāgamanaṃ tava | bandīmokṣamakṛtvā ca na cāgamanamiṣyate
तुमने उससे कहा: राक्षसों की सेना को जीते बिना तुम्हारा लौटना नहीं होगा, और बन्दियों को छुड़ाए बिना तुम्हारा आना स्वीकार नहीं किया जाएगा।
श्लोक 22 (12.98.22)
सुदेवस्तद्वचः श्रुत्वा प्रस्थानमकरोन्नृप । संप्राप्तश्च स तं देशं यत्र बन्दीकृताः प्रजाः ॥
sudevastadvacaḥ śrutvā prasthānamakaronnṛpa | saṃprāptaśca sa taṃ deśaṃ yatra bandīkṛtāḥ prajāḥ
हे राजन्, वे वचन सुनकर सुदेव चल पड़ा और उस स्थान पर पहुँचा जहाँ प्रजा बन्दी बनाई गई थी।
श्लोक 23 (12.98.23)
पश्यति स्म महाघोरां राक्षसानां महाचमूम् । दृष्ट्वा सुचिन्तयामास सुदेवो वाहिनीपतिः ॥
paśyati sma mahāghorāṃ rākṣasānāṃ mahācamūm | dṛṣṭvā sucintayāmāsa sudevo vāhinīpatiḥ
उसने राक्षसों की अत्यन्त भयंकर विशाल सेना देखी, और उसे देखकर सेनापति सुदेव गहरी चिन्ता में पड़ गया।
श्लोक 24 (12.98.24)
नेयं शक्या चमूर्जेतुमपि सेन्द्रैः सुरासुरैः । नाम्बरीषः कलामेकामेषां क्षपयितुं क्षमः । दिव्यास्त्रबलभूयिष्ठः किमहं पुनरीदृशः ॥
neyaṃ śakyā camūrjetumapi sendraiḥ surāsuraiḥ | nāmbarīṣaḥ kalāmekāmeṣāṃ kṣapayituṃ kṣamaḥ | divyāstrabalabhūyiṣṭhaḥ kimahaṃ punarīdṛśaḥ
इस सेना को इन्द्र सहित देवता और असुर भी नहीं जीत सकते। दिव्य अस्त्रों के बल से सम्पन्न अम्बरीष भी इसका एक अंश तक नष्ट नहीं कर सकता; तब मुझ जैसे की क्या बात?
श्लोक 25 (12.98.25)
ततः सेनां पुनः सर्वां प्रेषयामास पार्थिव । यत्र त्वं सचिवैः सर्वैर्मन्त्रिभिः सोपधैर्नृप ॥
tataḥ senāṃ punaḥ sarvāṃ preṣayāmāsa pārthiva | yatra tvaṃ sacivaiḥ sarvairmantribhiḥ sopadhairnṛpa
तब, हे राजन्, उसने सारी सेना को वहीं लौटा दिया जहाँ तुम अपने सब सचिवों और कपटी मन्त्रियों के साथ थे।
श्लोक 26 (12.98.26)
ततो रुद्रं महादेवं प्रपन्नो जगतः पतिम् । श्मशाननिलयं देवं तुष्टाव वृषभध्वजम् ॥
tato rudraṃ mahādevaṃ prapanno jagataḥ patim | śmaśānanilayaṃ devaṃ tuṣṭāva vṛṣabhadhvajam
फिर उसने जगत् के स्वामी रुद्र महादेव की शरण ली और श्मशान में निवास करने वाले, वृषभ-ध्वजधारी देव की स्तुति की।
श्लोक 27 (12.98.27)
स्तुत्वा शस्त्रं समादाय स्वशिरश्छेत्तुमुद्यतः ॥
stutvā śastraṃ samādāya svaśiraśchettumudyataḥ
स्तुति करके उसने शस्त्र उठाया और अपना ही सिर काटने को उद्यत हो गया।
श्लोक 28 (12.98.28)
कारुण्याद्देवदेवेन गृहीतस्तस्य दक्षिणः । स पाणिः सह शस्त्रेण दृष्ट्वा चेदमुवाच ह ॥
kāruṇyāddevadevena gṛhītastasya dakṣiṇaḥ | sa pāṇiḥ saha śastreṇa dṛṣṭvā cedamuvāca ha
करुणा से देवाधिदेव ने उसके दाहिने हाथ को शस्त्र सहित पकड़ लिया और उसे देखकर यह कहा:
श्लोक 29 (12.98.29)
