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स्त्री पर्व · अध्याय 15

गान्धारी और कुन्ती का पाण्डवों से मिलन; द्रौपदी का शोक

क्रोध में भरी गान्धारी पूछती हैं कि युधिष्ठिर कहाँ हैं। वे काँपते हुए उनके पास आते हैं और शाप के लिए स्वयं को प्रस्तुत करते हैं, पर गान्धारी केवल लम्बी साँसें भरती हैं; पट्टी के किनारे से उनकी दृष्टि युधिष्ठिर के पैरों की उँगलियों के सिरों पर पड़ती है और उनके नख तुरन्त कुरूप हो जाते हैं। अर्जुन कृष्ण के पीछे जा खड़ा होता है, और गान्धारी शान्त होकर माता की तरह पाण्डवों को सान्त्वना देती हैं। पाण्डव कुन्ती के पास जाते हैं, जो अपने घायल पुत्रों को देखकर रोती हैं और भूमि पर पड़ी, अपने पुत्रों के लिए विलाप करती द्रौपदी को देखती हैं। कुन्ती उसे उठाकर उसके साथ गान्धारी के पास जाती हैं, जहाँ गान्धारी कहती हैं कि यह विनाश काल से प्रेरित था, विदुर की चेतावनी को याद करती हैं और द्रौपदी से कहती हैं कि वे स्वयं भी सान्त्वना से परे हैं।

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वैशम्पायन उवाच

श्लोक 1 (11.15.1)

तमेवमुक्त्वा गान्धारी युधिष्ठिरमपृच्छत । क्व स राजेति सक्रोधा पुत्रपौत्रवधार्दिता ॥

tamevamuktvā gāndhārī yudhiṣṭhiramapṛcchata | kva sa rājeti sakrodhā putrapautravadhārditā

ऐसा कहकर पुत्रों और पौत्रों के वध से पीड़ित, क्रोध से भरी गान्धारी ने युधिष्ठिर से पूछा, "वह राजा कहाँ है?"

श्लोक 2 (11.15.2)

तामभ्यगच्छत्कौन्तेयो वेपमानः कृताञ्जलिः । युधिष्ठिरस्तु गान्धारीं मधुरं वाक्यमब्रवीत् ॥

tāmabhyagacchatkaunteyo vepamānaḥ kṛtāñjaliḥ | yudhiṣṭhirastu gāndhārīṃ madhuraṃ vākyamabravīt

कुन्तीपुत्र युधिष्ठिर काँपते हुए, हाथ जोड़े, उनके पास गए और गान्धारी से मधुर वचन बोले।

युधिष्ठिर उवाच

श्लोक 3 (11.15.3)

पुत्रहन्ता नृशंसोऽहं तव देवि युधिष्ठिरः । शापार्हः पृथिवीनाशे हेतुभूतः शपस्व माम् ॥

putrahantā nṛśaṃso'haṃ tava devi yudhiṣṭhiraḥ | śāpārhaḥ pṛthivīnāśe hetubhūtaḥ śapasva mām

"हे देवि! मैं आपके पुत्रों का हत्यारा क्रूर युधिष्ठिर हूँ। पृथ्वी के विनाश का कारण बनकर मैं शाप के योग्य हूँ; आप मुझे शाप दीजिए।

श्लोक 4 (11.15.4)

नहि मे जीवितेनार्थो न राज्येन सुखेन वा । तादृशान्सुहृदो हत्वा प्रमूढस्य सुहृद्द्रुहः ॥

nahi me jīvitenārtho na rājyena sukhena vā | tādṛśānsuhṛdo hatvā pramūḍhasya suhṛddruhaḥ

अब मुझे न जीवन से प्रयोजन है, न राज्य से, न सुख से; ऐसे मित्रों को मारकर मैं मोहग्रस्त होकर मित्रद्रोही बन गया हूँ।"

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 5 (11.15.5)

तमेवंवादिनं भीतं सन्निकर्षागतं तदा । नोवाच किञ्चिद्गान्धारी निःश्वासपरमा नृप ॥

tamevaṃvādinaṃ bhītaṃ sannikarṣāgataṃ tadā | novāca kiñcidgāndhārī niḥśvāsaparamā nṛpa

इस प्रकार बोलते हुए, भयभीत होकर उनके समीप खड़े युधिष्ठिर से गान्धारी ने, हे राजन्, कुछ नहीं कहा; वे केवल लम्बी साँसें भरती रहीं।

श्लोक 6 (11.15.6)

