स्त्री पर्व · अध्याय 23
गान्धारी का कृष्ण को शल्य, भीष्म और द्रोण के शव दिखाना
कृष्ण के साथ रणभूमि में चलती हुई गान्धारी एक-एक करके मरे हुए राजाओं और गुरुजनों को दिखाती हैं। वे शल्य को दिखाती हैं, जिनका मुख पक्षी नोच रहे हैं और जिन्हें घेरकर मद्रदेश की स्त्रियाँ रो रही हैं, और भगदत्त को, जिन्होंने अर्जुन से इतना भीषण युद्ध किया था। फिर वे शरशय्या पर लेटे भीष्म के लिए शोक करती हैं, जिनके सिरहाने अर्जुन के दिए तीन बाणों का तकिया है, और द्रोण के लिए, जिनके पास उनकी पत्नी कृपी बैठी है और जिनके शिष्य चिता सजाकर सामगान कर रहे हैं।
गान्धार्युवाच
श्लोक 1 (11.23.1)
एष शल्यो हतः शेते साक्षान्नकुलमातुलः । धर्मज्ञेन हतस्तात धर्मराजेन संयुगे ॥
eṣa śalyo hataḥ śete sākṣānnakulamātulaḥ | dharmajñena hatastāta dharmarājena saṃyuge
यह शल्य मरा पड़ा है, जो साक्षात् नकुल का मामा था। हे तात! धर्म को जाननेवाले धर्मराज युधिष्ठिर ने युद्ध में इसे मारा है।
श्लोक 2 (11.23.2)
यस्त्वया स्पर्धते नित्यं सर्वत्र पुरुषर्षभ । स एष निहतः शेते मद्रराजो महाबलः ॥
yastvayā spardhate nityaṃ sarvatra puruṣarṣabha | sa eṣa nihataḥ śete madrarājo mahābalaḥ
हे पुरुषश्रेष्ठ! जो सदा सर्वत्र तुम्हारी होड़ करता था, वही महाबली मद्रराज यह मारा पड़ा है।
श्लोक 3 (11.23.3)
जयद्रथे यदि ब्रूयुरुपरोधं कथञ्चन । मद्रपुत्रे कथं ब्रूयुरुपरोधं विवक्षवः ॥
jayadrathe yadi brūyuruparodhaṃ kathañcana | madraputre kathaṃ brūyuruparodhaṃ vivakṣavaḥ
यदि कोई किसी प्रकार जयद्रथ पर दोष लगाए भी, तो मद्रराज के पुत्र पर बोलने की इच्छा रखनेवाले भी दोष कैसे लगा सकेंगे?
श्लोक 4 (11.23.4)
येन सङ्गृह्णता तात रथमाधिरथेर्युधि । जयार्थं पाण्डुपुत्राणां तदा तेजोवधः कृतः ॥
yena saṅgṛhṇatā tāta rathamādhiratheryudhi | jayārthaṃ pāṇḍuputrāṇāṃ tadā tejovadhaḥ kṛtaḥ
हे तात! यह वही है जिसने युद्ध में कर्ण के रथ की बागडोर सँभालकर पाण्डवों की विजय के लिए उस समय कर्ण का तेज हर लिया था।
श्लोक 5 (11.23.5)
अहो धिक् पश्य शल्यस्य पूर्णचन्द्रसुदर्शनम् । मुखं पद्मपलाशाक्षं काकैरादष्टमव्रणम् ॥
aho dhik paśya śalyasya pūrṇacandrasudarśanam | mukhaṃ padmapalāśākṣaṃ kākairādaṣṭamavraṇam
हाय, धिक्कार है! शल्य का पूर्ण चन्द्रमा के समान सुन्दर, कमलदल के समान नेत्रोंवाला मुख देखो, जिसे कौए नोच रहे हैं, जबकि उस पर कोई घाव नहीं है।
श्लोक 6 (11.23.6)
