स्त्री पर्व · अध्याय 1
जनमेजय का प्रश्न; सञ्जय द्वारा धृतराष्ट्र को सान्त्वना
जनमेजय पूछते हैं कि दुर्योधन के पतन के बाद धृतराष्ट्र, पाण्डवों और बचे हुए तीनों कौरव-वीरों ने क्या किया, और वैशम्पायन स्त्रीपर्व आरम्भ करते हैं। सञ्जय शोक में डूबे अन्धे राजा से मृतकों के प्रेतकर्म करने को कहते हैं। धृतराष्ट्र मूर्छित होकर गिर पड़ते हैं और फिर विलाप करते हैं कि उन्होंने भीष्म, कृष्ण आदि की सलाह नहीं मानी। सञ्जय उन्हें समझाते हैं कि शोक से कुछ नहीं मिलता और युद्ध की आग उनके अपने पुत्र-मोह से ही भड़की थी; इसके बाद विदुर बोलने को उठते हैं।
जनमेजय उवाच
श्लोक 1 (11.1.1)
हते दुर्योधने चैव हते सैन्ये च सर्वशः । धृतराष्ट्रो महाराज श्रुत्वा किमकरोन्मुने ॥
hate duryodhane caiva hate sainye ca sarvaśaḥ | dhṛtarāṣṭro mahārāja śrutvā kimakaronmune
हे मुने, दुर्योधन के मारे जाने और सारी सेना के सब ओर से नष्ट हो जाने पर यह सुनकर महाराज धृतराष्ट्र ने क्या किया?
श्लोक 2 (11.1.2)
तथैव कौरवो राजा धर्मपुत्रो महामनाः । कृपप्रभृतयश्चैव किमकुर्वत ते त्रयः ॥
tathaiva kauravo rājā dharmaputro mahāmanāḥ | kṛpaprabhṛtayaścaiva kimakurvata te trayaḥ
और कुरुराज धर्मपुत्र उदारचित्त युधिष्ठिर ने क्या किया, तथा कृप आदि उन तीनों ने क्या किया?
श्लोक 3 (11.1.3)
अश्वत्थाम्नः कृतं कर्म शापश्चान्योन्यकारितः । वृत्तान्तमुत्तरं ब्रूहि यदभाषत सञ्जयः ॥
aśvatthāmnaḥ kṛtaṃ karma śāpaścānyonyakāritaḥ | vṛttāntamuttaraṃ brūhi yadabhāṣata sañjayaḥ
अश्वत्थामा ने जो कर्म किया और जो शाप दोनों ने एक-दूसरे को दिए, उसे तथा उसके आगे का वृत्तान्त बताइए, और यह भी कि सञ्जय ने क्या कहा।
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 4 (11.1.4)
हते पुत्रशते दीनं छिन्नशाखमिव द्रुमम् । पुत्रशोकाभिसन्तप्तं धृतराष्ट्रं महीपतिम् ॥
hate putraśate dīnaṃ chinnaśākhamiva drumam | putraśokābhisantaptaṃ dhṛtarāṣṭraṃ mahīpatim
सौ पुत्रों के मारे जाने पर राजा धृतराष्ट्र दीन हो गए थे, डालियाँ कटे हुए वृक्ष के समान, पुत्रशोक से सन्तप्त;
श्लोक 5 (11.1.5)
ध्यानमूकत्वमापन्नं चिन्तया समभिप्लुतम् । सञ्जयो जयतां श्रेष्ठ राजानं वाक्यमब्रवीत् ॥
dhyānamūkatvamāpannaṃ cintayā samabhiplutam | sañjayo jayatāṃ śreṣṭha rājānaṃ vākyamabravīt
ध्यान में डूबकर मौन हो गए, चिन्ता में निमग्न थे। हे विजयियों में श्रेष्ठ, उन राजा से सञ्जय ने यह बात कही।
सञ्जय उवाच
श्लोक 6 (11.1.6)
किं शोचसि महाराज नास्ति शोके सहायता । अक्षौहिण्यो हताश्चाष्टौ दश चैव विशाम्पते । निर्जितेयं वसुमती शून्या स्थास्यति केवलम् ॥
