स्त्री पर्व · अध्याय 26
कृष्ण का गान्धारी को उत्तर; मृतकों की गणना और दाह-संस्कार
कृष्ण भूमि पर गिरी हुई गान्धारी से उठने को कहते हैं और अपने पुत्र के किए विनाश का दोष अपने ऊपर न मढ़ने को कहते हैं; गान्धारी चुप हो जाती हैं। धृतराष्ट्र युधिष्ठिर से पूछते हैं कि कितने मारे गए और वे किस गति को गए; युधिष्ठिर लोमश ऋषि से मिली दृष्टि के बल पर संख्या और मृतकों की गतियाँ बताते हैं। उनकी आज्ञा से विदुर, सञ्जय, धौम्य, सुधर्मा, युयुत्सु और इन्द्रसेन चिताएँ बनाकर राजाओं का और अनाथ मृतकों की राशियों का दाह करते हैं, फिर युधिष्ठिर धृतराष्ट्र के साथ गङ्गा की ओर चलते हैं।
श्रीभगवानुवाच
श्लोक 1 (11.26.1)
उत्तिष्ठोत्तिष्ठ गान्धारि मा च शोके मनः कृथाः । तवैव ह्यपराधेन कुरवो निधनं गताः ॥
uttiṣṭhottiṣṭha gāndhāri mā ca śoke manaḥ kṛthāḥ | tavaiva hyaparādhena kuravo nidhanaṃ gatāḥ
उठो, गान्धारी, उठो; शोक में अपना मन मत लगाओ। तुम्हारे ही अपराध से कौरव विनाश को प्राप्त हुए हैं।
श्लोक 2 (11.26.2)
यत्त्वं पुत्रं दुरात्मानमीर्षुमत्यन्तमानिनम् । दुर्योधनं पुरस्कृत्य दुष्कृतं साधु मन्यसे ॥
yattvaṃ putraṃ durātmānamīrṣumatyantamāninam | duryodhanaṃ puraskṛtya duṣkṛtaṃ sādhu manyase
तुमने अपने दुष्ट, ईर्ष्यालु और अत्यन्त अभिमानी पुत्र दुर्योधन को आगे रखकर उसके दुष्कर्म को उचित माना।
श्लोक 3 (11.26.3)
निष्ठुरं वैरपुरुषं वृद्धानां शासनातिगम् । कथमात्मकृतं दोषं मय्याधातुमिहेच्छसि ॥
niṣṭhuraṃ vairapuruṣaṃ vṛddhānāṃ śāsanātigam | kathamātmakṛtaṃ doṣaṃ mayyādhātumihecchasi
वह निष्ठुर था, वैर रखनेवाला था और बड़ों के शासन को लाँघनेवाला था; फिर अपने ही किए हुए दोष को तुम यहाँ मुझ पर क्यों मढ़ना चाहती हो?
श्लोक 4 (11.26.4)
मृतं वा यदि वा नष्टं योऽतीतमनुशोचति । दुःखेन लभते दुःखं द्वावनर्थौ प्रपद्यते ॥
mṛtaṃ vā yadi vā naṣṭaṃ yo'tītamanuśocati | duḥkhena labhate duḥkhaṃ dvāvanarthau prapadyate
जो मरे हुए या नष्ट हुए, बीते हुए का शोक करता है, वह दुःख से दुःख को पाता है और दो अनर्थों में पड़ता है।
श्लोक 5 (11.26.5)
तपोर्थीयं ब्राह्मणी धत्त गर्भं । गौर्वोढारं धावितारं तुरङ्गी । शूद्रा दासं पशुपालं च वैश्या । वधार्थीयं त्वद्विधा राजपुत्री ॥
taporthīyaṃ brāhmaṇī dhatta garbhaṃ | gaurvoḍhāraṃ dhāvitāraṃ turaṅgī | śūdrā dāsaṃ paśupālaṃ ca vaiśyā | vadhārthīyaṃ tvadvidhā rājaputrī
ब्राह्मणी तप के लिए गर्भ धारण करती है; गाय बोझ ढोनेवाले को, घोड़ी दौड़नेवाले को; शूद्रा सेवक को और वैश्या पशुपालक को; किन्तु तुम जैसी राजकन्या वध के लिए ही गर्भ धारण करती है।
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 6 (11.26.6)
तच्छ्रुत्वा वासुदेवस्य पुनरुक्तं वचोऽप्रियम् । तूष्णीं बभूव गान्धारी शोकव्याकुललोचना ॥