एषा चामीकराभस्य तप्तकाञ्चनसप्रभा । आस्याद्विनिःसृता जिह्वा भक्ष्यते कृष्ण पक्षिभिः ॥
eṣā cāmīkarābhasya taptakāñcanasaprabhā | āsyādviniḥsṛtā jihvā bhakṣyate kṛṣṇa pakṣibhiḥ
हे कृष्ण! सोने के समान आभावाले इस राजा के मुख से निकली हुई यह तपाए हुए सोने जैसी चमकती जीभ पक्षी खा रहे हैं।
श्लोक 7 (11.23.7)
युधिष्ठिरेण निहतं शल्यं समितिशोभनम् । रुदन्त्यः पर्युपासन्ते मद्रराजं कुलाङ्गनाः ॥
yudhiṣṭhireṇa nihataṃ śalyaṃ samitiśobhanam | rudantyaḥ paryupāsante madrarājaṃ kulāṅganāḥ
सभाओं की शोभा बढ़ानेवाले शल्य को युधिष्ठिर ने मारा है; उन मद्रराज को घेरकर उनके कुल की स्त्रियाँ रोती हुई बैठी हैं।
श्लोक 8 (11.23.8)
एताः सुसूक्ष्मवसना मद्रराजं नरर्षभम् । क्रोशन्त्योऽथ समासाद्य क्षत्रियाः क्षत्रियर्षभम् ॥
etāḥ susūkṣmavasanā madrarājaṃ nararṣabham | krośantyo'tha samāsādya kṣatriyāḥ kṣatriyarṣabham
अत्यन्त झीने वस्त्र पहने ये क्षत्राणियाँ क्षत्रियश्रेष्ठ, नरश्रेष्ठ मद्रराज के पास पहुँचकर विलाप कर रही हैं।
श्लोक 9 (11.23.9)
शल्यं निपतितं नार्यः परिवार्याभितः स्थिताः । वासिता गृष्टयः पङ्के परिमग्नमिवर्षभम् ॥
śalyaṃ nipatitaṃ nāryaḥ parivāryābhitaḥ sthitāḥ | vāsitā gṛṣṭayaḥ paṅke parimagnamivarṣabham
गिरे हुए शल्य को घेरकर स्त्रियाँ चारों ओर खड़ी हैं, मानो कीचड़ में धँसे साँड़ को गायें घेरे खड़ी हों।
श्लोक 10 (11.23.10)
शल्यं शरणदं शूरं पश्येमं वृष्णिनन्दन । शयानं वीरशयने शरैर्विशकलीकृतम् ॥
śalyaṃ śaraṇadaṃ śūraṃ paśyemaṃ vṛṣṇinandana | śayānaṃ vīraśayane śarairviśakalīkṛtam
हे वृष्णिनन्दन! शरण देनेवाले उस वीर शल्य को देखो, जो बाणों से छिन्न-भिन्न होकर वीरशय्या पर पड़ा है।
श्लोक 11 (11.23.11)
एष शैलालयो राजा भगदत्तः प्रतापवान् । गजाङ्कुशधरः श्रीमाञ्शेते भुवि निपातितः ॥
eṣa śailālayo rājā bhagadattaḥ pratāpavān | gajāṅkuśadharaḥ śrīmāñśete bhuvi nipātitaḥ
यह पर्वतवासी प्रतापी राजा भगदत्त, हाथी का अंकुश धारण करनेवाला श्रीमान् वीर, मारा जाकर भूमि पर पड़ा है।
श्लोक 12 (11.23.12)
यस्य रुक्ममयी माला शिरस्येषा विराजते । श्वापदैर्भक्ष्यमाणस्य शोभयन्तीव मूर्धजान् ॥
yasya rukmamayī mālā śirasyeṣā virājate | śvāpadairbhakṣyamāṇasya śobhayantīva mūrdhajān
जिसे जंगली पशु खा रहे हैं, उसके सिर पर यह सोने की माला चमक रही है, मानो उसके केशों को सजा रही हो।
श्लोक 13 (11.23.13)
एतेन किल पार्थस्य युद्धमासीत्सुदारुणम् । रोमहर्षणमत्युग्रं शक्रस्य त्वहिना यथा ॥
