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स्वर्गारोहण पर्व · अध्याय 2

यातना-लोक में युधिष्ठिर

स्वर्ग में कर्ण और अपने भाइयों को न पाकर युधिष्ठिर देवताओं से कहते हैं कि वे वहाँ नहीं रहेंगे जहाँ वे नहीं हैं, और उन्हें स्वजन दिखाने के लिए एक देवदूत भेजा जाता है। युधिष्ठिर दूत के पीछे नरक के एक घृणित और भयंकर मार्ग से चलते हैं। लौटते समय दीन स्वर उनसे रुकने की विनती करते हैं और अपने को कर्ण, भीम, अर्जुन, नकुल-सहदेव और द्रौपदी बताते हैं। स्तब्ध और क्रुद्ध युधिष्ठिर लौटने से मना कर देते हैं और दूत को अपना निश्चय देकर इन्द्र के पास भेज देते हैं।

अध्याय 1अध्याय-सूचीअध्याय 3

युधिष्ठिर उवाच

श्लोक 1 (18.2.1)

नेह पश्यामि विबुधा राधेयममितौजसम् । भ्रातरौ च महात्मानौ युधामन्यूत्तमौजसौ ॥

neha paśyāmi vibudhā rādheyamamitaujasam | bhrātarau ca mahātmānau yudhāmanyūttamaujasau

हे देवताओ, मैं यहाँ अपार तेज वाले राधेय कर्ण को नहीं देखता, और न महात्मा भाइयों युधामन्यु तथा उत्तमौजा को;

श्लोक 2 (18.2.2)

जुहुवुर्ये शरीराणि रणवह्नौ महारथाः । राजानो राजपुत्राश्च ये मदर्थे हता रणे ॥

juhuvurye śarīrāṇi raṇavahnau mahārathāḥ | rājāno rājaputrāśca ye madarthe hatā raṇe

और न उन महारथियों को, उन राजाओं और राजकुमारों को, जिन्होंने रणभूमि की अग्नि में अपने शरीर की आहुति दी और मेरे लिए युद्ध में मारे गए।

श्लोक 3 (18.2.3)

क्व ते महारथाः सर्वे शार्दूलसमविक्रमाः । तैरप्ययं जितो लोकः कच्चित्पुरुषसत्तमैः ॥

kva te mahārathāḥ sarve śārdūlasamavikramāḥ | tairapyayaṃ jito lokaḥ kaccitpuruṣasattamaiḥ

सिंह के समान पराक्रम वाले वे सब महारथी कहाँ हैं? क्या उन श्रेष्ठ पुरुषों ने भी इस लोक को जीता है?

श्लोक 4 (18.2.4)

यदि लोकानिमान्प्राप्तास्ते च सर्वे महारथाः । स्थितं वित्त हि मां देवाः सहितं तैर्महात्मभिः ॥

yadi lokānimānprāptāste ca sarve mahārathāḥ | sthitaṃ vitta hi māṃ devāḥ sahitaṃ tairmahātmabhiḥ

यदि वे सब महारथी इन लोकों में पहुँचे हैं, तो हे देवताओ, जान लो कि मैं उन महात्माओं के साथ ही यहाँ रहूँगा।

श्लोक 5 (18.2.5)

कच्चिन्न तैरवाप्तोऽयं नृपैर्लोकोऽक्षयः शुभः । न तैरहं विना वत्स्ये भ्रातृभिर्ज्ञातिभिस्तथा ॥

kaccinna tairavāpto'yaṃ nṛpairloko'kṣayaḥ śubhaḥ | na tairahaṃ vinā vatsye bhrātṛbhirjñātibhistathā

अथवा क्या उन राजाओं ने यह अक्षय और शुभ लोक नहीं पाया? उनके बिना, अपने भाइयों और बन्धुओं के बिना, मैं नहीं रहूँगा।

श्लोक 6 (18.2.6)

