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स्त्री पर्व · अध्याय 17

गान्धारी का दुर्योधन के लिए विलाप

गान्धारी दुर्योधन के शव को देखकर मूर्छित होकर गिर पड़ती हैं, और होश आने पर उसे गले लगाकर रोती हैं। वे कृष्ण को बताती हैं कि दुर्योधन ने कभी उनसे विजय का आशीर्वाद माँगा था और उन्होंने उत्तर दिया था कि जहाँ धर्म है वहीं विजय है, और कहती हैं कि वे उसके लिए उतना नहीं, जितना धृतराष्ट्र के लिए शोक करती हैं। वे उसे धूल में पड़ा हुआ दिखाती हैं, जहाँ कभी स्त्रियाँ और राजा उसकी सेवा करते थे और अब गीध और सियार उसके पास हैं; ग्यारह अक्षौहिणी का वह स्वामी भीम के हाथों मारा गया। वे उसकी पत्नी, लक्ष्मण की माता, को उसके वक्ष पर पड़ी दिखाती हैं और अन्त में कहती हैं कि यदि शास्त्र सत्य हैं तो उसने अपने बाहुबल से अर्जित लोक पा लिए हैं।

अध्याय 16अध्याय-सूचीअध्याय 18

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 1 (11.17.1)

दुर्योधनं हतं दृष्ट्वा गान्धारी शोककर्शिता । सहसा न्यपतद्भूमौ छिन्नेव कदली वने ॥

duryodhanaṃ hataṃ dṛṣṭvā gāndhārī śokakarśitā | sahasā nyapatadbhūmau chinneva kadalī vane

दुर्योधन को मरा देखकर शोक से कृश गान्धारी वन में कटे हुए केले के वृक्ष की तरह सहसा भूमि पर गिर पड़ीं।

श्लोक 2 (11.17.2)

सा तु लब्ध्वा पुनः संज्ञां विक्रुश्य च विलप्य च । दुर्योधनमभिप्रेक्ष्य शयानं रुधिरोक्षितम् ॥

sā tu labdhvā punaḥ saṃjñāṃ vikruśya ca vilapya ca | duryodhanamabhiprekṣya śayānaṃ rudhirokṣitam

फिर होश में आकर, चीखकर और विलाप करके उन्होंने रक्त से लथपथ सोए हुए दुर्योधन को देखा,

श्लोक 3 (11.17.3)

परिष्वज्याथ गान्धारी कृपणं पर्यदेवयत् । हाहापुत्रेति शोकार्ता विललापाकुलेन्द्रिया ॥

pariṣvajyātha gāndhārī kṛpaṇaṃ paryadevayat | hāhāputreti śokārtā vilalāpākulendriyā

और उसे गले लगाकर गान्धारी शोक से व्याकुल इन्द्रियोंवाली होकर "हाय पुत्र!" कहती हुई दीनता से विलाप करने लगीं।

श्लोक 4 (11.17.4)

सुगूढजत्रु विपुलं हारनिष्कविभूषितम् । वारिणा नेत्रजेनोरः सिञ्चन्ती शोकतापिता ॥

sugūḍhajatru vipulaṃ hāraniṣkavibhūṣitam | vāriṇā netrajenoraḥ siñcantī śokatāpitā

शोक से तपी हुई वे अपनी आँखों के जल से उसके चौड़े वक्ष को सींचती रहीं, जिसकी हँसलियाँ गहरी छिपी थीं और जो हारों और निष्कों से सजा था,

श्लोक 5 (11.17.5)

समीपस्थं हृषीकेशमिदं वचनमब्रवीत् । उपस्थितेऽस्मिन्सङ्ग्रामे ज्ञातीनां संक्षये विभो ॥

samīpasthaṃ hṛṣīkeśamidaṃ vacanamabravīt | upasthite'sminsaṅgrāme jñātīnāṃ saṃkṣaye vibho

और पास खड़े हृषीकेश से यह बात कही: "हे विभो! जब यह संग्राम आ पहुँचा था और बन्धुओं का संहार होने को था,