kiṃ śocasi mahārāja nāsti śoke sahāyatā | akṣauhiṇyo hatāścāṣṭau daśa caiva viśāmpate | nirjiteyaṃ vasumatī śūnyā sthāsyati kevalam
हे महाराज, आप शोक क्यों करते हैं? शोक में कोई सहायता नहीं है। हे प्रजापालक, आठ और दस, यानी अठारह अक्षौहिणी सेनाएँ मारी गईं। यह जीती हुई पृथ्वी अब केवल सूनी रह जाएगी।
श्लोक 7 (11.1.7)
नानादिग्भ्यः समागम्य नानाजात्या नराधिपाः । सहितास्तव पुत्रेण सर्वे वै निधनं गताः ॥
nānādigbhyaḥ samāgamya nānājātyā narādhipāḥ | sahitāstava putreṇa sarve vai nidhanaṃ gatāḥ
नाना दिशाओं से आकर अनेक जातियों के राजा आपके पुत्र के साथ मिलकर सब-के-सब मृत्यु को प्राप्त हो गए।
श्लोक 8 (11.1.8)
पितॄणां पुत्रपौत्राणां ज्ञातीनां सुहृदां तथा । गुरूणां चानुपूर्व्येण ये चान्येऽनुचरा हताः । प्रेतकार्याणि सर्वाणि कारयस्व नराधिप ॥
pitṝṇāṃ putrapautrāṇāṃ jñātīnāṃ suhṛdāṃ tathā | gurūṇāṃ cānupūrvyeṇa ye cānye'nucarā hatāḥ | pretakāryāṇi sarvāṇi kārayasva narādhipa
हे नरेश, पितरों, पुत्रों, पौत्रों, जातिजनों, मित्रों और गुरुजनों के, तथा जो अन्य अनुचर मारे गए हैं उनके भी, क्रम से सब प्रेतकर्म करवाइए।
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 9 (11.1.9)
तच्छ्रुत्वा करुणं वाक्यं पुत्रपौत्रवधार्दितः । पपात भुवि दुर्धर्षो वाताहत इव द्रुमः ॥
tacchrutvā karuṇaṃ vākyaṃ putrapautravadhārditaḥ | papāta bhuvi durdharṣo vātāhata iva drumaḥ
वह करुण वचन सुनकर पुत्रों और पौत्रों के वध से पीड़ित वह दुर्धर्ष राजा आँधी से टूटे वृक्ष की तरह धरती पर गिर पड़ा।
धृतराष्ट्र उवाच
श्लोक 10 (11.1.10)
हतपुत्रो हतामात्यो हतसर्वसुहृज्जनः । दुःखं नूनं गमिष्यामि विचरन्पृथिवीमिमाम् ॥
hataputro hatāmātyo hatasarvasuhṛjjanaḥ | duḥkhaṃ nūnaṃ gamiṣyāmi vicaranpṛthivīmimām
मेरे पुत्र मारे गए, मन्त्री मारे गए, सारे मित्रजन मारे गए; अब मैं इस पृथ्वी पर भटकता हुआ निश्चय ही दुःख पाऊँगा।
श्लोक 11 (11.1.11)
किन्नु बन्धुविहीनस्य जीवितेन ममाद्य वै । लूनपक्षस्य इव मे वैनतेयस्य सञ्जय ॥
kinnu bandhuvihīnasya jīvitena mamādya vai | lūnapakṣasya iva me vainateyasya sañjaya
सञ्जय, बन्धुओं से रहित मुझे अब जीवित रहने से क्या लाभ? मैं तो कटे पंखों वाले विनता-पुत्र गरुड़ के समान हो गया हूँ।
श्लोक 12 (11.1.12)
हृतराज्यो हतसुहृद्धतपुत्रश्च वै तथा । न भ्राजिष्ये महाप्राज्ञ क्षीणरश्मिरिवांशुमान् ॥
hṛtarājyo hatasuhṛddhataputraśca vai tathā | na bhrājiṣye mahāprājña kṣīṇaraśmirivāṃśumān
राज्य छिन गया, मित्र और पुत्र मारे गए; हे महाप्राज्ञ, अब मैं किरणहीन सूर्य की तरह नहीं चमकूँगा।