tacchrutvā vāsudevasya punaruktaṃ vaco'priyam | tūṣṇīṃ babhūva gāndhārī śokavyākulalocanā
वासुदेव का यह अप्रिय और दोहराया हुआ वचन सुनकर शोक से व्याकुल नेत्रोंवाली गान्धारी चुप हो गई।
श्लोक 7 (11.26.7)
धृतराष्ट्रस्तु राजर्षिर्निगृह्याबुद्धिजं तमः । पर्यपृच्छत धर्मज्ञो धर्मराजं युधिष्ठिरम् ॥
dhṛtarāṣṭrastu rājarṣirnigṛhyābuddhijaṃ tamaḥ | paryapṛcchata dharmajño dharmarājaṃ yudhiṣṭhiram
किन्तु धर्म को जाननेवाले राजर्षि धृतराष्ट्र ने अज्ञान से उत्पन्न अन्धकार को रोककर धर्मराज युधिष्ठिर से पूछा।
धृतराष्ट्र उवाच
श्लोक 8 (11.26.8)
जीवतां परिमाणज्ञः सैन्यानामसि पाण्डव । हतानां यदि जानीषे परिमाणं वदस्व मे ॥
jīvatāṃ parimāṇajñaḥ sainyānāmasi pāṇḍava | hatānāṃ yadi jānīṣe parimāṇaṃ vadasva me
पाण्डव, तुम जीवित सेनाओं की गिनती जानते हो; यदि मारे गए लोगों की गिनती भी जानते हो तो मुझे बताओ।
युधिष्ठिर उवाच
श्लोक 9 (11.26.9)
दशायुतसहस्राणि सहस्राणि च विंशतिः । कोट्यः षष्टिश्च षट् चैव ह्यस्मिन्राजन्मृधे हताः ॥
daśāyutasahasrāṇi sahasrāṇi ca viṃśatiḥ | koṭyaḥ ṣaṣṭiśca ṣaṭ caiva hyasminrājanmṛdhe hatāḥ
दस अयुत-सहस्र, बीस सहस्र और छियासठ करोड़ — इतने योद्धा, हे राजन्, इस युद्ध में मारे गए हैं।
श्लोक 10 (11.26.10)
अलक्ष्याणां च वीराणां सहस्राणि चतुर्दश । दश चान्यानि राजेन्द्र शतं षष्टिश्च भारत ॥
alakṣyāṇāṃ ca vīrāṇāṃ sahasrāṇi caturdaśa | daśa cānyāni rājendra śataṃ ṣaṣṭiśca bhārata
जिन वीरों की गणना नहीं हुई, उनकी संख्या चौदह हज़ार है; हे राजेन्द्र, दस हज़ार और हैं, तथा हे भारत, एक सौ साठ।
धृतराष्ट्र उवाच
श्लोक 11 (11.26.11)
युधिष्ठिर गतिं कां ते गताः पुरुषसत्तम । आचक्ष्व मे महाबाहो सर्वज्ञो ह्यसि मे मतः ॥
yudhiṣṭhira gatiṃ kāṃ te gatāḥ puruṣasattama | ācakṣva me mahābāho sarvajño hyasi me mataḥ
युधिष्ठिर, हे पुरुषश्रेष्ठ, वे किस गति को गए? हे महाबाहो, मुझे बताओ; मैं तुम्हें सर्वज्ञ मानता हूँ।
युधिष्ठिर उवाच
श्लोक 12 (11.26.12)
यैर्हुतानि शरीराणि हृष्टैः परमसंयुगे । देवराजसमाँल्लोकान्गतास्ते सत्यविक्रमाः ॥
yairhutāni śarīrāṇi hṛṣṭaiḥ paramasaṃyuge | devarājasamām̐llokāngatāste satyavikramāḥ
जिन्होंने उस महासंग्राम में प्रसन्न होकर अपने शरीरों की आहुति दी, वे सत्यपराक्रमी वीर इन्द्र के समान लोकों को गए हैं।
श्लोक 13 (11.26.13)
ये त्वहृष्टेन मनसा मर्तव्यमिति भारत । युध्यमाना हताः सङ्ख्ये गन्धर्वैः सह सङ्गताः ॥
ye tvahṛṣṭena manasā martavyamiti bhārata | yudhyamānā hatāḥ saṅkhye gandharvaiḥ saha saṅgatāḥ
हे भारत, जो "मरना ही है" ऐसा सोचकर उदास मन से लड़ते हुए युद्ध में मारे गए, वे गन्धर्वों से जा मिले हैं।
श्लोक 14 (11.26.14)
ये च सङ्ग्रामभूमिष्ठा याचमानाः पराङ्मुखाः । शस्त्रेण निधनं प्राप्ता गतास्ते गुह्यकान्प्रति ॥
