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स्वर्गारोहण पर्व · अध्याय 3

माया का हटना और गंगा-स्नान

यातना-लोक में खड़े युधिष्ठिर के पास इन्द्र आदि देवता और स्वयं धर्म आ पहुँचते हैं; अन्धकार और नरक के सब दृश्य लुप्त हो जाते हैं। इन्द्र बताते हैं कि हर राजा को नरक देखना ही पड़ता है, कि द्रोण के प्रति किए गए एक छल के कारण युधिष्ठिर को नरक दिखाया गया, और उनके भाइयों तथा द्रौपदी को भी उसी प्रकार दिखाया गया। धर्म कहते हैं कि यह युधिष्ठिर की उनकी तीसरी परीक्षा थी और वह दृश्य इन्द्र की माया थी। युधिष्ठिर दिव्य गंगा में स्नान कर मानव शरीर त्याग देते हैं और दिव्य रूप में अपने स्वजनों के पास जाते हैं।

अध्याय 2अध्याय-सूचीअध्याय 4

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 1 (18.3.1)

स्थिते मुहूर्तं पार्थे तु धर्मराजे युधिष्ठिरे । आजग्मुस्तत्र कौरव्यं देवाः शक्रपुरोगमाः ॥

sthite muhūrtaṃ pārthe tu dharmarāje yudhiṣṭhire | ājagmustatra kauravyaṃ devāḥ śakrapurogamāḥ

जब पृथापुत्र धर्मराज युधिष्ठिर वहाँ एक मुहूर्त खड़े रहे, तब हे कौरव्य, इन्द्र को आगे करके देवता वहाँ आए।

श्लोक 2 (18.3.2)

स च विग्रहवान्धर्मो राजानं संपरीक्ष्य तम् । तत्राजगाम यत्रासौ कुरुराजो युधिष्ठिरः ॥

sa ca vigrahavāndharmo rājānaṃ saṃparīkṣya tam | tatrājagāma yatrāsau kururājo yudhiṣṭhiraḥ

और मूर्तिमान धर्म भी राजा की भली-भाँति परीक्षा करके वहाँ आए जहाँ कुरुराज युधिष्ठिर थे।

श्लोक 3 (18.3.3)

तेषु भासुरदेहेषु पुण्याभिजनकर्मसु । समागतेषु देवेषु व्यगमत्तत्तमो नृप ॥

teṣu bhāsuradeheṣu puṇyābhijanakarmasu | samāgateṣu deveṣu vyagamattattamo nṛpa

तेजस्वी शरीर वाले, पवित्र कुल और कर्म वाले उन देवताओं के एकत्र होने पर वह अन्धकार दूर हो गया, हे राजन्।

श्लोक 4 (18.3.4)

नादृश्यन्त च तास्तत्र यातनाः पापकर्मणाम् । नदी वैतरणी चैव कूटशाल्मलिना सह ॥

nādṛśyanta ca tāstatra yātanāḥ pāpakarmaṇām | nadī vaitaraṇī caiva kūṭaśālmalinā saha

वहाँ पापियों की वे यातनाएँ अब दिखाई नहीं दीं, न वैतरणी नदी, न कूटशाल्मली वृक्ष।

श्लोक 5 (18.3.5)

लोहकुंभ्यः शिलाश्चैव नादृश्यन्त भयानकाः । विकृतानि शरीराणि यानि तत्र समन्ततः ॥

lohakuṃbhyaḥ śilāścaiva nādṛśyanta bhayānakāḥ | vikṛtāni śarīrāṇi yāni tatra samantataḥ

लोहे के कड़ाहे और भयानक शिलाएँ भी दिखाई नहीं दीं, और न वे विकृत शरीर जो वहाँ चारों ओर पड़े थे।

श्लोक 6 (18.3.6)

ददर्श राजा कौरव्यस्तान्सर्वान्सुमहाप्रभान् ॥

dadarśa rājā kauravyastānsarvānsumahāprabhān

कुरुराज ने उन सबको अत्यन्त तेजस्वी रूप में देखा।

श्लोक 7 (18.3.7)

ततो वायुः सुखस्पर्शः पुण्यगन्धवहः शुचिः । ववौ देवसमीपस्थः शीतलोऽतीव भारत ॥

tato vāyuḥ sukhasparśaḥ puṇyagandhavahaḥ śuciḥ | vavau devasamīpasthaḥ śītalo'tīva bhārata