मातुर्हि वचनं श्रुत्वा तदा सलिलकर्मणि । कर्णस्य क्रियतां तोयमिति तप्यामि तेन वै ॥

māturhi vacanaṃ śrutvā tadā salilakarmaṇi | karṇasya kriyatāṃ toyamiti tapyāmi tena vai

मैं इसलिए जलता हूँ कि जलदान के समय मैंने माता का यह वचन सुना था — ‘कर्ण के लिए जल दिया जाए’।

श्लोक 7 (18.2.7)

इदं च परितप्यामि पुनःपुनरहं सुराः । यन्मातुः सदृशौ पादौ तस्याहममितात्मनः ॥

idaṃ ca paritapyāmi punaḥpunarahaṃ surāḥ | yanmātuḥ sadṛśau pādau tasyāhamamitātmanaḥ

और हे देवताओ, इस बात का भी मैं बार-बार शोक करता हूँ कि उन अपार तेजस्वी के चरण मेरी माता के चरणों के समान ही थे।

श्लोक 8 (18.2.8)

दृष्ट्वैव तं नानुगतः कर्णं परबलार्दनम् । न ह्यस्मान्कर्णसहिताञ्जयेच्छक्रोऽपि संयुगे ॥

dṛṣṭvaiva taṃ nānugataḥ karṇaṃ parabalārdanam | na hyasmānkarṇasahitāñjayecchakro'pi saṃyuge

उन्हें देखकर भी मैं शत्रुसेना का मर्दन करने वाले कर्ण के पीछे नहीं गया; क्योंकि कर्ण के साथ रहने पर हमें युद्ध में इन्द्र भी नहीं जीत सकते थे।

श्लोक 9 (18.2.9)

तमहं यत्रतत्रस्थं द्रष्टुमिच्छामि सूर्यजम् । अविज्ञातो मया योसौ घातितः सव्यसाचिना ॥

tamahaṃ yatratatrasthaṃ draṣṭumicchāmi sūryajam | avijñāto mayā yosau ghātitaḥ savyasācinā

मैं सूर्यपुत्र कर्ण को, वह जहाँ भी हो, देखना चाहता हूँ — जिसे मेरे पहचानने से पहले ही अर्जुन ने मार डाला।

श्लोक 10 (18.2.10)

भीमं च भीमविक्रान्तं प्राणेभ्योऽपि प्रियं मम । अर्जुनं चेन्द्रसंकाशं यमौ चैव यमोपमौ ॥

bhīmaṃ ca bhīmavikrāntaṃ prāṇebhyo'pi priyaṃ mama | arjunaṃ cendrasaṃkāśaṃ yamau caiva yamopamau

और भयंकर पराक्रम वाले भीम को, जो मुझे प्राणों से भी प्रिय हैं; इन्द्र के समान अर्जुन को; और यम के समान दोनों जुड़वाँ भाइयों को —

श्लोक 11 (18.2.11)

द्रष्टुमिच्छामि तां चाहं पाञ्चालीं धर्मचारिणीम् । न चेह स्थातुमिच्छामि सत्यमेवं ब्रवीमि वः ॥

draṣṭumicchāmi tāṃ cāhaṃ pāñcālīṃ dharmacāriṇīm | na ceha sthātumicchāmi satyamevaṃ bravīmi vaḥ

और धर्मपरायणा उस पाञ्चाली को भी देखना चाहता हूँ। मैं यहाँ रहना नहीं चाहता। मैं तुमसे यह सत्य कहता हूँ।

श्लोक 12 (18.2.12)

किं मे भ्रातृविहीनस्य स्वर्गेण सुरसत्तमाः । यत्र ते मम स स्वर्गो नायं स्वर्गो मतो मम ॥

kiṃ me bhrātṛvihīnasya svargeṇa surasattamāḥ | yatra te mama sa svargo nāyaṃ svargo mato mama

हे देवश्रेष्ठो, भाइयों के बिना मुझे स्वर्ग से क्या? जहाँ वे हैं, वही मेरा स्वर्ग है; मेरी दृष्टि में यह स्वर्ग नहीं है।

देवा ऊचुः

श्लोक 13 (18.2.13)