श्लोक 13 (11.1.13)
न कृतं सुहृदां वाक्यं जामद्ग्न्यस्य च । सभामध्ये तु कृष्णेन यच्छ्रेयोऽभिहितं मम ॥
na kṛtaṃ suhṛdāṃ vākyaṃ jāmadgnyasya ca | sabhāmadhye tu kṛṣṇena yacchreyo'bhihitaṃ mama
मैंने मित्रों की बात नहीं मानी, परशुराम की भी नहीं, और सभा के बीच कृष्ण ने मेरे हित की जो बात कही थी, उसे भी नहीं माना।
श्लोक 14 (11.1.14)
अलं वैरेण ते राजन्पुत्रः संगृह्यतामिति । तच्च वाक्यमकृत्वाऽहं भृशं तप्यामि दुर्मतिः ॥
alaṃ vaireṇa te rājanputraḥ saṃgṛhyatāmiti | tacca vākyamakṛtvā'haṃ bhṛśaṃ tapyāmi durmatiḥ
'हे राजन्, वैर बहुत हुआ; अपने पुत्र को रोक लो' — इस वचन का पालन न करके मैं मूर्ख अब बहुत पछता रहा हूँ।
श्लोक 15 (11.1.15)
न हि श्रोताऽस्मि भीष्मस्य शर्मयुक्तं प्रभाषितम् ॥
na hi śrotā'smi bhīṣmasya śarmayuktaṃ prabhāṣitam
मैंने भीष्म के कल्याणकारी वचन को भी नहीं सुना।
श्लोक 16 (11.1.16)
दुर्योधनस्य च तथा वृषभस्येव नर्दतः । दुःशासनवधं श्रुत्वा कर्णस्य च विपर्ययम् । द्रोणसूर्योपरागं च हृदयं मे विदीर्यते ॥
duryodhanasya ca tathā vṛṣabhasyeva nardataḥ | duḥśāsanavadhaṃ śrutvā karṇasya ca viparyayam | droṇasūryoparāgaṃ ca hṛdayaṃ me vidīryate
बैल की तरह गर्जते हुए दुर्योधन का स्मरण करके, और दुःशासन का वध, कर्ण का पतन तथा द्रोणरूपी सूर्य का ग्रहण सुनकर मेरा हृदय फटा जा रहा है।
श्लोक 17 (11.1.17)
न स्मराम्यात्मनः किञ्चित्पुरा सञ्जय दुष्कृतम् । यस्येदं फलमद्येह मया मूढेन भुज्यते ॥
na smarāmyātmanaḥ kiñcitpurā sañjaya duṣkṛtam | yasyedaṃ phalamadyeha mayā mūḍhena bhujyate
हे सञ्जय, मुझे अपना पहले किया कोई दुष्कर्म याद नहीं आता, जिसका यह फल आज मुझ मूढ़ को यहाँ भोगना पड़ रहा है।
श्लोक 18 (11.1.18)
नूनं व्यपकृतं किञ्चिन्मया पूर्वेषु जन्मसु । येन मां दुःखभागेषु धाता कर्मसु युक्तवान् ॥
nūnaṃ vyapakṛtaṃ kiñcinmayā pūrveṣu janmasu | yena māṃ duḥkhabhāgeṣu dhātā karmasu yuktavān
निश्चय ही मैंने पूर्वजन्मों में कोई अपराध किया होगा, जिससे विधाता ने मुझे दुःख भोगने वाले कर्मों में लगा दिया।
श्लोक 19 (11.1.19)
परिणामश्च वयसः सर्वबन्धुक्षयश्च मे । सुहृन्मित्रविनाशश्च दैवयोगादुपागतः ॥
pariṇāmaśca vayasaḥ sarvabandhukṣayaśca me | suhṛnmitravināśaśca daivayogādupāgataḥ
आयु का ढलना, सारे बन्धुओं का नाश और सुहृदों तथा मित्रों का विनाश — ये सब दैव के योग से मुझ पर आ पड़े हैं।
श्लोक 20 (11.1.20)
कोन्वस्ति दुःखिततरो मत्तोऽन्यो हि पुमान्भुवि ॥
konvasti duḥkhitataro matto'nyo hi pumānbhuvi
इस पृथ्वी पर मुझसे अधिक दुःखी दूसरा कौन मनुष्य होगा?
