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स्त्री पर्व · अध्याय 16

गान्धारी द्वारा रणभूमि का दर्शन

व्यास के वरदान से गान्धारी कुरुक्षेत्र का सारा रणांगण मानो समीप ही देख लेती हैं। धृतराष्ट्र, पाण्डव और कृष्ण विधवा कुरुस्त्रियों को लेकर वहाँ पहुँचते हैं, और यह दृश्य देखकर स्त्रियाँ मूर्छित होकर गिर पड़ती हैं। फिर गान्धारी कृष्ण से बोलती हैं और उन्हें उस भयानक दृश्य का दर्शन कराती हैं: गीधों और सियारों के बीच पड़े महान् योद्धाओं के शव, धूल में सोए हुए वे वीर जिनकी बन्दी कभी स्तुति करते थे, अपने मृतकों को खोजती और सिरों को अनमेल धड़ों से जोड़ती स्त्रियाँ। अपने पुत्रों और पौत्रों के वध पर शोक करती हुई वे कृष्ण को सम्बोधित करके अपने मरे हुए पुत्र दुर्योधन को देखती हैं।

अध्याय 15अध्याय-सूचीअध्याय 17

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 1 (11.16.1)

एवमुक्त्वा तु गान्धारी कुरूणामवकर्तनम् । अपश्यत्तत्र तिष्ठन्ती सर्वं तत्र यथास्थितम् ॥

evamuktvā tu gāndhārī kurūṇāmavakartanam | apaśyattatra tiṣṭhantī sarvaṃ tatra yathāsthitam

ऐसा कहकर वहीं खड़ी गान्धारी ने कुरुओं के संहार-स्थल को, जैसा वह पड़ा था वैसा ही पूरा देखा।

श्लोक 2 (11.16.2)

पतिव्रता महाभागा समानव्रतचारिणी । उग्रेण तपसा युक्ता सततं सत्यवादिनी ॥

pativratā mahābhāgā samānavratacāriṇī | ugreṇa tapasā yuktā satataṃ satyavādinī

वे पतिव्रता, महाभाग्यवती, पति के समान व्रतों का आचरण करनेवाली, उग्र तप से युक्त और सदा सत्य बोलनेवाली थीं।

श्लोक 3 (11.16.3)

वरदानेन कृष्णस्य महर्षेः पुण्यकर्मणः । दिव्यज्ञानबलोपेता विविधं पर्यदेवयत् ॥

varadānena kṛṣṇasya maharṣeḥ puṇyakarmaṇaḥ | divyajñānabalopetā vividhaṃ paryadevayat

पुण्यकर्मा महर्षि कृष्ण (व्यास) के वरदान से वे दिव्य ज्ञान के बल से सम्पन्न थीं, और उन्होंने अनेक प्रकार से विलाप किया।

श्लोक 4 (11.16.4)

ददर्श सा बुद्धिमती दूरादपि यथाऽन्तिके । रणाजिरं तद्वीराणामद्भुतं रोमहर्षणम् ॥

dadarśa sā buddhimatī dūrādapi yathā'ntike | raṇājiraṃ tadvīrāṇāmadbhutaṃ romaharṣaṇam

उस बुद्धिमती ने दूर होते हुए भी, मानो पास ही हो, वीरों का वह अद्भुत और रोमांचकारी रणांगण देखा।

श्लोक 5 (11.16.5)

अस्थिकेशवसाकीर्णं शोणितौघपरिप्लुतम् । शरीरैर्बहुसाहस्रैर्विनिकीर्णं समन्ततः ॥

asthikeśavasākīrṇaṃ śoṇitaughapariplutam | śarīrairbahusāhasrairvinikīrṇaṃ samantataḥ

वह रणांगण हड्डियों, केशों और चर्बी से पटा हुआ था, रक्त की धाराओं में डूबा था और चारों ओर हज़ारों शवों से भरा हुआ था।

श्लोक 6 (11.16.6)

गजाश्वरथयोधानामावृतं रुधिराविलैः । शरीरैरशिरस्कैश्च विदेहैश्च शिरोगणैः ॥

gajāśvarathayodhānāmāvṛtaṃ rudhirāvilaiḥ | śarīrairaśiraskaiśca videhaiśca śirogaṇaiḥ

वह हाथी, घोड़े और रथ के योद्धाओं के रक्त से सने शरीरों, सिरहीन धड़ों और धड़विहीन सिरों के ढेरों से भरा हुआ था।

श्लोक 7 (11.16.7)

