स्त्री पर्व · अध्याय 20
अभिमन्यु, उत्तरा और मत्स्यकुल की स्त्रियाँ
गान्धारी कृष्ण को मरे हुए अभिमन्यु को दिखाती हैं, जिसकी कान्ति अब भी नहीं बुझी है, और उसकी तरुण पत्नी, विराट की पुत्री उत्तरा को। उत्तरा उसके शरीर को पोंछती है, उसका सिर गोद में रखकर जीवित की तरह उससे प्रश्न करती है, उसे मारने वाले योद्धाओं को धिक्कारती है और उसके जीते हुए लोकों में उसके पीछे आने की बात कहती है। विराट के घर की स्त्रियाँ उसे हटा ले जाती हैं और स्वयं विराट के लिए विलाप करती हैं, जिन्हें गिद्ध नोच रहे हैं। अन्त में गान्धारी उत्तर, अभिमन्यु, कम्बोजराज सुदक्षिण और लक्ष्मण को दिखाती हैं, जो रणभूमि के अगले भाग में पड़े हैं।
गान्धार्युवाच
श्लोक 1 (11.20.1)
अध्यर्धगुणमाहुर्यं बले शौर्ये च केशव । पित्रा त्वया च दाशार्ह दृप्तं सिंहमिवोत्कटम् ॥
adhyardhaguṇamāhuryaṃ bale śaurye ca keśava | pitrā tvayā ca dāśārha dṛptaṃ siṃhamivotkaṭam
हे केशव! हे दाशार्ह! बल और शौर्य में जिसे लोग अपने पिता और आपसे भी डेढ़ गुना कहते थे, वह गर्वीला और सिंह के समान प्रचण्ड था।
श्लोक 2 (11.20.2)
यो बिभेद चमूमेको मम पुत्रस्य दुर्भिदाम् । स भूत्वा मृत्युरन्येषां स्वयं मृत्युवशं गतः ॥
yo bibheda camūmeko mama putrasya durbhidām | sa bhūtvā mṛtyuranyeṣāṃ svayaṃ mṛtyuvaśaṃ gataḥ
जिसने अकेले मेरे पुत्र की दुर्भेद्य सेना को भेद डाला और दूसरों के लिए मृत्यु बन गया, वह स्वयं मृत्यु के वश में चला गया।
श्लोक 3 (11.20.3)
तस्योपलक्षये कृष्ण कार्ष्णेरमिततेजसः । अभिमन्योर्हतस्यापि प्रभा नैवोपशाम्यति ॥
tasyopalakṣaye kṛṣṇa kārṣṇeramitatejasaḥ | abhimanyorhatasyāpi prabhā naivopaśāmyati
हे कृष्ण! अपरिमित तेज वाले अर्जुन-पुत्र अभिमन्यु के मारे जाने पर भी मैं देखती हूँ कि उसकी कान्ति शान्त नहीं हुई है।
श्लोक 4 (11.20.4)
एषा विराटदुहिता स्नुषा गाण्डीवधन्वनः । हतं बाला पतिं वीरं दृष्ट्वा शोचत्यनिन्दिता ॥
eṣā virāṭaduhitā snuṣā gāṇḍīvadhanvanaḥ | hataṃ bālā patiṃ vīraṃ dṛṣṭvā śocatyaninditā
यह विराट की पुत्री है, गाण्डीवधारी अर्जुन की पुत्रवधू; अपने वीर पति को मरा देखकर वह निर्दोष बाला शोक कर रही है।
श्लोक 5 (11.20.5)
तमेषा हि समागम्य भार्या भर्तारमन्तिके । विराटदुहिता कृष्ण पाणिना परिमार्जति ॥
tameṣā hi samāgamya bhāryā bhartāramantike | virāṭaduhitā kṛṣṇa pāṇinā parimārjati
हे कृष्ण! विराट की यह पुत्री, पत्नी होकर, अपने पति के पास पहुँचकर उसे अपने हाथ से पोंछ रही है।
श्लोक 6 (11.20.6)
तस्य वक्त्रमुपाघ्राय सौभद्रस्य मनस्विनी । विबुद्धकमलाकारं कम्बुवृत्तशिरोधरम् ॥
tasya vaktramupāghrāya saubhadrasya manasvinī | vibuddhakamalākāraṃ kambuvṛttaśirodharam