श्लोक 21 (11.1.21)
तन्मामद्यैव पश्यन्तु पाण्डवाः संशितव्रताः । विवृतं ब्रह्मलोकस्य दीर्घमध्वानमास्थितम् ॥
tanmāmadyaiva paśyantu pāṇḍavāḥ saṃśitavratāḥ | vivṛtaṃ brahmalokasya dīrghamadhvānamāsthitam
दृढ़ व्रत वाले पाण्डव आज ही मुझे देख लें, जब मैं ब्रह्मलोक के खुले, लम्बे मार्ग पर चल पड़ूँगा।
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 22 (11.1.22)
तस्य लालप्यमानस्य बहु शोकं विचिन्वतः । शोकापहं नरेन्द्रस्य सञ्जयो वाक्यमब्रवीत् ॥
tasya lālapyamānasya bahu śokaṃ vicinvataḥ | śokāpahaṃ narendrasya sañjayo vākyamabravīt
इस प्रकार विलाप करते और बहुत शोक बटोरते हुए उस राजा से सञ्जय ने शोक हरने वाली बात कही।
सञ्जय उवाच
श्लोक 23 (11.1.23)
शोकं राजन्व्यपनुद श्रुतास्ते वेदनिश्चयाः । शास्त्रागमाश्च विविधा वृद्धेभ्यो नृपसत्तम ॥
śokaṃ rājanvyapanuda śrutāste vedaniścayāḥ | śāstrāgamāśca vividhā vṛddhebhyo nṛpasattama
हे राजन्, शोक छोड़िए। हे नृपश्रेष्ठ, आपने वेदों के निश्चित सिद्धान्त और वृद्धजनों से अनेक शास्त्रों का ज्ञान सुना है,
श्लोक 24 (11.1.24)
सृञ्जये पुत्रशोकार्ते यदूचुर्मुनयः पुरा । यथा यौवनजं दर्पमास्थिते ते सुते नृप ॥
sṛñjaye putraśokārte yadūcurmunayaḥ purā | yathā yauvanajaṃ darpamāsthite te sute nṛpa
और पुत्रशोक से पीड़ित सृञ्जय से प्राचीन काल में मुनियों ने जो कहा था, वह भी; तथा हे राजन्, आपके पुत्र किस प्रकार यौवन से उपजे अहंकार में चढ़ गए थे, यह भी।
श्लोक 25 (11.1.25)
न त्वया सुहृदां वाक्यं ब्रुवतामवधारितम् । स्वार्थश्च न कृतः कश्चिल्लुब्धेन फलगृद्धिना ॥
na tvayā suhṛdāṃ vākyaṃ bruvatāmavadhāritam | svārthaśca na kṛtaḥ kaścillubdhena phalagṛddhinā
आपने बोलने वाले हितैषियों की बात मन में नहीं बैठाई; लोभी और फल की लालसा रखने वाले आपने अपना कोई वास्तविक स्वार्थ भी सिद्ध नहीं किया।
श्लोक 26 (11.1.26)
असिनैवैकधारेण स्वबुद्ध्या तु विचेष्टितम् । प्रायशोऽवृत्तसम्पन्नाः सततं पर्युपासिताः ॥
asinaivaikadhāreṇa svabuddhyā tu viceṣṭitam | prāyaśo'vṛttasampannāḥ satataṃ paryupāsitāḥ
जैसे एक धार की तलवार से, वैसे ही आपने केवल अपनी बुद्धि से काम किया; और आपकी सेवा में अधिकतर दुराचारी लोग ही निरन्तर रहे।
श्लोक 27 (11.1.27)
यस्य दुःशासनो मन्त्री राधेयश्च दुरात्मवान् । शकुनिश्चैव दुष्टात्मा चित्रसेनश्च दुर्मतिः ॥
yasya duḥśāsano mantrī rādheyaśca durātmavān | śakuniścaiva duṣṭātmā citrasenaśca durmatiḥ
जिसके मन्त्री दुःशासन, दुष्टात्मा राधापुत्र कर्ण, दुष्टचित्त शकुनि और दुर्बुद्धि चित्रसेन थे,
श्लोक 28 (11.1.28)
