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स्वर्गारोहण पर्व · अध्याय 1

स्वर्ग में युधिष्ठिर को दुर्योधन के दर्शन

जनमेजय पूछते हैं कि स्वर्ग पहुँचकर उनके पूर्वजों ने कौन-से स्थान पाए, और वैशम्पायन उत्तर आरम्भ करते हैं। युधिष्ठिर दुर्योधन को देवताओं के बीच वैभव से बैठा देखकर क्रोध से मुँह फेर लेते हैं और कहते हैं कि वे वहीं जाना चाहते हैं जहाँ उनके भाई हैं। नारद समझाते हैं कि स्वर्ग में वैर मिट जाता है और दुर्योधन ने क्षत्रिय की मृत्यु से यह स्थान पाया है; तब युधिष्ठिर पूछते हैं कि कर्ण, उनके भाई, पाञ्चाल, द्रौपदी के पुत्र और अन्य मारे गए वीर कहाँ हैं।

अध्याय-सूचीअध्याय 2

जनमेजय उवाच

श्लोक 1 (18.1.1)

स्वर्गं त्रिविष्टपं प्राप्य मम पूर्वपितामहाः । पाण्डवा धार्तराष्ट्राश्च कानि स्थानानि भेजिरे ॥

svargaṃ triviṣṭapaṃ prāpya mama pūrvapitāmahāḥ | pāṇḍavā dhārtarāṣṭrāśca kāni sthānāni bhejire

स्वर्ग में पहुँचकर मेरे पूर्वज पाण्डवों और धृतराष्ट्र के पुत्रों ने कौन-कौन से स्थान पाए?

श्लोक 2 (18.1.2)

एतदिच्छाम्यहं श्रोतुं सर्वविच्चासि मे मतः । महर्षिणाऽभ्यनुज्ञातो व्यासेनाद्भुतकर्मणा ॥

etadicchāmyahaṃ śrotuṃ sarvaviccāsi me mataḥ | maharṣiṇā'bhyanujñāto vyāsenādbhutakarmaṇā

यह मैं सुनना चाहता हूँ। मेरे विचार से आप सब कुछ जानने वाले हैं, और अद्भुत कर्म करने वाले महर्षि व्यास की भी आपको अनुमति मिली हुई है।

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 3 (18.1.3)

स्वर्गं त्रिविष्टपं प्राप्य तव पूर्वपितामहाः । युधिष्ठिरप्रभृतयो यदकुर्वत तच्छृणु ॥

svargaṃ triviṣṭapaṃ prāpya tava pūrvapitāmahāḥ | yudhiṣṭhiraprabhṛtayo yadakurvata tacchṛṇu

स्वर्ग पहुँचकर आपके पूर्वज युधिष्ठिर आदि ने जो कुछ किया, उसे सुनिए।

श्लोक 4 (18.1.4)

स्वर्गं त्रिविष्टपं प्राप्य धर्मराजो युधिष्ठिरः । दुर्योधनं श्रिया जुष्टं ददर्शासीनमासने ॥

svargaṃ triviṣṭapaṃ prāpya dharmarājo yudhiṣṭhiraḥ | duryodhanaṃ śriyā juṣṭaṃ dadarśāsīnamāsane

स्वर्ग पहुँचकर धर्मराज युधिष्ठिर ने दुर्योधन को देखा, जो वैभव से दीप्त होकर सिंहासन पर बैठा था,

श्लोक 5 (18.1.5)

भ्राजमानमिवादित्यं वीरलक्ष्म्याऽभिसंवृतम् । देवैर्भ्राजिष्णुभिः साध्यैः सहितं पुण्यकर्मभिः ॥

bhrājamānamivādityaṃ vīralakṣmyā'bhisaṃvṛtam | devairbhrājiṣṇubhiḥ sādhyaiḥ sahitaṃ puṇyakarmabhiḥ

सूर्य के समान चमकता हुआ, वीरोचित तेज से घिरा हुआ, तेजस्वी देवताओं और पुण्यकर्मा साध्यों के साथ।

श्लोक 6 (18.1.6)