ye ca saṅgrāmabhūmiṣṭhā yācamānāḥ parāṅmukhāḥ | śastreṇa nidhanaṃ prāptā gatāste guhyakānprati
जो रणभूमि में खड़े रहकर दया माँगते हुए मुँह फेर बैठे और शस्त्र से मारे गए, वे गुह्यकों के पास गए हैं।
श्लोक 15 (11.26.15)
पात्यमानाः परैर्ये तु हीयमाना निरायुधाः । ह्रीनिषेवा महात्मानः परानभिमुखा रणे ॥
pātyamānāḥ parairye tu hīyamānā nirāyudhāḥ | hrīniṣevā mahātmānaḥ parānabhimukhā raṇe
जो महात्मा शत्रुओं के हाथों गिराए जाने पर निःशस्त्र और निर्बल हो गए, फिर भी लज्जा-मर्यादा का पालन करते हुए रण में शत्रुओं के सामने ही डटे रहे,
श्लोक 16 (11.26.16)
छिद्यमानाः शितैः शस्त्रैः क्षत्रधर्मपरायणाः । हतास्ते ब्रह्मसदनं गता वीराः सुवर्चसः ॥
chidyamānāḥ śitaiḥ śastraiḥ kṣatradharmaparāyaṇāḥ | hatāste brahmasadanaṃ gatā vīrāḥ suvarcasaḥ
और क्षत्रिय-धर्म में लगे रहकर तीखे शस्त्रों से कटते हुए मारे गए, वे तेजस्वी वीर ब्रह्मलोक को गए हैं।
श्लोक 17 (11.26.17)
ये त्वत्र निहता राजन्नन्तरायोधनं प्रति । यथाकथञ्चित्पुरुषास्ते गता ह्युत्तरां गतिम् ॥
ye tvatra nihatā rājannantarāyodhanaṃ prati | yathākathañcitpuruṣāste gatā hyuttarāṃ gatim
और हे राजन्, जो पुरुष यहाँ रणभूमि के बीच जिस किसी प्रकार मारे गए, वे उत्तम गति को पहुँचे हैं।
धृतराष्ट्र उवाच
श्लोक 18 (11.26.18)
केन ज्ञानबलेनैव पुत्र पश्यसि सिद्धवत् । तन्मे वद महाबाहो श्रोतव्यं यदि वै मया ॥
kena jñānabalenaiva putra paśyasi siddhavat | tanme vada mahābāho śrotavyaṃ yadi vai mayā
पुत्र, किस ज्ञान-बल से तुम सिद्ध पुरुष की भाँति यह देखते हो? हे महाबाहो, यदि मेरे सुनने योग्य हो तो मुझे वह बताओ।
युधिष्ठिर उवाच
श्लोक 19 (11.26.19)
निदेशाद्भवतः पूर्वं वने विचरता मया । तीर्थयात्राप्रसङ्गेन सम्प्राप्तोऽयमनुग्रहः ॥
nideśādbhavataḥ pūrvaṃ vane vicaratā mayā | tīrthayātrāprasaṅgena samprāpto'yamanugrahaḥ
पहले आपकी आज्ञा से वन में विचरते हुए, तीर्थयात्रा के प्रसंग में मुझे यह अनुग्रह प्राप्त हुआ।
श्लोक 20 (11.26.20)
देवर्षिर्लोमशो दृष्टस्ततः प्राप्तोऽस्म्यनुस्मृतिम् । दिव्यं चक्षुरपि प्राप्तं ज्ञानयोगेन वै पुरा ॥
devarṣirlomaśo dṛṣṭastataḥ prāpto'smyanusmṛtim | divyaṃ cakṣurapi prāptaṃ jñānayogena vai purā
मुझे देवर्षि लोमश के दर्शन हुए, उसी से मुझे स्मरण-शक्ति मिली; और ज्ञानयोग से मुझे पहले ही दिव्य दृष्टि भी प्राप्त हो चुकी थी।
धृतराष्ट्र उवाच
श्लोक 21 (11.26.21)
ये त्वनाथा जनास्तात नाथवन्तश्च पाण्डव । कच्चित्तेषां शरीराणि धक्ष्यन्ति विधिपूर्वकम् ॥
ye tvanāthā janāstāta nāthavantaśca pāṇḍava | kaccitteṣāṃ śarīrāṇi dhakṣyanti vidhipūrvakam
तात पाण्डव, जो लोग अनाथ थे और जो सनाथ थे, क्या उनके शरीरों का विधिपूर्वक दाह होगा?
