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स्त्री पर्व · अध्याय 25

गान्धारी का कृष्ण को शाप

गान्धारी और मृतकों को दिखाती हैं: काम्बोज राजा सुदक्षिण, मगध के जयत्सेन, कोसल के बृहद्बल, धृष्टद्युम्न के पुत्र, पाँचों केकय भाई, द्रुपद, चेदिराज धृष्टकेतु, लक्ष्मण तथा विन्द और अनुविन्द। वे कहती हैं कि केवल पाण्डव ही बचे हैं और उनके पुत्र उसी समय मर चुके थे जब कृष्ण असफल दौत्य के बाद उपप्लव्य लौट गए थे। भूमि पर गिरकर फिर क्रोध से उठकर वे कृष्ण पर कुरुओं के विनाश की उपेक्षा का दोष लगाती हैं और शाप देती हैं कि छत्तीसवें वर्ष में वे अपने ही बन्धुओं का वध करेंगे और अकेले, घृणित ढंग से मरेंगे। कृष्ण हल्की मुस्कान के साथ उत्तर देते हैं कि वृष्णि दैव से और आपस में लड़कर नष्ट होंगे, और पाण्डव भय से भर जाते हैं।

अध्याय 24अध्याय-सूचीअध्याय 26

गान्धार्युवाच

श्लोक 1 (11.25.1)

काम्भोजं पश्य दुर्धर्षं काम्भोजास्तरणोचितम् । शयानमृषभस्कन्धं हतं पांसुषु माधव ॥

kāmbhojaṃ paśya durdharṣaṃ kāmbhojāstaraṇocitam | śayānamṛṣabhaskandhaṃ hataṃ pāṃsuṣu mādhava

हे माधव! उस दुर्धर्ष काम्बोज को देखो, जो काम्बोज कम्बल पर सोने योग्य था और अब बैल जैसे कन्धोंवाला होकर धूल में मरा पड़ा है।

श्लोक 2 (11.25.2)

अस्य क्षतजसन्दिग्धौ बाहू चन्दनरूषितौ । अवेक्ष्य कृपणं भार्या विलपत्यतिदुःखिता ॥

asya kṣatajasandigdhau bāhū candanarūṣitau | avekṣya kṛpaṇaṃ bhāryā vilapatyatiduḥkhitā

रक्त से सनी और चन्दन से लिपी हुई उसकी भुजाओं को देखकर उसकी पत्नी अत्यन्त दुःखी होकर दीन भाव से विलाप कर रही है।

श्लोक 3 (11.25.3)

इमौ तौ परिघप्रख्यौ बाहू चन्दनरूषितौ । ययोर्विवरमापन्नां न रतिर्मां पुराऽजहात् ॥

imau tau parighaprakhyau bāhū candanarūṣitau | yayorvivaramāpannāṃ na ratirmāṃ purā'jahāt

ये वही दो भुजाएँ हैं, जो लोहे की गदा-सी थीं और चन्दन से लिपी हैं; इनके बीच आ जाने पर पहले प्रेम ने कभी मेरा साथ नहीं छोड़ा।

श्लोक 4 (11.25.4)

कां गतिं तु गमिष्यामि त्वया हीना जनेश्वर । दूरबन्धुरनाथा च वेपन्ती मधुरस्वरा ॥

kāṃ gatiṃ tu gamiṣyāmi tvayā hīnā janeśvara | dūrabandhuranāthā ca vepantī madhurasvarā

हे नरेश्वर! तुम्हारे बिना मैं किस गति को जाऊँगी? अपने बन्धुओं से दूर, अनाथ, काँपती हुई और मधुर स्वरवाली मैं कहाँ जाऊँ?

श्लोक 5 (11.25.5)

आतपे क्लाम्यमानानां विविधानामिव स्रुजाम् । क्लान्तानामपि नारीणां जहाति श्रीर्न वै तनूः ॥

ātape klāmyamānānāṃ vividhānāmiva srujām | klāntānāmapi nārīṇāṃ jahāti śrīrna vai tanūḥ

धूप में मुरझाती हुई तरह-तरह की मालाओं की तरह थकी हुई भी इन स्त्रियों के शरीर को शोभा नहीं छोड़ती।

श्लोक 6 (11.25.6)

