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स्त्री पर्व · अध्याय 27

जलाञ्जलि-दान; कुन्ती द्वारा कर्ण के ज्येष्ठ पुत्र होने का रहस्योद्घाटन

पाण्डव, धृतराष्ट्र और कुरुकुल की स्त्रियाँ गङ्गा के तट पर पहुँचकर अपने मृतकों के लिए जलाञ्जलि देती हैं। तब कुन्ती अपने पुत्रों को बताती हैं कि जिस कर्ण को वे सूतपुत्र समझते थे, वह सूर्य से उत्पन्न उनका ज्येष्ठ पुत्र और पाण्डवों का सबसे बड़ा भाई था, और उसके लिए जल देने को कहती हैं। युधिष्ठिर रहस्य छिपाने के लिए माता को उलाहना देते हैं, कर्ण की मृत्यु को बाकी सब हानियों से सौ गुना बड़ा दुःख बताते हैं और स्त्रियों को शाप देते हैं कि वे कोई बात गुप्त न रख सकेंगी। फिर वे कर्ण की स्त्रियों के साथ उसके लिए प्रेतकृत्य करते हैं और सब लोग नदी से बाहर आते हैं।

अध्याय 26अध्याय-सूची

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 1 (11.27.1)

ते समासाद्य गङ्गां तु शिवां पुण्यजलान्विताम् । ह्लादिनीं च प्रसन्नां च महारूपां महावनाम् ॥

te samāsādya gaṅgāṃ tu śivāṃ puṇyajalānvitām | hlādinīṃ ca prasannāṃ ca mahārūpāṃ mahāvanām

वे पवित्र जल से भरी, कल्याणकारिणी, आह्लादिनी, निर्मल, महारूपवती और विशाल वनोंवाली गङ्गा के तट पर पहुँचकर

श्लोक 2 (11.27.2)

भूषणान्युत्तरीयाणि वेष्टनान्यवमुच्य च । कवचानि विचित्राणि गङ्गामवजगाहिरे ॥

bhūṣaṇānyuttarīyāṇi veṣṭanānyavamucya ca | kavacāni vicitrāṇi gaṅgāmavajagāhire

उन्होंने आभूषण, उत्तरीय वस्त्र, पगड़ियाँ और रंग-बिरंगे कवच उतारकर गङ्गा में अवगाहन किया।

श्लोक 3 (11.27.3)

ततः पितॄणां भ्रातॄणां पौत्राणां स्वजनस्य च । पुत्राणामार्यकाणां च पतीनां च कुरुस्त्रियः ॥

tataḥ pitṝṇāṃ bhrātṝṇāṃ pautrāṇāṃ svajanasya ca | putrāṇāmāryakāṇāṃ ca patīnāṃ ca kurustriyaḥ

तब कुरुकुल की स्त्रियों ने पिताओं, भाइयों, पौत्रों और स्वजनों, पुत्रों, पितामहों और पतियों के लिए

श्लोक 4 (11.27.4)

उदकं चक्रिरे सर्वा रुदन्त्यो भृशदुःखिताः । सुहृदां चापि धर्मज्ञाः प्रचक्रुः सलिलक्रियाम् ॥

udakaṃ cakrire sarvā rudantyo bhṛśaduḥkhitāḥ | suhṛdāṃ cāpi dharmajñāḥ pracakruḥ salilakriyām

सबने रोते हुए, अत्यन्त दुःखी होकर जलाञ्जलि दी; और धर्म को जाननेवालों ने मित्रों के लिए भी जलक्रिया की।

श्लोक 5 (11.27.5)

उदके क्रियमाणे तु वीराणां वीरपत्निभिः । सूपतीर्थाऽभवद्गङ्गा भूयो विप्रससार च ॥

udake kriyamāṇe tu vīrāṇāṃ vīrapatnibhiḥ | sūpatīrthā'bhavadgaṅgā bhūyo viprasasāra ca

वीरपत्नियों द्वारा वीरों के लिए जलदान किए जाते समय गङ्गा सुगम घाटोंवाली हो गई और फिर विस्तार से फैल गई।