गजाश्वनरवीराणां निःसत्वैरभिसंवृतम् । सृगालवलगोमायुकङ्ककाकनिषेवितम् ॥

gajāśvanaravīrāṇāṃ niḥsatvairabhisaṃvṛtam | sṛgālavalagomāyukaṅkakākaniṣevitam

वह हाथी, घोड़े और मनुष्य-वीरों के निर्जीव शरीरों से ढका था और सियारों, वल पक्षियों, गीदड़ों, कङ्क पक्षियों और कौओं से भरा हुआ था।

श्लोक 8 (11.16.8)

रक्षसां पुरुषादानां मोदनं कुरराकुलम् । अशिवाभिः शिवाभिश्च नादितं गृध्रसेवितम् ॥

rakṣasāṃ puruṣādānāṃ modanaṃ kurarākulam | aśivābhiḥ śivābhiśca nāditaṃ gṛdhrasevitam

वह नरभक्षी राक्षसों को आनन्द देनेवाला, कुररी पक्षियों से भरा, अशुभ जीवों और सियारिनों की आवाज़ों से गूँजता हुआ और गीधों से सेवित था।

श्लोक 9 (11.16.9)

ततो व्यासाभ्यनुज्ञातो धृतराष्ट्रो महीपतिः । पाण्डुपुत्राश्च ते सर्वे युधिष्ठिरपुरोगमाः ॥

tato vyāsābhyanujñāto dhṛtarāṣṭro mahīpatiḥ | pāṇḍuputrāśca te sarve yudhiṣṭhirapurogamāḥ

तब व्यास की अनुमति पाकर राजा धृतराष्ट्र और युधिष्ठिर के नेतृत्व में पाण्डु के सभी पुत्र,

श्लोक 10 (11.16.10)

वासुदेवं पुरस्कृत्य हतबन्धुं च पार्थिवम् । कुरुस्त्रियः समादाय जग्मुरायोधनं प्रति ॥

vāsudevaṃ puraskṛtya hatabandhuṃ ca pārthivam | kurustriyaḥ samādāya jagmurāyodhanaṃ prati

वासुदेव को और बन्धुओं को खो चुके राजा धृतराष्ट्र को आगे करके, कुरुकुल की स्त्रियों को साथ लेकर रणभूमि की ओर चले।

श्लोक 11 (11.16.11)

समासाद्य कुरुक्षेत्रं ताः स्त्रियो निहतेश्वराः । अपश्यन्त हतांस्तत्र पुत्रान्भ्रातॄन्पितॄन्पतीन् ॥

samāsādya kurukṣetraṃ tāḥ striyo nihateśvarāḥ | apaśyanta hatāṃstatra putrānbhrātṝnpitṝnpatīn

कुरुक्षेत्र पहुँचकर पति खो चुकी उन स्त्रियों ने वहाँ अपने पुत्रों, भाइयों, पिताओं और पतियों को मरा पड़ा देखा,

श्लोक 12 (11.16.12)

क्रव्यादैर्भक्ष्यमाणांश्च गोमायुवलवायसैः । भूतैः पिशाचै रक्षोभिर्विविधैश्च निशाचरैः ॥

kravyādairbhakṣyamāṇāṃśca gomāyuvalavāyasaiḥ | bhūtaiḥ piśācai rakṣobhirvividhaiśca niśācaraiḥ

जिन्हें माँसभक्षी जीव, सियार, वल पक्षी और कौए, भूत, पिशाच, राक्षस और अनेक प्रकार के निशाचर खा रहे थे।

श्लोक 13 (11.16.13)

रुद्राक्रीडनिभं दृष्ट्वा तदा विशसनं स्त्रियः । कुरर्य इव शोकार्ता विक्रोशन्त्यो निपेतिरे ॥

rudrākrīḍanibhaṃ dṛṣṭvā tadā viśasanaṃ striyaḥ | kurarya iva śokārtā vikrośantyo nipetire

रुद्र की क्रीड़ास्थली जैसे उस संहार-स्थल को देखकर वे स्त्रियाँ शोक से कुररी पक्षियों की तरह चीखती हुई गिर पड़ीं।

श्लोक 14 (11.16.14)

अदृष्टपूर्वं पश्यन्त्यो दुःखार्ता भरतस्त्रियः । शरीरेषु स्खलन्त्यश्च न्यपतंश्च परासुवत् ॥

adṛṣṭapūrvaṃ paśyantyo duḥkhārtā bharatastriyaḥ | śarīreṣu skhalantyaśca nyapataṃśca parāsuvat

जो पहले कभी नहीं देखा था उसे देखकर दुःख से पीड़ित भरतवंश की स्त्रियाँ शवों पर लड़खड़ाईं और कुछ निर्जीव-सी होकर भूमि पर गिर पड़ीं।