तब देवताओं के समीप से पवित्र, सुखद स्पर्श वाली और पुण्य गन्ध ढोने वाली वायु बहने लगी, जो अत्यन्त शीतल थी, हे भारत।

श्लोक 8 (18.3.8)

मरुतः सह शक्रेण वसवश्चाश्विनौ सह । साध्या रुद्रास्तथाऽऽदित्या ये चान्येऽपि दिवौकसः ॥

marutaḥ saha śakreṇa vasavaścāśvinau saha | sādhyā rudrāstathā''dityā ye cānye'pi divaukasaḥ

इन्द्र के साथ मरुद्गण, वसु, दोनों अश्विनीकुमार, साध्य, रुद्र, आदित्य और स्वर्ग में रहने वाले अन्य देवता,

श्लोक 9 (18.3.9)

सर्वे तत्र समाजग्मुः सिद्धाश्च परमर्षयः । यत्र राजा महातेजा धर्मपुत्रः स्थितोऽभवत् ॥

sarve tatra samājagmuḥ siddhāśca paramarṣayaḥ | yatra rājā mahātejā dharmaputraḥ sthito'bhavat

सिद्ध और महर्षि भी — सब वहाँ एकत्र हुए जहाँ महातेजस्वी राजा धर्मपुत्र खड़े थे।

श्लोक 10 (18.3.10)

ततः शक्रः सुरपतिः श्रिया परमया युतः । युधिष्ठिरमुवाचेदं सान्त्वपूर्वमिदं वचः ॥

tataḥ śakraḥ surapatiḥ śriyā paramayā yutaḥ | yudhiṣṭhiramuvācedaṃ sāntvapūrvamidaṃ vacaḥ

तब परम तेज से युक्त देवराज इन्द्र ने युधिष्ठिर से पहले सान्त्वना देते हुए ये वचन कहे —

इन्द्र उवाच

श्लोक 11 (18.3.11)

युधिष्ठिर महाबाहो प्रीता देवगणास्त्वया । एह्येहि पुरुषव्याघ्र कृतमेतावता विभो ॥

yudhiṣṭhira mahābāho prītā devagaṇāstvayā | ehyehi puruṣavyāghra kṛtametāvatā vibho

‘महाबाहु युधिष्ठिर! देवगण तुमसे प्रसन्न हैं। आओ, पुरुषव्याघ्र, आओ; हे विभो, इतना ही बहुत हुआ।

श्लोक 12 (18.3.12)

सिद्धिः प्राप्ता महाबाहो लोकाश्चाप्यक्षयास्तव । भ्रातॄणां सुहृदां चैव गतिर्नित्या सुपूजिता ॥

siddhiḥ prāptā mahābāho lokāścāpyakṣayāstava | bhrātṝṇāṃ suhṛdāṃ caiva gatirnityā supūjitā

‘हे महाबाहो, तुम्हें सिद्धि प्राप्त हुई है और तुम्हारे लोक अक्षय हैं; तुम्हारे भाइयों और मित्रों की गति भी नित्य और सुपूजित है।

श्लोक 13 (18.3.13)

न च मन्युस्त्वया कार्यः शृणु चेदं वचो मम । अवश्यं नरकस्तात द्रष्टव्यः सर्वराजभिः ॥

na ca manyustvayā kāryaḥ śṛṇu cedaṃ vaco mama | avaśyaṃ narakastāta draṣṭavyaḥ sarvarājabhiḥ

‘तुम्हें क्रोध नहीं करना चाहिए; मेरी यह बात सुनो। हे तात, सभी राजाओं को नरक अवश्य देखना पड़ता है।

श्लोक 14 (18.3.14)

शुभानामशुभानां च द्वौ राशी पुरुषर्षभ । यः पूर्वं सुकृतं भुङ्क्ते पश्चान्निरयमेति सः ॥

śubhānāmaśubhānāṃ ca dvau rāśī puruṣarṣabha | yaḥ pūrvaṃ sukṛtaṃ bhuṅkte paścānnirayameti saḥ

‘हे पुरुषश्रेष्ठ, शुभ और अशुभ कर्मों की दो राशियाँ हैं: जो पहले अपने पुण्य का फल भोगता है, वह पीछे नरक में जाता है;

श्लोक 15 (18.3.15)

पूर्वं नरकभाग्यस्तु पश्चात्स्वर्गमुपैति सः । भूयिष्ठं पापकर्मा यः स पूर्वं स्वर्गमश्नुते ॥

pūrvaṃ narakabhāgyastu paścātsvargamupaiti saḥ | bhūyiṣṭhaṃ pāpakarmā yaḥ sa pūrvaṃ svargamaśnute