तस्यावनतदेहस्य पादयोर्निपतिष्यतः । युधिष्ठिरस्य नृपतेर्धर्मज्ञा दीर्घदर्शिनी ॥

tasyāvanatadehasya pādayornipatiṣyataḥ | yudhiṣṭhirasya nṛpaterdharmajñā dīrghadarśinī

शरीर झुकाए हुए और चरणों पर गिरने को उद्यत उन राजा युधिष्ठिर के, धर्म को जाननेवाली दूरदर्शी गान्धारी ने

श्लोक 7 (11.15.7)

अङ्गुल्यग्राणि ददृशे देवी पट्टान्तरेण सा । ततः स कुनखीभूतो दर्शनीयनखो नृपः ॥

aṅgulyagrāṇi dadṛśe devī paṭṭāntareṇa sā | tataḥ sa kunakhībhūto darśanīyanakho nṛpaḥ

पट्टी के किनारे से उनके पैरों की उँगलियों के सिरे देख लिए; और तब वे राजा, जिनके नख सुन्दर थे, कुरूप नखोंवाले हो गए।

श्लोक 8 (11.15.8)

तं दृष्ट्वा चार्जुनोऽगच्छद्वासुदेवस्य पृष्ठतः ॥

taṃ dṛṣṭvā cārjuno'gacchadvāsudevasya pṛṣṭhataḥ

यह देखकर अर्जुन वासुदेव के पीछे चला गया।

श्लोक 9 (11.15.9)

एवं सञ्चेष्टमानांस्तानितश्चेतश्च भारत । गान्धारी विगतक्रोधा सांत्वयामास मातृवत् ॥

evaṃ sañceṣṭamānāṃstānitaścetaśca bhārata | gāndhārī vigatakrodhā sāṃtvayāmāsa mātṛvat

हे भारत! इस प्रकार इधर-उधर हिलते-डुलते उन पाण्डवों को गान्धारी ने क्रोध छोड़कर माता के समान सान्त्वना दी।

श्लोक 10 (11.15.10)

ते पाण्डवा अनुज्ञाता मातरं वीतमत्सराः । अभ्यगच्छन्त सहिताः पृथां पृथुलवक्षसः ॥

te pāṇḍavā anujñātā mātaraṃ vītamatsarāḥ | abhyagacchanta sahitāḥ pṛthāṃ pṛthulavakṣasaḥ

गान्धारी की आज्ञा पाकर वे चौड़ी छातीवाले पाण्डव, मन का वैर छोड़कर, एक साथ अपनी माता पृथा के पास गए।

श्लोक 11 (11.15.11)

चिरस्य दृष्ट्वा पुत्रान्सा पुत्राधिभिरभिप्लुता । बाष्पमाहारयद्देवी वस्त्रेणावृत्य वै मुखम् ॥

cirasya dṛṣṭvā putrānsā putrādhibhirabhiplutā | bāṣpamāhārayaddevī vastreṇāvṛtya vai mukham

बहुत समय बाद पुत्रों को देखकर पुत्रों की पीड़ा से भरी रानी कुन्ती ने वस्त्र से मुख ढककर आँसुओं को रोका।

श्लोक 12 (11.15.12)

ततो बाष्पं समुत्सृज्य सह पुत्रैस्तदा पृथा । अपश्यदेनाञ्शस्त्रौघैर्बहुधा परिविक्षतान् ॥

tato bāṣpaṃ samutsṛjya saha putraistadā pṛthā | apaśyadenāñśastraughairbahudhā parivikṣatān

फिर पुत्रों के साथ आँसू बहाकर पृथा ने देखा कि वे अस्त्रों की बौछार से कई स्थानों पर घायल हैं।

श्लोक 13 (11.15.13)

सा तानेकैकशः पुत्रान्संस्पृशन्ती पुनःपुनः । अन्वशोचत दुःखार्ता द्रौपदीं निहतात्मजाम् । रुदन्तीमथ पाञ्चालीं ददर्श पतितां भुवि ॥

sā tānekaikaśaḥ putrānsaṃspṛśantī punaḥpunaḥ | anvaśocata duḥkhārtā draupadīṃ nihatātmajām | rudantīmatha pāñcālīṃ dadarśa patitāṃ bhuvi

अपने पुत्रों को एक-एक करके बार-बार छूती हुई वे दुःख से पीड़ित होकर पुत्रहीन द्रौपदी के लिए शोक करने लगीं, और उन्होंने भूमि पर गिरी हुई रोती पाञ्चाली को देखा।

द्रौपद्युवाच

श्लोक 14 (11.15.14)

आर्ये पौत्रास्तु ते सर्वे सौभद्रसहिता गताः । न त्वां तेऽद्याभिगच्छन्ति चिरं दृष्ट्वा अनिन्दिते । किन्नु राज्येन मे कार्यं विहीनायाः सुतैर्वरैः ॥

ārye pautrāstu te sarve saubhadrasahitā gatāḥ | na tvāṃ te'dyābhigacchanti ciraṃ dṛṣṭvā anindite | kinnu rājyena me kāryaṃ vihīnāyāḥ sutairvaraiḥ

"हे आर्ये! आपके सब पौत्र सौभद्र के साथ चले गए। हे निर्दोषे! इतने समय बाद आपको देखकर भी वे आज आपके पास नहीं आते। श्रेष्ठ पुत्रों से विहीन मुझे राज्य से क्या प्रयोजन?"