ततो युधिष्ठिरो राजा दुर्योधनममर्षितः । सहसा सन्निवृत्तोऽभूच्छ्रियं दृष्ट्वा सुयोधने ॥

tato yudhiṣṭhiro rājā duryodhanamamarṣitaḥ | sahasā sannivṛtto'bhūcchriyaṃ dṛṣṭvā suyodhane

तब राजा युधिष्ठिर दुर्योधन को देखकर अप्रसन्न हो उठे और सुयोधन पर ऐसा वैभव देखकर सहसा लौट पड़े।

श्लोक 7 (18.1.7)

ब्रुवन्नुच्चैर्वचस्तान्वै नाहं दुर्योधनेन वै । सहितः कामये लोकाँल्लुब्धेनादीर्घदर्शिना ॥

bruvannuccairvacastānvai nāhaṃ duryodhanena vai | sahitaḥ kāmaye lokām̐llubdhenādīrghadarśinā

उन देवताओं से ऊँचे स्वर में कहते हुए वे बोले — ‘मैं उस लोभी और अदूरदर्शी दुर्योधन के साथ लोकों की इच्छा नहीं करता,

युधिष्ठिर उवाच

श्लोक 8 (18.1.8)

यत्कृते पृथिवी सर्वा सुहृदो बान्धवास्तथा । हतास्माभिः प्रसह्याजौ क्लिष्टैः पूर्वं महावने ॥

yatkṛte pṛthivī sarvā suhṛdo bāndhavāstathā | hatāsmābhiḥ prasahyājau kliṣṭaiḥ pūrvaṃ mahāvane

‘जिसके कारण हमने, जो पहले महावन में कष्ट सह चुके थे, युद्ध में बलपूर्वक सारी पृथ्वी, अपने मित्रों और बन्धुओं का संहार किया;

श्लोक 9 (18.1.9)

द्रौपदी च सभामध्ये पाञ्चाली धर्मचारिणी । पर्याकृष्टाऽनवद्याङ्गी पत्नी नो गुरुसन्निधौ ॥

draupadī ca sabhāmadhye pāñcālī dharmacāriṇī | paryākṛṣṭā'navadyāṅgī patnī no gurusannidhau

‘और जिसके कारण धर्मपरायणा, निर्दोष अंगों वाली हमारी पत्नी पाञ्चाली द्रौपदी को सभा के बीच, गुरुजनों के सामने घसीटा गया।

श्लोक 10 (18.1.10)

अस्ति देवा न मे कामः सुयोधनमुदीक्षितुम् । तत्राहं गन्तुमिच्छामि यत्र ते भ्रातरो मम ॥

asti devā na me kāmaḥ suyodhanamudīkṣitum | tatrāhaṃ gantumicchāmi yatra te bhrātaro mama

‘हे देवताओ, मुझे सुयोधन को देखने की इच्छा नहीं है। मैं वहाँ जाना चाहता हूँ जहाँ मेरे भाई हैं।’

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 11 (18.1.11)

नैवमित्यब्रवीत्तं तु नारदः प्रहसन्निव । स्वर्गे निवासे राजेन्द्र विरुद्धं चापि नश्यति ॥

naivamityabravīttaṃ tu nāradaḥ prahasanniva | svarge nivāse rājendra viruddhaṃ cāpi naśyati

तब नारद ने कुछ मुस्कुराते हुए उनसे कहा — ‘ऐसा नहीं! हे राजेन्द्र, स्वर्ग में रहने पर पुराना वैर भी नष्ट हो जाता है।

नारद उवाच

श्लोक 12 (18.1.12)

युधिष्ठिर महाबाहो मैवं वोचः कथञ्चन । दुर्योधनं प्रति नृपं शृणु चेदं वचो मम ॥

yudhiṣṭhira mahābāho maivaṃ vocaḥ kathañcana | duryodhanaṃ prati nṛpaṃ śṛṇu cedaṃ vaco mama

‘महाबाहु युधिष्ठिर! ऐसा कभी मत कहो। राजा दुर्योधन के विषय में मेरी यह बात सुनो।

श्लोक 13 (18.1.13)