श्लोक 6 (11.27.6)

तन्महोदधिसङ्काशं निरानन्दमनुत्सवम् । वीरपत्नीभिराकीर्णं गङ्गातीरमशोभत ॥

tanmahodadhisaṅkāśaṃ nirānandamanutsavam | vīrapatnībhirākīrṇaṃ gaṅgātīramaśobhata

वीरपत्नियों से भरा हुआ वह गङ्गातट आनन्द और उत्सव से रहित, महासागर के समान दिखाई देता था।

श्लोक 7 (11.27.7)

ततः कुन्ती महाराज रुदन्ती शोककर्शिता । व्रीडया मन्दया वाचा पुत्रान्वचनमब्रवीत् ॥

tataḥ kuntī mahārāja rudantī śokakarśitā | vrīḍayā mandayā vācā putrānvacanamabravīt

तब, हे महाराज, शोक से कृश हुई कुन्ती ने रोते हुए, लज्जा से मन्द स्वर में अपने पुत्रों से कहा—

कुन्त्युवाच

श्लोक 8 (11.27.8)

यः स वीरो महेष्वासो रथयूथपयूथपः । अर्जुनेन हतः सङ्ख्ये वीरलक्षणलक्षितः ॥

yaḥ sa vīro maheṣvāso rathayūthapayūthapaḥ | arjunena hataḥ saṅkhye vīralakṣaṇalakṣitaḥ

वह वीर महाधनुर्धर, जो रथ-यूथपतियों का भी यूथपति था, वीर के लक्षणों से युक्त, जिसे अर्जुन ने युद्ध में मारा,

श्लोक 9 (11.27.9)

यं सूतपुत्रं मन्यध्वं राधेयमिति पाण्डवाः । यो व्यराजच्चमूमध्ये दिवाकर इव प्रभुः ॥

yaṃ sūtaputraṃ manyadhvaṃ rādheyamiti pāṇḍavāḥ | yo vyarājaccamūmadhye divākara iva prabhuḥ

जिसे, पाण्डवो, तुम सूतपुत्र राधेय समझते रहे, जो सेना के बीच सूर्य के समान प्रभु बनकर शोभित होता था,

श्लोक 10 (11.27.10)

प्रत्ययुध्यत वः सर्वान्पुरा यः सपदानुगान् । दुर्योधनबलं सर्वं यः प्रकर्षन्व्यरोचत ॥

pratyayudhyata vaḥ sarvānpurā yaḥ sapadānugān | duryodhanabalaṃ sarvaṃ yaḥ prakarṣanvyarocata

जो पहले तुम सबसे, तुम्हारे अनुयायियों सहित, लड़ा, और दुर्योधन की सारी सेना को अपने साथ खींचता हुआ शोभित होता था,

श्लोक 11 (11.27.11)

यस्य नास्ति समो वीर्ये पृथिव्यामपि कश्चन । यो वृणीत यशः शूरः प्राणैरपि सदा भुवि ॥

yasya nāsti samo vīrye pṛthivyāmapi kaścana | yo vṛṇīta yaśaḥ śūraḥ prāṇairapi sadā bhuvi

पृथ्वी पर पराक्रम में जिसके समान कोई भी नहीं था, जो शूर प्राणों से भी बढ़कर इस लोक में सदा यश को ही चुनता था,

श्लोक 12 (11.27.12)

कर्णस्य सत्यसन्धस्य सङ्ग्रामेष्वपलायिनः । कुरुध्वमुदकं तस्य भ्रातुरक्लिष्टकर्मणः ॥

karṇasya satyasandhasya saṅgrāmeṣvapalāyinaḥ | kurudhvamudakaṃ tasya bhrāturakliṣṭakarmaṇaḥ

सत्यप्रतिज्ञ, युद्धों में कभी न भागनेवाले, अक्लान्त कर्मोंवाले अपने उस भाई कर्ण के लिए जलाञ्जलि दो।

श्लोक 13 (11.27.13)