किमिदं साहसं पुत्र कर्तुकामो वदस्व मे । स उवाच महादेवं शिरसा त्ववनीं गतः ॥
kimidaṃ sāhasaṃ putra kartukāmo vadasva me | sa uvāca mahādevaṃ śirasā tvavanīṃ gataḥ
बेटा, यह कैसा साहस करना चाहते हो? मुझे बताओ। तब वह सिर झुकाकर भूमि पर पड़ा हुआ महादेव से बोला:
सुदेव उवाच
श्लोक 30 (12.98.30)
भगवन्वाहिनीमेनां राक्षसानां सुरेश्वर । अशक्तोऽहं रणे जेतुं तस्मात्त्यक्ष्यामि जीवितम् । गतिर्भव महादेव ममार्तस्य जगत्पते ॥
bhagavanvāhinīmenāṃ rākṣasānāṃ sureśvara | aśakto'haṃ raṇe jetuṃ tasmāttyakṣyāmi jīvitam | gatirbhava mahādeva mamārtasya jagatpate
भगवन्, हे देवेश्वर, मैं इस राक्षस-सेना को युद्ध में जीतने में असमर्थ हूँ, इसलिए प्राण त्याग दूँगा। हे महादेव, हे जगत्पति, मुझ दुखी की आप ही गति हों।
श्लोक 31 (12.98.31)
नागन्तव्यमजित्वा च मामाह जगतीपतिः । अम्बरीषो महादेव क्षारितः सचिवैः सह ॥
nāgantavyamajitvā ca māmāha jagatīpatiḥ | ambarīṣo mahādeva kṣāritaḥ sacivaiḥ saha
पृथ्वीपति ने मुझसे कहा था, "बिना जीते लौटना नहीं।" हे महादेव, अम्बरीष अपने सचिवों सहित मेरे विरुद्ध कर दिए गए हैं।
इन्द्र उवाच
श्लोक 32 (12.98.32)
तमुवाच महादेवः सुदेवं पतितं क्षितौ । अधोमुखं महात्मानं सत्वानां हितकाम्यया ॥
tamuvāca mahādevaḥ sudevaṃ patitaṃ kṣitau | adhomukhaṃ mahātmānaṃ satvānāṃ hitakāmyayā
महादेव ने उस महात्मा सुदेव से, जो मुँह के बल भूमि पर पड़ा था, प्राणियों के हित की इच्छा से कहा,
श्लोक 33 (12.98.33)
धनुर्वेदं समाहूय सगणं सहविग्रहम् । रथनागाश्वकलिलं दिव्यास्त्रसमलंकृतम् ॥
dhanurvedaṃ samāhūya sagaṇaṃ sahavigraham | rathanāgāśvakalilaṃ divyāstrasamalaṃkṛtam
धनुर्वेद को, उसके गणों सहित साकार रूप में बुलाकर, जो रथों, हाथियों और घोड़ों से भरा तथा दिव्य अस्त्रों से सुसज्जित था,
श्लोक 34 (12.98.34)
रथं च सुमहाभागं येन तन्त्रिपुरं हतम् । धनुः पिनाकं खड्गं च रौद्रमस्त्रं च शंकरः । निजघानासुरान्सर्वान्येन देवस्त्रियम्बकः ॥
rathaṃ ca sumahābhāgaṃ yena tantripuraṃ hatam | dhanuḥ pinākaṃ khaḍgaṃ ca raudramastraṃ ca śaṃkaraḥ | nijaghānāsurānsarvānyena devastriyambakaḥ
और उस महान् तेजस्वी रथ को, जिससे त्रिपुर का नाश हुआ था, पिनाक धनुष, खड्ग और रुद्र के भयंकर अस्त्र को भी, जिनसे त्रिनेत्र देव शंकर ने सब असुरों का संहार किया था।
श्लोक 35 (12.98.35)
उवाच च महादेवः सुदेवं वाहिनीपतिम् । रथादस्मात्सुदेव त्वं दुर्जयः स सुरासुरैः ॥
uvāca ca mahādevaḥ sudevaṃ vāhinīpatim | rathādasmātsudeva tvaṃ durjayaḥ sa surāsuraiḥ
और महादेव ने सेनापति सुदेव से कहा: इस रथ के बल से तुम देवताओं और असुरों के लिए भी अजेय रहोगे।
महादेव उवाच