शयानमभितः शूरं कालिङ्गं मधुसूदन । पश्य दीप्ताङ्गदयुतं प्रतिमानं धनुष्मताम् ॥

śayānamabhitaḥ śūraṃ kāliṅgaṃ madhusūdana | paśya dīptāṅgadayutaṃ pratimānaṃ dhanuṣmatām

हे मधुसूदन! चमकते बाजूबन्द पहने, धनुर्धारियों के आदर्श उस कलिंग वीर को लेटा हुआ देखो।

श्लोक 7 (11.25.7)

मागधानामधिपतिं जयत्सेनं जनार्दन । परिवार्य प्ररुदिता मागध्यः पश्य योषितः ॥

māgadhānāmadhipatiṃ jayatsenaṃ janārdana | parivārya praruditā māgadhyaḥ paśya yoṣitaḥ

हे जनार्दन! मगधराज जयत्सेन को घेरकर रोती हुई मागध स्त्रियों को देखो।

श्लोक 8 (11.25.8)

हरिणायतनेत्राणां सुस्वराणां जनार्दन । मनः श्रुतिहरो नादो मनो मोहयतीव मे ॥

hariṇāyatanetrāṇāṃ susvarāṇāṃ janārdana | manaḥ śrutiharo nādo mano mohayatīva me

हे जनार्दन! हिरनी जैसे बड़े नेत्रोंवाली इन मधुर स्वरवाली स्त्रियों का मन और कानों को हर लेनेवाला यह नाद मुझे मोहित-सा कर रहा है।

श्लोक 9 (11.25.9)

प्रकीर्णवस्त्राभरणा रुदत्यः शोककर्शिताः । स्वास्तीर्णशयनोपेता मागध्यः शेरते भुवि ॥

prakīrṇavastrābharaṇā rudatyaḥ śokakarśitāḥ | svāstīrṇaśayanopetā māgadhyaḥ śerate bhuvi

वस्त्र और आभूषण बिखेरे, रोती हुई और शोक से दुर्बल ये मागध स्त्रियाँ, जिनके पास अच्छी बिछी शय्याएँ थीं, भूमि पर पड़ी हैं।

श्लोक 10 (11.25.10)

कोसलानामधिपतिं राजपुत्रं बृहद्बलम् । भर्तारं परिवार्यैताः पृथक्प्ररुदिताः स्त्रियः ॥

kosalānāmadhipatiṃ rājaputraṃ bṛhadbalam | bhartāraṃ parivāryaitāḥ pṛthakpraruditāḥ striyaḥ

कोसल के राजा, राजपुत्र बृहद्बल को ये स्त्रियाँ अपने पति के रूप में अलग-अलग घेरकर रो रही हैं।

श्लोक 11 (11.25.11)

अस्य गात्रगतान्बाणान्कार्ष्णिबाहुबलेरितान् । उद्धरन्त्यसुखाविष्टा मूर्च्छमानाः पुनः पुनः ॥

asya gātragatānbāṇānkārṣṇibāhubaleritān | uddharantyasukhāviṣṭā mūrcchamānāḥ punaḥ punaḥ

दुःख में डूबी हुई वे बार-बार मूर्छित होती हुई, अभिमन्यु के बाहुबल से चलाए गए उसके शरीर में धँसे बाणों को निकाल रही हैं।

श्लोक 12 (11.25.12)

आसां सर्वानवद्यानामातपेन परिश्रमात् । प्रम्लाननलिनाभानि भान्ति वक्त्राणि माधव ॥

āsāṃ sarvānavadyānāmātapena pariśramāt | pramlānanalinābhāni bhānti vaktrāṇi mādhava

हे माधव! धूप और थकान से मुरझाई हुई इन सब निर्दोष स्त्रियों के मुख कुम्हलाए कमलों जैसे दिख रहे हैं।

श्लोक 13 (11.25.13)

द्रोणेन निहताः शूराः शेरते रुचिराङ्गदाः । धृष्टद्युम्नसुताः सर्वे शिशवो हेममालिनः ॥

droṇena nihatāḥ śūrāḥ śerate rucirāṅgadāḥ | dhṛṣṭadyumnasutāḥ sarve śiśavo hemamālinaḥ

सुन्दर बाजूबन्दवाले शूर द्रोण के हाथों मारे गए पड़े हैं; ये सब धृष्टद्युम्न के पुत्र हैं, सोने की मालाएँ पहने हुए बालक।

श्लोक 14 (11.25.14)

