स्वर्गारोहण पर्व · अध्याय 6
भारत-श्रवण की विधि
जनमेजय वैशम्पायन से पूछते हैं कि भारत किस विधि से सुनना चाहिए, उसका क्या फल है, वाचक और ब्राह्मणों को क्या देना चाहिए, और कैसा वाचक चुनना चाहिए। वैशम्पायन वाचक के गुण, पाठ की प्रत्येक क्रमिक पारण पर मिलने वाले स्वर्गीय फल, प्रत्येक पर्व के उचित अर्पण, वाचक को दिए जाने वाले दान, तथा भारत के श्रवण और कीर्तन के महान् पुण्य का वर्णन करते हैं। यह केवल प्रचलित पाठ का परिशिष्ट-अध्याय है, समीक्षित संस्करण में नहीं मिलता।
जनमेजय उवाच
श्लोक 1 (18.6.1)
भगवन्केन विधिना श्रोतव्यं भारतं बुधैः । फलं किं के च देवाश्च पूज्या वै पारणेष्विह ॥
bhagavankena vidhinā śrotavyaṃ bhārataṃ budhaiḥ | phalaṃ kiṃ ke ca devāśca pūjyā vai pāraṇeṣviha
भगवन्, विद्वानों को भारत किस विधि से सुनना चाहिए? उसका फल क्या है, और यहाँ समाप्ति के अवसरों पर किन देवताओं की पूजा करनी चाहिए?
श्लोक 2 (18.6.2)
देयं समाप्ते भगवन्किं च पर्वणिपर्वणि । वाचकः कीदृशश्चात्र एष्टव्यस्तद्ब्रवीहि मे ॥
deyaṃ samāpte bhagavankiṃ ca parvaṇiparvaṇi | vācakaḥ kīdṛśaścātra eṣṭavyastadbravīhi me
भगवन्, श्रवण पूर्ण होने पर क्या देना चाहिए, और प्रत्येक पर्व पर क्या देना चाहिए? इसके लिए कैसा वाचक चुनना चाहिए? यह मुझे बताइए।
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 3 (18.6.3)
शृणु राजन्विधिमिमं फलं यच्चापि भारतात् । श्रुताद्भवति राजेन्द्र यत्त्वं मामनुपृच्छसि ॥
śṛṇu rājanvidhimimaṃ phalaṃ yaccāpi bhāratāt | śrutādbhavati rājendra yattvaṃ māmanupṛcchasi
राजन्, यह विधि सुनो, और भारत के श्रवण से जो फल मिलता है वह भी सुनो, जिसके विषय में तुम मुझसे पूछ रहे हो, हे राजेन्द्र।
श्लोक 4 (18.6.4)
दिवि देवा महीपाल क्रीडार्थमवनिं गताः । कृत्वा कार्यमिदं चैव ततश्च दिवमागताः ॥
divi devā mahīpāla krīḍārthamavaniṃ gatāḥ | kṛtvā kāryamidaṃ caiva tataśca divamāgatāḥ
हे पृथ्वीपालक, स्वर्ग के देवता क्रीड़ा के लिए पृथ्वी पर उतरे थे; यह कार्य पूरा करके वे फिर स्वर्ग लौट गए।
श्लोक 5 (18.6.5)
हन्त यत्ते प्रवक्ष्यामि तच्छृणुष्व समाहितः । ऋषीणां देवतानां च सम्भवं वसुधातले ॥
hanta yatte pravakṣyāmi tacchṛṇuṣva samāhitaḥ | ṛṣīṇāṃ devatānāṃ ca sambhavaṃ vasudhātale
सुनो, मैं तुम्हें बताता हूँ; एकाग्र होकर सुनो: ऋषियों और देवताओं के पृथ्वी पर जन्म की कथा।
श्लोक 6 (18.6.6)
अत्र रुद्रास्तथा साध्या विश्वेदेवाश्च शाश्वताः । आदित्याश्चाश्विनौ देवौ लोकपाला महर्षयः ॥