etena kila pārthasya yuddhamāsītsudāruṇam | romaharṣaṇamatyugraṃ śakrasya tvahinā yathā
कहते हैं, इसके साथ अर्जुन का अत्यन्त भयंकर युद्ध हुआ था, जो रोंगटे खड़े कर देनेवाला और अति उग्र था, जैसे इन्द्र का वृत्रासुर के साथ।
श्लोक 14 (11.23.14)
योधयित्वा महाबाहुरेष पार्थं धनञ्जयम् । संशयं गमयित्वा च कुन्तीपुत्रेण पातितः ॥
yodhayitvā mahābāhureṣa pārthaṃ dhanañjayam | saṃśayaṃ gamayitvā ca kuntīputreṇa pātitaḥ
इस महाबाहु ने अर्जुन से युद्ध करके उसे संशय में डाल दिया था, और अन्त में कुन्तीपुत्र के हाथों मारा गया।
श्लोक 15 (11.23.15)
यस्य नास्ति समो लोके शौर्ये वीर्ये च कश्चन । स एष निहतः शेते भीष्मो भीष्मकृदाहवे ॥
yasya nāsti samo loke śaurye vīrye ca kaścana | sa eṣa nihataḥ śete bhīṣmo bhīṣmakṛdāhave
शूरता और बल में संसार में जिसके समान कोई नहीं था, युद्ध में भय उत्पन्न करनेवाला वह भीष्म यहाँ मरा पड़ा है।
श्लोक 16 (11.23.16)
पश्य शान्तनवं कृष्ण शयानं सूर्यवर्चसम् । युगान्त इव कालेन पातितं सूर्यमम्बरात् ॥
paśya śāntanavaṃ kṛṣṇa śayānaṃ sūryavarcasam | yugānta iva kālena pātitaṃ sūryamambarāt
हे कृष्ण! सूर्य के समान तेजस्वी शान्तनुपुत्र को लेटे हुए देखो, मानो युग के अन्त में काल ने सूर्य को आकाश से गिरा दिया हो।
श्लोक 17 (11.23.17)
एष तप्त्वा रणे शत्रूञ्शस्त्रतापेन वीर्यवान् । नरसूर्योऽस्तमभ्येति सूर्योऽस्तमिव केशव ॥
eṣa taptvā raṇe śatrūñśastratāpena vīryavān | narasūryo'stamabhyeti sūryo'stamiva keśava
हे केशव! रणभूमि में अस्त्रों की तपन से शत्रुओं को तपाकर यह पराक्रमी नरसूर्य सूर्य की भाँति अस्त हो रहा है।
श्लोक 18 (11.23.18)
शरतल्पगतं भीष्ममूर्ध्वरेतसमच्युतम् । शयानं वीरशयने पश्य शूरनिषेविते ॥
śaratalpagataṃ bhīṣmamūrdhvaretasamacyutam | śayānaṃ vīraśayane paśya śūraniṣevite
शरशय्या पर पड़े, ऊर्ध्वरेता और अटल भीष्म को देखो, जो शूरवीरों से सेवित वीरशय्या पर लेटे हैं।
श्लोक 19 (11.23.19)
कर्णिनालीकनाराचैरास्तीर्य शयनोत्तमम् । आविश्य शेते भगवान्स्कन्दः शरवणं यथा ॥
karṇinālīkanārācairāstīrya śayanottamam | āviśya śete bhagavānskandaḥ śaravaṇaṃ yathā
कर्णी, नालीक और नाराच बाणों से उत्तम शय्या बिछाकर उसमें प्रवेश किए हुए वे ऐसे लेटे हैं, जैसे भगवान् स्कन्द सरकण्डों के वन में लेटे थे।
श्लोक 20 (11.23.20)
अतूलपूर्णं गाङ्गेयस्त्रिभिर्बाणैः समन्वितम् । उपधायोपधानाग्र्यं दत्तं गाण्डीवधन्वना ॥