उस मनस्विनी ने सुभद्रा-पुत्र के मुख को सूँघकर चूमा है, जो खिले कमल के समान है और जिसकी ग्रीवा शंख की तरह गोल है,
श्लोक 7 (11.20.7)
कामरूपवती चैषा परिष्वजति भामिनी । लज्जमाना पुरा चैनं माध्वीकमदमूर्च्छिता ॥
kāmarūpavatī caiṣā pariṣvajati bhāminī | lajjamānā purā cainaṃ mādhvīkamadamūrcchitā
और अब वह सुन्दरी, जैसे पहले लजाती थी वैसे ही लजाती हुई, मधु की मदिरा के नशे में चूर-सी होकर उसका आलिंगन कर रही है।
श्लोक 8 (11.20.8)
तस्य क्षतजसन्दिग्धं जातरूपपरिष्कृतम् । विमुच्य कवचं कृष्ण शरीरमभिवीक्षते ॥
tasya kṣatajasandigdhaṃ jātarūpapariṣkṛtam | vimucya kavacaṃ kṛṣṇa śarīramabhivīkṣate
हे कृष्ण! वह उसके रक्त से सने, सोने से सजे शरीर का कवच उतारकर उसे निहार रही है।
श्लोक 9 (11.20.9)
अवेक्षमाणा तं बाला कृष्ण त्वामभिभाषते । अयं ते पुण्डरीकाक्ष सदृशाक्षो निपातितः ॥
avekṣamāṇā taṃ bālā kṛṣṇa tvāmabhibhāṣate | ayaṃ te puṇḍarīkākṣa sadṛśākṣo nipātitaḥ
उसे देखती हुई वह बाला आपसे कहती है, हे कृष्ण: "हे कमलनयन! आपकी आँखों जैसी आँखों वाला यह वीर मारा गया है।
उत्तरोवाच
श्लोक 10 (11.20.10)
बले वीर्ये च सदृशस्तेजसा चैव तेऽनघ । रूपेण च तथाऽत्यर्थं शेते भुवि निपातितः ॥
bale vīrye ca sadṛśastejasā caiva te'nagha | rūpeṇa ca tathā'tyarthaṃ śete bhuvi nipātitaḥ
हे निष्पाप! बल और पराक्रम में, तेज में और रूप में भी अत्यन्त आपके समान यह वीर मारा जाकर भूमि पर पड़ा है।
श्लोक 11 (11.20.11)
अत्यन्तं सुकुमारस्य राङ्कवाजिनशायिनः । कच्चिदद्य शरीरं ते भूमौ न परितप्यते ॥
atyantaṃ sukumārasya rāṅkavājinaśāyinaḥ | kaccidadya śarīraṃ te bhūmau na paritapyate
तुम तो अत्यन्त सुकुमार थे और रङ्कु मृग के चर्म पर सोते थे; आज भूमि पर पड़े तुम्हारे शरीर को कष्ट तो नहीं हो रहा?
श्लोक 12 (11.20.12)
मातङ्गभुजवर्ष्माणौ ज्याक्षेपकठिनत्वचौ । काञ्चनाङ्गदिनौ शेते निक्षिप्य विपुलौ भुजौ । व्यायम्य बहुधा नूनं सुखसुप्तः श्रमादिव ॥
mātaṅgabhujavarṣmāṇau jyākṣepakaṭhinatvacau | kāñcanāṅgadinau śete nikṣipya vipulau bhujau | vyāyamya bahudhā nūnaṃ sukhasuptaḥ śramādiva
हाथी की सूँड़ जैसी भुजाओं वाला, जिसकी त्वचा प्रत्यंचा की रगड़ से कठोर हो गई है और जो सोने के बाजूबन्द पहने है, वह अपनी दोनों विशाल भुजाएँ फैलाए, अनेक प्रकार से हाथ-पैर पसारे, मानो थकान से सुख की नींद सो रहा है।
श्लोक 13 (11.20.13)
एवं विलपतीमार्तां किं मां न प्रतिभाषसे । न स्मराम्यपराधं ते किं मां न प्रतिभाषसे ॥
evaṃ vilapatīmārtāṃ kiṃ māṃ na pratibhāṣase | na smarāmyaparādhaṃ te kiṃ māṃ na pratibhāṣase
मैं दुःख से इस प्रकार विलाप कर रही हूँ; तुम मुझे उत्तर क्यों नहीं देते? मुझे तुम्हारे प्रति कोई अपराध याद नहीं आता; तुम मुझे उत्तर क्यों नहीं देते?