गान्धार्युवाच

श्लोक 6 (11.17.6)

मामयं प्राह वार्ष्णेय प्राञ्चलिर्नृपसत्तमः । अस्मिञ्ज्ञातिसमुद्धर्षे जयमम्बा ब्रवीतु मे ॥

māmayaṃ prāha vārṣṇeya prāñcalirnṛpasattamaḥ | asmiñjñātisamuddharṣe jayamambā bravītu me

तब हाथ जोड़े हुए इस श्रेष्ठ राजा ने मुझसे कहा था, हे वार्ष्णेय: 'माँ, बन्धुओं के इस संहार में मेरे लिए विजय का आशीर्वाद दीजिए।'

श्लोक 7 (11.17.7)

इत्युक्ते जानती सर्वमहं स्वव्यसनागमम् । अब्रुवं पुरुषव्याघ्र यतो धर्मस्ततो जयः ॥

ityukte jānatī sarvamahaṃ svavyasanāgamam | abruvaṃ puruṣavyāghra yato dharmastato jayaḥ

यह कहे जाने पर, अपने ऊपर आनेवाले दुःख को पूरी तरह जानती हुई, मैंने कहा था, हे पुरुषव्याघ्र: 'जहाँ धर्म है, वहीं विजय है।'

श्लोक 8 (11.17.8)

तथा तु युध्यमानस्त्वं सम्प्रगृह्य सुपुत्रक । ध्रुवं शस्त्रजिताँल्लोकान्प्राप्स्यस्यमरवत्प्रभो ॥

tathā tu yudhyamānastvaṃ sampragṛhya suputraka | dhruvaṃ śastrajitām̐llokānprāpsyasyamaravatprabho

'इस प्रकार शस्त्र उठाकर युद्ध करते हुए, हे सुपुत्र, हे प्रभो, तुम निश्चय ही अमरों की तरह शस्त्रों से जीते हुए लोक पाओगे।'

श्लोक 9 (11.17.9)

इत्येवमब्रुवं पूर्वं नैवं शोचामि वै प्रभो । धृतराष्ट्रं तु शोचामि कृपणं हतबान्धवम् ॥

ityevamabruvaṃ pūrvaṃ naivaṃ śocāmi vai prabho | dhṛtarāṣṭraṃ tu śocāmi kṛpaṇaṃ hatabāndhavam

मैंने पहले ऐसा ही कहा था, इसलिए हे प्रभो, मैं उसके लिए इस प्रकार शोक नहीं करती; मैं बन्धुओं को खो चुके दीन धृतराष्ट्र के लिए शोक करती हूँ।

श्लोक 10 (11.17.10)

अमर्षणं युधां श्रेष्ठं कृतास्त्रं युद्धदुर्मदम् । शयानं वीरशयने पश्य माधव मे सुतम् ॥

amarṣaṇaṃ yudhāṃ śreṣṭhaṃ kṛtāstraṃ yuddhadurmadam | śayānaṃ vīraśayane paśya mādhava me sutam

हे माधव! देखो, मेरा पुत्र, जो असहनशील था, योद्धाओं में श्रेष्ठ, अस्त्रविद्या में निपुण और युद्ध के लिए उन्मत्त था, आज वीरशय्या पर सोया है।

श्लोक 11 (11.17.11)

योऽयं मूर्धावसिक्तानामग्रे याति परन्तपः । सोऽयं पांसुषु शेतेऽद्य पश्य कालस्य पर्ययम् ॥

yo'yaṃ mūrdhāvasiktānāmagre yāti parantapaḥ | so'yaṃ pāṃsuṣu śete'dya paśya kālasya paryayam

जो शत्रुओं को तपानेवाला मूर्धाभिषिक्त राजाओं के आगे-आगे चलता था, वही आज धूल में पड़ा है। काल का यह पलटाव देखो।

श्लोक 12 (11.17.12)