atūlapūrṇaṃ gāṅgeyastribhirbāṇaiḥ samanvitam | upadhāyopadhānāgryaṃ dattaṃ gāṇḍīvadhanvanā
गंगापुत्र भीष्म सर्वोत्तम तकिये पर लेटे हैं, जो रुई से नहीं भरा है, बल्कि तीन बाणों से बना है और जिसे गाण्डीवधारी अर्जुन ने उन्हें दिया था।
श्लोक 21 (11.23.21)
पालयानः पितुः शास्त्रमूर्ध्वरेता महायशाः । एष शान्तनवः शेते माधवाप्रतिमो युधि ॥
pālayānaḥ pituḥ śāstramūrdhvaretā mahāyaśāḥ | eṣa śāntanavaḥ śete mādhavāpratimo yudhi
पिता की आज्ञा का पालन करनेवाले, ऊर्ध्वरेता और महायशस्वी यह शान्तनुपुत्र, हे माधव, युद्ध में अप्रतिम होकर यहाँ लेटे हैं।
श्लोक 22 (11.23.22)
धर्मात्मा तात सर्वज्ञः पारावर्येण निर्णये । अमर्त्य इव मर्त्यः सन्नेष प्राणानधारयत् ॥
dharmātmā tāta sarvajñaḥ pārāvaryeṇa nirṇaye | amartya iva martyaḥ sanneṣa prāṇānadhārayat
हे तात! धर्मात्मा, सर्वज्ञ और इस लोक तथा परलोक के ज्ञान से निर्णय में निपुण ये मनुष्य होकर भी अमर के समान अपने प्राणों को धारण किए रहे।
श्लोक 23 (11.23.23)
नास्ति युद्धे कृती कश्चिन्न विद्वान्न पराक्रमी । यत्र शान्तनवो भीष्मः शेतेऽद्य निहतः परैः ॥
nāsti yuddhe kṛtī kaścinna vidvānna parākramī | yatra śāntanavo bhīṣmaḥ śete'dya nihataḥ paraiḥ
जहाँ शान्तनुपुत्र भीष्म आज शत्रुओं के हाथों मरे पड़े हैं, वहाँ युद्ध में कोई भी कुशल, विद्वान् या पराक्रमी नहीं ठहरता।
श्लोक 24 (11.23.24)
स्वयमेतेन शूरेण पृच्छयमानेन पाण्डवैः । धर्मज्ञेनाहवे मृत्युरादिष्टः सत्यवादिना ॥
svayametena śūreṇa pṛcchayamānena pāṇḍavaiḥ | dharmajñenāhave mṛtyurādiṣṭaḥ satyavādinā
धर्म को जाननेवाले और सत्य बोलनेवाले इस वीर ने पाण्डवों के पूछने पर स्वयं ही युद्ध में अपनी मृत्यु का उपाय बता दिया था।
श्लोक 25 (11.23.25)
प्रनष्टः कुरुवंशश्च पुनर्येन समुद्वृतः । स गतः कुरुभिः सार्धं महाबुद्धिः पराभवम् ॥
pranaṣṭaḥ kuruvaṃśaśca punaryena samudvṛtaḥ | sa gataḥ kurubhiḥ sārdhaṃ mahābuddhiḥ parābhavam
जिसने नष्ट हुए कुरुवंश को फिर उठाया था, वही महाबुद्धिमान् कुरुओं के साथ विनाश को प्राप्त हो गया।
श्लोक 26 (11.23.26)
धर्मेण कुरवः केन परिद्रक्ष्यन्ति माधव । हते देवव्रते भीष्मे देवकल्पे नरर्षभे ॥
dharmeṇa kuravaḥ kena paridrakṣyanti mādhava | hate devavrate bhīṣme devakalpe nararṣabhe
हे माधव! देवतुल्य नरश्रेष्ठ देवव्रत भीष्म के मारे जाने पर अब धर्म के अनुसार कुरुओं की देखभाल कौन करेगा?