atra rudrāstathā sādhyā viśvedevāśca śāśvatāḥ | ādityāścāśvinau devau lokapālā maharṣayaḥ
इस ग्रन्थ में रुद्र, साध्य, सनातन विश्वेदेव, आदित्य, दोनों अश्विनीकुमार, लोकपाल और महर्षि हैं;
श्लोक 7 (18.6.7)
गुह्यकाश्च सगन्धर्वा नागा विद्याधरास्तथा । सिद्धा धर्मः स्वयंभूश्च मुनिः कात्यायनो वरः ॥
guhyakāśca sagandharvā nāgā vidyādharāstathā | siddhā dharmaḥ svayaṃbhūśca muniḥ kātyāyano varaḥ
गन्धर्वों सहित गुह्यक, नाग, विद्याधर, सिद्ध, धर्म, स्वयम्भू और श्रेष्ठ मुनि कात्यायन;
श्लोक 8 (18.6.8)
गिरयः सागरा नद्यस्तथैवाप्सरसां गणाः । ग्रहाः संवत्सराश्चैव अयनान्यृतवस्तथा ॥
girayaḥ sāgarā nadyastathaivāpsarasāṃ gaṇāḥ | grahāḥ saṃvatsarāścaiva ayanānyṛtavastathā
पर्वत, समुद्र, नदियाँ, अप्सराओं के समूह, ग्रह, संवत्सर, अयन और ऋतुएँ;
श्लोक 9 (18.6.9)
स्थावरं जङ्गमं चैव जगत्सर्वं सुरासुरम् । भारते भरतश्रेष्ठ एकस्थमिह दृश्यते ॥
sthāvaraṃ jaṅgamaṃ caiva jagatsarvaṃ surāsuram | bhārate bharataśreṣṭha ekasthamiha dṛśyate
हे भरतश्रेष्ठ, स्थावर और जंगम, देवताओं और असुरों सहित सारा जगत् भारत में एक ही स्थान पर एकत्र दिखाई देता है।
श्लोक 10 (18.6.10)
तेषां श्रुत्वा प्रतिष्ठानं नामकर्मानुकीर्तनात् । कृत्वाऽपि पातकं घोरं सद्यो मुच्येत मानवः ॥
teṣāṃ śrutvā pratiṣṭhānaṃ nāmakarmānukīrtanāt | kṛtvā'pi pātakaṃ ghoraṃ sadyo mucyeta mānavaḥ
उनके निवास को सुनकर और उनके नाम तथा कर्मों के कीर्तन से मनुष्य घोर पाप करके भी तुरन्त मुक्त हो जाता है।
श्लोक 11 (18.6.11)
इतिहासमिमं श्रुत्वा यथावदनुपूर्वशः । संयतात्मा शुचिर्भूत्वा पारं गत्वा च भारते ॥
itihāsamimaṃ śrutvā yathāvadanupūrvaśaḥ | saṃyatātmā śucirbhūtvā pāraṃ gatvā ca bhārate
संयतचित्त और पवित्र होकर इस इतिहास को यथाविधि, क्रम से सुनकर और भारत का पार पाकर,
श्लोक 12 (18.6.12)
तेषां श्राद्धानि देयानि श्रुत्वा भारत भारतम् । ब्राह्मणेभ्यो यथाशक्त्या भक्त्या च भरतर्षभ ॥
teṣāṃ śrāddhāni deyāni śrutvā bhārata bhāratam | brāhmaṇebhyo yathāśaktyā bhaktyā ca bharatarṣabha
हे भारत, भारत सुनकर उनके लिए श्राद्ध करना चाहिए, और हे भरतर्षभ, शक्ति के अनुसार भक्तिपूर्वक ब्राह्मणों को दान देना चाहिए।
श्लोक 13 (18.6.13)
महादानानि देयानि रत्नानि विविधानि च । गावः कांस्योपदोहाश्च कन्याश्चैव स्वलङ्कृताः ॥