‘और जिसे पहले नरक का भाग मिलता है, वह पीछे स्वर्ग पाता है। जिसके कर्म अधिकतर पापमय हैं, वह पहले स्वर्ग भोगता है।

श्लोक 16 (18.3.16)

भूयिष्ठशुभकर्मा त्वमल्पजिह्मतयाऽच्युत । तेन त्वमेवं गमितो मया श्रेयोर्थिना नृप ॥

bhūyiṣṭhaśubhakarmā tvamalpajihmatayā'cyuta | tena tvamevaṃ gamito mayā śreyorthinā nṛpa

‘हे अच्युत, तुम्हारे कर्म अधिकतर शुभ थे और कुटिलता बहुत थोड़ी थी; इसीलिए तुम्हारा कल्याण चाहने वाला मैं तुम्हें इस प्रकार यहाँ ले आया, हे राजन्।

श्लोक 17 (18.3.17)

व्याजेन हि त्वया द्रोण उपचीर्णः सुतं प्रति । व्याजेनैव ततो राजन्दर्शितो नरकस्तव ॥

vyājena hi tvayā droṇa upacīrṇaḥ sutaṃ prati | vyājenaiva tato rājandarśito narakastava

‘तुमने पुत्र के विषय में छल के सहारे द्रोण को धोखा दिया था; इसीलिए हे राजन्, छल से ही तुम्हें नरक दिखाया गया।

श्लोक 18 (18.3.18)

यथैव त्वं तथा भीमस्तथा पार्थो यमौ तथा । द्रौपदी च तथा कृष्णा व्याजेन नरकं गताः । आगच्छ नरशार्दूल मुक्तास्ते चैव कल्मषात् ॥

yathaiva tvaṃ tathā bhīmastathā pārtho yamau tathā | draupadī ca tathā kṛṣṇā vyājena narakaṃ gatāḥ | āgaccha naraśārdūla muktāste caiva kalmaṣāt

‘जैसे तुम, वैसे ही भीम, अर्जुन, दोनों जुड़वाँ भाई और कृष्णा द्रौपदी भी छल से नरक गए। हे नरशार्दूल, आओ; तुम सब पाप-दोष से मुक्त हो चुके हो।

श्लोक 19 (18.3.19)

स्वपक्ष्याश्चैव ये तुभ्यं पार्थिवा निहता रणे । सर्वे स्वर्गमनुप्राप्तास्तान्पश्य भरतर्षभ ॥

svapakṣyāścaiva ye tubhyaṃ pārthivā nihatā raṇe | sarve svargamanuprāptāstānpaśya bharatarṣabha

‘तुम्हारे पक्ष के जो राजा युद्ध में मारे गए, वे सब स्वर्ग को प्राप्त हुए हैं; हे भरतश्रेष्ठ, आओ, उन्हें देखो।

श्लोक 20 (18.3.20)

कर्णश्चैव महेष्वासः सर्वशस्त्रभृतांवरः । स गतः परमां सिद्धिं यदर्थं परितप्यसे ॥

karṇaścaiva maheṣvāsaḥ sarvaśastrabhṛtāṃvaraḥ | sa gataḥ paramāṃ siddhiṃ yadarthaṃ paritapyase

‘और महाधनुर्धर कर्ण, जो सब शस्त्रधारियों में श्रेष्ठ था, परम सिद्धि को प्राप्त हो चुका है — जिसके लिए तुम शोक करते हो।

श्लोक 21 (18.3.21)

तं पश्य पुरुषव्याघ्रमादित्यतनयं विभो । स्वस्थानस्थं महाबाहो जहि शोकं नरर्षभ ॥

taṃ paśya puruṣavyāghramādityatanayaṃ vibho | svasthānasthaṃ mahābāho jahi śokaṃ nararṣabha

‘हे विभो, पुरुषव्याघ्र सूर्यपुत्र कर्ण को अपने स्थान पर स्थित देखो; हे महाबाहो, हे नरश्रेष्ठ, शोक त्याग दो।

श्लोक 22 (18.3.22)

भ्रातॄन्पुत्रांस्तथा पश्य स्वपक्ष्यांश्चैव पार्थिवान् । स्वंस्वं स्थानमनुप्राप्तान्व्येतु ते मानसो ज्वरः ॥

bhrātṝnputrāṃstathā paśya svapakṣyāṃścaiva pārthivān | svaṃsvaṃ sthānamanuprāptānvyetu te mānaso jvaraḥ