श्लोक 15 (11.16.15)

श्रान्तानां चाप्यनाथानां क्रन्दन्तीनां भृशं तदा । पाञ्चालकुरुयोषाणां कृपणं तदभून्महत् ॥

śrāntānāṃ cāpyanāthānāṃ krandantīnāṃ bhṛśaṃ tadā | pāñcālakuruyoṣāṇāṃ kṛpaṇaṃ tadabhūnmahat

थकी हुई, असहाय और ऊँचे स्वर से रोती हुई पाञ्चाल और कुरु स्त्रियों का उस समय का दृश्य बहुत बड़ा और दयनीय था।

श्लोक 16 (11.16.16)

दुःखोपहतचित्ताभिः समन्तादनुनादितम् । दृष्ट्वाऽऽयोधनमत्युग्रं धर्मज्ञा सुबलात्मजा ॥

duḥkhopahatacittābhiḥ samantādanunāditam | dṛṣṭvā''yodhanamatyugraṃ dharmajñā subalātmajā

दुःख से व्याकुल चित्तवाली स्त्रियों की आवाज़ों से चारों ओर गूँजते उस अत्यन्त भयंकर रणांगण को धर्म जाननेवाली सुबलकन्या गान्धारी ने देखा।

श्लोक 17 (11.16.17)

ततः सा पुण्डरीकाक्षमामन्त्र्य पुरुषोत्तमम् । कुरूणां वैशमं दृष्ट्वा इदं वचनमब्रवीत् ॥

tataḥ sā puṇḍarīkākṣamāmantrya puruṣottamam | kurūṇāṃ vaiśamaṃ dṛṣṭvā idaṃ vacanamabravīt

तब उन्होंने कमलनयन पुरुषोत्तम को पुकारा और कुरुओं का विनाश देखकर यह वचन कहा।

गान्धार्युवाच

श्लोक 18 (11.16.18)

पश्यैताः पुण्डरीकाक्ष स्नुषा मे निहतेश्वराः । प्रकीर्णकेशाः क्रोशन्तीः कुररीरिव माधव ॥

paśyaitāḥ puṇḍarīkākṣa snuṣā me nihateśvarāḥ | prakīrṇakeśāḥ krośantīḥ kurarīriva mādhava

"हे कमलनयन! देखो, पति खो चुकी, बिखरे बालोंवाली मेरी ये बहुएँ कुररी पक्षियों की तरह रो रही हैं, हे माधव!

श्लोक 19 (11.16.19)

अमूस्त्वभिसमागम्य स्मरन्त्यो भरतर्षभान् । पृथगेवानुपद्यन्ते पुत्रान्भ्रातॄन्पितॄन्पतीन् ॥

amūstvabhisamāgamya smarantyo bharatarṣabhān | pṛthagevānupadyante putrānbhrātṝnpitṝnpatīn

ये एक साथ आकर उन भरतश्रेष्ठों को याद करती हुई अलग-अलग अपने पुत्रों, भाइयों, पिताओं और पतियों के पास पहुँचती हैं।

श्लोक 20 (11.16.20)

वीरसूभिर्महाबाहो हतपुत्राभिरावृतम् । क्वचिच्च वीरपत्नीभिर्हतवीराभिरावृतम् ॥

vīrasūbhirmahābāho hataputrābhirāvṛtam | kvacicca vīrapatnībhirhatavīrābhirāvṛtam

हे महाबाहो! यह रणांगण पुत्र खो चुकी वीरमाताओं से भरा है, और कहीं-कहीं पति खो चुकी वीरपत्नियों से घिरा है।

श्लोक 21 (11.16.21)

शोभितं पुरुषव्याघ्रैः कर्णभीष्माभिमन्युभिः । द्रोणद्रुपदशल्यैश्च ज्वलद्भिरिव पावकैः ॥

śobhitaṃ puruṣavyāghraiḥ karṇabhīṣmābhimanyubhiḥ | droṇadrupadaśalyaiśca jvaladbhiriva pāvakaiḥ

यह कर्ण, भीष्म और अभिमन्यु जैसे पुरुषसिंहों से तथा द्रोण, द्रुपद और शल्य से शोभित है, जो अग्नियों की तरह दहक रहे हैं।

श्लोक 22 (11.16.22)

काञ्चनैः कवचैर्निष्कैर्मणिभिश्च महाधनैः । अद्भुतैर्हस्तकेयूरैः स्रग्भिश्च समलंकृतम् ॥

kāñcanaiḥ kavacairniṣkairmaṇibhiśca mahādhanaiḥ | adbhutairhastakeyūraiḥ sragbhiśca samalaṃkṛtam

