स्त्री पर्व · अध्याय 24
भूरिश्रवा और शकुनि रणभूमि में
गान्धारी कृष्ण को मृतकों को दिखाना जारी रखती हैं। वे सोमदत्त के पुत्र भूरिश्रवा को दिखाती हैं, जिन्हें सात्यकि ने मारा था; उनके वृद्ध पिता शोक कर रहे हैं और उनकी पत्नियाँ रोती हुई बाँह कटने के लिए अर्जुन और सात्यकि की निन्दा कर रही हैं। फिर वे शकुनि को दिखाती हैं, जिन्हें कभी सोने की डंडीवाले पंखे झलते थे और अब पक्षी अपने पंखों से हवा कर रहे हैं, और कहती हैं कि उसकी भड़काई हुई शत्रुता ने ही उनके पुत्रों का नाश किया।
गान्धार्युवाच
श्लोक 1 (11.24.1)
सोमदत्तसुतं पश्य युयुधानेन पातितम् । वितुद्यमानं विहगैर्बहुभिर्माधवान्तिके ॥
somadattasutaṃ paśya yuyudhānena pātitam | vitudyamānaṃ vihagairbahubhirmādhavāntike
सोमदत्त के पुत्र को देखो, जिसे युयुधान ने मारा है और जिसे माधव, तुम्हारे समीप ही, बहुत-से पक्षी नोच रहे हैं।
श्लोक 2 (11.24.2)
पुत्रशोकाभिसन्तप्तः सोमदत्तो जनार्दन । युयुधानं महेष्वासं गर्हयन्निव दृश्यते ॥
putraśokābhisantaptaḥ somadatto janārdana | yuyudhānaṃ maheṣvāsaṃ garhayanniva dṛśyate
हे जनार्दन! पुत्रशोक से संतप्त सोमदत्त ऐसे दिखाई देते हैं, मानो महान् धनुर्धर युयुधान को धिक्कार रहे हों।
श्लोक 3 (11.24.3)
असौ हि भूरिश्रवसो माता शोकपरिप्लुता । आश्वासयति भर्तारं सोमदत्तमनिन्दिता ॥
asau hi bhūriśravaso mātā śokapariplutā | āśvāsayati bhartāraṃ somadattamaninditā
वह भूरिश्रवा की माता है, जो शोक में डूबी हुई है; वह निर्दोष स्त्री अपने पति सोमदत्त को ढाढ़स बँधा रही है।
श्लोक 4 (11.24.4)
दिष्ट्या नैनं महाराज दारुणं भरतक्षयम् । कुरुसङ्क्रन्दनं घोरं युगान्तमनुपश्यसि ॥
diṣṭyā nainaṃ mahārāja dāruṇaṃ bharatakṣayam | kurusaṅkrandanaṃ ghoraṃ yugāntamanupaśyasi
हे महाराज! सौभाग्य है कि आप भरतवंश का यह भयंकर विनाश, कुरुओं का यह घोर रुदन, यह युगान्त-जैसा संहार नहीं देख रहे हैं।
श्लोक 5 (11.24.5)
दिष्ट्या यूपध्वजं पुत्रं वीरं भूरिसहस्रदम् । अनेकक्रतुयज्वानं निहतं नानुपश्यसि ॥
diṣṭyā yūpadhvajaṃ putraṃ vīraṃ bhūrisahasradam | anekakratuyajvānaṃ nihataṃ nānupaśyasi
सौभाग्य है कि आप अपने वीर पुत्र यूपध्वज को, जिसने बहुत-से सहस्र दान किए और अनेक यज्ञ किए, मरा हुआ नहीं देख रहे।
श्लोक 6 (11.24.6)
दिष्ट्या स्नुषाणामाक्रन्दे घोरं विलपितं बहु । न शृणोषि महाराज सारसीनामिवार्णवे ॥
diṣṭyā snuṣāṇāmākrande ghoraṃ vilapitaṃ bahu | na śṛṇoṣi mahārāja sārasīnāmivārṇave
हे महाराज! सौभाग्य है कि आप अपनी बहुओं के आक्रन्दन में समुद्र पर सारसियों के कलरव जैसा वह घोर और लम्बा विलाप नहीं सुन रहे।
श्लोक 7 (11.24.7)
एकवस्त्रास्तु पञ्चैताः प्रकीर्णासितमूर्धजाः । स्नुषास्ते परिधावन्ति हतापत्या हतेश्वराः ॥
ekavastrāstu pañcaitāḥ prakīrṇāsitamūrdhajāḥ | snuṣāste paridhāvanti hatāpatyā hateśvarāḥ
आपकी ये पाँचों बहुएँ एक-एक वस्त्र पहने, काले केश बिखेरे, पुत्रों और पतियों से रहित होकर इधर-उधर दौड़ रही हैं।