‘अपने भाइयों, पुत्रों और अपने पक्ष के राजाओं को देखो, जो सब अपने-अपने स्थान को पहुँच चुके हैं; तुम्हारे मन का ताप दूर हो।

श्लोक 23 (18.3.23)

कृच्छ्रं पूर्वं चानुभूय इतःप्रभृति कौरव । विहारस्व मया सार्धं गतशोको निरामयः ॥

kṛcchraṃ pūrvaṃ cānubhūya itaḥprabhṛti kaurava | vihārasva mayā sārdhaṃ gataśoko nirāmayaḥ

‘पहले कष्ट भोगकर अब से, हे कौरव, शोक और रोग से रहित होकर मेरे साथ विहार करो।

श्लोक 24 (18.3.24)

कर्मणां तात पुण्यानां ज्ञानानां तपसां स्वयम् । दानानां च महाबाहो फलं प्राप्नुहि पार्थिवः ॥

karmaṇāṃ tāta puṇyānāṃ jñānānāṃ tapasāṃ svayam | dānānāṃ ca mahābāho phalaṃ prāpnuhi pārthivaḥ

‘हे तात, हे महाबाहु राजन्, अपने पुण्यकर्मों, ज्ञान, तप और दानों का फल स्वयं प्राप्त करो।

श्लोक 25 (18.3.25)

अद्य त्वां देवगन्धर्वा दिव्याश्चाप्सरसो दिवि । उपसेवन्तु कल्याणं विरजोऽम्बरभूषणाः ॥

adya tvāṃ devagandharvā divyāścāpsaraso divi | upasevantu kalyāṇaṃ virajo'mbarabhūṣaṇāḥ

‘आज से स्वर्ग में दिव्य गन्धर्व और अप्सराएँ निर्मल वस्त्रों और आभूषणों से सज्जित होकर, हे कल्याणमय, तुम्हारी सेवा करें।

श्लोक 26 (18.3.26)

राजसूयजितां लोकानश्वमेधाभिनिर्मितान् । प्राप्नुहि त्वं महाबाहो तपसश्च महाफलम् ॥

rājasūyajitāṃ lokānaśvamedhābhinirmitān | prāpnuhi tvaṃ mahābāho tapasaśca mahāphalam

‘हे महाबाहो, राजसूय से जीते हुए और अश्वमेध से रचे हुए लोकों को, और अपने तप के महान् फल को प्राप्त करो।

श्लोक 27 (18.3.27)

उपर्युपरि राज्ञां हि तव लोकाः युधिष्ठिर । हरिश्चन्द्रसमाः पार्थ येषु त्वं विहरिष्यसि ॥

uparyupari rājñāṃ hi tava lokāḥ yudhiṣṭhira | hariścandrasamāḥ pārtha yeṣu tvaṃ vihariṣyasi

‘हे युधिष्ठिर, तुम्हारे लोक अन्य राजाओं के लोकों से ऊपर-ऊपर हैं, हरिश्चन्द्र के लोकों के समान, जिनमें तुम विहार करोगे।

श्लोक 28 (18.3.28)

मान्धाता यत्र राजर्षिर्यत्र राजा भगीरथः । दौष्यन्तिर्यत्र भरतस्तत्र त्वं विहरिष्यसि ॥

māndhātā yatra rājarṣiryatra rājā bhagīrathaḥ | dauṣyantiryatra bharatastatra tvaṃ vihariṣyasi

‘जहाँ राजर्षि मान्धाता हैं, जहाँ राजा भगीरथ हैं, जहाँ दुष्यन्तपुत्र भरत हैं, वहाँ तुम विहार करोगे।

श्लोक 29 (18.3.29)

एषा देवनदी पुण्या पार्थ त्रैलोक्यपावनी । आकाशगङ्गा राजेन्द्र तत्राप्लुत्य गमिष्यसि ॥

eṣā devanadī puṇyā pārtha trailokyapāvanī | ākāśagaṅgā rājendra tatrāplutya gamiṣyasi

‘यह देवताओं की पवित्र नदी है, तीनों लोकों को पावन करने वाली आकाशगंगा; हे राजेन्द्र, इसमें स्नान करके तुम आगे जाओगे।

श्लोक 30 (18.3.30)