स हि वः पूर्वजो भ्राता भास्करान्मय्यजायत । कुण्डली कवची शूरो दिवाकरसमप्रभः ॥

sa hi vaḥ pūrvajo bhrātā bhāskarānmayyajāyata | kuṇḍalī kavacī śūro divākarasamaprabhaḥ

वह तुम्हारा सबसे बड़ा भाई था, सूर्य से मुझसे उत्पन्न हुआ था — कुण्डल और कवच धारण किए हुए, सूर्य के समान तेजस्वी वीर।

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 14 (11.27.14)

श्रुत्वा तु पाण्डवाः सर्वे मातुर्वचनमप्रियम् । कर्णमेवानुशोचन्तो भूयश्चात्यातुरा भवन् ॥

śrutvā tu pāṇḍavāḥ sarve māturvacanamapriyam | karṇamevānuśocanto bhūyaścātyāturā bhavan

माता के वे अप्रिय वचन सुनकर सब पाण्डव केवल कर्ण के लिए शोक करने लगे और और भी अधिक व्याकुल हो गए।

श्लोक 15 (11.27.15)

ततः स पुरुषव्याघ्रः कुन्तीपुत्रो युधिष्ठिरः । उवाच मातरं वीरो निःश्वसन्निव पन्नगः ॥

tataḥ sa puruṣavyāghraḥ kuntīputro yudhiṣṭhiraḥ | uvāca mātaraṃ vīro niḥśvasanniva pannagaḥ

तब पुरुषसिंह वीर कुन्तीपुत्र युधिष्ठिर ने सर्प की भाँति निःश्वास भरते हुए माता से कहा—

युधिष्ठिर उवाच

श्लोक 16 (11.27.16)

यः शरोर्मिर्ध्वजावर्तो महाभुजमहाग्रहः । तलशब्दप्रणुदितो महारथमहाग्रहः ॥

yaḥ śarormirdhvajāvarto mahābhujamahāgrahaḥ | talaśabdapraṇudito mahārathamahāgrahaḥ

जिसकी तरंगें बाण थे, जिसके भँवर ध्वज थे, जिसके बड़े ग्राह उसकी विशाल भुजाएँ थे, जो करतल-ध्वनि से उद्वेलित होता था और जिसके बड़े ग्राह महारथी थे;

श्लोक 17 (11.27.17)

यस्येषुपातमासाद्य कोऽन्यस्तिष्ठेद्धनञ्जयात् । कथं पुत्रो भवत्याः स देवगर्भः पुराऽभवत् । कुण्डली कवची शूरो दिवाकरसमप्रभः ॥

yasyeṣupātamāsādya ko'nyastiṣṭheddhanañjayāt | kathaṃ putro bhavatyāḥ sa devagarbhaḥ purā'bhavat | kuṇḍalī kavacī śūro divākarasamaprabhaḥ

जिसके बाणों की पहुँच में आकर अर्जुन के सिवा और कौन ठहर सकता था — देवगर्भ से उत्पन्न, कुण्डल और कवच धारण किए हुए, सूर्य के समान तेजस्वी वह वीर पहले आपका पुत्र कैसे हुआ?

श्लोक 18 (11.27.18)

यस्य बाहुप्रतापेन तापिताः सर्वतो वयम् । तमग्निमिव वस्त्रेण कथं छादितवत्यसि ॥

yasya bāhupratāpena tāpitāḥ sarvato vayam | tamagnimiva vastreṇa kathaṃ chāditavatyasi

जिसके बाहुबल के प्रताप से हम चारों ओर से तपाए गए, उस अग्नि को आपने वस्त्र से कैसे ढक रखा?

श्लोक 19 (11.27.19)

यस्य बाहुप्रभावेन वैरमस्मास्वरोचयत् । सुयोधनस्तु तं ज्येष्ठं कथं नोदितवत्यसि ॥

yasya bāhuprabhāvena vairamasmāsvarocayat | suyodhanastu taṃ jyeṣṭhaṃ kathaṃ noditavatyasi

जिसके बाहुबल के भरोसे सुयोधन को हमसे वैर रुचा, हमारे उस ज्येष्ठ के विषय में आपने हमें क्यों नहीं बताया?