श्लोक 8 (11.24.8)
श्वापदैर्भक्ष्यमाणं त्वमहो दिष्ट्या न पश्यसि । छिन्नबाहुं नरव्याघ्रमर्जुनेन निपातितम् ॥
śvāpadairbhakṣyamāṇaṃ tvamaho diṣṭyā na paśyasi | chinnabāhuṃ naravyāghramarjunena nipātitam
सौभाग्य है कि आप उस नरव्याघ्र को नहीं देख रहे, जिसे अर्जुन ने गिराया, जिसकी बाँह कट गई है और जिसे जंगली पशु खा रहे हैं।
श्लोक 9 (11.24.9)
शलं विनिहतं सङ्ख्ये भूरिश्रवसमेव च । स्नुषाश्च विविधाः सर्वा दिष्ट्या नाद्येह पश्यसि ॥
śalaṃ vinihataṃ saṅkhye bhūriśravasameva ca | snuṣāśca vividhāḥ sarvā diṣṭyā nādyeha paśyasi
सौभाग्य है कि आप युद्ध में मारे गए शल और भूरिश्रवा को तथा यहाँ अपनी सब बहुओं को उनकी अलग-अलग दशाओं में आज नहीं देख रहे।
श्लोक 10 (11.24.10)
दिष्ट्या तत्काञ्चनं छत्रं यूपकेतोर्महात्मनः । विनिकीर्णं रथोपस्थे सौमदत्तेर्न पश्यसि ॥
diṣṭyā tatkāñcanaṃ chatraṃ yūpaketormahātmanaḥ | vinikīrṇaṃ rathopasthe saumadatterna paśyasi
सौभाग्य है कि आप महात्मा यूपकेतु का वह सुनहरा छत्र नहीं देख रहे, जो सोमदत्त के पुत्र के रथ के पिछले भाग में बिखरा पड़ा है।
श्लोक 11 (11.24.11)
अमूस्तु भूरिश्रवसो भार्याः सात्यकिना हतम् । परिवार्यानुशोचन्ति भर्तारमसितेक्षणाः ॥
amūstu bhūriśravaso bhāryāḥ sātyakinā hatam | parivāryānuśocanti bhartāramasitekṣaṇāḥ
और ये भूरिश्रवा की काली आँखोंवाली पत्नियाँ सात्यकि के हाथों मारे गए अपने पति को घेरकर शोक कर रही हैं।
श्लोक 12 (11.24.12)
एता विलप्य करुणं भर्तृशोकेन कर्शिताः । पतन्त्यभिमुखा भूमौ कृपणं बत केशव ॥
etā vilapya karuṇaṃ bhartṛśokena karśitāḥ | patantyabhimukhā bhūmau kṛpaṇaṃ bata keśava
हे केशव! पति के शोक से दुर्बल हुई ये स्त्रियाँ करुण विलाप करके, हाय, दीन भाव से उनके सामने भूमि पर गिर पड़ती हैं।
श्लोक 13 (11.24.13)
बीभत्सुरतिबीभत्सं कर्मेदमकरोत्कथम् । प्रमत्तस्य यदच्छैत्सीद्बाहुं शूरस्य यज्वनः ॥
bībhatsuratibībhatsaṃ karmedamakarotkatham | pramattasya yadacchaitsīdbāhuṃ śūrasya yajvanaḥ
अर्जुन ने यह अत्यन्त घृणित कर्म कैसे किया कि असावधान, शूर और यज्ञ करनेवाले की बाँह काट डाली?
श्लोक 14 (11.24.14)
ततः पापतरं कर्म कृतवानपि सात्यकिः । यस्मात्प्रायोपविष्टस्य प्राहार्षीत्संशितात्मनः ॥
tataḥ pāpataraṃ karma kṛtavānapi sātyakiḥ | yasmātprāyopaviṣṭasya prāhārṣītsaṃśitātmanaḥ
उससे भी अधिक पापपूर्ण कर्म सात्यकि ने किया, जिसने प्रायोपवेशन में बैठे हुए दृढ़ व्रतवाले पुरुष पर प्रहार किया।
श्लोक 15 (11.24.15)
एको द्वाभ्यां हतः शेते क्षत्रधर्मेण धार्मिकः । किन्नु वक्ष्यति वै सत्सु गोष्ठीषु च सभासु च ॥
eko dvābhyāṃ hataḥ śete kṣatradharmeṇa dhārmikaḥ | kinnu vakṣyati vai satsu goṣṭhīṣu ca sabhāsu ca
क्षत्रिय-धर्म के अनुसार धार्मिक होने पर भी वह अकेला दो के हाथों मारा पड़ा है। अब वह सज्जनों के बीच, गोष्ठियों और सभाओं में क्या कहेगा?