अत्र स्नातस्य भावस्ते मानुषो विगमिष्यति । गतशोको निरायासो मुक्तवैरो भविष्यसि ॥

atra snātasya bhāvaste mānuṣo vigamiṣyati | gataśoko nirāyāso muktavairo bhaviṣyasi

‘यहाँ स्नान करने पर तुम्हारा मानव-भाव दूर हो जाएगा; तुम शोक, श्रम और वैर से रहित हो जाओगे।’

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 31 (18.3.31)

एवं ब्रुवति देवेन्द्रे कौरवेन्द्रं युधिष्ठिरम् । धर्मो विग्रहवान्साक्षादुवाच सुतमात्मनः ॥

evaṃ bruvati devendre kauravendraṃ yudhiṣṭhiram | dharmo vigrahavānsākṣāduvāca sutamātmanaḥ

देवेन्द्र के कुरुराज युधिष्ठिर से इस प्रकार कहते समय, साक्षात् मूर्तिमान धर्म ने अपने पुत्र से कहा —

धर्म उवाच

श्लोक 32 (18.3.32)

भोभो राजन्महाप्राज्ञ प्रीतोस्मि तव पुत्रक । मद्भक्त्या सत्यवाक्यैश्च क्षमया च दमेन च ॥

bhobho rājanmahāprājña prītosmi tava putraka | madbhaktyā satyavākyaiśca kṣamayā ca damena ca

‘हे महाप्राज्ञ राजन्, पुत्र! तुम्हारी मुझमें भक्ति, सत्य वचनों, क्षमा और संयम से मैं तुमसे प्रसन्न हूँ।

श्लोक 33 (18.3.33)

एषा तृतीया जिज्ञासा तव राजन्कृता मया । न शक्यसे चालयितुं स्वभावात्पार्थ हेतुतः ॥

eṣā tṛtīyā jijñāsā tava rājankṛtā mayā | na śakyase cālayituṃ svabhāvātpārtha hetutaḥ

‘हे राजन्, यह तुम्हारी मेरे द्वारा ली गई तीसरी परीक्षा है; हे पार्थ, तर्कों से तुम्हें तुम्हारे स्वभाव से डिगाया नहीं जा सकता।

श्लोक 34 (18.3.34)

पूर्वं परीक्षितो हि त्वं प्रश्नाद्द्वैतवने मया । अरणीसहितस्यार्थे तच्च निस्तीर्णवानसि ॥

pūrvaṃ parīkṣito hi tvaṃ praśnāddvaitavane mayā | araṇīsahitasyārthe tacca nistīrṇavānasi

‘पहले द्वैतवन में अरणी-सहित ब्राह्मण के प्रयोजन से मैंने प्रश्न द्वारा तुम्हारी परीक्षा ली थी, और तुम उसमें उत्तीर्ण हुए।

श्लोक 35 (18.3.35)

सोदर्येषु विनष्टेषु द्रौपद्या तत्र भारत । श्वरूपधारिणा तत्र पुनस्त्वं मे परीक्षितः ॥

sodaryeṣu vinaṣṭeṣu draupadyā tatra bhārata | śvarūpadhāriṇā tatra punastvaṃ me parīkṣitaḥ

‘फिर हे भारत, जब द्रौपदी सहित तुम्हारे भाई गिर चुके थे, तब कुत्ते का रूप धरकर मैंने दोबारा तुम्हारी परीक्षा ली।

श्लोक 36 (18.3.36)

इदं तृतीयं भ्रातॄणामर्थे यत्स्थातुमिच्छसि । विशुद्धोसि महाभाग सुखी विगतकल्मषः ॥

idaṃ tṛtīyaṃ bhrātṝṇāmarthe yatsthātumicchasi | viśuddhosi mahābhāga sukhī vigatakalmaṣaḥ

‘यह तीसरी है, कि तुम अपने भाइयों के लिए यहाँ रुकना चाहते हो। हे महाभाग, तुम शुद्ध हो, सुखी हो और पाप-दोष से रहित हो।

श्लोक 37 (18.3.37)

न च ते भ्रातरः पार्थ नरकार्हा विशांपते । मायैषा देवराजेन महेन्द्रेण प्रयोजिता ॥

na ca te bhrātaraḥ pārtha narakārhā viśāṃpate | māyaiṣā devarājena mahendreṇa prayojitā

‘हे पार्थ, हे विशांपते, तुम्हारे भाई नरक के योग्य नहीं हैं। यह देवराज महेन्द्र द्वारा रची गई माया है।

श्लोक 38 (18.3.38)