यदि वै तत्र ते श्रद्धा गम्यतां तत्र माचिरम् । प्रिये हि तव वर्तामो देवराजस्य शासनात् ॥

yadi vai tatra te śraddhā gamyatāṃ tatra māciram | priye hi tava vartāmo devarājasya śāsanāt

यदि तुम्हारी श्रद्धा वहीं है, तो शीघ्र वहीं जाओ। देवराज की आज्ञा से हम तुम्हारा प्रिय ही करते हैं।

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 14 (18.2.14)

इत्युक्त्वा तं ततो देवा देवदूतमुपादिशन् । युधिष्ठिरस्य सुहृदो दर्शयेति परंतप ॥

ityuktvā taṃ tato devā devadūtamupādiśan | yudhiṣṭhirasya suhṛdo darśayeti paraṃtapa

यह कहकर देवताओं ने देवदूत को आदेश दिया — ‘युधिष्ठिर को उसके स्वजन दिखा दो’; हे परंतप!

श्लोक 15 (18.2.15)

ततः कुन्तीसुतो राजा देवदूतश्च जग्मतुः । सहितौ राजशार्दूल यत्र ते पुरुषर्षभाः ॥

tataḥ kuntīsuto rājā devadūtaśca jagmatuḥ | sahitau rājaśārdūla yatra te puruṣarṣabhāḥ

तब कुन्तीपुत्र राजा युधिष्ठिर और देवदूत दोनों साथ चल पड़े, हे राजशार्दूल, उस स्थान की ओर जहाँ वे पुरुषश्रेष्ठ थे।

श्लोक 16 (18.2.16)

अग्रतो देवदूतश्च ययौ राजा च पृष्ठतः । पन्थानमशुभं दुर्गं सेवितं पापकर्मभिः ॥

agrato devadūtaśca yayau rājā ca pṛṣṭhataḥ | panthānamaśubhaṃ durgaṃ sevitaṃ pāpakarmabhiḥ

आगे देवदूत चला और पीछे राजा, एक अशुभ और दुर्गम मार्ग से, जिस पर पापकर्मी चलते थे —

श्लोक 17 (18.2.17)

तमसा संवृतं घोरं केशशैवलशाद्वलम् । युक्तं पापकृतां गन्धैर्मासशोणितकर्दमम् ॥

tamasā saṃvṛtaṃ ghoraṃ keśaśaivalaśādvalam | yuktaṃ pāpakṛtāṃ gandhairmāsaśoṇitakardamam

जो अन्धकार से ढका और भयानक था, जिसमें केश ही सेवार और घास थे, जो पापियों की दुर्गन्ध से भरा था और जहाँ मांस तथा रक्त का कीचड़ था,

श्लोक 18 (18.2.18)

दंशोत्पातकभल्लूकमक्षिकामशकावृतम् । इतश्चेतश्च कुणपैः समन्तात्परिवारितम् ॥

daṃśotpātakabhallūkamakṣikāmaśakāvṛtam | itaścetaśca kuṇapaiḥ samantātparivāritam

जो डाँस, काटने वाले कीड़ों, भालुओं, मक्खियों और मच्छरों से भरा था, और जिसके चारों ओर इधर-उधर शव पड़े थे,

श्लोक 19 (18.2.19)

अस्थिकेशसमाकीर्णं कृमिकीटसमाकुलम् । ज्वलनेन प्रदीप्तेन समन्तात्परिवेष्टितम् ॥

asthikeśasamākīrṇaṃ kṛmikīṭasamākulam | jvalanena pradīptena samantātpariveṣṭitam

जिसमें हड्डियाँ और केश बिखरे थे, जो कीड़ों और कृमियों से भरा था, और जिसे चारों ओर जलती हुई आग ने घेर रखा था,

श्लोक 20 (18.2.20)

अयोमुखैश्च काकाद्यैर्गृध्रैश्च समभिद्रुतम् । सूचीमुखैस्तथा प्रेतैर्विन्ध्यशैलोपमैर्वृतम् ॥

ayomukhaiśca kākādyairgṛdhraiśca samabhidrutam | sūcīmukhaistathā pretairvindhyaśailopamairvṛtam