यह सोने के कवचों, निष्कों, बहुमूल्य मणियों, अद्भुत बाजूबन्दों और मालाओं से सजा हुआ है।

श्लोक 23 (11.16.23)

वीरबाहुविसृष्टाभिः शक्तिभिः परिघैरपि । खड्गैश्च विविधैस्तीक्ष्णैः सशरैश्च शरासनैः ॥

vīrabāhuvisṛṣṭābhiḥ śaktibhiḥ parighairapi | khaḍgaiśca vividhaistīkṣṇaiḥ saśaraiśca śarāsanaiḥ

यह वीरों की भुजाओं से फेंकी गई शक्तियों, परिघों, अनेक तीखी तलवारों तथा बाणों सहित धनुषों से पटा है।

श्लोक 24 (11.16.24)

क्रव्यादसङ्घैर्मुदितैस्तिष्ठद्भिः सहितैः क्वचित् । क्वचिदाक्रीडमानैश्च शयानैश्चापरैः क्वचित् ॥

kravyādasaṅghairmuditaistiṣṭhadbhiḥ sahitaiḥ kvacit | kvacidākrīḍamānaiśca śayānaiścāparaiḥ kvacit

कहीं माँसभक्षी जीवों के झुंड प्रसन्न होकर एक साथ खड़े हैं; कहीं दूसरे क्रीड़ा कर रहे हैं और कहीं दूसरे लेटे हैं।

श्लोक 25 (11.16.25)

एतदेवंविधं वीर सम्पश्यायोधनं विभो । त्वया तु श्रावितं कर्म पुष्कराक्ष महाद्युते । पश्यमाना हि दह्यामि शोकेनाहं जनार्दन ॥

etadevaṃvidhaṃ vīra sampaśyāyodhanaṃ vibho | tvayā tu śrāvitaṃ karma puṣkarākṣa mahādyute | paśyamānā hi dahyāmi śokenāhaṃ janārdana

हे वीर! हे विभो! इस ऐसे रणांगण को देखो। हे कमलनयन! हे महातेजस्वी! यह कर्म तो तुम्हारे ही द्वारा सुनाया गया था। इसे देखती हुई मैं शोक से जल रही हूँ, हे जनार्दन।

श्लोक 26 (11.16.26)

पाञ्चालानां कुरूणां च विनाशं मधुसूदन । पञ्चानामपि भूतानामहं वधमचिन्तयम् ॥

pāñcālānāṃ kurūṇāṃ ca vināśaṃ madhusūdana | pañcānāmapi bhūtānāmahaṃ vadhamacintayam

हे मधुसूदन! पाञ्चालों और कुरुओं के इस विनाश को मैंने पाँच महाभूतों के ही विनाश के समान माना है।

श्लोक 27 (11.16.27)

तान्सुपर्णाश्च गृध्राश्च कर्षयन्त्यसृगुक्षितान् । विगृह्य चरणैर्गृध्रा भक्षयन्ति सहस्रशः ॥

tānsuparṇāśca gṛdhrāśca karṣayantyasṛgukṣitān | vigṛhya caraṇairgṛdhrā bhakṣayanti sahasraśaḥ

गरुड़ और गीध रक्त से सने उन्हें खींच रहे हैं, और गीध पंजों से पकड़कर उन्हें हज़ारों की संख्या में खा रहे हैं।

श्लोक 28 (11.16.28)

जयद्रथस्य कर्णस्य तथैव द्रोमभीष्मयोः । अभिमन्योर्विनाशं च कश्चिन्तयितुमर्हति ॥

jayadrathasya karṇasya tathaiva dromabhīṣmayoḥ | abhimanyorvināśaṃ ca kaścintayitumarhati

जयद्रथ, कर्ण, द्रोण, भीष्म और अभिमन्यु के विनाश के बारे में सोचने का साहस कौन कर सकता है?

श्लोक 29 (11.16.29)

अवध्यकल्पान्निहतान्गतसत्वानचेतसः । गृध्रकङ्कवलश्येनश्वसृगालसमावृतान् ॥

avadhyakalpānnihatāngatasatvānacetasaḥ | gṛdhrakaṅkavalaśyenaśvasṛgālasamāvṛtān

जो मानो अवध्य थे वे अब मरे पड़े हैं, निष्प्राण और अचेत, गीधों, कङ्कों, वलों, बाजों, कुत्तों और सियारों से घिरे हुए,

श्लोक 30 (11.16.30)