एष दुर्योधनो राजा पूज्यते त्रिदशैः सह । सद्भिश्च राजप्रवरैते इमे स्वर्गवासिनः ॥

eṣa duryodhano rājā pūjyate tridaśaiḥ saha | sadbhiśca rājapravaraite ime svargavāsinaḥ

‘ये राजा दुर्योधन देवताओं के साथ पूजित होते हैं, और इन सज्जनों तथा श्रेष्ठ राजाओं द्वारा भी, जो स्वर्ग में निवास करते हैं।

श्लोक 14 (18.1.14)

वीरलोकगतिं प्राप्ता युद्धे हुत्वाऽऽत्मनस्तनुम् । यूयं सर्वे सुरसमा येन युद्धेन बाधिताः ॥

vīralokagatiṃ prāptā yuddhe hutvā''tmanastanum | yūyaṃ sarve surasamā yena yuddhena bādhitāḥ

‘इन्होंने युद्ध में अपने शरीर की आहुति देकर वीरों की गति पाई है; इन्हीं के कारण तुम सब देवतुल्य होकर भी युद्ध में पीड़ित हुए।

श्लोक 15 (18.1.15)

स एष क्षत्रधर्मेण स्थानमेतदवाप्तवान् । भये महति योऽभीतो बभूव पृथिवीपतिः ॥

sa eṣa kṣatradharmeṇa sthānametadavāptavān | bhaye mahati yo'bhīto babhūva pṛthivīpatiḥ

‘क्षत्रिय-धर्म के पालन से इन्होंने यह स्थान पाया है; ये पृथ्वीपति महान् भय के समय भी निर्भय रहे।

श्लोक 16 (18.1.16)

न तन्मनसि कर्तव्यं पुत्र यद्द्यूतकारितम् । द्रौपद्याश्च परिक्लेशं न चिन्तयितुमर्हसि ॥

na tanmanasi kartavyaṃ putra yaddyūtakāritam | draupadyāśca parikleśaṃ na cintayitumarhasi

‘पुत्र! जुए के कारण जो हुआ, उसे मन में मत रखो; द्रौपदी के क्लेश का चिन्तन भी तुम्हें नहीं करना चाहिए।

श्लोक 17 (18.1.17)

ये चान्येऽपि परिक्लेशा युष्माकं ज्ञातिकारिताः । संग्रामेष्वथवाऽन्यत्र न तान्संस्मर्तुमर्हसि ॥

ye cānye'pi parikleśā yuṣmākaṃ jñātikāritāḥ | saṃgrāmeṣvathavā'nyatra na tānsaṃsmartumarhasi

‘और तुम लोगों को अपने बन्धुओं के कारण युद्धों में या अन्यत्र जो-जो क्लेश सहने पड़े, उन्हें भी स्मरण नहीं करना चाहिए।

श्लोक 18 (18.1.18)

समागच्छ यथान्यायं राज्ञा दुर्योधनेन वै । स्वर्गोऽयं नेह वैराणि भवन्ति मनुजाधिप ॥

samāgaccha yathānyāyaṃ rājñā duryodhanena vai | svargo'yaṃ neha vairāṇi bhavanti manujādhipa

‘राजा दुर्योधन से यथोचित रीति से मिलो। यह स्वर्ग है, हे नरेश, यहाँ वैर नहीं होते।’

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 19 (18.1.19)

नारदेनैवमुक्तस्तु कुरुराजो युधिष्ठिरः । भ्रातॄन्पप्रच्छ मेधावी वाक्यमेतदुवाच ह ॥

nāradenaivamuktastu kururājo yudhiṣṭhiraḥ | bhrātṝnpapraccha medhāvī vākyametaduvāca ha

नारद के ऐसा कहने पर बुद्धिमान कुरुराज युधिष्ठिर ने अपने भाइयों के विषय में पूछा और यह वचन कहा —

युधिष्ठिर उवाच

श्लोक 20 (18.1.20)