श्लोक 27 (11.23.27)
अर्जुनस्य विनेतारमाचार्यं सात्यकेस्तथा । तं पश्य पतितं द्रोणं कुरूणां गुरुमुत्तमम् ॥
arjunasya vinetāramācāryaṃ sātyakestathā | taṃ paśya patitaṃ droṇaṃ kurūṇāṃ gurumuttamam
अर्जुन और सात्यकि के आचार्य, कुरुओं के परम गुरु उन द्रोण को गिरा हुआ देखो।
श्लोक 28 (11.23.28)
अस्त्रं चतुर्विधं वेद यथैव त्रिदशेश्वरः । भार्गवो वा महावीर्यस्तथा द्रोणोऽपि माधव ॥
astraṃ caturvidhaṃ veda yathaiva tridaśeśvaraḥ | bhārgavo vā mahāvīryastathā droṇo'pi mādhava
हे माधव! जैसे देवराज इन्द्र या महापराक्रमी परशुराम चारों प्रकार के अस्त्र-विद्या को जानते थे, वैसे ही द्रोण भी जानते थे।
श्लोक 29 (11.23.29)
यस्य प्रसादाद्बीभत्सुः पाण्डवः कर्म दुष्करम् । चकार स हतः शेते नैनमस्त्राण्यपालयन् ॥
yasya prasādādbībhatsuḥ pāṇḍavaḥ karma duṣkaram | cakāra sa hataḥ śete nainamastrāṇyapālayan
जिनकी कृपा से पाण्डुपुत्र अर्जुन ने दुष्कर कर्म किए, वे मरे पड़े हैं और उनके अस्त्र उनकी रक्षा नहीं कर सके।
श्लोक 30 (11.23.30)
यं पुरोधाय कुरव आह्वयन्ति स्म पाण्डवान् । सोऽयं शस्त्रभृतां श्रेष्ठो द्रोणः शस्त्रपृथक्कृतः ॥
yaṃ purodhāya kurava āhvayanti sma pāṇḍavān | so'yaṃ śastrabhṛtāṃ śreṣṭho droṇaḥ śastrapṛthakkṛtaḥ
जिन्हें आगे करके कौरवों ने पाण्डवों को ललकारा था, शस्त्रधारियों में श्रेष्ठ वही द्रोण आज शस्त्रों से अलग पड़े हैं।
श्लोक 31 (11.23.31)
यस्य निर्दहतः सेनां गतिरग्नेरिवाभवत् । स भूमौ निहतः शेते शान्तार्चिरिव पावकः ॥
yasya nirdahataḥ senāṃ gatiragnerivābhavat | sa bhūmau nihataḥ śete śāntārciriva pāvakaḥ
सेना को जलाते समय जिनकी गति अग्नि के समान थी, वे बुझी हुई लपटोंवाली आग की भाँति भूमि पर मरे पड़े हैं।
श्लोक 32 (11.23.32)
धनुर्मुष्टिरशीर्णश्च हस्तावापश्च माधव । द्रोणस्य निहतस्यापि दृश्यते जीवतो यथा ॥
dhanurmuṣṭiraśīrṇaśca hastāvāpaśca mādhava | droṇasya nihatasyāpi dṛśyate jīvato yathā
हे माधव! उनकी मुट्ठी में धनुष अब भी साबुत है और हाथ पर दस्ताना चढ़ा है; मरकर भी द्रोण जीवित-से दिखाई देते हैं।
श्लोक 33 (11.23.33)
वेदा यस्माच्च चत्वारः सर्वाण्यस्त्राणि केशव । अनपेतानि वै शूराद्यथैवादौ प्रजापतेः ॥
vedā yasmācca catvāraḥ sarvāṇyastrāṇi keśava | anapetāni vai śūrādyathaivādau prajāpateḥ
हे केशव! जैसे आरम्भ में प्रजापति से चारों वेद और सब अस्त्र कभी अलग नहीं हुए, वैसे ही इस शूर से भी नहीं हुए।
श्लोक 34 (11.23.34)
चन्दनार्हाविमौ तस्य बन्दिभिर्वन्दितौ शुभौ । गोमायवो विकर्षन्ति पादौ शिष्यशतार्चितौ ॥
candanārhāvimau tasya bandibhirvanditau śubhau | gomāyavo vikarṣanti pādau śiṣyaśatārcitau
चन्दन लगाने योग्य, बन्दियों द्वारा वन्दित और सैकड़ों शिष्यों से पूजित इन शुभ चरणों को गीदड़ खींच रहे हैं।
श्लोक 35 (11.23.35)
द्रोणं द्रुपदपुत्रेण निहतं मधुसूदन । कृपी कृपणमन्वास्ते दुःखोपहतचेतना ॥
droṇaṃ drupadaputreṇa nihataṃ madhusūdana | kṛpī kṛpaṇamanvāste duḥkhopahatacetanā