श्लोक 14 (11.20.14)
ननु मां त्वं पुरा दूरादभिवीक्ष्याभिभाषसे । न स्मराम्यपराधं मे किं मां न प्रतिभाषसे ॥
nanu māṃ tvaṃ purā dūrādabhivīkṣyābhibhāṣase | na smarāmyaparādhaṃ me kiṃ māṃ na pratibhāṣase
क्या तुम पहले दूर से ही मुझे देखकर मुझसे बात नहीं करते थे? मुझे अपना कोई अपराध याद नहीं आता; तुम मुझे उत्तर क्यों नहीं देते?
श्लोक 15 (11.20.15)
आर्यामार्य सुभद्रां त्वमिमांश्च त्रिदशोपमान् । पितॄन्मां चैव दुःखार्तां विहाय क्व गमिष्यसि ॥
āryāmārya subhadrāṃ tvamimāṃśca tridaśopamān | pitṝnmāṃ caiva duḥkhārtāṃ vihāya kva gamiṣyasi
हे आर्य! अपनी पूज्य माता सुभद्रा को, देवताओं के समान इन पितृजनों को और दुःख से पीड़ित मुझको छोड़कर तुम कहाँ जाओगे?"
गान्धार्युवाच
श्लोक 16 (11.20.16)
तस्य शोणितदिग्धान्वै केशानुन्नम्य पाणिना । उत्सङ्गे वक्त्रमाधाय जीवन्तमिव पृच्छति ॥
tasya śoṇitadigdhānvai keśānunnamya pāṇinā | utsaṅge vaktramādhāya jīvantamiva pṛcchati
वह हाथ से उसके रक्त से सने केशों को ऊपर उठाकर, उसका मुख अपनी गोद में रखकर जीवित की तरह उससे पूछती है,
श्लोक 17 (11.20.17)
स्वस्रीयं वासुदेवस्य पुत्रं गाण्डीवधन्वनः । कथं त्वां रणमध्यस्थं जघ्नुरेते महारथाः ॥
svasrīyaṃ vāsudevasya putraṃ gāṇḍīvadhanvanaḥ | kathaṃ tvāṃ raṇamadhyasthaṃ jaghnurete mahārathāḥ
वासुदेव के भानजे, गाण्डीवधारी के पुत्र से: "तुम रणभूमि के बीच खड़े थे, इन महारथियों ने तुम्हें कैसे मार डाला?
उत्तरोवाच
श्लोक 18 (11.20.18)
धिगस्तु क्रूरकर्तॄंस्तान्कृपकर्णजयद्रथान् । द्रोणद्रौणायनी चोभौ यैरहं विधवा कृता ॥
dhigastu krūrakartṝṃstānkṛpakarṇajayadrathān | droṇadrauṇāyanī cobhau yairahaṃ vidhavā kṛtā
उन क्रूर कर्म करने वालों कृप, कर्ण और जयद्रथ को धिक्कार है, और द्रोण तथा द्रोणपुत्र दोनों को भी, जिन्होंने मुझे विधवा कर दिया!
श्लोक 19 (11.20.19)
रथर्षभाणां सर्वेषां कथमासीत्तदा मनः । बालं त्वां परिवार्यैकमनेकेषां च जघ्नताम् ॥
ratharṣabhāṇāṃ sarveṣāṃ kathamāsīttadā manaḥ | bālaṃ tvāṃ parivāryaikamanekeṣāṃ ca jaghnatām
उस समय उन सब श्रेष्ठ रथियों का मन कैसा रहा होगा, जब बहुत से मिलकर तुम अकेले बालक को घेरकर मार रहे थे?
श्लोक 20 (11.20.20)
कथं नु पाण्डवानां च पाञ्चालानां तु पश्यताम् । त्वं वीर निधनं प्राप्तो नाथवान्सन्ननाथवत् ॥
kathaṃ nu pāṇḍavānāṃ ca pāñcālānāṃ tu paśyatām | tvaṃ vīra nidhanaṃ prāpto nāthavānsannanāthavat
हे वीर! पाण्डवों और पाञ्चालों के देखते-देखते तुम रक्षकों वाले होकर भी अनाथ की तरह मृत्यु को कैसे प्राप्त हुए?