जिस पर लोहे की चोंच वाले कौए और गिद्ध झपटते थे, और जो सुई जैसे मुँह वाले, विन्ध्य पर्वत के समान विशाल प्रेतों से घिरा था,

श्लोक 21 (18.2.21)

मेदोरुधिरयुक्तैश्च च्छिन्नबाहूरुपाणिभिः । निकृत्तोदरपदैश्च तत्रतत्र प्रवेशितैः ॥

medorudhirayuktaiśca cchinnabāhūrupāṇibhiḥ | nikṛttodarapadaiśca tatratatra praveśitaiḥ

और जहाँ-तहाँ चर्बी और रक्त से सने, कटी हुई भुजाओं, जाँघों और हाथों वाले, तथा कटे हुए पेट और पैरों वाले शव बिखरे पड़े थे।

श्लोक 22 (18.2.22)

स तत्कुणपदुर्गन्धमशिवं रोमहर्षणम् । जगाम राजा धर्मात्मा मध्ये बहु विचिन्तयन् ॥

sa tatkuṇapadurgandhamaśivaṃ romaharṣaṇam | jagāma rājā dharmātmā madhye bahu vicintayan

शवों की उस अशुभ, रोमांचकारी दुर्गन्ध के बीच से धर्मात्मा राजा गहन चिन्ता करते हुए आगे बढ़ते गए।

श्लोक 23 (18.2.23)

ददर्शोष्णोदकैः पूर्णां नदीं चापि सुदुर्गमाम् । असिपत्रवनं चैव निशितं क्षुरसंवृतम् ॥

dadarśoṣṇodakaiḥ pūrṇāṃ nadīṃ cāpi sudurgamām | asipatravanaṃ caiva niśitaṃ kṣurasaṃvṛtam

उन्होंने खौलते जल से भरी, अत्यन्त दुर्गम नदी देखी, और तलवार जैसे पत्तों वाला वन भी, जो तीखा और उस्तरों से घिरा था,

श्लोक 24 (18.2.24)

करम्भवालुकास्तप्ता आयसीश्च शिलाः पृथक् । लोहकुंभीश्च तैलस्य क्वाथ्यमानाः समन्ततः ॥

karambhavālukāstaptā āyasīśca śilāḥ pṛthak | lohakuṃbhīśca tailasya kvāthyamānāḥ samantataḥ

तपती हुई करम्भ-बालू, अलग-अलग रखी लोहे की शिलाएँ, और लोहे के कड़ाहे जिनमें चारों ओर तेल खौल रहा था,

श्लोक 25 (18.2.25)

कूटशाल्मलिकं चापि दुःस्पर्शं तीक्ष्णकण्टकम् । ददर्शान्याश्च कौन्तेयो यातनाः पापकर्मिणाम् ॥

kūṭaśālmalikaṃ cāpi duḥsparśaṃ tīkṣṇakaṇṭakam | dadarśānyāśca kaunteyo yātanāḥ pāpakarmiṇām

और कूटशाल्मली वृक्ष, जो छूने में कठोर और तीखे काँटों से भरा था। कुन्तीपुत्र ने पापियों की ये और अन्य यातनाएँ देखीं।

श्लोक 26 (18.2.26)

स तं दुर्गन्धमालक्ष्य देवदूतमुवाच ह । कियदध्वानमस्माभिर्गन्तव्यमिममीदृशम् ॥

sa taṃ durgandhamālakṣya devadūtamuvāca ha | kiyadadhvānamasmābhirgantavyamimamīdṛśam

उस दुर्गन्ध को देखकर उन्होंने देवदूत से कहा — ‘ऐसे मार्ग पर हमें कितनी दूर और चलना है?