mahādānāni deyāni ratnāni vividhāni ca | gāvaḥ kāṃsyopadohāśca kanyāścaiva svalaṅkṛtāḥ
बड़े दान देने चाहिए: अनेक प्रकार के रत्न, काँसे के दोहनपात्र सहित गायें, और भली-भाँति अलंकृत कन्याएँ,
श्लोक 14 (18.6.14)
सर्वकामगुणोपेता यानानि विविधानि च । भवनानि विचित्राणि भूमिर्वासांसि काञ्चनम् ॥
sarvakāmaguṇopetā yānāni vividhāni ca | bhavanāni vicitrāṇi bhūmirvāsāṃsi kāñcanam
सब इच्छित गुणों से युक्त; अनेक प्रकार के यान, विचित्र भवन, भूमि, वस्त्र और स्वर्ण;
श्लोक 15 (18.6.15)
वाहनानि च देयानि हया मत्ताश्च वारणाः । शयनं शिबिकाश्चैव स्यन्दनाश्च स्वलंकृताः ॥
vāhanāni ca deyāni hayā mattāśca vāraṇāḥ | śayanaṃ śibikāścaiva syandanāśca svalaṃkṛtāḥ
वाहन भी देने चाहिए: घोड़े, मदमत्त हाथी, शय्या, पालकियाँ और भली-भाँति सजे रथ।
श्लोक 16 (18.6.16)
यद्यद्गृहे वरं किञ्चिद्यद्यदस्ति महद्वसु । तत्तद्देयं द्विजातिभ्य आत्मा दाराश्च सूनवः ॥
yadyadgṛhe varaṃ kiñcidyadyadasti mahadvasu | tattaddeyaṃ dvijātibhya ātmā dārāśca sūnavaḥ
घर में जो कुछ श्रेष्ठ हो, जो कुछ बड़ा धन हो, वह सब ब्राह्मणों को देना चाहिए, यहाँ तक कि स्वयं को, पत्नियों को और पुत्रों को भी।
श्लोक 17 (18.6.17)
श्रद्धया परया युक्तं क्रमशस्तस्य पारगः । शक्तितः सुमना हृष्टः सुश्रूषुरविकल्पकः ॥
śraddhayā parayā yuktaṃ kramaśastasya pāragaḥ | śaktitaḥ sumanā hṛṣṭaḥ suśrūṣuravikalpakaḥ
परम श्रद्धा से, क्रम के अनुसार, जिसने पाठ का पार पा लिया है उसके लिए, शक्ति के अनुसार, प्रसन्न मन से, सेवा की इच्छा रखते हुए और निःसंशय होकर,
श्लोक 18 (18.6.18)
सत्यार्जवरतो दान्तः शुचिः शौचसमन्वितः । श्रद्धधानो जितक्रोधो यथा सिद्ध्यति तच्छृणु ॥
satyārjavarato dāntaḥ śuciḥ śaucasamanvitaḥ | śraddhadhāno jitakrodho yathā siddhyati tacchṛṇu
सत्य और सरलता में रत, संयमी, पवित्र और शौच से युक्त, श्रद्धावान् तथा क्रोध को जीते हुए व्यक्ति को जैसे सिद्धि मिलती है, वह सुनो।
श्लोक 19 (18.6.19)
शुचिः शीलान्विताचारः शुक्लवासा जितेन्द्रियः । संस्कृतः सर्वशास्त्रज्ञः श्रद्दधानोऽनसूयकः ॥
śuciḥ śīlānvitācāraḥ śuklavāsā jitendriyaḥ | saṃskṛtaḥ sarvaśāstrajñaḥ śraddadhāno'nasūyakaḥ
पवित्र, शीलवान् और सदाचारी, श्वेत वस्त्र पहनने वाला, जितेन्द्रिय, संस्कारसम्पन्न, सब शास्त्रों का ज्ञाता, श्रद्धावान् और असूयारहित,
श्लोक 20 (18.6.20)
रूपवान्सुभगो दान्तः सत्यवादी जितेन्द्रियः । दानमानगृहीतश्च कार्यो भवति वाचकः ॥