युधिष्ठिर उवाच
श्लोक 22 (11.26.22)
न येषां शान्तिकर्तारो न च येऽत्राहिताग्नयः । वयं च तेषां कुर्यामो बहुत्वात्तात कर्मणाम् ॥
na yeṣāṃ śāntikartāro na ca ye'trāhitāgnayaḥ | vayaṃ ca teṣāṃ kuryāmo bahutvāttāta karmaṇām
जिनका शान्ति-कर्म करनेवाला कोई नहीं है और जिन्होंने अग्नि की स्थापना नहीं की थी, उनके लिए भी, तात, कर्मों की बहुतायत को देखते हुए हम ही करेंगे।
श्लोक 23 (11.26.23)
यान्सुपर्णाश्च गृध्राश्च विकर्षन्ति ततस्ततः । तेषां सङ्कर्षणा लोका भविष्यन्ति न संशयः ॥
yānsuparṇāśca gṛdhrāśca vikarṣanti tatastataḥ | teṣāṃ saṅkarṣaṇā lokā bhaviṣyanti na saṃśayaḥ
जिन्हें गिद्ध और बाज़ इधर-उधर खींचते हैं, उन्हें खींच लेनेवाले लोक प्राप्त होंगे, इसमें संशय नहीं।
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 24 (11.26.24)
एवमुक्त्वा महाराज कुन्तीपुत्रो युधिष्ठिरः । आदिदेश सुधर्माणं धौम्यं सूतं च सञ्जयम् ॥
evamuktvā mahārāja kuntīputro yudhiṣṭhiraḥ | ādideśa sudharmāṇaṃ dhaumyaṃ sūtaṃ ca sañjayam
हे महाराज, ऐसा कहकर कुन्तीपुत्र युधिष्ठिर ने सुधर्मा, धौम्य और सूत सञ्जय को आदेश दिया,
श्लोक 25 (11.26.25)
विदुरं च महाबुद्धिं युयुत्सुं चैव कौरवम् । इन्द्रसेनमुखान्भृत्यान्सूतांश्चैव सहस्रशः ॥
viduraṃ ca mahābuddhiṃ yuyutsuṃ caiva kauravam | indrasenamukhānbhṛtyānsūtāṃścaiva sahasraśaḥ
तथा महाबुद्धिमान् विदुर, कुरुवंशी युयुत्सु, इन्द्रसेन आदि सेवकों और हज़ारों सूतों को भी—
युधिष्ठिर उवाच
श्लोक 26 (11.26.26)
भवन्तः कारयन्त्वेषां प्रेतकार्याण्यशेषतः । यथा नाथवतां किञ्चिच्छरीरं न विनश्यति ॥
bhavantaḥ kārayantveṣāṃ pretakāryāṇyaśeṣataḥ | yathā nāthavatāṃ kiñciccharīraṃ na vinaśyati
आप लोग इन सबके प्रेतकर्म पूर्ण रूप से करवाइए, जिससे किसी का भी शरीर नष्ट न हो, जैसे सनाथों का नहीं होता।
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 27 (11.26.27)
शासनाद्धर्मराजस्य क्षत्ता सूतश्च सञ्जयः । सुधर्मा धौम्यसहित इन्द्रसेनादयस्तथा ॥
śāsanāddharmarājasya kṣattā sūtaśca sañjayaḥ | sudharmā dhaumyasahita indrasenādayastathā
धर्मराज की आज्ञा से विदुर, सूत सञ्जय, धौम्य के साथ सुधर्मा तथा इन्द्रसेन आदि—
श्लोक 28 (11.26.28)
चन्दनागुरुकाष्ठानि तथा कालीयकान्युत । घृतं तैलं च गन्धांश्च क्षौमाणि वसनानि च ॥
candanāgurukāṣṭhāni tathā kālīyakānyuta | ghṛtaṃ tailaṃ ca gandhāṃśca kṣaumāṇi vasanāni ca
चन्दन और अगुरु की लकड़ियाँ, कालीयक काष्ठ, घी, तेल, सुगन्धित द्रव्य और रेशमी वस्त्र,
श्लोक 29 (11.26.29)
समाहृत्य महार्हाणि दारूणां चैव सञ्चयान् । रथांश्च मृदितांस्तत्र नानाप्रहरणानि च ॥