यदि दुर्योधनस्यैते वीरलोकाः सनातनाः । अधर्मज्ञस्य पापस्य पृथिवीसुहृदद्रुहः ॥

yadi duryodhanasyaite vīralokāḥ sanātanāḥ | adharmajñasya pāpasya pṛthivīsuhṛdadruhaḥ

‘यदि ये सनातन वीरलोक उस दुर्योधन के हैं — जो धर्म को नहीं जानता था, पापी था और पृथ्वी के हितैषियों से द्रोह करने वाला था —

श्लोक 21 (18.1.21)

यत्कृते पृथिवी नष्टा सहसा सनरद्विपा । वयं च मन्युना दग्धा वैरं प्रतिचिकीर्षवः ॥

yatkṛte pṛthivī naṣṭā sahasā sanaradvipā | vayaṃ ca manyunā dagdhā vairaṃ praticikīrṣavaḥ

‘जिसके कारण पृथ्वी मनुष्यों और हाथियों सहित सहसा नष्ट हो गई, और हम क्रोध से जलकर वैर का बदला लेना चाहते थे —

श्लोक 22 (18.1.22)

ये ते वीरा महात्मानो भ्रातरो मे महाव्रताः । सत्यप्रतिज्ञा लोकस्य शूरा वै सत्यवादिनः । तेषामिदानीं के लोका द्रष्टुमिच्छामि तानहम् ॥

ye te vīrā mahātmāno bhrātaro me mahāvratāḥ | satyapratijñā lokasya śūrā vai satyavādinaḥ | teṣāmidānīṃ ke lokā draṣṭumicchāmi tānaham

‘तो उन महात्मा वीरों, मेरे महाव्रती भाइयों को, जो अपनी प्रतिज्ञा के पक्के, शूर और संसार भर में सत्यवादी थे, अब कौन-से लोक मिले हैं? मैं उन्हें देखना चाहता हूँ —

श्लोक 23 (18.1.23)

कर्णं चैव महात्मानं कौन्तेयं सत्यसङ्गरम् । धृष्टद्युम्नं सात्यकिं च धृष्टद्युम्नस्य चात्मजान् ॥

karṇaṃ caiva mahātmānaṃ kaunteyaṃ satyasaṅgaram | dhṛṣṭadyumnaṃ sātyakiṃ ca dhṛṣṭadyumnasya cātmajān

‘महात्मा कर्ण को, जो कुन्ती का पुत्र और सत्य-प्रतिज्ञ था; धृष्टद्युम्न और सात्यकि को, और धृष्टद्युम्न के पुत्रों को;

श्लोक 24 (18.1.24)

ये च शस्त्रैर्वधं प्राप्ताः क्षत्रधर्मेण पार्थिवाः । क्वनु ते पार्थिवा ब्रह्मन्नैतान्पश्यामि नारद ॥

ye ca śastrairvadhaṃ prāptāḥ kṣatradharmeṇa pārthivāḥ | kvanu te pārthivā brahmannaitānpaśyāmi nārada

‘और जो राजा क्षत्रिय-धर्म के अनुसार शस्त्रों से मारे गए — हे ब्रह्मन् नारद, वे राजा कहाँ हैं? मैं उन्हें यहाँ नहीं देखता;

श्लोक 25 (18.1.25)

विराटद्रुपदौ चैव धृष्टकेतुमुखांश्च तान् । शिखण्डिनं च पाञ्चाल्यं द्रौपदेयांश्च सर्वशः । अभिमन्युं च दुर्धर्षं द्रष्टुमिच्छामि नारद ॥

virāṭadrupadau caiva dhṛṣṭaketumukhāṃśca tān | śikhaṇḍinaṃ ca pāñcālyaṃ draupadeyāṃśca sarvaśaḥ | abhimanyuṃ ca durdharṣaṃ draṣṭumicchāmi nārada

‘विराट और द्रुपद को, धृष्टकेतु आदि प्रमुख वीरों को; पाञ्चाल शिखण्डी को और द्रौपदी के सभी पुत्रों को; तथा दुर्धर्ष अभिमन्यु को — हे नारद, मैं इन सबको देखना चाहता हूँ।’

अध्याय-सूचीअध्याय 2