अनल्पं येन वै सर्वं शल्यभूतं कृतं जगत् । कुरुवृद्धस्य भीष्मस्य गान्धार्या विदुरस्य च ॥
analpaṃ yena vai sarvaṃ śalyabhūtaṃ kṛtaṃ jagat | kuruvṛddhasya bhīṣmasya gāndhāryā vidurasya ca
जिसने सारे जगत् को कम नहीं, बहुत ही काँटे की तरह चुभने वाला बना दिया, उसने कुरुओं के वृद्ध भीष्म, गान्धारी और विदुर की बात नहीं मानी,
श्लोक 29 (11.1.29)
द्रोणस्य च महाराज कृपस्य च शरद्वतः । कृष्णस्य च महाबाहो नारदस्य च धीमतः ॥
droṇasya ca mahārāja kṛpasya ca śaradvataḥ | kṛṣṇasya ca mahābāho nāradasya ca dhīmataḥ
हे महाराज, द्रोण और शरद्वान् के पुत्र कृप की, हे महाबाहो, कृष्ण और बुद्धिमान् नारद की,
श्लोक 30 (11.1.30)
ऋषीणां च तथाऽन्येषां व्यासस्यामिततेजसः । न कृतं तेन वचनं तव पुत्रेण भारत । क्षपिताः क्षत्रियाः सर्वे शत्रूणां वर्धितं यशः ॥
ṛṣīṇāṃ ca tathā'nyeṣāṃ vyāsasyāmitatejasaḥ | na kṛtaṃ tena vacanaṃ tava putreṇa bhārata | kṣapitāḥ kṣatriyāḥ sarve śatrūṇāṃ vardhitaṃ yaśaḥ
तथा अन्य ऋषियों और अपार तेजस्वी व्यास की भी। हे भारत, आपके पुत्र ने उनका कहा नहीं किया; सब क्षत्रिय नष्ट हो गए और शत्रुओं का यश बढ़ गया।
श्लोक 31 (11.1.31)
अधर्मसंयुतं किञ्चिन्नित्यं युद्धमिति ब्रुवन् । मध्यस्थो हि त्वमप्यासीर्न क्षमं किञ्चिदुक्तवान् ॥
adharmasaṃyutaṃ kiñcinnityaṃ yuddhamiti bruvan | madhyastho hi tvamapyāsīrna kṣamaṃ kiñciduktavān
वह यह कहता रहा कि युद्ध सदा करना चाहिए, यद्यपि वह कुछ अधर्म से जुड़ा था; और आप भी उदासीन बने रहे, कोई उचित बात नहीं कही।
श्लोक 32 (11.1.32)
धूर्धरेण त्वया भारस्तुलया न समं धृतः ॥
dhūrdhareṇa tvayā bhārastulayā na samaṃ dhṛtaḥ
धुरी सँभालने वाले होकर भी आपने भार को तराजू की भाँति बराबर नहीं रखा।
श्लोक 33 (11.1.33)
आदावेव मनुष्येण वर्तितव्यं यथाक्रमम् । यथा नातीतमर्थं वै पश्चात्तापेन युज्यते ॥
ādāveva manuṣyeṇa vartitavyaṃ yathākramam | yathā nātītamarthaṃ vai paścāttāpena yujyate
मनुष्य को आरम्भ से ही क्रम के अनुसार चलना चाहिए, जिससे बीती बात के लिए उसे पछतावे में न पड़ना पड़े।
श्लोक 34 (11.1.34)
पुत्रगृद्ध्या त्वया राजन्प्रियं तस्य चिकीर्षितम् । पश्चात्तापमिमं प्राप्तो न त्वं शोचितुमर्हसि ॥
putragṛddhyā tvayā rājanpriyaṃ tasya cikīrṣitam | paścāttāpamimaṃ prāpto na tvaṃ śocitumarhasi
हे राजन्, पुत्र के मोह में आपने उसका प्रिय करना चाहा; अब इस पछतावे को पाकर आपको शोक नहीं करना चाहिए।
श्लोक 35 (11.1.35)
मधु यः केवलं दृष्ट्वा प्रपातं नानुपश्यति । स भ्रष्टोमधुलोभेन शोचत्येव यथा भवान् ॥