श्लोक 36 (12.98.36)
मायया मोहितो भूमौ न पदं कर्तुमर्हसि । रथस्थस्त्रिदशान्सर्वाञ्जेष्यसि त्वं सदानवान् ॥
māyayā mohito bhūmau na padaṃ kartumarhasi | rathasthastridaśānsarvāñjeṣyasi tvaṃ sadānavān
भूमि पर पैर मत रखना, नहीं तो उनकी माया से मोहित हो जाओगे; रथ पर खड़े रहकर तुम दानवों सहित सब देवताओं को जीत लोगे।
श्लोक 37 (12.98.37)
राक्षसाश्च पिशाचाश्च न शक्ता द्रष्टुमीदृशम् । रथं सूर्यसहस्राभं किमु योद्धुं त्वया सह ॥
rākṣasāśca piśācāśca na śaktā draṣṭumīdṛśam | rathaṃ sūryasahasrābhaṃ kimu yoddhuṃ tvayā saha
हजार सूर्यों के समान चमकते ऐसे रथ को राक्षस और पिशाच देख तक नहीं सकते; फिर तुम्हारे साथ युद्ध करना तो दूर की बात है।
इन्द्र उवाच
श्लोक 38 (12.98.38)
स जित्वा राक्षसान्सर्वान्कृत्वा बन्दीविमोक्षणम् । घातयित्वा च तान्सर्वान्बाहुयुद्धे त्वयं हतः । वियमं प्राप्य भूपाल वियमश्च निपातितः ॥
sa jitvā rākṣasānsarvānkṛtvā bandīvimokṣaṇam | ghātayitvā ca tānsarvānbāhuyuddhe tvayaṃ hataḥ | viyamaṃ prāpya bhūpāla viyamaśca nipātitaḥ
उसने सब राक्षसों को जीतकर बन्दियों को छुड़ाया, और जब वे सब मारे जा चुके तो वह स्वयं भुजाओं की लड़ाई में मारा गया; फिर भी, हे राजन्, वियम के पास पहुँचकर उसने वियम को भी गिरा दिया।
श्लोक 39 (12.98.39)
तस्य विक्रमतस्तात सुदेवस्य बभूव ह । संग्रामयज्ञः सुमहान्यश्चान्यो युध्यते नरः ॥
tasya vikramatastāta sudevasya babhūva ha | saṃgrāmayajñaḥ sumahānyaścānyo yudhyate naraḥ
वत्स, पराक्रम दिखाते हुए सुदेव के लिए एक महान् संग्राम-यज्ञ सम्पन्न हुआ, और जो भी दूसरा मनुष्य युद्ध करता है उसके लिए भी ऐसा ही होता है।
श्लोक 40 (12.98.40)
सन्नद्धो दीक्षितः सर्वो योधः प्राप्य चमूमुखम् । युद्धयज्ञाधिकारस्थो भवतीति विनिश्चयः ॥
sannaddho dīkṣitaḥ sarvo yodhaḥ prāpya camūmukham | yuddhayajñādhikārastho bhavatīti viniścayaḥ
जो भी योद्धा कवच बाँधकर, दीक्षित होकर सेना के अग्रभाग में पहुँचता है, वह निश्चय ही युद्ध-यज्ञ के अधिकार में स्थित होता है।
अम्बरीष उवाच
श्लोक 41 (12.98.41)
कानि यज्ञे हवींष्यस्मिन्किमाज्यं का च दक्षिणा । ऋत्विजश्चात्र के प्रोक्तास्तन्मे ब्रूहि शतक्रतो ॥
kāni yajñe havīṃṣyasminkimājyaṃ kā ca dakṣiṇā | ṛtvijaścātra ke proktāstanme brūhi śatakrato
इस यज्ञ में हवि क्या है, घी क्या है और दक्षिणा क्या है? और यहाँ ऋत्विज कौन कहे गए हैं? हे शतक्रतु, यह मुझे बताइए।
इन्द्र उवाच
श्लोक 42 (12.98.42)
ऋत्विजः कुञ्जरास्तत्र वाजिनोऽध्वर्यवस्तथा । हवींषि परमांसानि रुधिरं त्वाज्यमुच्यते ॥
ṛtvijaḥ kuñjarāstatra vājino'dhvaryavastathā | havīṃṣi paramāṃsāni rudhiraṃ tvājyamucyate