rūpavānsubhago dāntaḥ satyavādī jitendriyaḥ | dānamānagṛhītaśca kāryo bhavati vācakaḥ
रूपवान्, सौभाग्यशाली, संयमी, सत्यवादी, जितेन्द्रिय, तथा दान और सम्मान से अपनाया गया पुरुष वाचक बनाया जाना चाहिए।
श्लोक 21 (18.6.21)
अविलम्बमनायस्तमद्रुतं धीरमुर्जितम् । असंसक्ताक्षरपदं स्वरभावसमन्वितम् ॥
avilambamanāyastamadrutaṃ dhīramurjitam | asaṃsaktākṣarapadaṃ svarabhāvasamanvitam
वह बिना विलम्ब और बिना थकान के, न जल्दी में, धैर्य और ओज के साथ, अक्षरों और पदों को मिलाए बिना, स्वर और भाव सहित,
श्लोक 22 (18.6.22)
त्रिषष्टिवर्णसंयुक्तमष्टस्थानसमीरितम् । वाचयेद्वाचकः स्वस्थः स्वासीनः सुसमाहितः ॥
triṣaṣṭivarṇasaṃyuktamaṣṭasthānasamīritam | vācayedvācakaḥ svasthaḥ svāsīnaḥ susamāhitaḥ
त्रेसठ वर्णों से युक्त और आठ उच्चारण-स्थानों से उच्चरित वाणी में पाठ करे; वाचक स्वस्थ, सुखपूर्वक बैठा हुआ और पूर्ण एकाग्र होकर पाठ करे।
श्लोक 23 (18.6.23)
नारायणं नमस्कृत्य नरं चैव नरोत्तमम् । देवीं सरस्वतीं चैव ततो जयमुदीरयेत् ॥
nārāyaṇaṃ namaskṛtya naraṃ caiva narottamam | devīṃ sarasvatīṃ caiva tato jayamudīrayet
नारायण को, पुरुषोत्तम नर को और देवी सरस्वती को नमस्कार करके तब जय का पाठ आरम्भ करे।
श्लोक 24 (18.6.24)
ईदृशाद्वाचकाद्राजञ्श्रुत्वा भारत भारतम् । नियमस्थः शुचिः श्रोता शृण्वन्स फलमश्नुते ॥
īdṛśādvācakādrājañśrutvā bhārata bhāratam | niyamasthaḥ śuciḥ śrotā śṛṇvansa phalamaśnute
हे राजन्, हे भारत, ऐसे वाचक से भारत सुनते हुए नियम में स्थित और पवित्र श्रोता फल प्राप्त करता है।
श्लोक 25 (18.6.25)
पारणं प्रथमं प्राप्य द्विजान्कामैश्च तर्पयन् । अग्निष्टोमस्य यज्ञस्य फलं वै लभते नरः ॥
pāraṇaṃ prathamaṃ prāpya dvijānkāmaiśca tarpayan | agniṣṭomasya yajñasya phalaṃ vai labhate naraḥ
पहली पारण पर पहुँचकर, ब्राह्मणों को उनकी इच्छित वस्तुओं से तृप्त करके मनुष्य अग्निष्टोम यज्ञ का फल पाता है।
श्लोक 26 (18.6.26)
अप्सरोगणसंकीर्णं विमानं लभते महत् । प्रहृष्टः स तु देवैश्च दिवं याति समाहितः ॥
apsarogaṇasaṃkīrṇaṃ vimānaṃ labhate mahat | prahṛṣṭaḥ sa tu devaiśca divaṃ yāti samāhitaḥ
वह अप्सराओं के समूहों से भरा हुआ महान् विमान पाता है, और प्रसन्न तथा शान्तचित्त होकर देवताओं के साथ स्वर्ग जाता है।
श्लोक 27 (18.6.27)
द्वितीयं पारणं प्राप्य सोतिरात्रफलं लभेत् । सर्वरत्नमयं दिव्यं विमानमधिरोहति ॥
dvitīyaṃ pāraṇaṃ prāpya sotirātraphalaṃ labhet | sarvaratnamayaṃ divyaṃ vimānamadhirohati