samāhṛtya mahārhāṇi dārūṇāṃ caiva sañcayān | rathāṃśca mṛditāṃstatra nānāpraharaṇāni ca
बहुमूल्य वस्तुएँ, लकड़ियों के ढेर, वहाँ टूटे हुए रथ और नाना प्रकार के अस्त्र-शस्त्र इकट्ठे करके,
श्लोक 30 (11.26.30)
चिताः कृत्वा प्रयत्नेन यथामुख्यान्नराधिपान् । दाहयामासुरव्यग्राः शास्त्रदृष्टेन कर्मणा ॥
citāḥ kṛtvā prayatnena yathāmukhyānnarādhipān | dāhayāmāsuravyagrāḥ śāstradṛṣṭena karmaṇā
प्रधान राजाओं के लिए प्रयत्नपूर्वक यथाक्रम चिताएँ बनाकर, उन्होंने शान्तभाव से शास्त्रविधि के अनुसार उनका दाह किया।
श्लोक 31 (11.26.31)
दुर्योधनं च राजानं भ्रातॄंश्चास्य कर्मणा । शल्यं शलं च राजानं भूरिश्रवसमेव च ॥
duryodhanaṃ ca rājānaṃ bhrātṝṃścāsya karmaṇā | śalyaṃ śalaṃ ca rājānaṃ bhūriśravasameva ca
राजा दुर्योधन और उसके भाइयों का विधि से; शल्य, राजा शल और भूरिश्रवा का भी;
श्लोक 32 (11.26.32)
जयद्रथं च राजानमभिमन्युं च भारत । दौःशासनिं लक्ष्मणं च धृष्टकेतुं च पार्थिवम् ॥
jayadrathaṃ ca rājānamabhimanyuṃ ca bhārata | dauḥśāsaniṃ lakṣmaṇaṃ ca dhṛṣṭaketuṃ ca pārthivam
राजा जयद्रथ और अभिमन्यु का, हे भारत; दुःशासन-पुत्र, लक्ष्मण और राजा धृष्टकेतु का;
श्लोक 33 (11.26.33)
बृहद्वलं सोमदत्तं सृञ्जयं च महारथम् । राजानं क्षेमधन्वानं विराटद्रुपदौ तथा ॥
bṛhadvalaṃ somadattaṃ sṛñjayaṃ ca mahāratham | rājānaṃ kṣemadhanvānaṃ virāṭadrupadau tathā
बृहद्बल, सोमदत्त और महारथी सृञ्जय; राजा क्षेमधन्वा तथा विराट और द्रुपद का;
श्लोक 34 (11.26.34)
शिखण्डिनं च पाञ्चाल्यं धृष्टद्युम्नं च पार्षतम् । युधामन्युं च विक्रान्तमुत्तमौजसमेव च ॥
śikhaṇḍinaṃ ca pāñcālyaṃ dhṛṣṭadyumnaṃ ca pārṣatam | yudhāmanyuṃ ca vikrāntamuttamaujasameva ca
पाञ्चाल शिखण्डी, पृषतपुत्र धृष्टद्युम्न, पराक्रमी युधामन्यु और उत्तमौजा का;
श्लोक 35 (11.26.35)
कौसल्यं द्रौपदेयांश्च शकुनिं चापि सौबलम् । अचलं वृषकं चैव भगदत्तं च पार्थिवम् ॥
kausalyaṃ draupadeyāṃśca śakuniṃ cāpi saubalam | acalaṃ vṛṣakaṃ caiva bhagadattaṃ ca pārthivam
कोसलराज, द्रौपदी के पुत्रों, सुबलपुत्र शकुनि, अचल, वृषक और राजा भगदत्त का;
श्लोक 36 (11.26.36)
कर्णं वैकर्तनं चैव सहपुत्रममर्षणम् । केकयांश्च महेष्वासांस्त्रिगर्तांश्च महारथान् ॥
karṇaṃ vaikartanaṃ caiva sahaputramamarṣaṇam | kekayāṃśca maheṣvāsāṃstrigartāṃśca mahārathān
वैकर्तन कर्ण का, जो अमर्षशील था, उसके पुत्र सहित; महाधनुर्धर केकयों और महारथी त्रिगर्तों का;
श्लोक 37 (11.26.37)
घटोत्कचं राक्षसेन्द्रं बकभ्रातरमेव च । अलम्बुसं राक्षसेन्द्रं जलसन्धं च पार्थिवम् ॥