वहाँ हाथी ऋत्विज हैं और घोड़े अध्वर्यु; शत्रुओं का मांस हवि है और रक्त को घी कहा जाता है।
श्लोक 43 (12.98.43)
शृगालगृध्रकाकोलाः सदस्यास्तत्र सत्रिणः । आज्यशेषं पिबन्त्येते हविः प्राश्नन्ति चाध्वरे ॥
śṛgālagṛdhrakākolāḥ sadasyāstatra satriṇaḥ | ājyaśeṣaṃ pibantyete haviḥ prāśnanti cādhvare
वहाँ सियार, गिद्ध और कौए सभासद् हैं, यज्ञ में भाग लेने वाले; वे उस यज्ञ में बचा हुआ घी पीते हैं और हवि खाते हैं।
श्लोक 44 (12.98.44)
प्रासतोमरसंघाताः खड्गशक्तिपरश्वधाः । ज्वलन्तो निशिताः पीताः स्रुचस्तस्याथ सत्रिणः ॥
prāsatomarasaṃghātāḥ khaḍgaśaktiparaśvadhāḥ | jvalanto niśitāḥ pītāḥ srucastasyātha satriṇaḥ
भाले, तोमर, तलवारें, शक्तियाँ और फरसे, जो चमकते हुए, तीखे और पानी पिलाकर तेज किए हुए होते हैं, उस यज्ञ के और उसके सहभागियों के स्रुच हैं।
श्लोक 45 (12.98.45)
चापवेगायतस्तीक्ष्णः परकायावभेदनः । ऋजुः सुनिशितः पीतः सायकश्च स्रुवो महान् ॥
cāpavegāyatastīkṣṇaḥ parakāyāvabhedanaḥ | ṛjuḥ suniśitaḥ pītaḥ sāyakaśca sruvo mahān
धनुष के वेग से छूटा हुआ लम्बा, तीखा, शत्रु के शरीर को भेदने वाला, सीधा, खूब धार चढ़ाया हुआ और पानी पिलाया हुआ बाण उसका बड़ा स्रुवा है।
श्लोक 46 (12.98.46)
द्वीपिचर्मावनद्धश्च नागदन्तकृतत्सरुः । हस्तिहस्तहरः खड्गः स्फ्यो भवेत्तस्य संयुगे ॥
dvīpicarmāvanaddhaśca nāgadantakṛtatsaruḥ | hastihastaharaḥ khaḍgaḥ sphyo bhavettasya saṃyuge
चीते की खाल से मढ़ी हुई, हाथीदाँत की मूठ वाली, हाथी की सूँड़ काट देने वाली तलवार उसके युद्ध में स्फ्य होती है।
श्लोक 47 (12.98.47)
ज्वलितैर्निशितैः प्रासशक्त्यृष्टिसपरश्वधैः । शैक्यायसमयैस्तीक्ष्णैरभिघातो भवेद्वसु ॥
jvalitairniśitaiḥ prāsaśaktyṛṣṭisaparaśvadhaiḥ | śaikyāyasamayaistīkṣṇairabhighāto bhavedvasu
चमकते, तीखे, लोहे के बने और धारदार भालों, शक्तियों, ऋष्टियों और फरसों के प्रहार ही उसकी यज्ञ-सामग्री होंगे।
श्लोक 48 (12.98.48)
सङ्ख्यासमयविस्तीर्णमभिजातोद्भवं बहु । आवेधाद्यच्च रुधिरं संग्रामे स्रवते भुवि । साऽस्य पूर्णाहुतिर्होत्रैः समृद्धा सर्वकामधुक् ॥
saṅkhyāsamayavistīrṇamabhijātodbhavaṃ bahu | āvedhādyacca rudhiraṃ saṃgrāme sravate bhuvi | sā'sya pūrṇāhutirhotraiḥ samṛddhā sarvakāmadhuk
अनेक, योद्धाओं की गणना के अनुसार फैला हुआ, कुलीन पुरुषों से उत्पन्न: युद्ध में घाव लगने से जो रक्त भूमि पर बहता है, वही उसकी पूर्णाहुति है, जो होताओं के कर्म से पूर्ण होकर सब कामनाएँ पूरी करती है।
श्लोक 49 (12.98.49)
छिन्धि भिन्धीति यः शब्दः श्रूयते वाहिनीमुखे । सामानि सामगास्तस्य गायन्ति यमसादने ॥
chindhi bhindhīti yaḥ śabdaḥ śrūyate vāhinīmukhe | sāmāni sāmagāstasya gāyanti yamasādane