रथाग्न्यगारं चापार्चिं शरशक्तिगदेन्धनम् । द्रोणमासाद्य निर्दग्धाः शलभा इव पावकम् ॥

rathāgnyagāraṃ cāpārciṃ śaraśaktigadendhanam | droṇamāsādya nirdagdhāḥ śalabhā iva pāvakam

रथ ही जिसका अग्निगृह था, धनुष ज्वाला थी और बाण, शक्ति तथा गदाएँ ईंधन थीं, उन द्रोण के पास पहुँचकर वे पतंगों की तरह आग में जल गए।

श्लोक 15 (11.25.15)

तथैव निहताः शूराः शेरते रुचिराङ्गदाः । द्रोणेनाभिमुखाः सङ्ख्ये भ्रातरः पञ्च केकयाः ॥

tathaiva nihatāḥ śūrāḥ śerate rucirāṅgadāḥ | droṇenābhimukhāḥ saṅkhye bhrātaraḥ pañca kekayāḥ

उसी प्रकार सुन्दर बाजूबन्दवाले शूर द्रोण के सामने युद्ध में डटे हुए मारे गए पड़े हैं: ये पाँच केकय भाई।

श्लोक 16 (11.25.16)

तप्तकाञ्चनवर्माणस्तालध्वजस्थव्रजाः । भासयन्ति महीं भासा ज्वलिता इव पावकाः ॥

taptakāñcanavarmāṇastāladhvajasthavrajāḥ | bhāsayanti mahīṃ bhāsā jvalitā iva pāvakāḥ

तपाए हुए सोने के कवच पहने, ताल के चिह्नवाली ध्वजाओंवाले रथों पर खड़े अपने समूहों के साथ वे जलती हुई अग्नियों की तरह अपनी आभा से पृथ्वी को प्रकाशित कर रहे हैं।

श्लोक 17 (11.25.17)

द्रोणेन द्रुपदं सङ्ख्ये पश्य माधव पातितम् । महाद्विपमिवारण्ये सिंहेन महता हतम् ॥

droṇena drupadaṃ saṅkhye paśya mādhava pātitam | mahādvipamivāraṇye siṃhena mahatā hatam

हे माधव! द्रोण के हाथों युद्ध में गिराए गए द्रुपद को देखो, जो वन में बलवान् सिंह के हाथों मारे गए विशाल हाथी-सा पड़ा है।

श्लोक 18 (11.25.18)

पाञ्चालराज्ञो विमलं पुण्डरीकाक्ष पाण्डुरम् । आतपत्रं समाभाति शरदीव निशाकरः ॥

pāñcālarājño vimalaṃ puṇḍarīkākṣa pāṇḍuram | ātapatraṃ samābhāti śaradīva niśākaraḥ

हे पुण्डरीकाक्ष! पाञ्चालराज का निर्मल श्वेत छत्र शरद् ऋतु के चन्द्रमा की तरह शोभित हो रहा है।

श्लोक 19 (11.25.19)

एतास्तु द्रुपदं वृद्धं स्नुषा भार्याश्च दुःखिताः । दग्ध्वा गच्छन्ति पाञ्चालराजानमपसव्यतः ॥

etāstu drupadaṃ vṛddhaṃ snuṣā bhāryāśca duḥkhitāḥ | dagdhvā gacchanti pāñcālarājānamapasavyataḥ

वृद्ध द्रुपद का दाह करके उनकी ये बहुएँ और पत्नियाँ दुःखी होकर पाञ्चालराज को अपनी बाईं ओर रखते हुए जा रही हैं।

श्लोक 20 (11.25.20)

धृष्टकेतुं महात्मानं चेदिपुङ्गवमङ्गनाः । द्रोणेन निहतं शूरं हरन्ति हृतचेतसः ॥

dhṛṣṭaketuṃ mahātmānaṃ cedipuṅgavamaṅganāḥ | droṇena nihataṃ śūraṃ haranti hṛtacetasaḥ

शोक से चेतना खो बैठी स्त्रियाँ द्रोण के हाथों मारे गए महात्मा, चेदिश्रेष्ठ, शूर धृष्टकेतु को ले जा रही हैं।

श्लोक 21 (11.25.21)

द्रोणास्त्रमभिहत्यैष विमर्दे मधुसूदन । महेष्वासो हतः शेते वज्राहत इव द्रुमः ॥

droṇāstramabhihatyaiṣa vimarde madhusūdana | maheṣvāso hataḥ śete vajrāhata iva drumaḥ