श्लोक 16 (11.24.16)
अपुण्यमयशस्यं च कर्मेदं सात्यकिः स्वयम् । इति यूपध्वजस्यैताः स्त्रियः क्रोशन्ति माधव ॥
apuṇyamayaśasyaṃ ca karmedaṃ sātyakiḥ svayam | iti yūpadhvajasyaitāḥ striyaḥ krośanti mādhava
"यह अपुण्य और अपयश का कर्म सात्यकि ने स्वयं किया है", हे माधव, यूपध्वज की ये स्त्रियाँ इस प्रकार चिल्ला रही हैं।
श्लोक 17 (11.24.17)
भार्या यूपध्वजस्यैषा करसम्मितमध्यमा । कृत्वोत्सङ्गे भुजं भर्तुः कृपणं परिदेवति ॥
bhāryā yūpadhvajasyaiṣā karasammitamadhyamā | kṛtvotsaṅge bhujaṃ bhartuḥ kṛpaṇaṃ paridevati
यह यूपध्वज की पत्नी है, जिसकी कमर मुट्ठी में समा जाए इतनी पतली है; वह पति की भुजा को गोद में रखकर दीन भाव से विलाप कर रही है।
श्लोक 18 (11.24.18)
अयं स हन्ता शूराणां मित्राणामभयप्रदः । प्रदाता गोसहस्राणां क्षत्रियान्तकरः करः ॥
ayaṃ sa hantā śūrāṇāṃ mitrāṇāmabhayapradaḥ | pradātā gosahasrāṇāṃ kṣatriyāntakaraḥ karaḥ
यही वह हाथ है जो वीरों का संहार करता था, मित्रों को अभय देता था, हज़ारों गायों का दान करता था और क्षत्रियों का अन्त करता था।
श्लोक 19 (11.24.19)
अयं स रशनोत्कर्षी पीनस्तनविमर्दनः । नाभ्यूरुजघनस्पर्शी नीवीविस्रंसनः करः ॥
ayaṃ sa raśanotkarṣī pīnastanavimardanaḥ | nābhyūrujaghanasparśī nīvīvisraṃsanaḥ karaḥ
यही वह हाथ है जो करधनी खींचता था, भरे स्तनों को दबाता था, नाभि, जंघा और कटि का स्पर्श करता था और नीवी की गाँठ खोलता था।
श्लोक 20 (11.24.20)
वासुदेवस्य सान्निध्ये पार्थेनाक्लिष्टकर्मणा । युध्यतः समरेऽन्येन प्रमत्तस्य निपातितः ॥
vāsudevasya sānnidhye pārthenākliṣṭakarmaṇā | yudhyataḥ samare'nyena pramattasya nipātitaḥ
वासुदेव के सामने, अनायास कर्म करनेवाले अर्जुन ने इसे तब काटा, जब यह किसी दूसरे से लड़ रहा था और असावधान था।
श्लोक 21 (11.24.21)
किन्नु वक्ष्यसि संसत्सु कथासु च जनार्दन । अर्जुनस्य महत्कर्म स्वयं वा स किरीटभृत् ॥
kinnu vakṣyasi saṃsatsu kathāsu ca janārdana | arjunasya mahatkarma svayaṃ vā sa kirīṭabhṛt
हे जनार्दन! सभाओं और कथाओं में तुम अर्जुन के इस महान् कर्म के विषय में क्या कहोगे, अथवा वह मुकुटधारी स्वयं क्या कहेगा?