दूसरी पारण पर पहुँचकर वह अतिरात्र का फल पाता है; वह सर्वरत्नमय दिव्य विमान पर चढ़ता है,
श्लोक 28 (18.6.28)
दिव्यमाल्यांबरधरो दिव्यगन्धविभूषितः । दिव्याङ्गदधरो नित्यं देवलोके महीयते ॥
divyamālyāṃbaradharo divyagandhavibhūṣitaḥ | divyāṅgadadharo nityaṃ devaloke mahīyate
दिव्य माला और वस्त्र धारण किए, दिव्य सुगन्ध से विभूषित, सदा दिव्य बाजूबन्द पहने हुए वह देवलोक में सम्मानित होता है।
श्लोक 29 (18.6.29)
तृतीयं पारणं प्राप्य द्वादशाहफलं लभेत् । वसत्यमरसंकाशो वर्षाण्ययुतशो दिवि ॥
tṛtīyaṃ pāraṇaṃ prāpya dvādaśāhaphalaṃ labhet | vasatyamarasaṃkāśo varṣāṇyayutaśo divi
तीसरी पारण पर पहुँचकर वह द्वादशाह का फल पाता है; वह देवता के समान स्वर्ग में दसियों हजार वर्ष रहता है।
श्लोक 30 (18.6.30)
चतुर्थे वाजपेयस्य पञ्चमे द्विगुणं फलम् । उदितादित्यसंकाशं ज्वलन्तमनलोपमम् ॥
caturthe vājapeyasya pañcame dviguṇaṃ phalam | uditādityasaṃkāśaṃ jvalantamanalopamam
चौथी पर वाजपेय का फल, पाँचवीं पर उससे दुगुना: उदित सूर्य के समान चमकता और अग्नि के समान जलता हुआ विमान,
श्लोक 31 (18.6.31)
विमानं विबुधैः सार्धमारुह्य दिवि गच्छति । वर्षायुतानि भवने शक्रस्य दिवि मोदते ॥
vimānaṃ vibudhaiḥ sārdhamāruhya divi gacchati | varṣāyutāni bhavane śakrasya divi modate
जिस पर देवताओं के साथ चढ़कर वह स्वर्ग जाता है और दस हजार वर्ष तक स्वर्ग में इन्द्र के भवन में आनन्द करता है।
श्लोक 32 (18.6.32)
षष्ठे द्विगुणमस्तीति सप्तमे त्रिगुणं फलम् । कैलासशिखराकारं वैदूर्यमणिवेदिकम् ॥
ṣaṣṭhe dviguṇamastīti saptame triguṇaṃ phalam | kailāsaśikharākāraṃ vaidūryamaṇivedikam
छठी पर फल दुगुना, सातवीं पर तिगुना: कैलास के शिखर के आकार का विमान, जिसकी वेदी वैदूर्य और मणियों की है,
श्लोक 33 (18.6.33)
परिक्षिप्तं च बहुधा मणिविद्रुमभूषितम् । विमानं समधिष्ठाय कामगं साप्सरोगणम् ॥
parikṣiptaṃ ca bahudhā maṇividrumabhūṣitam | vimānaṃ samadhiṣṭhāya kāmagaṃ sāpsarogaṇam
जो चारों ओर से घिरा हुआ और मणियों तथा मूँगों से सजा है; इच्छानुसार चलने वाले और अप्सराओं के समूह सहित उस विमान में बैठकर,
श्लोक 34 (18.6.34)
सर्वांल्लोकान्विचरते द्वितीय इव भास्करः । अष्टमे राजसूयस्य पारणे लभते फलम् ॥
sarvāṃllokānvicarate dvitīya iva bhāskaraḥ | aṣṭame rājasūyasya pāraṇe labhate phalam
वह दूसरे सूर्य की भाँति सब लोकों में विचरता है। आठवीं पारण पर वह राजसूय का फल पाता है।