श्लोक 20 (11.27.20)

तथा कर्णं महेष्वासं धार्तराष्ट्रैरुपासितम् । उपासितं यथाऽस्माभिर्बलं गाण्डीवधन्वनः ॥

tathā karṇaṃ maheṣvāsaṃ dhārtarāṣṭrairupāsitam | upāsitaṃ yathā'smābhirbalaṃ gāṇḍīvadhanvanaḥ

जैसे हमने गाण्डीवधारी अर्जुन के बल का आश्रय लिया, वैसे ही धृतराष्ट्र के पुत्रों ने महाधनुर्धर कर्ण का आश्रय लिया था।

श्लोक 21 (11.27.21)

भूमिपानां च सर्वेषां बलं बलवतां वरः । नान्यः कुन्तीसुतात्कर्णादगृह्णाद्रथिनो रथी ॥

bhūmipānāṃ ca sarveṣāṃ balaṃ balavatāṃ varaḥ | nānyaḥ kuntīsutātkarṇādagṛhṇādrathino rathī

उसने सब राजाओं के बल को अपने ऊपर ले रखा था, वह बलवानों में श्रेष्ठ था; कुन्तीपुत्र कर्ण के सिवा रथियों में दूसरा कोई रथी ऐसा नहीं कर सका।

श्लोक 22 (11.27.22)

स नः प्रथमजो भ्राता सर्वशस्त्रभृतां वरः । असूत तं भवत्यग्रे कथमद्भुतविक्रमम् ॥

sa naḥ prathamajo bhrātā sarvaśastrabhṛtāṃ varaḥ | asūta taṃ bhavatyagre kathamadbhutavikramam

सब शस्त्रधारियों में श्रेष्ठ वह हमारा सबसे बड़ा भाई था। आपने उस अद्भुत पराक्रमी को हम सबसे पहले कैसे जन्म दिया?

श्लोक 23 (11.27.23)

अहो भवत्या मन्त्रस्य गूहनेन वयं हताः । निधनेन हि कर्णस्य पीडितास्तु सबान्धवाः ॥

aho bhavatyā mantrasya gūhanena vayaṃ hatāḥ | nidhanena hi karṇasya pīḍitāstu sabāndhavāḥ

हाय! आपके उस रहस्य को छिपाए रखने से हम नष्ट हो गए। कर्ण की मृत्यु से हम अपने बन्धुओं सहित पीड़ित हैं।

श्लोक 24 (11.27.24)

अभिमन्योर्विनाशेन द्रौपदेयवधेन च । पाञ्चालानां विनाशेन कुरूणां घातनादपि ॥

abhimanyorvināśena draupadeyavadhena ca | pāñcālānāṃ vināśena kurūṇāṃ ghātanādapi

अभिमन्यु के विनाश, द्रौपदी के पुत्रों के वध, पाञ्चालों के संहार और कौरवों के मारे जाने से भी

श्लोक 25 (11.27.25)

ततः शतगुणं दुःखमिदमापतितं महत् । कर्णमेवानुशोचन्हि दह्याम्यग्नाविवाहितः ॥

tataḥ śataguṇaṃ duḥkhamidamāpatitaṃ mahat | karṇamevānuśocanhi dahyāmyagnāvivāhitaḥ

उससे सौ गुना बड़ा यह महान् दुःख मुझ पर आ पड़ा है; केवल कर्ण के लिए शोक करता हुआ मैं आग में रखे हुए की भाँति जल रहा हूँ।

श्लोक 26 (11.27.26)

नेह स्म किञ्चिदप्राप्य भवेदपि दिवि स्थितम् । न चेदं वैशसं घोरकं कौरवान्तकरं भवेत् ॥

neha sma kiñcidaprāpya bhavedapi divi sthitam | na cedaṃ vaiśasaṃ ghorakaṃ kauravāntakaraṃ bhavet

तब यहाँ कुछ भी अप्राप्य न रहता, चाहे वह स्वर्ग में ही क्यों न स्थित हो; और कौरवों का अन्त करनेवाला यह भयंकर संहार भी न होता।