युधिष्ठिर उवाच

श्लोक 27 (18.2.27)

क्व च ते भ्रातरो मह्यं तन्ममाख्यातुमर्हसि । देशोऽयं कश्च देवानामेतदिच्छामि वेदितुम् ॥

kva ca te bhrātaro mahyaṃ tanmamākhyātumarhasi | deśo'yaṃ kaśca devānāmetadicchāmi veditum

और मेरे भाई कहाँ हैं? यह आप मुझे बताइए। और देवताओं का यह कौन-सा स्थान है? यह भी मैं जानना चाहता हूँ।’

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 28 (18.2.28)

स संनिववृते श्रुत्वा धर्मराजस्य भाषितम् । देवदूतोऽब्रवीच्चैनमेतावद्गमनं तव ॥

sa saṃnivavṛte śrutvā dharmarājasya bhāṣitam | devadūto'bravīccainametāvadgamanaṃ tava

धर्मराज की बात सुनकर देवदूत रुक गया और उनसे बोला — ‘आपका इतना ही चलना था।

देवदूत उवाच

श्लोक 29 (18.2.29)

निवर्तितव्यो हि मया तथाऽस्म्युक्तो दिवौकसैः । यदि श्रान्तोसि राजेन्द्र त्वमथागन्तुमर्हसि ॥

nivartitavyo hi mayā tathā'smyukto divaukasaiḥ | yadi śrāntosi rājendra tvamathāgantumarhasi

मुझे लौटना है, क्योंकि स्वर्गवासियों ने मुझसे ऐसा ही कहा है। हे राजेन्द्र, यदि आप थक गए हों तो मेरे साथ लौट सकते हैं।’

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 30 (18.2.30)

युधिष्ठिरस्तु निर्विण्णस्तेन गन्धेन मूर्छितः । निवर्तने धृतमनाः पर्यावर्तत भारत ॥

yudhiṣṭhirastu nirviṇṇastena gandhena mūrchitaḥ | nivartane dhṛtamanāḥ paryāvartata bhārata

परन्तु युधिष्ठिर खिन्न थे और उस दुर्गन्ध से मूर्छित-से हो गए थे; लौटने का मन बनाकर वे मुड़ पड़े, हे भारत।

श्लोक 31 (18.2.31)

स संनिवृत्तो धर्मात्मा दुःखशोकसमाहतः । शुश्राव तत्र वदतां दीना वाचः समन्ततः ॥

sa saṃnivṛtto dharmātmā duḥkhaśokasamāhataḥ | śuśrāva tatra vadatāṃ dīnā vācaḥ samantataḥ

लौटते हुए, दुःख और शोक से पीड़ित धर्मात्मा राजा ने चारों ओर बोलने वालों की दीन वाणी सुनी।

नरकस्था ऊचुः

श्लोक 32 (18.2.32)

भोभो धर्मज राजर्षे पुण्याभिजन पाण्डव । अनुग्रहार्थमस्माकं तिष्ठ तावन्मुहूर्तकम् ॥

bhobho dharmaja rājarṣe puṇyābhijana pāṇḍava | anugrahārthamasmākaṃ tiṣṭha tāvanmuhūrtakam

‘हे धर्मपुत्र राजर्षि, पुण्यवंश में जन्मे पाण्डव! हमारे ऊपर कृपा करने के लिए थोड़ी देर यहीं ठहर जाओ।

श्लोक 33 (18.2.33)

आयाति त्वयि दुर्धर्षे वाति पुण्यः समीरणः । तव गन्धानुगस्तात येनास्मान्सुखमागमत् ॥

āyāti tvayi durdharṣe vāti puṇyaḥ samīraṇaḥ | tava gandhānugastāta yenāsmānsukhamāgamat

‘हे दुर्धर्ष, तुम्हारे आते ही पवित्र वायु बह रही है, तात, जो तुम्हारी गन्ध के पीछे-पीछे आती है; उससे हमें सुख मिला है।

श्लोक 34 (18.2.34)

ते वयं पार्थ दीर्घस्य कालस्य पुरुषर्षभ । सुखमासादयिष्यामस्त्वां दृष्ट्वा राजसत्तम ॥

te vayaṃ pārtha dīrghasya kālasya puruṣarṣabha | sukhamāsādayiṣyāmastvāṃ dṛṣṭvā rājasattama