ध्रुवं दुर्योधनो वीरो गतिं न सुलभां गतः । तथा ह्यभिमुखः शेते शयने वीरसेविते ॥

dhruvaṃ duryodhano vīro gatiṃ na sulabhāṃ gataḥ | tathā hyabhimukhaḥ śete śayane vīrasevite

निश्चय ही वीर दुर्योधन ने दुर्लभ गति पाई है, क्योंकि वह वीरों के योग्य शय्या पर सामने की ओर मुख किए सोया है।

श्लोक 13 (11.17.13)

यं पुरा पर्युपासीना रमयन्ति वरस्त्रियः । तं वीरशयने सुप्तं रमयन्त्यशिवाः शिवाः ॥

yaṃ purā paryupāsīnā ramayanti varastriyaḥ | taṃ vīraśayane suptaṃ ramayantyaśivāḥ śivāḥ

जिसे पहले सुन्दर स्त्रियाँ घेरकर बैठतीं और रिझाती थीं, उसी को आज वीरशय्या पर सोया हुआ अमंगलकारी सियार और सियारिनें "रिझा" रही हैं।

श्लोक 14 (11.17.14)

यं पुरा पर्युपासीना रमयन्ति महीक्षितः । महीतलस्थं निहतं गृध्रास्तं पर्युपासते ॥

yaṃ purā paryupāsīnā ramayanti mahīkṣitaḥ | mahītalasthaṃ nihataṃ gṛdhrāstaṃ paryupāsate

जिसे पहले राजा लोग घेरकर बैठकर रिझाते थे, उसी को आज भूमि पर मरा पड़ा देखकर गीध घेरकर बैठे हैं।

श्लोक 15 (11.17.15)

यं पुरा व्यजनैरम्यैरुपवीजन्ति योषितः । तमद्य पक्षव्यजनैरुपवीजन्ति पक्षिणः ॥

yaṃ purā vyajanairamyairupavījanti yoṣitaḥ | tamadya pakṣavyajanairupavījanti pakṣiṇaḥ

जिसे पहले स्त्रियाँ सुन्दर पंखों से हवा करती थीं, आज उसी को पक्षी अपने पंखों के पंखों से हवा कर रहे हैं।

श्लोक 16 (11.17.16)

एष शेते महाबाहुर्बलवान्सत्यविक्रमः । सिंहेनेव द्विपः सङ्ख्ये भीमसेनेन पातितः ॥

eṣa śete mahābāhurbalavānsatyavikramaḥ | siṃheneva dvipaḥ saṅkhye bhīmasenena pātitaḥ

यह महाबाहु, बलवान् और सत्यपराक्रमी वीर यहाँ सोया है, जिसे भीमसेन ने युद्ध में वैसे गिरा दिया जैसे सिंह हाथी को गिराता है।

श्लोक 17 (11.17.17)

पश्य दुर्योधनं कृष्ण शयानं रुधिरोक्षितम् । निहतं भीमसेनेन गदां सम्मृज्य भारत ॥

paśya duryodhanaṃ kṛṣṇa śayānaṃ rudhirokṣitam | nihataṃ bhīmasenena gadāṃ sammṛjya bhārata

हे कृष्ण! रक्त से लथपथ सोए हुए दुर्योधन को देखो, जिसे हे भारत, गदा उठाए हुए भीमसेन ने मार डाला।

श्लोक 18 (11.17.18)

अक्षौहिणीर्महाबाहुर्दश चैकां च केशव । आनयद्यः पुरा सङ्ख्ये सोऽनयान्निधनं गतः ॥

akṣauhiṇīrmahābāhurdaśa caikāṃ ca keśava | ānayadyaḥ purā saṅkhye so'nayānnidhanaṃ gataḥ

हे केशव! जो महाबाहु पहले ग्यारह अक्षौहिणी सेनाएँ युद्ध में लाया था, वह अपने ही अनीतिपूर्ण आचरण से मृत्यु को प्राप्त हुआ।

श्लोक 19 (11.17.19)

एष दुर्योधनः शेते महेष्वासो महाबलः । शार्दूल इव सिंहेन भीमसेनेन पातितः ॥

eṣa duryodhanaḥ śete maheṣvāso mahābalaḥ | śārdūla iva siṃhena bhīmasenena pātitaḥ