हे मधुसूदन! द्रुपदपुत्र के हाथों मारे गए द्रोण के पास दुःख से संज्ञाशून्य बनी दीन कृपी बैठी है।
श्लोक 36 (11.23.36)
तां पश्य रुदतीमार्तां मुक्तकेशीमधोमुखीम् । हतं पतिमुपासन्तीं द्रोणं शस्त्रभृतां वरम् ॥
tāṃ paśya rudatīmārtāṃ muktakeśīmadhomukhīm | hataṃ patimupāsantīṃ droṇaṃ śastrabhṛtāṃ varam
उसे देखो, जो खुले केश और झुके मुख से आर्त होकर रो रही है और शस्त्रधारियों में श्रेष्ठ अपने मरे हुए पति द्रोण के पास बैठी है।
श्लोक 37 (11.23.37)
बाणैर्भिन्नतनुत्राणं धृष्टद्युम्नेन केशव । उपास्ते वै मृधे द्रोणं जटिला ब्रह्मचारिणी ॥
bāṇairbhinnatanutrāṇaṃ dhṛṣṭadyumnena keśava | upāste vai mṛdhe droṇaṃ jaṭilā brahmacāriṇī
हे केशव! धृष्टद्युम्न के बाणों से जिनका कवच छिन्न हो गया है, उन द्रोण के पास रणभूमि में जटाधारिणी ब्रह्मचारिणी कृपी बैठी है।
श्लोक 38 (11.23.38)
प्रेतकृत्ये च यतते कृपी कृपणमातुरा । हतस्य समरे भर्तुः सुकुमारी यशस्विनी ॥
pretakṛtye ca yatate kṛpī kṛpaṇamāturā | hatasya samare bhartuḥ sukumārī yaśasvinī
दीन और व्याकुल, सुकुमारी और यशस्विनी कृपी युद्ध में मारे गए अपने पति के अन्तिम संस्कार के लिए प्रयत्न कर रही है।
श्लोक 39 (11.23.39)
अग्नीनाधाय विविधवच्चितां प्रज्वाल्य सर्वतः । द्रोणमाधाय गायन्ति त्रीणि सामानि सामगाः ॥
agnīnādhāya vividhavaccitāṃ prajvālya sarvataḥ | droṇamādhāya gāyanti trīṇi sāmāni sāmagāḥ
अनेक विधियों से अग्नियाँ स्थापित करके और चारों ओर चिता जलाकर सामगान करनेवाले द्रोण को चिता पर रखकर तीन साम गा रहे हैं।
श्लोक 40 (11.23.40)
कुर्वन्ति च चितामेते जटिला ब्रह्मचारिणः । धनुर्भिः शक्तिभिश्चैव रथनीडैश्च माधव ॥
kurvanti ca citāmete jaṭilā brahmacāriṇaḥ | dhanurbhiḥ śaktibhiścaiva rathanīḍaiśca mādhava
हे माधव! ये जटाधारी ब्रह्मचारी धनुषों, शक्तियों और रथ के आसनों से चिता बना रहे हैं।
श्लोक 41 (11.23.41)
शरैश्च विविधैरन्यैर्धक्ष्यन्ते भूरितेजसम् । त एते द्रोणमादाय गायन्ति च रुदन्ति च ॥
śaraiśca vividhairanyairdhakṣyante bhūritejasam | ta ete droṇamādāya gāyanti ca rudanti ca
अनेक अन्य बाणों से वे महातेजस्वी द्रोण का दाह करेंगे; ये लोग द्रोण को लेकर गाते भी हैं और रोते भी हैं।
श्लोक 42 (11.23.42)
सामभिस्त्रिभिरन्तस्थैरनुशंसन्ति चापरे । अग्नावग्निं समाधाय द्रोणं हुत्वा हुताशने ॥
sāmabhistribhirantasthairanuśaṃsanti cāpare | agnāvagniṃ samādhāya droṇaṃ hutvā hutāśane
अग्नि को अग्नि में रखकर और द्रोण की आहुति देकर दूसरे लोग भीतर ही भीतर स्वर साधते हुए तीन सामों का गान करते हैं।
श्लोक 43 (11.23.43)
गच्छन्त्यभिमुखा गङ्गां द्रोणशिष्या द्विजातयः । अपसव्यां चितिं कृत्वा पुरस्कृत्य कृपीं तथा ॥
gacchantyabhimukhā gaṅgāṃ droṇaśiṣyā dvijātayaḥ | apasavyāṃ citiṃ kṛtvā puraskṛtya kṛpīṃ tathā
द्रोण के द्विज शिष्य चिता को बाएँ रखकर और कृपी को आगे करके गंगा की ओर जा रहे हैं।