‘हे पृथापुत्र, पुरुषश्रेष्ठ! हे राजाओं में श्रेष्ठ! बहुत समय के बाद तुम्हें देखकर हम सुख पाएँगे।

श्लोक 35 (18.2.35)

संतिष्ठस्व महाबाहो मुहूर्तमिह भारत । त्वयि तिष्ठति कौरव्य यातनाऽस्मान्न बाधते ॥

saṃtiṣṭhasva mahābāho muhūrtamiha bhārata | tvayi tiṣṭhati kauravya yātanā'smānna bādhate

‘हे महाबाहु भारत, यहाँ एक मुहूर्त ठहरो। हे कौरव्य, तुम्हारे रहते यातना हमें पीड़ा नहीं देती।’

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 36 (18.2.36)

एवं बहुविधा वाचः कृपणा वेदनावताम् । तस्मिन्देशे स शुश्राव समन्ताद्वदतां नृप ॥

evaṃ bahuvidhā vācaḥ kṛpaṇā vedanāvatām | tasmindeśe sa śuśrāva samantādvadatāṃ nṛpa

हे राजन्, उस स्थान पर उन्होंने चारों ओर से बोलते हुए पीड़ितों की ऐसी अनेक दयनीय पुकारें सुनीं।

श्लोक 37 (18.2.37)

तेषां तु वचनं श्रुत्वा दयावान्दीनभाषिणाम् । अहो कृच्छ्रमिति प्राह तस्थौ स च युधिष्ठिरः ॥

teṣāṃ tu vacanaṃ śrutvā dayāvāndīnabhāṣiṇām | aho kṛcchramiti prāha tasthau sa ca yudhiṣṭhiraḥ

उन दीन वचन बोलने वालों की बात सुनकर दयालु युधिष्ठिर ने ‘हाय, कैसा कष्ट है!’ कहा और वहीं खड़े रह गए।

श्लोक 38 (18.2.38)

स ता गिरः पुरस्ताद्वै श्रुतपूर्वाः पुनःपुनः । ग्लानानां दुःखितानां च नाभ्यजानत पाण्डवः ॥

sa tā giraḥ purastādvai śrutapūrvāḥ punaḥpunaḥ | glānānāṃ duḥkhitānāṃ ca nābhyajānata pāṇḍavaḥ

थके हुए और दुःखी लोगों की उन वाणियों को, जिन्हें वे पहले भी सुन चुके थे, बार-बार सुनकर भी पाण्डव पहचान न सके।

श्लोक 39 (18.2.39)

अबुध्यमानस्ता वाचो धर्मपुत्रो युधिष्ठिरः । उवाच के भवन्तो वै किमर्थमिह तिष्ठथ ॥

abudhyamānastā vāco dharmaputro yudhiṣṭhiraḥ | uvāca ke bhavanto vai kimarthamiha tiṣṭhatha

उन वाणियों को न पहचानते हुए धर्मपुत्र युधिष्ठिर ने पूछा — ‘आप कौन हैं, और यहाँ क्यों ठहरे हैं?’

श्लोक 40 (18.2.40)

इत्युक्तास्ते ततः सर्वे समन्तादवभाषिरे । कर्णोऽहं भीमसेनोऽहमर्जुनोऽहमिति प्रभो ॥

ityuktāste tataḥ sarve samantādavabhāṣire | karṇo'haṃ bhīmaseno'hamarjuno'hamiti prabho

यह सुनकर वे सब चारों ओर से बोले — ‘मैं कर्ण हूँ! मैं भीमसेन हूँ! मैं अर्जुन हूँ!’ हे प्रभो।

श्लोक 41 (18.2.41)

नकुलः सहदेवोऽहं धृष्टद्युम्नोऽहमित्युत । द्रौपदी द्रौपदेयाश्च इत्येवं ते विचुक्रुशुः ॥

nakulaḥ sahadevo'haṃ dhṛṣṭadyumno'hamityuta | draupadī draupadeyāśca ityevaṃ te vicukruśuḥ