सेना के अग्रभाग में जो "काटो! भेदो!" की पुकार सुनाई देती है, उसी के लिए सामगान करने वाले यमलोक में उसके सामों का गान करते हैं।
श्लोक 50 (12.98.50)
हविर्धानं तु तस्याहुः परेषां वाहिनीमुखम् ॥
havirdhānaṃ tu tasyāhuḥ pareṣāṃ vāhinīmukham
शत्रुओं की सेना का अग्रभाग उसका हविर्धान कहा जाता है।
श्लोक 51 (12.98.51)
कुञ्जराणां हयानां च वर्मिणां च समुच्चयः । अग्निः श्येनचितो नाम यज्ञे तस्य विधीयते ॥
kuñjarāṇāṃ hayānāṃ ca varmiṇāṃ ca samuccayaḥ | agniḥ śyenacito nāma yajñe tasya vidhīyate
हाथियों, घोड़ों और कवचधारियों का ढेर उसके यज्ञ में श्येनचित नामक अग्नि-चयन है।
श्लोक 52 (12.98.52)
उत्तिष्ठते कबन्धोऽत्र सहस्रे पतिते तु यः । स यूपस्तस्य शूरस्य खादिरोऽष्टाश्रिरुच्यते ॥
uttiṣṭhate kabandho'tra sahasre patite tu yaḥ | sa yūpastasya śūrasya khādiro'ṣṭāśrirucyate
जब हजार वीर गिर जाते हैं और एक कबन्ध उठ खड़ा होता है, तो वही उस शूर का यूप है, जिसे खदिर की लकड़ी का और अष्टकोण वाला कहा जाता है।
श्लोक 53 (12.98.53)
इडोपहूताः क्रोशन्ति कुञ्जरास्त्वङ्कुशेरिताः । ज्याघुष्टतलतालेन वषट्कारेण पार्थिव ॥
iḍopahūtāḥ krośanti kuñjarāstvaṅkuśeritāḥ | jyāghuṣṭatalatālena vaṣaṭkāreṇa pārthiva
अंकुश से प्रेरित हाथी चिंघाड़ते हैं, मानो इडा का आह्वान हो रहा हो; और धनुष की डोरी की टंकार तथा हथेलियों की ताली वषट्कार है, हे राजन्।
श्लोक 54 (12.98.54)
उद्गाता तत्र संग्रामे त्रिसामा दुन्दुभिर्नृप । ब्रह्मस्वे ह्रियमाणे तु त्यक्त्वा युद्धे प्रियां तनुम् । आत्मानं यूपमुच्छ्रित्य स यज्ञोऽनन्तदक्षिणः ॥
udgātā tatra saṃgrāme trisāmā dundubhirnṛpa | brahmasve hriyamāṇe tu tyaktvā yuddhe priyāṃ tanum | ātmānaṃ yūpamucchritya sa yajño'nantadakṣiṇaḥ
उस युद्ध में उद्गाता तीन सामों वाली दुन्दुभि है, हे राजन्। और जो ब्राह्मण का धन छीना जाते समय युद्ध में अपना प्रिय शरीर त्याग देता है और स्वयं को यूप बनाकर खड़ा करता है, उसका यज्ञ अनन्त दक्षिणा वाला है।
श्लोक 55 (12.98.55)
भर्तुरर्थे च यः शूरो निष्क्रामेद्वाहिनीमुखात् । न भयाद्विनिवर्तेत तस्य लोका यथा मम ॥
bharturarthe ca yaḥ śūro niṣkrāmedvāhinīmukhāt | na bhayādvinivarteta tasya lokā yathā mama
जो शूर स्वामी के लिए सेना के अग्रभाग से निकल पड़ता है और भय से पीछे नहीं हटता, उसके लोक मेरे लोकों के समान होंगे।
श्लोक 56 (12.98.56)
द्वीपिचर्मावृतैः खड्गैर्बाहुभिः परिघोपमैः । यस्य वेदिरुपस्तीर्णा तस्य लोका यथा मम ॥
dvīpicarmāvṛtaiḥ khaḍgairbāhubhiḥ parighopamaiḥ | yasya vedirupastīrṇā tasya lokā yathā mama