हे मधुसूदन! संग्राम में द्रोण के अस्त्र से भिड़कर यह महाधनुर्धर वज्र से मारे वृक्ष की तरह मरा पड़ा है।

श्लोक 22 (11.25.22)

एष चेदिपतिः शूरो धृष्टकेतुर्महारथः । शेते विनिहतः सङ्ख्ये हत्वा शत्रून्सहस्रशः ॥

eṣa cedipatiḥ śūro dhṛṣṭaketurmahārathaḥ | śete vinihataḥ saṅkhye hatvā śatrūnsahasraśaḥ

यह चेदिराज, शूर, महारथी धृष्टकेतु है, जो हज़ारों शत्रुओं को मारकर युद्ध में स्वयं मारा गया और पड़ा है।

श्लोक 23 (11.25.23)

वितुद्यमानं विहगैस्तं भार्याः पर्युपाश्रिताः । चेदिराजं हृषीकेश हतं सबलबान्धवम् ॥

vitudyamānaṃ vihagaistaṃ bhāryāḥ paryupāśritāḥ | cedirājaṃ hṛṣīkeśa hataṃ sabalabāndhavam

हे हृषीकेश! उस चेदिराज को, जो सेना और बन्धुओं सहित मारा गया है, पक्षी नोच रहे हैं और उसकी पत्नियाँ उसके पास बैठी हैं।

श्लोक 24 (11.25.24)

दाशार्हपुत्रजं वीरं शयानं सत्यविक्रमम् । आरोप्याङ्के रुदन्त्येताश्चेदिराजवराङ्गनाः ॥

dāśārhaputrajaṃ vīraṃ śayānaṃ satyavikramam | āropyāṅke rudantyetāścedirājavarāṅganāḥ

दाशार्ह वंश की पुत्री के पुत्र से उत्पन्न इस सत्यपराक्रमी वीर को लेटा देखकर चेदिराज की सुन्दर स्त्रियाँ उसे गोद में लेकर रो रही हैं।

श्लोक 25 (11.25.25)

अस्य पुत्रं हृषीकेश सुवक्त्रं चारुकुण्डलम् । द्रोणेन समरे पश्य निकृत्तं बहुधा शरैः ॥

asya putraṃ hṛṣīkeśa suvaktraṃ cārukuṇḍalam | droṇena samare paśya nikṛttaṃ bahudhā śaraiḥ

हे हृषीकेश! उसके पुत्र को देखो, जिसका मुख सुन्दर है और कुण्डल मनोहर हैं और जिसे द्रोण ने युद्ध में बाणों से बहुत टुकड़ों में काट दिया है।

श्लोक 26 (11.25.26)

पितरं नूनमाजिस्थं युध्यमानं परैः सह । नाजहात्पितरं वीरमद्यापि मधुसूदन ॥

pitaraṃ nūnamājisthaṃ yudhyamānaṃ paraiḥ saha | nājahātpitaraṃ vīramadyāpi madhusūdana

हे मधुसूदन! निश्चय ही जब पिता युद्ध में शत्रुओं से लड़ रहे थे, उसने वीर पिता का साथ नहीं छोड़ा, और आज भी नहीं छोड़ा है।

श्लोक 27 (11.25.27)

एवं ममापि पुत्रस्य पुत्रः पितरमन्वगात् । दुर्योधनं महाबाहो लक्ष्मणः परवीरहा ॥

evaṃ mamāpi putrasya putraḥ pitaramanvagāt | duryodhanaṃ mahābāho lakṣmaṇaḥ paravīrahā

हे महाबाहो! इसी प्रकार मेरे पुत्र का पुत्र भी अपने पिता के पीछे गया: शत्रुवीरों का संहार करनेवाला लक्ष्मण दुर्योधन के पीछे चला गया।

श्लोक 28 (11.25.28)

विन्दानुविन्दावावन्त्यौ पतितौ पश्य माधव । हिमान्ते पुष्पितौ शालौ मरुता गलिताविव ॥

vindānuvindāvāvantyau patitau paśya mādhava | himānte puṣpitau śālau marutā galitāviva

हे माधव! अवन्ति के विन्द और अनुविन्द को गिरा हुआ देखो, जो शीत के अन्त में फूले हुए दो शाल वृक्षों की तरह हवा से गिरा दिए गए हैं।

श्लोक 29 (11.25.29)