madhu yaḥ kevalaṃ dṛṣṭvā prapātaṃ nānupaśyati | sa bhraṣṭomadhulobhena śocatyeva yathā bhavān
जो केवल शहद को देखता है और गड्ढे को नहीं देखता, वह शहद के लोभ से गिरकर वैसे ही शोक करता है जैसे आप कर रहे हैं।
श्लोक 36 (11.1.36)
अर्थान्न शोचन्प्राप्नोति न शोचन्विन्दते सुखम् । न शोचञ्श्रियमाप्नोति न शोचन्विन्दते जयम् ॥
arthānna śocanprāpnoti na śocanvindate sukham | na śocañśriyamāpnoti na śocanvindate jayam
शोक करने से न धन मिलता है, न सुख; शोक करने से न लक्ष्मी मिलती है, न विजय।
श्लोक 37 (11.1.37)
स्वयमुत्पादयित्वाऽग्निं परीतस्तेन योऽग्निना । दह्यमानः पुनस्तापं भजते न स पण्डितः ॥
svayamutpādayitvā'gniṃ parītastena yo'gninā | dahyamānaḥ punastāpaṃ bhajate na sa paṇḍitaḥ
जो स्वयं आग जलाकर उसी से घिर जाता है और जलता हुआ फिर उसकी तपन सहता है, वह पण्डित नहीं।
श्लोक 38 (11.1.38)
त्वयैव ससुतेनायं वाक्यवायुसमीरितः । लोभाज्येन च संसिक्तो ज्वलितः पार्थपावकः ॥
tvayaiva sasutenāyaṃ vākyavāyusamīritaḥ | lobhājyena ca saṃsikto jvalitaḥ pārthapāvakaḥ
आपने ही अपने पुत्र के साथ वाणीरूपी वायु से इस पार्थरूपी अग्नि को भड़काया और लोभरूपी घी से सींचा, तब यह जल उठी।
श्लोक 39 (11.1.39)
तस्मिन्समिद्धे पतिताः शलभा इव ते सुताः । तान्केशवाग्निनिर्दग्धान्न त्वं शोचितुमर्हसि ॥
tasminsamiddhe patitāḥ śalabhā iva te sutāḥ | tānkeśavāgninirdagdhānna tvaṃ śocitumarhasi
उसके दहकने पर आपके पुत्र पतंगों की तरह उसमें गिरे; केशवरूपी अग्नि से भस्म हुए उनके लिए आपको शोक नहीं करना चाहिए।
श्लोक 40 (11.1.40)
यच्चाश्रुपातकलिलं वदनं वहसे नृप । अशास्त्रदृष्टमेतद्धि न प्रशंसन्ति पण्डिताः ॥
yaccāśrupātakalilaṃ vadanaṃ vahase nṛpa | aśāstradṛṣṭametaddhi na praśaṃsanti paṇḍitāḥ
आप आँसुओं से भीगा जो मुख लिए हुए हैं, वह शास्त्रों में नहीं देखा गया; विद्वान् इसकी प्रशंसा नहीं करते।
श्लोक 41 (11.1.41)
विस्फुलिङ्गा इव ह्येतान्दहन्ति किल मानवान् । जहीहि मन्युं बुद्ध्या वै धारयात्मानमात्मना ॥
visphuliṅgā iva hyetāndahanti kila mānavān | jahīhi manyuṃ buddhyā vai dhārayātmānamātmanā
ये आँसू चिनगारियों की तरह मनुष्यों को जलाते हैं। बुद्धि से शोक का त्याग कीजिए और अपने को अपने ही द्वारा थामिए।
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 42 (11.1.42)
एवमाश्वासितं तेन सञ्जयेन महात्मना । विदुरो भूय एवाह बुद्धिपूर्वं परन्तप ॥
evamāśvāsitaṃ tena sañjayena mahātmanā | viduro bhūya evāha buddhipūrvaṃ parantapa
महात्मा सञ्जय के द्वारा इस प्रकार आश्वस्त किए जाने पर, हे शत्रुतापन, विदुर ने सोच-विचारकर फिर कहा।