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 15 (11.15.15)

तां समाश्वासयामास पृथा पृथुललोचना । उत्थाप्याङ्केन सुदतीं रुदतीं शोककर्शिताम् ॥

tāṃ samāśvāsayāmāsa pṛthā pṛthulalocanā | utthāpyāṅkena sudatīṃ rudatīṃ śokakarśitām

विशाल नेत्रोंवाली पृथा ने शोक से कृश, रोती हुई सुन्दर दाँतोंवाली द्रौपदी को उठाकर गोद में लेकर सान्त्वना दी।

श्लोक 16 (11.15.16)

तयैव सहिता चापि पुत्रैरनुगता पृथा । अभ्यगच्छत गान्धारीमार्तामार्ततरा स्वयम् ॥

tayaiva sahitā cāpi putrairanugatā pṛthā | abhyagacchata gāndhārīmārtāmārtatarā svayam

उसी द्रौपदी के साथ और पुत्रों के पीछे चलती हुई पृथा स्वयं और भी अधिक दुःखी होकर दुःखी गान्धारी के पास गईं।

श्लोक 17 (11.15.17)

तामुवाचाथ गान्धारी सह कुन्त्या यशस्विनीम् । मैवं पुत्रीति शोकार्ता पश्य मामपि दुःखितां ॥

tāmuvācātha gāndhārī saha kuntyā yaśasvinīm | maivaṃ putrīti śokārtā paśya māmapi duḥkhitāṃ

तब गान्धारी ने कुन्ती के साथ यशस्विनी द्रौपदी से कहा, "बेटी, शोक से ऐसा मत करो; मुझ दुःखिनी को भी देखो।

गान्धार्युवाच

श्लोक 18 (11.15.18)

मन्ये लोकविनाशोऽयं कालपर्यायनोदितः । अवश्यभावी सम्प्राप्तः स्वभावाद्रोमहर्षणः ॥

manye lokavināśo'yaṃ kālaparyāyanoditaḥ | avaśyabhāvī samprāptaḥ svabhāvādromaharṣaṇaḥ

मैं मानती हूँ कि काल के चक्र से प्रेरित यह लोकों का विनाश अवश्यम्भावी था; स्वभाव से ही यह रोमांच उत्पन्न करनेवाला विनाश आ पहुँचा है।

श्लोक 19 (11.15.19)

इदं तत्समनुप्राप्तं विदुरस्य वचो महत् । असिद्धानुनये कृष्णे यदुवाच महामतिः ॥

idaṃ tatsamanuprāptaṃ vidurasya vaco mahat | asiddhānunaye kṛṣṇe yaduvāca mahāmatiḥ

अब विदुर का वह महान् वचन सच हो गया, जो उन बुद्धिमान् ने तब कहा था जब कृष्ण का सन्धि का प्रयत्न सफल नहीं हुआ था।

श्लोक 20 (11.15.20)

तस्मिन्नपरिहार्येऽर्थे व्यतीते च विशेषतः । मा शुचो न हि शोच्यास्ते सङ्ग्रामे निधनं गताः ॥

tasminnaparihārye'rthe vyatīte ca viśeṣataḥ | mā śuco na hi śocyāste saṅgrāme nidhanaṃ gatāḥ

जो बात टाली नहीं जा सकती थी और अब बीत चुकी है, उसके लिए शोक मत करो; जो संग्राम में मारे गए हैं, वे शोक के योग्य नहीं हैं।

श्लोक 21 (11.15.21)

यथैवाहं तथैव त्वं को वामाश्वासयिष्यति । ममैव ह्यपराधेन कुलमग्र्यं विनाशितम् ॥

yathaivāhaṃ tathaiva tvaṃ ko vāmāśvāsayiṣyati | mamaiva hyaparādhena kulamagryaṃ vināśitam

जैसी मैं हूँ, वैसी ही तुम हो; हम दोनों को कौन सान्त्वना देगा? मेरे ही अपराध से यह श्रेष्ठ कुल नष्ट हुआ है।"

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