काञ्चनाङ्गदवर्माणौ बाणखड्गधनुर्धरौ । ऋषभप्रतिरूपाक्षौ शयानौ विमलस्रजौ ॥

kāñcanāṅgadavarmāṇau bāṇakhaḍgadhanurdharau | ṛṣabhapratirūpākṣau śayānau vimalasrajau

सोने के बाजूबन्द और कवच पहने, बाण, खड्ग और धनुष धारण किए, बैल जैसी आँखोंवाले वे दोनों निर्मल मालाएँ पहने लेटे हैं।

श्लोक 30 (11.25.30)

अवध्याः पाण्डवाः कृष्ण सर्व एव त्वया सह । ये मुक्ता द्रोणभीष्माभ्यां कर्णाद्वैकर्तनात्कृपात् ॥

avadhyāḥ pāṇḍavāḥ kṛṣṇa sarva eva tvayā saha | ye muktā droṇabhīṣmābhyāṃ karṇādvaikartanātkṛpāt

हे कृष्ण! केवल पाण्डव ही तुम्हारे साथ अवध्य रहे, जिन्हें द्रोण और भीष्म ने, वैकर्तन कर्ण ने और कृपाचार्य ने छोड़ दिया था।

श्लोक 31 (11.25.31)

दुर्योधनाद्द्रोणसुतात्सैन्धवाच्च जयद्रथात् । सोमदत्ताद्विकर्णाच्च शूराच्च कृतवर्मणः ॥

duryodhanāddroṇasutātsaindhavācca jayadrathāt | somadattādvikarṇācca śūrācca kṛtavarmaṇaḥ

दुर्योधन, द्रोणपुत्र, सिन्धुराज जयद्रथ, सोमदत्त, विकर्ण और शूर कृतवर्मा ने भी जिन्हें छोड़ दिया था,

श्लोक 32 (11.25.32)

ये हन्युः शस्त्रवेगेन देवानपि नरर्षभाः । त इमे निहताः सङ्ख्ये पश्य कालस्य पर्ययम् ॥

ye hanyuḥ śastravegena devānapi nararṣabhāḥ | ta ime nihatāḥ saṅkhye paśya kālasya paryayam

जो नरश्रेष्ठ अपने शस्त्रों के वेग से देवताओं को भी मार सकते थे, वे ही रणभूमि में मारे गए; काल का यह फेर देखो।

श्लोक 33 (11.25.33)

नातिभारोऽस्ति दैवस्य ध्रुवं माधव कश्चन । यदिमे निहताः शूराः क्षत्रियैः क्षत्रियर्षभाः । शूराश्च कृतविद्याश्च मम पुत्रा मनस्विनः ॥

nātibhāro'sti daivasya dhruvaṃ mādhava kaścana | yadime nihatāḥ śūrāḥ kṣatriyaiḥ kṣatriyarṣabhāḥ | śūrāśca kṛtavidyāśca mama putrā manasvinaḥ

हे माधव! दैव के लिए निश्चय ही कोई बोझ भारी नहीं है, यदि ये क्षत्रियश्रेष्ठ वीर क्षत्रियों के हाथों मारे गए: वे शूर, विद्वान् और उदार मन के मेरे पुत्र।

श्लोक 34 (11.25.34)

तदैव निहताः कृष्ण मम पुत्रास्तरस्विनः । यदैवाकृतकामस्त्वमुपप्लाव्यं गतः पुनः ॥

tadaiva nihatāḥ kṛṣṇa mama putrāstarasvinaḥ | yadaivākṛtakāmastvamupaplāvyaṃ gataḥ punaḥ

हे कृष्ण! मेरे पराक्रमी पुत्र उसी समय मर चुके थे, जब तुम अपना काम पूरा किए बिना फिर उपप्लव्य चले गए थे।

श्लोक 35 (11.25.35)

शन्तनोश्चैव पुत्रेण प्राज्ञेन विदुरेण च । तदैवोक्तास्मि मा स्नेहं कुरुष्वात्मसुतेष्विति ॥

śantanoścaiva putreṇa prājñena vidureṇa ca | tadaivoktāsmi mā snehaṃ kuruṣvātmasuteṣviti

शान्तनुपुत्र भीष्म और बुद्धिमान् विदुर ने उसी समय मुझसे कहा था: "अपने पुत्रों पर इतना स्नेह मत करो।"

श्लोक 36 (11.25.36)