अमर्षवशमापन्नान्दुर्योधनवशे स्थितान् । पश्येमान्पुरुषव्याघ्रान्संशान्तान्पावकानिव ॥

amarṣavaśamāpannānduryodhanavaśe sthitān | paśyemānpuruṣavyāghrānsaṃśāntānpāvakāniva

जो क्रोध के वश में आ गए थे और दुर्योधन के अधीन खड़े थे; इन पुरुषसिंहों को देखो, जो बुझी हुई अग्नियों की तरह शान्त पड़े हैं।

श्लोक 31 (11.16.31)

शयनान्युचिताः सर्वे मृदूनि विमलानि च । विपन्नास्तेऽद्य वसुधां विवृतामधिशेरते ॥

śayanānyucitāḥ sarve mṛdūni vimalāni ca | vipannāste'dya vasudhāṃ vivṛtāmadhiśerate

ये सब कोमल, निर्मल शय्याओं के अभ्यस्त थे; आज मृत होकर ये खुली भूमि पर पड़े हैं।

श्लोक 32 (11.16.32)

बन्दिभिः सततं काले स्तुवद्भिरभिनन्दिताः । शिवानामशिवा घोराः शृण्वन्ति विविधा गिरः ॥

bandibhiḥ satataṃ kāle stuvadbhirabhinanditāḥ | śivānāmaśivā ghorāḥ śṛṇvanti vividhā giraḥ

जिन्हें बन्दीजन समय-समय पर निरन्तर स्तुति करके प्रसन्न करते थे, वे आज सियारों की अनेक भयंकर और अशुभ आवाज़ें सुन रहे हैं।

श्लोक 33 (11.16.33)

ये पुरा शेरते वीराः शयनेषु यशस्विनः । चन्दनागुरुदिग्धाङ्गास्तेऽद्य पांसुषु शेरते ॥

ye purā śerate vīrāḥ śayaneṣu yaśasvinaḥ | candanāgurudigdhāṅgāste'dya pāṃsuṣu śerate

जो यशस्वी वीर पहले शय्याओं पर चन्दन और अगुरु से लिपे अंगों के साथ सोते थे, वे आज धूल में सो रहे हैं।

श्लोक 34 (11.16.34)

तेषामाभरणान्येते गृध्रगोमायुवायसाः । आक्षिपन्ति शिवा घोरा विनदन्त्यः पुनः पुनः ॥

teṣāmābharaṇānyete gṛdhragomāyuvāyasāḥ | ākṣipanti śivā ghorā vinadantyaḥ punaḥ punaḥ

ये गीध, सियार और कौए, और बार-बार चिल्लाती भयंकर सियारिनें उनके आभूषण छीन रही हैं।

श्लोक 35 (11.16.35)

बाणान्विनिशितान्पीतान्निस्त्रिंशान्विमला गदाः । युद्धाभिमानिनः सर्वे जीवन्त इव बिभ्रति ॥

bāṇānviniśitānpītānnistriṃśānvimalā gadāḥ | yuddhābhimāninaḥ sarve jīvanta iva bibhrati

तेज़ धारवाले, पानीदार बाण, तलवारें और चमकती गदाएँ ये सब युद्ध का अभिमान रखनेवाले वीर इस तरह थामे हैं मानो जीवित हों।

श्लोक 36 (11.16.36)

सुरूपवर्णा बहवः क्रव्यादैरवघट्टिताः । ऋषभप्रतिरूपाक्षाः शेरते च सहस्रशः ॥

surūpavarṇā bahavaḥ kravyādairavaghaṭṭitāḥ | ṛṣabhapratirūpākṣāḥ śerate ca sahasraśaḥ

सुन्दर रूप और रंगवाले, बैल जैसी आँखोंवाले अनेक वीर माँसभक्षी जीवों से नोचे जाते हुए हज़ारों की संख्या में पड़े हैं।

श्लोक 37 (11.16.37)

अपरे पुनरालिङ्ग्य गदाः परिघबाहवः । शेरतेऽभिमुखाः शूरा दयिता इव योषितः ॥

apare punarāliṅgya gadāḥ parighabāhavaḥ | śerate'bhimukhāḥ śūrā dayitā iva yoṣitaḥ

परिघ जैसी भुजाओंवाले दूसरे गदाधारी शूरवीर, गदाओं को गले लगाए, प्रिय स्त्रियों की तरह उनसे लिपटकर सामने मुख किए पड़े हैं।

श्लोक 38 (11.16.38)

बिभ्रतः कवचान्यन्ये विमलान्यायुधानि च । न धर्षयन्ति क्रव्यादा जीवन्तीति जनार्दन ॥

bibhrataḥ kavacānyanye vimalānyāyudhāni ca | na dharṣayanti kravyādā jīvantīti janārdana