जिसकी वेदी चीते की खाल में मढ़ी तलवारों और परिघ-जैसी भुजाओं से बिछी है, उसके लोक मेरे लोकों के समान होंगे।
श्लोक 57 (12.98.57)
यस्तु नापेक्षते कंचित्सहायं विषमे स्थितः । विगाह्य वाहिनीमध्यं तस्य लोका यथा मम ॥
yastu nāpekṣate kaṃcitsahāyaṃ viṣame sthitaḥ | vigāhya vāhinīmadhyaṃ tasya lokā yathā mama
जो संकट की स्थिति में किसी सहायक की अपेक्षा नहीं करता और सेना के बीच घुस जाता है, उसके लोक मेरे लोकों के समान होंगे।
श्लोक 58 (12.98.58)
यस्य शोणितसंघट्टा भेरीमण्डूककच्छपा । वीरास्थिशर्करा दुर्गा मांसशोणितकर्दमा ॥
yasya śoṇitasaṃghaṭṭā bherīmaṇḍūkakacchapā | vīrāsthiśarkarā durgā māṃsaśoṇitakardamā
एक नदी, जिसमें रक्त की लहरें उमड़ती हैं, जिसके मेंढक और कछुए भेरियाँ हैं, जिसकी कंकड़ियाँ वीरों की हड्डियाँ हैं, जो पार करने में कठिन है और जिसका कीचड़ मांस और रक्त है,
श्लोक 59 (12.98.59)
असिचर्मप्लवा घोरा केशशैवलशाद्वला । अश्वनागरथैश्चैव संछिन्नैः कृतसंक्रमा ॥
asicarmaplavā ghorā keśaśaivalaśādvalā | aśvanāgarathaiścaiva saṃchinnaiḥ kṛtasaṃkramā
जिसमें तलवारें और ढालें बेड़े हैं, जो भयानक है, जिसकी काई और घास केश हैं, और कटे हुए घोड़ों, हाथियों और रथों से जिस पर पुल बन गए हैं,
श्लोक 60 (12.98.60)
पताकाध्वजवानीरा हतवाहनवारणा । शोणितोदकसंपूर्णा दुस्तरा पारगैर्नरैः ॥
patākādhvajavānīrā hatavāhanavāraṇā | śoṇitodakasaṃpūrṇā dustarā pāragairnaraiḥ
जिसके किनारे के सरकण्डे पताकाएँ और ध्वज हैं, जिसमें मारे गए वाहन और हाथी पड़े हैं, जो रक्त के जल से भरी है और पार जाने वाले मनुष्यों के लिए दुस्तर है,
श्लोक 61 (12.98.61)
हतनागमहानक्रा परलोकवहाऽशिवा । ऋष्टिखड्गमहामीना गृध्रकङ्कबलप्लवा ॥
hatanāgamahānakrā paralokavahā'śivā | ṛṣṭikhaḍgamahāmīnā gṛdhrakaṅkabalaplavā
जिसमें मरे हुए हाथी बड़े ग्राह हैं, जो अमंगलमयी है और परलोक की ओर बहाकर ले जाती है, जिसमें ऋष्टि और खड्ग बड़ी मछलियाँ हैं, और गिद्ध, कंक तथा बगुले जिस पर तैरते हैं,
श्लोक 62 (12.98.62)
पुरुषादानुचरिता भीरूणां कश्मलावहा । नदी योधस्य संग्रामे तदस्यावभृथं नृप ॥
puruṣādānucaritā bhīrūṇāṃ kaśmalāvahā | nadī yodhasya saṃgrāme tadasyāvabhṛthaṃ nṛpa
जिसमें मांसभक्षी विचरते हैं और जो डरपोकों को मूर्छित कर देती है: ऐसी नदी योद्धा के लिए युद्ध में उसका अवभृथ-स्नान है, हे राजन्।
श्लोक 63 (12.98.63)
वेदिर्यस्य त्वमित्राणां शिरोभिर्व्यवकीर्यते । अश्वस्कन्धैर्गजस्कन्धैस्तस्य लोका यथा मम ॥
vediryasya tvamitrāṇāṃ śirobhirvyavakīryate | aśvaskandhairgajaskandhaistasya lokā yathā mama
जिसकी वेदी शत्रुओं के सिरों तथा घोड़ों और हाथियों के कन्धों से पटी है, उसके लोक मेरे लोकों के समान होंगे।