‘मैं नकुल हूँ! मैं सहदेव हूँ! मैं धृष्टद्युम्न हूँ!’ — ‘हम द्रौपदी और द्रौपदी के पुत्र हैं!’ इस प्रकार वे चिल्लाए।

श्लोक 42 (18.2.42)

ता वाचः स तदा श्रुत्वा तद्देशसदृशीर्नृप । ततो विममृशे राजा किंत्विदं दैवकारितम् ॥

tā vācaḥ sa tadā śrutvā taddeśasadṛśīrnṛpa | tato vimamṛśe rājā kiṃtvidaṃ daivakāritam

हे राजन्, उस स्थान के अनुरूप उन वाणियों को सुनकर राजा सोचने लगे — ‘यह दैव ने कैसा खेल रचा है?

श्लोक 43 (18.2.43)

किन्तु तत्कलुषं कर्म कृतमेभिर्महात्मभिः । कर्णेन द्रौपदेयैर्वा पाञ्चाल्या वा सुमध्यया ॥

kintu tatkaluṣaṃ karma kṛtamebhirmahātmabhiḥ | karṇena draupadeyairvā pāñcālyā vā sumadhyayā

इन महात्माओं ने — कर्ण ने, द्रौपदी के पुत्रों ने, या सुन्दर कटि वाली पाञ्चाली ने — ऐसा कौन-सा बुरा कर्म किया,

श्लोक 44 (18.2.44)

य इमे पापगन्धेऽस्मिन्देशे सन्ति सुदारुणे । नाहं जानामि सर्वेषां दुष्कृतं पुण्यकर्मणाम् ॥

ya ime pāpagandhe'smindeśe santi sudāruṇe | nāhaṃ jānāmi sarveṣāṃ duṣkṛtaṃ puṇyakarmaṇām

कि वे पाप की गन्ध से भरे इस अत्यन्त भयंकर स्थान में हैं? ये सब तो पुण्यकर्मा थे; मैं इनमें से किसी का कोई दुष्कर्म नहीं जानता।

श्लोक 45 (18.2.45)

किं कृत्वा धृतराष्ट्रस्य पुत्रो राजा सुयोधनः । तथा श्रिया युतः पापैः सह सर्वैः पदानुगैः ॥

kiṃ kṛtvā dhṛtarāṣṭrasya putro rājā suyodhanaḥ | tathā śriyā yutaḥ pāpaiḥ saha sarvaiḥ padānugaiḥ

धृतराष्ट्र के पुत्र राजा सुयोधन ने ऐसा क्या किया — उस पापी ने, जो अपने सब पापी अनुचरों के साथ इतने वैभव से युक्त है —

श्लोक 46 (18.2.46)

महेन्द्र इव लक्ष्मीवानास्ते परमपूजितः । कस्येदानीं विकारोऽयं य इमे नरकं गताः ॥

mahendra iva lakṣmīvānāste paramapūjitaḥ | kasyedānīṃ vikāro'yaṃ ya ime narakaṃ gatāḥ

कि वह महेन्द्र के समान ऐश्वर्यशाली होकर परम सम्मान के साथ बैठा है? यह किसकी विपरीतता है कि ये लोग नरक में आ पड़े हैं?

श्लोक 47 (18.2.47)

सर्वे धर्मविदः शूराः सत्यागमपरायणाः । क्षत्रधर्मरताः सन्तो यज्वानो भूरिदक्षिणाः ॥

sarve dharmavidaḥ śūrāḥ satyāgamaparāyaṇāḥ | kṣatradharmaratāḥ santo yajvāno bhūridakṣiṇāḥ

ये सब धर्म के जानने वाले, शूर, सत्य और शास्त्र में तत्पर, क्षत्रिय-धर्म में रत, सज्जन तथा प्रचुर दक्षिणा देने वाले यज्ञकर्ता थे।

श्लोक 48 (18.2.48)

किंनु सुप्तोस्मि जागर्मि चेतयामि न चेतये । अहो चित्तविकारोऽयं स्याद्वा मे चित्तविभ्रमः ॥

kiṃnu suptosmi jāgarmi cetayāmi na cetaye | aho cittavikāro'yaṃ syādvā me cittavibhramaḥ

क्या मैं सो रहा हूँ या जाग रहा हूँ? क्या मैं चेतन हूँ या अचेत? हाय, यह मेरे चित्त का विकार है या मेरी बुद्धि का भ्रम?’