श्लोक 21 (11.20.21)
दृष्ट्वा बहुभिराक्रन्दे निहतं त्वां पिता तव । वीरः पुरुषशार्दूलः कथं जीवति पाण्डवः ॥
dṛṣṭvā bahubhirākrande nihataṃ tvāṃ pitā tava | vīraḥ puruṣaśārdūlaḥ kathaṃ jīvati pāṇḍavaḥ
तुम्हें इतने लोगों के हाथों उस मारकाट में मरा देखकर तुम्हारे पिता, वह पुरुषसिंह पाण्डव वीर, कैसे जी रहे हैं?
श्लोक 22 (11.20.22)
न राज्यलाभो विपुलः शत्रूणां च पराभवः । प्रीतिं धास्यति पार्थानां त्वामृते पुष्करेक्षण ॥
na rājyalābho vipulaḥ śatrūṇāṃ ca parābhavaḥ | prītiṃ dhāsyati pārthānāṃ tvāmṛte puṣkarekṣaṇa
हे कमलनयन! तुम्हारे बिना न विशाल राज्य का लाभ और न शत्रुओं की पराजय पार्थों को प्रसन्नता देगी।
श्लोक 23 (11.20.23)
तव शस्त्रजिताँल्लोकान्धर्मेण च दमेन च । क्षिप्रमन्वागमिष्यामि तत्र मां प्रतिपालय ॥
tava śastrajitām̐llokāndharmeṇa ca damena ca | kṣipramanvāgamiṣyāmi tatra māṃ pratipālaya
धर्म और संयम के बल से मैं शीघ्र ही तुम्हारे शस्त्रों से जीते हुए लोकों में तुम्हारे पीछे आऊँगी; वहाँ मेरी प्रतीक्षा करना।
श्लोक 24 (11.20.24)
दुर्मरं पुनरप्राप्ते काले भवति केनचित् । यदहं त्वां रणे दृष्ट्वा हतं जीवामि दुर्भगा ॥
durmaraṃ punaraprāpte kāle bhavati kenacit | yadahaṃ tvāṃ raṇe dṛṣṭvā hataṃ jīvāmi durbhagā
समय न आने पर किसी का भी मरना कठिन होता है, क्योंकि मैं अभागिनी तुम्हें युद्ध में मरा देखकर भी जी रही हूँ।
श्लोक 25 (11.20.25)
कामिदानीं नरव्याघ्र श्लक्ष्णया स्मितया गिरा । पितृलोके समेत्यान्यां मामिवामन्त्रयिष्यसि ॥
kāmidānīṃ naravyāghra ślakṣṇayā smitayā girā | pitṛloke sametyānyāṃ māmivāmantrayiṣyasi
हे नरव्याघ्र! पितृलोक में किसी और स्त्री से मिलकर अब तुम किसे मुझ जैसे मधुर मुस्कान और कोमल वाणी से सम्बोधित करोगे?