तयोर्हि दर्शनं नैतन्मिथ्या भवितुमर्हति । अचिरेणैव मे पुत्रा भस्मीभूता जनार्दन ॥

tayorhi darśanaṃ naitanmithyā bhavitumarhati | acireṇaiva me putrā bhasmībhūtā janārdana

उन दोनों का वह दर्शन मिथ्या नहीं हो सकता; हे जनार्दन! थोड़े ही समय में मेरे पुत्र भस्म हो गए।

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 37 (11.25.37)

इत्युक्त्वा न्यपतद्भूमौ गान्धारी शोकमूर्च्छिता । दुःखोपहतविज्ञाना धैर्यमुत्सृज्य भारत ॥

ityuktvā nyapatadbhūmau gāndhārī śokamūrcchitā | duḥkhopahatavijñānā dhairyamutsṛjya bhārata

हे भारत! यह कहकर शोक से मूर्छित गान्धारी धैर्य छोड़कर, दुःख से ज्ञान खोई हुई, भूमि पर गिर पड़ीं।

श्लोक 38 (11.25.38)

ततः कोपपरीताङ्गी पुत्रशोकपरिप्लुता । जगाद शौरिं दोषेण गान्धारी व्यथितेन्द्रिया ॥

tataḥ kopaparītāṅgī putraśokapariplutā | jagāda śauriṃ doṣeṇa gāndhārī vyathitendriyā

तब क्रोध से भरी हुई, पुत्रशोक में डूबी और व्यथित इन्द्रियोंवाली गान्धारी ने रोष में शौरि से कहा।

गान्धार्युवाच

श्लोक 39 (11.25.39)

पाण्डवा धार्तराष्ट्राश्च क्रुद्धाः कृष्ण परस्परम् । उपेक्षिता विनश्यन्तस्त्वया कस्माज्जनार्दन ॥

pāṇḍavā dhārtarāṣṭrāśca kruddhāḥ kṛṣṇa parasparam | upekṣitā vinaśyantastvayā kasmājjanārdana

हे कृष्ण! पाण्डव और धृतराष्ट्र के पुत्र परस्पर क्रुद्ध होकर नष्ट होते रहे और हे जनार्दन! तुमने उनकी उपेक्षा क्यों की?

श्लोक 40 (11.25.40)

शक्तेन बहुभृत्येन विपुले तिष्ठता बले । उभयत्र समर्थेन श्रुतवाक्येन चैव ह ॥

śaktena bahubhṛtyena vipule tiṣṭhatā bale | ubhayatra samarthena śrutavākyena caiva ha

तुम समर्थ थे, तुम्हारे पास बहुत-से सेवक थे, विशाल सेना तुम्हारे अधिकार में थी, तुम दोनों पक्षों के लिए कुछ कर सकते थे और तुम्हारी बात सुनी जाती थी।

श्लोक 41 (11.25.41)

इच्छतोपेक्षितो नाशः कुरूणां मधुसूदन । यस्मात्त्वया महाबाहो फलं तस्मादवाप्नुहि ॥

icchatopekṣito nāśaḥ kurūṇāṃ madhusūdana | yasmāttvayā mahābāho phalaṃ tasmādavāpnuhi

हे मधुसूदन! तुमने चाहकर कुरुओं के विनाश की उपेक्षा की; इसलिए हे महाबाहो! अब उसका फल भोगो।

श्लोक 42 (11.25.42)

पतिशुश्रूषया यन्मे तपः किञ्चिदुपार्जितम् । तेन त्वां दुरवापेन शपे चक्रगदाधरम् ॥

patiśuśrūṣayā yanme tapaḥ kiñcidupārjitam | tena tvāṃ duravāpena śape cakragadādharam

पति की सेवा से जो थोड़ा-सा तप मैंने अर्जित किया है, उस दुर्लभ तप के द्वारा, हे चक्र-गदाधारी! मैं तुम्हें शाप देती हूँ।

श्लोक 43 (11.25.43)

यस्मात्परस्परं घ्नन्तो ज्ञातयः कुरुपाण्डवाः । उपेक्षितास्ते गोविन्द तस्माज्ज्ञातीन्वधिष्यसि ॥

yasmātparasparaṃ ghnanto jñātayaḥ kurupāṇḍavāḥ | upekṣitāste govinda tasmājjñātīnvadhiṣyasi

हे गोविन्द! तुमने कुरु और पाण्डव बन्धुओं की उपेक्षा की, जो एक-दूसरे को मारते रहे; इसलिए तुम अपने बन्धुओं को मारोगे।