श्लोक 64 (12.98.64)
पत्नी शालाकृता यस्य परेषां वाहिनीमुखम् । हविर्धानं स्ववाहिन्यास्तदस्याहुर्मनीषिणः ॥
patnī śālākṛtā yasya pareṣāṃ vāhinīmukham | havirdhānaṃ svavāhinyāstadasyāhurmanīṣiṇaḥ
जिसके लिए शत्रुओं की सेना का अग्रभाग पत्नीशाला बना है और अपनी सेना का अग्रभाग हविर्धान, उसके विषय में विद्वान् ऐसा कहते हैं।
श्लोक 65 (12.98.65)
सदस्या दक्षिणा योधा आग्नीध्रश्चोत्तरां दिशम् । शत्रुसेनाकलत्रस्य सर्वलोकानदूरतः ॥
sadasyā dakṣiṇā yodhā āgnīdhraścottarāṃ diśam | śatrusenākalatrasya sarvalokānadūrataḥ
दाहिनी ओर के योद्धा उसके सदस्य हैं और आग्नीध्र उत्तर दिशा में है; शत्रु की सेना ही जिसकी पत्नी है, उसके लिए सब लोक दूर नहीं हैं।
श्लोक 66 (12.98.66)
यस्य भयतो व्यूहे भवत्याकाशमग्रतः । सास्य वेदिस्तदा यज्ञैर्नित्यं व्यूहास्त्रयोऽग्नयः ॥
yasya bhayato vyūhe bhavatyākāśamagrataḥ | sāsya vedistadā yajñairnityaṃ vyūhāstrayo'gnayaḥ
जिसके भय से व्यूह के सामने का स्थान खाली हो जाता है, वही उस समय उसकी वेदी है, और उसके यज्ञों में तीनों व्यूह सदा तीन अग्नियाँ हैं।
श्लोक 67 (12.98.67)
यस्तु योधः परावृत्तः संत्रस्तो हन्यते परैः । अप्रतिष्ठः स नरकं याति नास्त्यत्र संशयः ॥
yastu yodhaḥ parāvṛttaḥ saṃtrasto hanyate paraiḥ | apratiṣṭhaḥ sa narakaṃ yāti nāstyatra saṃśayaḥ
किन्तु जो योद्धा भयभीत होकर पीठ फेर लेता है और शत्रुओं द्वारा मारा जाता है, वह कहीं ठिकाना न पाकर नरक में जाता है; इसमें कोई सन्देह नहीं।
श्लोक 68 (12.98.68)
यस्य शोणितवेगेण वेदिः स्यात्संपरिप्लुता । केशमांसास्थिसंपूर्णा स गच्छेत्परमां गतिम् ॥
yasya śoṇitavegeṇa vediḥ syātsaṃpariplutā | keśamāṃsāsthisaṃpūrṇā sa gacchetparamāṃ gatim
जिसकी वेदी रक्त के प्रवाह से भीग जाती है और केश, मांस तथा हड्डियों से भर जाती है, वह परम गति को प्राप्त होता है।
श्लोक 69 (12.98.69)
यस्तु सेनापतिं हत्वा तद्यानमधिरोहति । स विष्णुविक्रमक्रामी बृहस्पतिसमः प्रभुः ॥
yastu senāpatiṃ hatvā tadyānamadhirohati | sa viṣṇuvikramakrāmī bṛhaspatisamaḥ prabhuḥ
जो सेनापति को मारकर उसके वाहन पर चढ़ता है, वह विष्णु के समान पग रखने वाला और बृहस्पति के समान प्रभु होता है।
श्लोक 70 (12.98.70)
नायकं तत्कुमारं वा यो वा स्यात्तत्र पूजितः । जीवग्राहं प्रगृह्णाति तस्य लोका यथा मम ॥
nāyakaṃ tatkumāraṃ vā yo vā syāttatra pūjitaḥ | jīvagrāhaṃ pragṛhṇāti tasya lokā yathā mama
जो नायक को, उसके पुत्र को, या वहाँ जो भी सम्मानित हो, उसे जीवित पकड़ लेता है, उसके लोक मेरे लोकों के समान होंगे।
श्लोक 71 (12.98.71)
आहवे तु हतं शूरं न शोचेत कथंचन । अशोच्यो हि हतः शूरः स्वर्गलोके महीयते ॥