दूसरे वीर कवच और चमकते हथियार पहने हैं, और माँसभक्षी उन्हें जीवित समझकर छूते नहीं, हे जनार्दन।

श्लोक 39 (11.16.39)

क्रव्यादैः कृष्यमाणानामपरेषां महात्मनाम् । शातकौम्भ्यः स्रजश्चित्रा विप्रकीर्णाः समन्ततः ॥

kravyādaiḥ kṛṣyamāṇānāmapareṣāṃ mahātmanām | śātakaumbhyaḥ srajaścitrā viprakīrṇāḥ samantataḥ

माँसभक्षी जीवों द्वारा घसीटे जाते दूसरे महात्माओं की रंग-बिरंगी सोने की मालाएँ चारों ओर बिखरी पड़ी हैं।

श्लोक 40 (11.16.40)

एते गोमायवो भीमा निहतानां यशस्विनाम् । कण्ठान्तरगतान्हारानाक्षिपन्ति सहस्रशः ॥

ete gomāyavo bhīmā nihatānāṃ yaśasvinām | kaṇṭhāntaragatānhārānākṣipanti sahasraśaḥ

ये भयानक सियार मारे गए यशस्वी वीरों के गलों से हार हज़ारों की संख्या में खींच रहे हैं।

श्लोक 41 (11.16.41)

सर्वेष्वपररात्रेषु यानवन्दन्त बन्दिनः । स्तुतिभिश्च परार्ध्याभिरुपचारैश्च शिक्षिताः ॥

sarveṣvapararātreṣu yānavandanta bandinaḥ | stutibhiśca parārdhyābhirupacāraiśca śikṣitāḥ

जिन्हें स्तुति और सेवा में निपुण बन्दीजन रात के प्रत्येक अन्तिम पहर में उत्तम स्तुतियों और सेवाओं से प्रसन्न करते थे,

श्लोक 42 (11.16.42)

तानद्य परिदेवन्ति दुःखार्ताः परमाङ्गनाः । कृपणा वृष्णिशार्दूल दुःखशोकार्दिता भृशम् ॥

tānadya paridevanti duḥkhārtāḥ paramāṅganāḥ | kṛpaṇā vṛṣṇiśārdūla duḥkhaśokārditā bhṛśam

उन्हीं के लिए ये श्रेष्ठ स्त्रियाँ दुःख से व्याकुल, दीन और शोक से पीड़ित होकर आज विलाप कर रही हैं, हे वृष्णिश्रेष्ठ!

श्लोक 43 (11.16.43)

रक्तोत्पलवनानीव विभान्ति रुचिराणि च । मुखानि परमस्त्रीणां परिशुष्काणि केशव ॥

raktotpalavanānīva vibhānti rucirāṇi ca | mukhāni paramastrīṇāṃ pariśuṣkāṇi keśava

हे केशव! इन श्रेष्ठ स्त्रियों के सूखे हुए मुख लाल कमलों के वनों की तरह सुन्दर लग रहे हैं।

श्लोक 44 (11.16.44)

रुदित्वा विरता ह्येता ध्यायन्त्यः सपरिक्लमाः । कुरुस्त्रियोऽभिगच्छन्ति तेन तेनैव दुःखिताः ॥

ruditvā viratā hyetā dhyāyantyaḥ sapariklamāḥ | kurustriyo'bhigacchanti tena tenaiva duḥkhitāḥ

रोते-रोते थककर चुप हुई, चिन्ता में डूबी और क्लान्त ये कुरुस्त्रियाँ अपने-अपने प्रियजन के कारण दुःखी होकर उन-उन के पास जा रही हैं।

श्लोक 45 (11.16.45)

एतान्यादित्यवर्णानि तपनीयनिभानि च । पश्य रोदनताम्राणि वक्त्राणि कुरुयोषिताम् ॥

etānyādityavarṇāni tapanīyanibhāni ca | paśya rodanatāmrāṇi vaktrāṇi kuruyoṣitām

कुरुकुल की स्त्रियों के इन मुखों को देखो, जो सूर्य के समान दीप्त हैं, तपे हुए सोने जैसे हैं और रोने से लाल हो गए हैं।

श्लोक 46 (11.16.46)

श्यामानां वरवर्णानां गौरीणामेकवाससाम् । दुर्योधनवरस्त्रीणां पश्य वृन्दानि केशव ॥

śyāmānāṃ varavarṇānāṃ gaurīṇāmekavāsasām | duryodhanavarastrīṇāṃ paśya vṛndāni keśava