श्लोक 26 (11.20.26)
नूनमप्सरसां स्वर्गे मनांसि प्रमथिष्यसि । परमेण च रूपेण गिरा च स्मितपूर्वया ॥
nūnamapsarasāṃ svarge manāṃsi pramathiṣyasi | parameṇa ca rūpeṇa girā ca smitapūrvayā
निश्चय ही तुम स्वर्ग में अपने परम सौन्दर्य और मुस्कान से आरम्भ होने वाली वाणी से अप्सराओं के मन को मथ डालोगे।
श्लोक 27 (11.20.27)
प्राप्य पुण्यकृताँल्लोकानप्सरोभिः समेयिवान् । सौभद्र विहरन्काले स्मरेथाः सुकृतानि मे ॥
prāpya puṇyakṛtām̐llokānapsarobhiḥ sameyivān | saubhadra viharankāle smarethāḥ sukṛtāni me
हे सौभद्र! पुण्यात्माओं के लोकों में पहुँचकर और अप्सराओं से मिलकर जब तुम समय पर विहार करो, तब मेरे सत्कर्मों को स्मरण करना।
श्लोक 28 (11.20.28)
एतावानिह संवासो विहितस्ते मया सह । षण्मासान्सप्तमे मासि त्वं वीर निधनं गतः ॥
etāvāniha saṃvāso vihitaste mayā saha | ṣaṇmāsānsaptame māsi tvaṃ vīra nidhanaṃ gataḥ
हे वीर! तुम्हारा मेरे साथ रहना बस इतना ही विधाता ने ठहराया था: छह महीने, और सातवें महीने में तुम मृत्यु को प्राप्त हो गए।"
गान्धार्युवाच
श्लोक 29 (11.20.29)
इत्युक्तवचनामेनामपकर्षन्ति दुःखिताम् । उत्तरां मोघसङ्कल्पां मत्स्यराजकुलस्त्रियः ॥
ityuktavacanāmenāmapakarṣanti duḥkhitām | uttarāṃ moghasaṅkalpāṃ matsyarājakulastriyaḥ
इस प्रकार कहती हुई उस दुःखी उत्तरा को, जिसकी आशाएँ व्यर्थ हो गई थीं, मत्स्यराज के कुल की स्त्रियाँ वहाँ से हटा रही हैं।
श्लोक 30 (11.20.30)
उत्तरामपकृष्यैनामार्तामार्ततराः स्वयम् । विराटं निहतं दृष्ट्वा क्रोशन्ति विलपन्ति च ॥
uttarāmapakṛṣyaināmārtāmārtatarāḥ svayam | virāṭaṃ nihataṃ dṛṣṭvā krośanti vilapanti ca
उत्तरा को खींचकर हटाने के बाद विराट को मरा देखकर वे स्वयं और भी अधिक दुःखी होकर चीखती और विलाप करती हैं।
श्लोक 31 (11.20.31)
द्रोणास्त्रशरसङ्कृत्तं शयानं रुधिरोक्षितम् । विराटं वितुदन्त्येते गृध्रगोमायुवायसाः ॥
droṇāstraśarasaṅkṛttaṃ śayānaṃ rudhirokṣitam | virāṭaṃ vitudantyete gṛdhragomāyuvāyasāḥ
द्रोणाचार्य के अस्त्रों और बाणों से कटे, रक्त से लथपथ पड़े विराट को ये गिद्ध, सियार और कौए नोच रहे हैं।
श्लोक 32 (11.20.32)
वितुद्यमानं विहगैर्विराटमसितेक्षणाः । न शक्नुवन्ति विहगान्निवारयितुमातुराः ॥
vitudyamānaṃ vihagairvirāṭamasitekṣaṇāḥ | na śaknuvanti vihagānnivārayitumāturāḥ
काली आँखों वाली वे व्याकुल स्त्रियाँ विराट को नोचते हुए पक्षियों को हटाने में समर्थ नहीं हैं।
श्लोक 33 (11.20.33)
आसामातपतप्तानामायासेन च योषिताम् । श्रमेण च विवर्णानां वक्त्राणां विप्लुतं वपुः ॥
āsāmātapataptānāmāyāsena ca yoṣitām | śrameṇa ca vivarṇānāṃ vaktrāṇāṃ viplutaṃ vapuḥ
धूप से तपी हुई, परिश्रम से थकी और थकान से पीली पड़ी इन स्त्रियों के मुखों की शोभा बिगड़ गई है।
श्लोक 34 (11.20.34)
उत्तरं चाभिमन्युं च काम्भोजं च सुदक्षिणम् । कार्ष्णिनाऽभिहतं पश्य लक्ष्मणं प्रियदर्शनम् ॥
uttaraṃ cābhimanyuṃ ca kāmbhojaṃ ca sudakṣiṇam | kārṣṇinā'bhihataṃ paśya lakṣmaṇaṃ priyadarśanam
उत्तर को, अभिमन्यु को, कम्बोजराज सुदक्षिण को और देखने में प्रिय लक्ष्मण को देखो, जिसे अभिमन्यु ने मार गिराया था।
श्लोक 35 (11.20.35)
आयोधनशिरोमध्ये शयानं पश्य माधव ॥
āyodhanaśiromadhye śayānaṃ paśya mādhava
हे माधव! उसे देखो, जो रणभूमि के अगले भाग के बीच पड़ा है।