ghaṭotkacaṃ rākṣasendraṃ bakabhrātarameva ca | alambusaṃ rākṣasendraṃ jalasandhaṃ ca pārthivam
राक्षसराज घटोत्कच और बक के भाई का; राक्षसराज अलम्बुस और राजा जलसन्ध का;
श्लोक 38 (11.26.38)
एतांश्चान्यांश्च सुबहून्पार्थिवांश्च सहस्रशः । धृतधाराहुतैर्दीप्तैः पावकैः समदाहयन् ॥
etāṃścānyāṃśca subahūnpārthivāṃśca sahasraśaḥ | dhṛtadhārāhutairdīptaiḥ pāvakaiḥ samadāhayan
इन्हें और अन्य बहुत-से राजाओं को, हज़ारों की संख्या में, घी की धाराओं की आहुति से प्रज्वलित अग्नियों में उन्होंने जलाया।
श्लोक 39 (11.26.39)
पितृमेधाश्च केषाञ्चित्प्रावर्तन्त महात्मनाम् । सामभिश्चाप्यगायन्त तेऽन्वशासत चापरैः ॥
pitṛmedhāśca keṣāñcitprāvartanta mahātmanām | sāmabhiścāpyagāyanta te'nvaśāsata cāparaiḥ
उन महात्माओं में से कुछ के लिए पितृमेध आरम्भ हुए; सामगान किया गया, और उन्होंने दूसरों के साथ मिलकर विधि का निर्देशन किया।
श्लोक 40 (11.26.40)
साम्नामृचां च नादेन स्त्रीणां च रुदितस्वनैः । कश्मलं सर्वभूतानां निशायां समपद्यत ॥
sāmnāmṛcāṃ ca nādena strīṇāṃ ca ruditasvanaiḥ | kaśmalaṃ sarvabhūtānāṃ niśāyāṃ samapadyata
साम और ऋचाओं के घोष तथा स्त्रियों के रुदन के स्वरों से रात में सब प्राणियों पर मूर्च्छा-सी छा गई।
श्लोक 41 (11.26.41)
हुताश्च तत्प्रदीप्ताश्च दीप्यमानाश्च पावकाः । नभसीवान्वदृश्यन्त ग्रहास्तन्वभ्रसंवृताः ॥
hutāśca tatpradīptāśca dīpyamānāśca pāvakāḥ | nabhasīvānvadṛśyanta grahāstanvabhrasaṃvṛtāḥ
आहुति पाकर प्रज्वलित और दीप्त वे अग्नियाँ आकाश में हल्के बादलों से ढके ग्रहों के समान दिखाई देती थीं।
श्लोक 42 (11.26.42)
ये चाप्यनाथास्तत्रासन्नानादेशसमागताः । तांश्च सर्वान्समानीय राशीकृत्वा सहस्रशः ॥
ye cāpyanāthāstatrāsannānādeśasamāgatāḥ | tāṃśca sarvānsamānīya rāśīkṛtvā sahasraśaḥ
और वहाँ जो अनाथ लोग नाना देशों से आए हुए थे, उन सबको एकत्र करके उनकी हज़ारों राशियाँ बनाकर,
श्लोक 43 (11.26.43)
चित्वा दारुभिरव्यग्रैः प्रभूतैः स्नेहपाचितैः । दाहयामास तान्सर्वान्विदुरो राजशासनात् ॥
citvā dārubhiravyagraiḥ prabhūtaiḥ snehapācitaiḥ | dāhayāmāsa tānsarvānviduro rājaśāsanāt
शान्तभाव से तेल में भीगी हुई बहुत-सी लकड़ियों से चिताएँ चुनकर विदुर ने राजा की आज्ञा से उन सबका दाह किया।
श्लोक 44 (11.26.44)
कारयित्वा क्रियास्तेषां कुरुराजो युधिष्ठिरः । धृतराष्ट्रं पुरस्कृत्य गङ्गामभिमुखोऽगमत् ॥
kārayitvā kriyāsteṣāṃ kururājo yudhiṣṭhiraḥ | dhṛtarāṣṭraṃ puraskṛtya gaṅgāmabhimukho'gamat
उनके संस्कार करवा चुकने पर कुरुराज युधिष्ठिर धृतराष्ट्र को आगे करके गङ्गा की ओर चले।