āhave tu hataṃ śūraṃ na śoceta kathaṃcana | aśocyo hi hataḥ śūraḥ svargaloke mahīyate
युद्ध में मारे गए शूर के लिए कभी शोक नहीं करना चाहिए; मारा गया शूर शोक के योग्य नहीं है, क्योंकि वह स्वर्गलोक में सम्मान पाता है।
श्लोक 72 (12.98.72)
न ह्यन्नं नोदकं तस्य न स्नानं नाप्यशौचकम् । हतस्य कर्तुमिच्छन्ति तस्य लोकाञ्शृणुष्व मे ॥
na hyannaṃ nodakaṃ tasya na snānaṃ nāpyaśaucakam | hatasya kartumicchanti tasya lokāñśṛṇuṣva me
युद्ध में मारे गए के लिए कोई अन्न, जल, स्नान या अशौच के कर्म करना नहीं चाहता; अब सुनो कि उसके लोक कौन-से हैं।
श्लोक 73 (12.98.73)
वराप्सरः सहस्राणि शूरमायोधने हतम् । त्वरमाणानि धावन्ति मम भर्ता भवेदिति ॥
varāpsaraḥ sahasrāṇi śūramāyodhane hatam | tvaramāṇāni dhāvanti mama bhartā bhavediti
हजारों सुन्दर अप्सराएँ युद्ध में मारे गए शूर की ओर यह कहती हुई उतावली से दौड़ती हैं, "यह मेरा पति हो!"
श्लोक 74 (12.98.74)
एतत्तपश्च पुण्यं च धर्मश्चैव सनातनः । चत्वारश्चाश्रमास्तस्य यो युद्धे न पलायते ॥
etattapaśca puṇyaṃ ca dharmaścaiva sanātanaḥ | catvāraścāśramāstasya yo yuddhe na palāyate
जो युद्ध से नहीं भागता, उसके लिए यही तप है, यही पुण्य है, यही सनातन धर्म है और यही चारों आश्रम हैं।
श्लोक 75 (12.98.75)
वृद्धबालौ न हन्तव्यौ न च स्त्री नैव पृष्ठतः । तृणपूर्णमुखश्चैव तवास्मीति च यो वदेत् ॥
vṛddhabālau na hantavyau na ca strī naiva pṛṣṭhataḥ | tṛṇapūrṇamukhaścaiva tavāsmīti ca yo vadet
वृद्धों और बालकों को नहीं मारना चाहिए, न स्त्री को, न पीठ दिखाने वाले को, और न उसे जो मुँह में तिनका लेकर कहे, "मैं आपका हूँ।"
श्लोक 76 (12.98.76)
अहं वृत्रं बलं पाकं महाकायं विरोचनम् । दुरावारं च नमुचिं शतमायं च शम्बरम् ॥
ahaṃ vṛtraṃ balaṃ pākaṃ mahākāyaṃ virocanam | durāvāraṃ ca namuciṃ śatamāyaṃ ca śambaram
मैंने वृत्र, बल, पाक, महाकाय विरोचन, दुरासद नमुचि और सौ मायाओं वाले शम्बर को मारा,
श्लोक 77 (12.98.77)
विप्रचित्तिं च दैतेयं दनोः पुत्रांश्च सर्वशः । प्रह्रादं च निहत्याजौ ततो देवाधिपोऽभवम् ॥
vipracittiṃ ca daiteyaṃ danoḥ putrāṃśca sarvaśaḥ | prahrādaṃ ca nihatyājau tato devādhipo'bhavam
और दैत्य विप्रचित्ति, दनु के सब पुत्रों तथा प्रह्लाद को भी युद्ध में मारकर तब मैं देवताओं का अधिपति बना।
भीष्म उवाच
श्लोक 78 (12.98.78)
इत्येतच्छक्रवचनं निशम्य प्रतिपूज्य च । योधानामात्मनः सिद्धिमम्बरीषोऽभिपन्नवान् ॥
ityetacchakravacanaṃ niśamya pratipūjya ca | yodhānāmātmanaḥ siddhimambarīṣo'bhipannavān
शक्र के इस वचन को सुनकर और उसका आदर करके अम्बरीष ने योद्धाओं की सिद्धि को समझ लिया।