अवश्यं नरकास्तात द्रष्टव्याः सर्वराजभिः । ततस्त्वया प्राप्तमिदं मुहूर्तं दुःखमुत्तमम् ॥

avaśyaṃ narakāstāta draṣṭavyāḥ sarvarājabhiḥ | tatastvayā prāptamidaṃ muhūrtaṃ duḥkhamuttamam

‘सभी राजाओं को नरक अवश्य देखना पड़ता है; इसीलिए तुमने यह क्षण-भर का परम दुःख पाया।

श्लोक 39 (18.3.39)

न सव्यसाची भीमो वा यमौ वा पुरुषर्षभौ । कर्णो वा सत्यवाक् शूरो नरकार्हाश्चिरं नृप ॥

na savyasācī bhīmo vā yamau vā puruṣarṣabhau | karṇo vā satyavāk śūro narakārhāściraṃ nṛpa

‘न अर्जुन, न भीम, न दोनों जुड़वाँ पुरुषश्रेष्ठ, और न सत्यवादी शूर कर्ण ही, हे राजन्, देर तक नरक के योग्य हैं।

श्लोक 40 (18.3.40)

न कृष्णा राजपुत्री च नरकार्हा कथञ्चन । एह्येहि भरतश्रेष्ठ पश्य चेमांस्त्रिलोकगान् ॥

na kṛṣṇā rājaputrī ca narakārhā kathañcana | ehyehi bharataśreṣṭha paśya cemāṃstrilokagān

‘राजकुमारी कृष्णा भी किसी प्रकार नरक के योग्य नहीं है। हे भरतश्रेष्ठ, आओ, आओ, और इन त्रिलोक में विचरने वालों को देखो।’

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 41 (18.3.41)

एवमुक्तः स राजर्षिस्तव पूर्वपितामहः । जगाम सह धर्मेण सर्वैश्च त्रिदिवालयैः ॥

evamuktaḥ sa rājarṣistava pūrvapitāmahaḥ | jagāma saha dharmeṇa sarvaiśca tridivālayaiḥ

इस प्रकार कहे जाने पर आपके पूर्वज वे राजर्षि धर्म और सभी स्वर्गवासियों के साथ चल पड़े।

श्लोक 42 (18.3.42)

गङ्गां देवनदीं पुण्यां पावनीमृषिसंस्तुताम् । अवगाह्य ततो राजा तनुं तत्याज मानुषीम् ॥

gaṅgāṃ devanadīṃ puṇyāṃ pāvanīmṛṣisaṃstutām | avagāhya tato rājā tanuṃ tatyāja mānuṣīm

ऋषियों से स्तुत, पवित्र करने वाली, पुण्यमयी दिव्य नदी गंगा में डुबकी लगाकर राजा ने मानव शरीर त्याग दिया।

श्लोक 43 (18.3.43)

ततो दिव्यवपुर्भूत्वा धर्मराजो युधिष्ठिरः । निर्वैरो गतसंतापो जले तस्मिन्समाप्लुतः ॥

tato divyavapurbhūtvā dharmarājo yudhiṣṭhiraḥ | nirvairo gatasaṃtāpo jale tasminsamāplutaḥ

तब दिव्य शरीर धारण करके धर्मराज युधिष्ठिर उस जल में स्नान कर वैर और सन्ताप से रहित हो गए।

श्लोक 44 (18.3.44)

ततो ययौ वृतो देवैः कुरुराजो युधिष्ठिरः । धर्मेण सहितो धीमांस्तूयमानो महर्षिभिः ॥

tato yayau vṛto devaiḥ kururājo yudhiṣṭhiraḥ | dharmeṇa sahito dhīmāṃstūyamāno maharṣibhiḥ

तब देवताओं से घिरे हुए, धर्म के साथ, बुद्धिमान कुरुराज युधिष्ठिर महर्षियों की स्तुति सुनते हुए चले,

श्लोक 45 (18.3.45)

यत्र ते पुरुषव्याघ्राः शूरा विगतमन्यवः । पाण्डवा धार्तराष्ट्राश्च स्वानि स्थानानि भेजिरे ॥

yatra te puruṣavyāghrāḥ śūrā vigatamanyavaḥ | pāṇḍavā dhārtarāṣṭrāśca svāni sthānāni bhejire

वहाँ जहाँ वे पुरुषव्याघ्र शूरवीर, क्रोध से मुक्त होकर, पाण्डव और धृतराष्ट्र के पुत्र, अपने-अपने स्थानों में प्रतिष्ठित थे।

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