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 27 (11.27.27)

एवं विलप्य बहुलं धर्मराजो युधिष्ठिरः । व्यरुदच्छनकैः राजंश्चकारास्योदकं प्रभुः ॥

evaṃ vilapya bahulaṃ dharmarājo yudhiṣṭhiraḥ | vyarudacchanakaiḥ rājaṃścakārāsyodakaṃ prabhuḥ

इस प्रकार बहुत विलाप करके धर्मराज युधिष्ठिर धीरे-धीरे रोते रहे; हे राजन्, फिर उन प्रभु ने उसके लिए जलाञ्जलि दी।

श्लोक 28 (11.27.28)

ततो विनेदुः सहसा स्त्रियस्ताः खलु सर्वशः । अभितो याः स्थितास्तत्र तस्मिन्नुदककर्मणि ॥

tato vineduḥ sahasā striyastāḥ khalu sarvaśaḥ | abhito yāḥ sthitāstatra tasminnudakakarmaṇi

तब उस जलदान के समय चारों ओर जो स्त्रियाँ खड़ी थीं, वे सब एकाएक चीख उठीं।

श्लोक 29 (11.27.29)

तत आनाययामास कर्णस्य सपरिच्छदाः । स्त्रियः कुरुपतिर्धीमान्भ्रातुः प्रेम्णा युधिष्ठिरः ॥

tata ānāyayāmāsa karṇasya saparicchadāḥ | striyaḥ kurupatirdhīmānbhrātuḥ premṇā yudhiṣṭhiraḥ

फिर बुद्धिमान् कुरुराज युधिष्ठिर ने भाई के प्रेम से कर्ण की स्त्रियों को उनके परिजनों सहित बुलवाया।

श्लोक 30 (11.27.30)

स ताभिः सह धर्मात्मा प्रेतकृत्यमनन्तरम् । सर्वं चकार कर्णस्य विधिवद्भूरिदक्षिणम् ॥

sa tābhiḥ saha dharmātmā pretakṛtyamanantaram | sarvaṃ cakāra karṇasya vidhivadbhūridakṣiṇam

फिर धर्मात्मा युधिष्ठिर ने उनके साथ कर्ण के सब प्रेतकृत्य विधिपूर्वक और प्रचुर दक्षिणा सहित किए।

श्लोक 31 (11.27.31)

स राजा धृतराष्ट्रश्च कृत्वा जलमतन्द्रितः । समुत्ततार गङ्गाया भार्यया सह भारत ॥

sa rājā dhṛtarāṣṭraśca kṛtvā jalamatandritaḥ | samuttatāra gaṅgāyā bhāryayā saha bhārata

और राजा धृतराष्ट्र भी, बिना थके जलक्रिया पूरी करके, हे भारत, अपनी पत्नी के साथ गङ्गा से बाहर निकले।

युधिष्ठिर उवाच

श्लोक 32 (11.27.32)

पापेनासौ मया श्रेष्ठो भ्राता ज्ञातिर्निपातितः । अतो मनसि यद्गुह्यं स्त्रीणां तन्न भविष्यति ॥

pāpenāsau mayā śreṣṭho bhrātā jñātirnipātitaḥ | ato manasi yadguhyaṃ strīṇāṃ tanna bhaviṣyati

मेरे पाप से वह श्रेष्ठ भाई, मेरा अपना बन्धु, मारा गया। इसलिए स्त्रियों के मन में जो गुप्त बात होगी, वह अब गुप्त नहीं रहेगी।

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 33 (11.27.33)

इत्युक्त्वा स तु गङ्गाया उत्तताराकुलेन्द्रियः । भ्रातृभिः सहितः सर्वैर्गङ्गातीरमुपेयिवान् ॥

ityuktvā sa tu gaṅgāyā uttatārākulendriyaḥ | bhrātṛbhiḥ sahitaḥ sarvairgaṅgātīramupeyivān

यह कहकर व्याकुल इन्द्रियोंवाले वे गङ्गा से निकले और सब भाइयों के साथ गङ्गा के तट पर पहुँचे।

अध्याय 26अध्याय-सूची