हे केशव! दुर्योधन की उन श्रेष्ठ पत्नियों के झुंड देखो, जिनमें कोई श्यामा है, कोई गौरी, सुन्दर रंगवाली, सब एक ही वस्त्र पहने हुए।

श्लोक 47 (11.16.47)

आसामपरिपूर्णार्थं निशम्य परिदेवितम् । इतरेतरसङ्क्रन्दान्न विजानन्ति योषितः ॥

āsāmaparipūrṇārthaṃ niśamya paridevitam | itaretarasaṅkrandānna vijānanti yoṣitaḥ

एक-दूसरी के अधूरे विलाप सुनती हुई ये स्त्रियाँ आपस के आक्रन्दन के शोर में किसी को पहचान नहीं पातीं।

श्लोक 48 (11.16.48)

एता दीर्घमिवोच्छ्वस्य विक्रुश्य च विलप्य च । विस्पन्दमाना दुःखेन वीरा जहति जीवितम् ॥

etā dīrghamivocchvasya vikruśya ca vilapya ca | vispandamānā duḥkhena vīrā jahati jīvitam

लम्बी साँस भरती, चीखती और विलाप करती, दुःख से तड़पती ये वीर स्त्रियाँ प्राण त्याग रही हैं।

श्लोक 49 (11.16.49)

बह्व्यो दृष्ट्वा शरीराणि क्रोशन्ति विलपन्ति च । पाणिभिश्चापरा घ्नन्ति शिरांसि मृदुपाणयः ॥

bahvyo dṛṣṭvā śarīrāṇi krośanti vilapanti ca | pāṇibhiścāparā ghnanti śirāṃsi mṛdupāṇayaḥ

अनेक स्त्रियाँ शवों को देखकर चीखती और विलाप करती हैं, और दूसरी कोमल हाथोंवाली अपने हाथों से सिर पीटती हैं।

श्लोक 50 (11.16.50)

शिरोभिः पतितैर्हस्तैः सर्वाङ्गैः खण्डशः कृतैः । इतरेतरसम्पृक्तैराकीर्णा भाति मेदिनी ॥

śirobhiḥ patitairhastaiḥ sarvāṅgaiḥ khaṇḍaśaḥ kṛtaiḥ | itaretarasampṛktairākīrṇā bhāti medinī

गिरे हुए सिरों, हाथों और टुकड़े-टुकड़े किए गए अंगों के आपस में मिल जाने से पृथ्वी बिखरी-सी दिखाई देती है।

श्लोक 51 (11.16.51)

विशिरस्कानथो कायान्दृष्ट्वा ह्येताननिन्दितान् । मुह्यन्त्यनुचिता नार्यो विदेहानि शिरांसि च ॥

viśiraskānatho kāyāndṛṣṭvā hyetānaninditān | muhyantyanucitā nāryo videhāni śirāṃsi ca

इन निर्दोष धड़ों को सिरहीन और सिरों को धड़विहीन देखकर, ऐसे दृश्यों की अभ्यस्त न होने के कारण स्त्रियाँ मूर्छित हो जाती हैं।

श्लोक 52 (11.16.52)

शिरः कायेन सन्धाय प्रेक्षमाणा विचेतसः । अपश्यन्त्योऽपरं तत्र नेदमस्येति दुःखिताः ॥

śiraḥ kāyena sandhāya prekṣamāṇā vicetasaḥ | apaśyantyo'paraṃ tatra nedamasyeti duḥkhitāḥ

सिर को धड़ से जोड़कर हतचित्त होकर देखती हैं, पर उचित दूसरा नहीं पातीं; "यह इसका नहीं है" कहती हुई दुःख में डूबी हैं।

श्लोक 53 (11.16.53)

बाहूरुचरणानन्यान्विशिखोन्मथितान्पृथक् । सन्दधत्योऽसुखाविष्टा मूर्छन्त्येताः पुनःपुनः ॥

bāhūrucaraṇānanyānviśikhonmathitānpṛthak | sandadhatyo'sukhāviṣṭā mūrchantyetāḥ punaḥpunaḥ

बाणों से अलग-अलग टूटी दूसरों की भुजाओं, जाँघों और चरणों को जोड़ने का यत्न करती हुई, दुःख से भरी ये स्त्रियाँ बार-बार मूर्छित हो जाती हैं।

श्लोक 54 (11.16.54)

उत्कृत्तशिरसश्चान्यान्विजग्धान्मृगपक्षिभिः । दृष्ट्वा काश्चिन्न जानन्ति भर्तॄन्भरतयोषितः ॥

utkṛttaśirasaścānyānvijagdhānmṛgapakṣibhiḥ | dṛṣṭvā kāścinna jānanti bhartṝnbharatayoṣitaḥ