श्लोक 22 (11.24.22)
इत्येवं गर्हयित्वैषा तूष्णीमास्ते वराङ्गना । तामेतामनुशोचन्ति सपत्न्यः स्वामिव स्नुषाम् ॥
ityevaṃ garhayitvaiṣā tūṣṇīmāste varāṅganā | tāmetāmanuśocanti sapatnyaḥ svāmiva snuṣām
इस प्रकार निन्दा करके वह सुन्दरी चुप हो गई है; उसकी सह-पत्नियाँ उसे अपनी बहू की तरह मानकर उसके लिए शोक कर रही हैं।
श्लोक 23 (11.24.23)
गान्धारराजः शकुनिर्बलवान्सत्यविक्रमः । निहतः सहदेवेन भागिनेयेन मातुलः ॥
gāndhārarājaḥ śakunirbalavānsatyavikramaḥ | nihataḥ sahadevena bhāgineyena mātulaḥ
गान्धार देश के राजा बलवान् और सच्चे पराक्रमी शकुनि को उनके भानजे सहदेव ने मार डाला; वे उसके मामा थे।
श्लोक 24 (11.24.24)
यः पुरा हेमदण्डाभ्यां व्यजनाभ्यां स्म वीज्यते । स एष पक्षिभिः पक्षैः शयान उपवीज्यते ॥
yaḥ purā hemadaṇḍābhyāṃ vyajanābhyāṃ sma vījyate | sa eṣa pakṣibhiḥ pakṣaiḥ śayāna upavījyate
जिसे पहले सोने की डंडीवाले दो पंखे झले जाते थे, वही आज लेटा हुआ पक्षियों के पंखों से हवा किया जा रहा है।
श्लोक 25 (11.24.25)
यः स्वरूपाणि कुरुते शतशोऽथ सहस्रशः । तस्य मायाविनो माया दग्धाः पाण्डवतेजसा ॥
yaḥ svarūpāṇi kurute śataśo'tha sahasraśaḥ | tasya māyāvino māyā dagdhāḥ pāṇḍavatejasā
जो सैकड़ों-हज़ारों रूप धारण करता था, उस मायावी की मायाएँ पाण्डवों के तेज से जल गईं।
श्लोक 26 (11.24.26)
मायया निकृतिप्रज्ञो जितवान्यो युधिष्ठिरम् । सभायां विपुलं राज्यं स जहौ जीवितं कथम् ॥
māyayā nikṛtiprajño jitavānyo yudhiṣṭhiram | sabhāyāṃ vipulaṃ rājyaṃ sa jahau jīvitaṃ katham
जिसने छल की चतुराई से सभा में युधिष्ठिर को जीतकर विशाल राज्य ले लिया था, उसने अपना प्राण कैसे छोड़ दिया?
श्लोक 27 (11.24.27)
शकुन्ताः शकुनिं कृष्ण समन्तात्पर्युपासते । कितवं मम पुत्राणां विनाशायोपशिक्षितम् ॥
śakuntāḥ śakuniṃ kṛṣṇa samantātparyupāsate | kitavaṃ mama putrāṇāṃ vināśāyopaśikṣitam
हे कृष्ण! मेरे पुत्रों का विनाश करने के लिए सीखे हुए उस जुआरी शकुनि को पक्षी चारों ओर से घेरे हुए हैं।
श्लोक 28 (11.24.28)
एतेनैतन्महद्वैरं प्रसक्तं पाण्डवैः सह । वधाय मम पुत्राणामात्मनः सगणस्य च ॥
etenaitanmahadvairaṃ prasaktaṃ pāṇḍavaiḥ saha | vadhāya mama putrāṇāmātmanaḥ sagaṇasya ca
इसी के कारण पाण्डवों के साथ यह भारी वैर लग गया, जो मेरे पुत्रों के और इसके अपने सहित सारे दल के विनाश का कारण बना।
श्लोक 29 (11.24.29)
यथैव मम पुत्राणां लोकाः शस्त्रजिताः प्रभो । एवमस्यापि दुर्बुद्धेर्लोकाः शस्त्रेण वै जिताः ॥
yathaiva mama putrāṇāṃ lokāḥ śastrajitāḥ prabho | evamasyāpi durbuddherlokāḥ śastreṇa vai jitāḥ
हे प्रभो! जैसे मेरे पुत्रों के लोक शस्त्रों से जीते गए, वैसे ही इस दुर्बुद्धि के लोक भी शस्त्र से जीते गए।
श्लोक 30 (11.24.30)
कथं च नायं तत्रापि पुत्रान्मे भ्रातृभिः सह । विरोधयेदृजुप्रज्ञाननृजुर्मधुसूदन ॥
kathaṃ ca nāyaṃ tatrāpi putrānme bhrātṛbhiḥ saha | virodhayedṛjuprajñānanṛjurmadhusūdana
और हे मधुसूदन! यह कुटिल पुरुष वहाँ भी मेरे सरल बुद्धिवाले पुत्रों को उनके भाइयों से क्यों न लड़ाएगा?