श्लोक 49 (18.2.49)

एवं बहुविधं राजा विममर्श युधिष्ठिरः । दुःखशोकसमाविष्टश्चिन्ताव्याकुलितेन्द्रियः ॥

evaṃ bahuvidhaṃ rājā vimamarśa yudhiṣṭhiraḥ | duḥkhaśokasamāviṣṭaścintāvyākulitendriyaḥ

इस प्रकार राजा युधिष्ठिर अनेक प्रकार से विचार करते रहे; वे दुःख और शोक से भर गए थे और चिन्ता से उनकी इन्द्रियाँ व्याकुल हो उठी थीं।

श्लोक 50 (18.2.50)

क्रोधमाहारयच्चैव तीव्रं धर्मसुतो नृपः । देवांश्च गर्हयामास धर्मं चैव युधिष्ठिरः ॥

krodhamāhārayaccaiva tīvraṃ dharmasuto nṛpaḥ | devāṃśca garhayāmāsa dharmaṃ caiva yudhiṣṭhiraḥ

धर्मपुत्र राजा को तीव्र क्रोध हो आया, और युधिष्ठिर ने देवताओं की तथा स्वयं धर्म की निन्दा की।

श्लोक 51 (18.2.51)

स तीव्रशोकसंतप्तो देवदूतमुवाच ह । गम्यतां तत्र येषां त्वं दूतस्तेषामुपान्तिकम् ॥

sa tīvraśokasaṃtapto devadūtamuvāca ha | gamyatāṃ tatra yeṣāṃ tvaṃ dūtasteṣāmupāntikam

तीव्र शोक से सन्तप्त होकर उन्होंने देवदूत से कहा — ‘जिनके तुम दूत हो, उन्हीं के पास लौट जाओ।

युधिष्ठिर उवाच

श्लोक 52 (18.2.52)

न ह्यहं तत्र यास्यामि स्थितोस्मीति निवेद्यताम् । मत्संश्रयादिमे दूनाः सुखिनो भ्रातरो हि मे ॥

na hyahaṃ tatra yāsyāmi sthitosmīti nivedyatām | matsaṃśrayādime dūnāḥ sukhino bhrātaro hi me

मैं वहाँ नहीं जाऊँगा; उनसे कह देना कि मैं यहीं रुका हूँ। मेरे भाई पीड़ित हैं, फिर भी मेरे समीप रहने से सुखी हैं।’

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 53 (18.2.53)

इत्युक्तः स तदा दूतः पाण्डुपुत्रेण धीमता । जगाम तत्र यत्रास्ते देवराजः शतक्रतुः ॥

ityuktaḥ sa tadā dūtaḥ pāṇḍuputreṇa dhīmatā | jagāma tatra yatrāste devarājaḥ śatakratuḥ

बुद्धिमान पाण्डुपुत्र के ऐसा कहने पर वह दूत वहाँ गया जहाँ सौ यज्ञ करने वाले देवराज इन्द्र थे,

श्लोक 54 (18.2.54)

निवेदयामास च तद्धर्मराजचिकीर्षितम् । यथोक्तं धर्मपुत्रेण सर्वमेव जनाधिप ॥

nivedayāmāsa ca taddharmarājacikīrṣitam | yathoktaṃ dharmaputreṇa sarvameva janādhipa

और हे जनाधिप, धर्मपुत्र ने जैसा कहा था, ठीक वैसा ही धर्मराज का सारा अभिप्राय उन्हें बता दिया।

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