पशु-पक्षियों से नोचे गए, कटे सिरवाले दूसरे शवों को देखकर कुछ भरतस्त्रियाँ अपने पतियों को पहचान नहीं पातीं।

श्लोक 55 (11.16.55)

पाणिभिश्चापरा घ्नन्ति शिरांसि मधुसूदन । प्रेक्ष्य भ्रातॄन्पितॄन्पुत्रान्पतींश्च निहतान्परैः ॥

pāṇibhiścāparā ghnanti śirāṃsi madhusūdana | prekṣya bhrātṝnpitṝnputrānpatīṃśca nihatānparaiḥ

अन्य स्त्रियाँ, हे मधुसूदन, भाइयों, पिताओं, पुत्रों और पतियों को शत्रुओं के हाथों मरा देखकर अपने हाथों से सिर पीटती हैं।

श्लोक 56 (11.16.56)

बाहुभिश्च सखड्गैश्च शिरोभिश्च सकुण्डलैः । अगम्यकल्पा पृथिवी मांसशोणितकर्दमा । बभूव भरतश्रेष्ठ प्राणिभिर्गतजीवितैः ॥

bāhubhiśca sakhaḍgaiśca śirobhiśca sakuṇḍalaiḥ | agamyakalpā pṛthivī māṃsaśoṇitakardamā | babhūva bharataśreṣṭha prāṇibhirgatajīvitaiḥ

तलवारों सहित भुजाओं और कुण्डलों सहित सिरों से, प्राणहीन प्राणियों से, पृथ्वी माँस और रक्त के कीचड़ से भरी अगम्य हो गई है, हे भरतश्रेष्ठ!

श्लोक 57 (11.16.57)

न दुःखेषूचिताः पूर्वं दुःखं गाहन्त्यनिन्दिताः । भ्रातृभिः पतिभिः पुत्रैरुपाकीर्णां वसुन्धराम् ॥

na duḥkheṣūcitāḥ pūrvaṃ duḥkhaṃ gāhantyaninditāḥ | bhrātṛbhiḥ patibhiḥ putrairupākīrṇāṃ vasundharām

जो निर्दोष स्त्रियाँ पहले कभी दुःख की अभ्यस्त नहीं थीं, वे भाइयों, पतियों और पुत्रों से पटी हुई पृथ्वी पर अब दुःख में डूब रही हैं।

श्लोक 58 (11.16.58)

यूथानीव किशोरीणां सुकेशीनां जनार्दन । स्नुषाणां धृतराष्ट्रस्य पश्य वृन्दान्यनेकशः ॥

yūthānīva kiśorīṇāṃ sukeśīnāṃ janārdana | snuṣāṇāṃ dhṛtarāṣṭrasya paśya vṛndānyanekaśaḥ

हे जनार्दन! धृतराष्ट्र की सुन्दर केशोंवाली बहुओं के अनेक झुंड देखो, जो जवान घोड़ियों के झुंडों जैसे हैं।

श्लोक 59 (11.16.59)

इतो दुःखतरं किन्नु केशव प्रतिभाति मे । यदिमाः कुर्वते सर्वा रवमुच्चावचं स्त्रियः ॥

ito duḥkhataraṃ kinnu keśava pratibhāti me | yadimāḥ kurvate sarvā ravamuccāvacaṃ striyaḥ

हे केशव! इससे बढ़कर दुःखदायी मुझे और क्या लगता है कि ये सब स्त्रियाँ ऊँचे-नीचे स्वर में यह विलाप कर रही हैं?

श्लोक 60 (11.16.60)

नूनमाचरितं पापं मया पूर्वेषु जन्मसु । या पश्यामि हतान्पुत्रान्पौत्रान्भ्रातॄंश्च माधव ॥

nūnamācaritaṃ pāpaṃ mayā pūrveṣu janmasu | yā paśyāmi hatānputrānpautrānbhrātṝṃśca mādhava

निश्चय ही मैंने पूर्वजन्मों में पाप किया है, जो मैं अपने पुत्रों, पौत्रों और भाइयों को मरा हुआ देख रही हूँ, हे माधव।

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 61 (11.16.61)

एवमार्ता विलपती समाभाष्य जनार्दनम् । गान्धारी पुत्रशोकार्ता ददर्श निहतं सुतम् ॥

evamārtā vilapatī samābhāṣya janārdanam | gāndhārī putraśokārtā dadarśa nihataṃ sutam

इस प्रकार दुःख से विलाप करती हुई, पुत्रशोक से पीड़ित गान्धारी ने जनार्दन से बात करके अपने मरे हुए पुत्र को देखा।

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