यह महाधनुर्धर, महाबली दुर्योधन यहाँ सोया है, जिसे भीमसेन ने वैसे गिरा दिया जैसे सिंह बाघ को गिराता है।

श्लोक 20 (11.17.20)

विदुरं ह्यवमत्यैष पितरं चैव मन्दभाक् । बालो वृद्धावमानेन मन्दो मृत्युवशं गतः ॥

viduraṃ hyavamatyaiṣa pitaraṃ caiva mandabhāk | bālo vṛddhāvamānena mando mṛtyuvaśaṃ gataḥ

विदुर और अपने पिता का भी अपमान करके यह अभागा, बालक की तरह बड़ों का अनादर करनेवाला मूर्ख मृत्यु के वश में चला गया।

श्लोक 21 (11.17.21)

निःसपत्ना मही यस्य त्रयोदशसमाः स्थिता । स शेते निहतो भूमौ पुत्रो मे पृथिवीपतिः ॥

niḥsapatnā mahī yasya trayodaśasamāḥ sthitā | sa śete nihato bhūmau putro me pṛthivīpatiḥ

तेरह वर्षों तक जिसकी पृथ्वी निष्कण्टक रही, वही मेरा पुत्र, पृथ्वी का स्वामी, मरा हुआ भूमि पर पड़ा है।

श्लोक 22 (11.17.22)

अपश्यं कृष्ण पृथिवीं धार्तराष्ट्रानुशासिताम् । पूर्णां हस्तिगवाश्वैश्च वार्ष्णेय न तु तच्चिरम् ॥

apaśyaṃ kṛṣṇa pṛthivīṃ dhārtarāṣṭrānuśāsitām | pūrṇāṃ hastigavāśvaiśca vārṣṇeya na tu tacciram

हे कृष्ण! मैंने धृतराष्ट्र के पुत्रों के शासन में हाथियों, गायों और घोड़ों से भरी पृथ्वी देखी थी, पर हे वार्ष्णेय, वह अधिक समय नहीं टिकी।

श्लोक 23 (11.17.23)

तामेवाद्य महाबाहो पश्याम्यन्यानुशासिताम् । हीनां हस्तिगवाश्वेन किन्नु जीवामि माधव ॥

tāmevādya mahābāho paśyāmyanyānuśāsitām | hīnāṃ hastigavāśvena kinnu jīvāmi mādhava

हे महाबाहो! वही पृथ्वी आज मैं दूसरों के शासन में और हाथियों, गायों और घोड़ों से रहित देख रही हूँ। हे माधव, मैं अब क्यों जी रही हूँ?

श्लोक 24 (11.17.24)

इदं कष्टतरं पश्य पुत्रस्यापि वधान्मम । या इमाः पर्युपासन्ते हताञ्शूरान्रणे स्त्रियः ॥

idaṃ kaṣṭataraṃ paśya putrasyāpi vadhānmama | yā imāḥ paryupāsante hatāñśūrānraṇe striyaḥ

देखो, यह तो मेरे पुत्र के वध से भी अधिक कष्टदायी है कि ये स्त्रियाँ रण में मरे हुए वीरों को घेरकर बैठी हैं।

श्लोक 25 (11.17.25)

प्रकीर्णकेशां सुश्रोणीं दुर्योधनभुजाङ्कगाम् । रुक्मवेदिनिभां पश्य कृष्ण लक्ष्मणमातरम् ॥

prakīrṇakeśāṃ suśroṇīṃ duryodhanabhujāṅkagām | rukmavedinibhāṃ paśya kṛṣṇa lakṣmaṇamātaram

हे कृष्ण! लक्ष्मण की माता को देखो, जिसके केश बिखरे हैं, जिसके नितम्ब सुन्दर हैं, जो सोने की वेदी जैसी दीप्त है और दुर्योधन की भुजा की गोद में पड़ी है।

श्लोक 26 (11.17.26)