श्लोक 44 (11.25.44)

त्वमप्युपस्थिते वर्षे षट्त्रिंशे मधुसूदन । हतज्ञातिर्हतामात्यो हतपुत्रो वनेचरः ॥

tvamapyupasthite varṣe ṣaṭtriṃśe madhusūdana | hatajñātirhatāmātyo hataputro vanecaraḥ

और हे मधुसूदन! छत्तीसवाँ वर्ष आने पर तुम भी, अपने बन्धुओं, मन्त्रियों और पुत्र के मारे जाने पर, वन में भटकते हुए,

श्लोक 45 (11.25.45)

अनाथवदविज्ञातो लोकेष्वनभिलक्षितः । कुत्सितेनाभ्युपायेन निधनं समवाप्स्यसि ॥

anāthavadavijñāto lokeṣvanabhilakṣitaḥ | kutsitenābhyupāyena nidhanaṃ samavāpsyasi

अनाथ की तरह अपरिचित और लोकों में किसी की दृष्टि में न आते हुए, एक निन्दित उपाय से मृत्यु को प्राप्त होगे।

श्लोक 46 (11.25.46)

तवाप्येवं हतसुता निहतज्ञातिबान्धवाः । स्त्रियः परिपतिष्यन्ति यथैता भरतस्त्रियः ॥

tavāpyevaṃ hatasutā nihatajñātibāndhavāḥ | striyaḥ paripatiṣyanti yathaitā bharatastriyaḥ

तुम्हारी स्त्रियाँ भी, अपने पुत्रों, बन्धुओं और सम्बन्धियों के मारे जाने पर, ठीक वैसे ही भूमि पर गिरेंगी जैसे ये भरतवंश की स्त्रियाँ गिरी हैं।

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 47 (11.25.47)

तच्छ्रुत्वा वचनं घोरं वासुदेवो महामनाः । उवाच देवीं गान्धारीमीषदभ्युत्स्मयन्निव ॥

tacchrutvā vacanaṃ ghoraṃ vāsudevo mahāmanāḥ | uvāca devīṃ gāndhārīmīṣadabhyutsmayanniva

उन भयंकर वचनों को सुनकर महामना वासुदेव ने मानो थोड़ा मुस्कराते हुए देवी गान्धारी से कहा।

वासुदेव उवाच

श्लोक 48 (11.25.48)

जानेऽहमेतदप्येवं चीर्णं चरसि क्षत्रिये । दैवादेव विनश्यन्ति वृष्णयो नात्र संशयः ॥

jāne'hametadapyevaṃ cīrṇaṃ carasi kṣatriye | daivādeva vinaśyanti vṛṣṇayo nātra saṃśayaḥ

हे क्षत्राणी! मैं यह भी जानता हूँ कि ऐसा ही होगा; तुम वही कर रही हो जो हो चुका है। वृष्णि दैव से ही नष्ट होंगे, इसमें संदेह नहीं।

श्लोक 49 (11.25.49)

संहर्ता वृष्णिचक्रस्य नान्यो मद्विद्यते शुभे । अवध्यास्ते नरैरन्यैरपि वा देवदानवैः ॥

saṃhartā vṛṣṇicakrasya nānyo madvidyate śubhe | avadhyāste narairanyairapi vā devadānavaiḥ

हे शुभे! वृष्णि-मण्डल का संहार करनेवाला मेरे सिवा दूसरा कोई नहीं है। वे दूसरे मनुष्यों से, अथवा देवताओं और दानवों से भी नहीं मारे जा सकते।

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 50 (11.25.50)

परस्परकृतं नाशं यतः प्राप्स्यन्ति यादवाः । इत्युक्तवति दाशार्हे पाण्डवास्त्रस्तचेतसः । बभूवुर्भृशसंविग्ना निराशाश्चापि जीविते ॥

parasparakṛtaṃ nāśaṃ yataḥ prāpsyanti yādavāḥ | ityuktavati dāśārhe pāṇḍavāstrastacetasaḥ | babhūvurbhṛśasaṃvignā nirāśāścāpi jīvite

इसलिए यादव आपस में किए हुए विनाश को प्राप्त होंगे। दाशार्ह के ऐसा कहने पर पाण्डवों के हृदय भय से काँप उठे; वे अत्यन्त व्याकुल हो गए और जीवन से निराश हो गए।

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