नूनमेषा पुरा बाला जीवमाने महाभुजे । भुजावाश्रित्य रमते सुभुजस्य मनस्विनी ॥

nūnameṣā purā bālā jīvamāne mahābhuje | bhujāvāśritya ramate subhujasya manasvinī

निश्चय ही यह स्वाभिमानिनी युवती पहले, जब वह महाबाहु जीवित था, अपने सुन्दर भुजाओंवाले पति की भुजाओं का सहारा लेकर आनन्द करती थी।

श्लोक 27 (11.17.27)

कथं तु शतधा नेदं हृदयं मम दीर्यते । पश्यन्त्या निहतं पुत्रं पौत्रेण सहितं रणे ॥

kathaṃ tu śatadhā nedaṃ hṛdayaṃ mama dīryate | paśyantyā nihataṃ putraṃ pautreṇa sahitaṃ raṇe

मेरा यह हृदय सौ टुकड़ों में क्यों नहीं फट जाता, जब मैं रण में मारे गए अपने पुत्र को पौत्र के साथ देख रही हूँ?

श्लोक 28 (11.17.28)

पुत्रं रुधिरसंसिक्तमुपजिघ्रत्यनिन्दिता । दुर्योधनं तु वामोरूः पाणिना परिमार्जती ॥

putraṃ rudhirasaṃsiktamupajighratyaninditā | duryodhanaṃ tu vāmorūḥ pāṇinā parimārjatī

वह निर्दोष स्त्री रक्त से भीगे अपने पुत्र को सूँघती-चूमती है, और सुन्दर जाँघोंवाली वह दुर्योधन को अपने हाथ से पोंछती है।

श्लोक 29 (11.17.29)

किन्नु शोचति भर्तारं हतपुत्रं मनस्विनी । तथा ह्यवस्थिता भाति पुत्रं चाप्यभिवीक्ष्य सा ॥

kinnu śocati bhartāraṃ hataputraṃ manasvinī | tathā hyavasthitā bhāti putraṃ cāpyabhivīkṣya sā

क्या वह स्वाभिमानिनी अपने उस पति के लिए शोक कर रही है जिसका पुत्र मारा गया है? वह वहीं खड़ी पुत्र को भी देखती हुई ऐसी ही दिखती है।

श्लोक 30 (11.17.30)

स्वशिरः पञ्चशाखाभ्यामभिहत्यायतेक्षणा । पतत्युरसि वीरस्य कुरुराजस्य माधव ॥

svaśiraḥ pañcaśākhābhyāmabhihatyāyatekṣaṇā | patatyurasi vīrasya kururājasya mādhava

विशाल नेत्रोंवाली वह अपने ही सिर को पाँच शाखाओंवाले हाथों से पीटकर, हे माधव, वीर कुरुराज की छाती पर गिर पड़ती है।

श्लोक 31 (11.17.31)

पुण्डरीकनिभा भाति पुण्डरीकान्तरप्रभा । मुखं प्रमृज्य पुत्रस्य भर्तुश्चैव तपस्विनी ॥

puṇḍarīkanibhā bhāti puṇḍarīkāntaraprabhā | mukhaṃ pramṛjya putrasya bhartuścaiva tapasvinī

वह दुःखिनी स्त्री अपने पुत्र और पति के मुख को पोंछती हुई कमल जैसी दीप्त और कमल के भीतरी भाग जैसी आभावाली दिखाई देती है।

श्लोक 32 (11.17.32)

यदि सत्यागमाः सन्ति यदि वै श्रुतयस्तथा । ध्रुवं लोकानवाप्तोऽयं नृपो बाहुबलार्जितान् ॥

yadi satyāgamāḥ santi yadi vai śrutayastathā | dhruvaṃ lokānavāpto'yaṃ nṛpo bāhubalārjitān

यदि सच्चे शास्त्र हैं और यदि वेद वास्तव में प्रमाण हैं, तो निश्चय ही इस राजा ने अपने बाहुबल से अर्जित लोक पा लिए हैं।"

अध्याय 16अध्याय-सूचीअध्याय 18