श्लोक 35 (18.6.35)
चन्द्रोदयनिभं रम्यं विमानमधिरोहति । चन्द्ररश्मिप्रतीकाशैर्हयैर्युक्तं मनोजवैः ॥
candrodayanibhaṃ ramyaṃ vimānamadhirohati | candraraśmipratīkāśairhayairyuktaṃ manojavaiḥ
वह उदित चन्द्रमा जैसे सुन्दर विमान पर चढ़ता है, जिसमें मन के समान वेगवान् और चन्द्रकिरणों जैसे घोड़े जुते हैं,
श्लोक 36 (18.6.36)
सेव्यमानो वरस्त्रीणां चन्द्रात्कान्ततरैर्मुखैः । मेखलानां निनादेन नूपुराणां च निःस्वनैः ॥
sevyamāno varastrīṇāṃ candrātkāntatarairmukhaiḥ | mekhalānāṃ ninādena nūpurāṇāṃ ca niḥsvanaiḥ
चन्द्रमा से भी अधिक सुन्दर मुखों वाली श्रेष्ठ स्त्रियों से सेवित, उनकी करधनियों की ध्वनि और नूपुरों की झंकार के साथ,
श्लोक 37 (18.6.37)
अङ्के परमनारीणां सुखसुप्तो विबुध्यते । नवमे क्रतुराजस्य वाजिमेधस्य भारत ॥
aṅke paramanārīṇāṃ sukhasupto vibudhyate | navame kraturājasya vājimedhasya bhārata
वह उत्तम स्त्रियों की गोद में सुख से सोकर जागता है। हे भारत, नवीं पर यज्ञों के राजा अश्वमेध का फल मिलता है,
श्लोक 38 (18.6.38)
काञ्चनस्तंभनिर्यूहवैदूर्यकृतवेदिकम् । जांबूनदमयैर्दिव्यैर्गवाक्षैः सर्वतो वृतम् ॥
kāñcanastaṃbhaniryūhavaidūryakṛtavedikam | jāṃbūnadamayairdivyairgavākṣaiḥ sarvato vṛtam
सोने के खम्भों और छज्जों वाला, वैदूर्य की वेदी वाला, और जाम्बूनद स्वर्ण की दिव्य खिड़कियों से चारों ओर घिरा विमान,
श्लोक 39 (18.6.39)
सेवितं चाप्सरःसङ्घैर्गन्धर्वैर्दिविचारिभिः । विमानं समधिष्ठाय श्रिया परमया ज्वलन् ॥
sevitaṃ cāpsaraḥsaṅghairgandharvairdivicāribhiḥ | vimānaṃ samadhiṣṭhāya śriyā paramayā jvalan
अप्सराओं के समूहों और आकाशचारी गन्धर्वों से सेवित; परम तेज से दीप्त उस विमान पर चढ़कर,
श्लोक 40 (18.6.40)
दिव्यमाल्यांबरधरो दिव्यचन्दनरूषितः । मोदते दैवतैः सार्धं दिवि देव इवापरः ॥
divyamālyāṃbaradharo divyacandanarūṣitaḥ | modate daivataiḥ sārdhaṃ divi deva ivāparaḥ
दिव्य माला और वस्त्र धारण किए, दिव्य चन्दन से लिप्त, वह स्वर्ग में देवताओं के साथ दूसरे देवता की भाँति आनन्द करता है।
श्लोक 41 (18.6.41)
दशमं पारणं प्राप्य द्विजातीनभिवन्द्य च । किङ्किणीजालनिर्घोषं पताकाध्वजशोभितम् ॥
daśamaṃ pāraṇaṃ prāpya dvijātīnabhivandya ca | kiṅkiṇījālanirghoṣaṃ patākādhvajaśobhitam
दसवीं पारण पर पहुँचकर और ब्राह्मणों को प्रणाम करके वह ऐसा विमान पाता है जो छोटी घण्टियों के जाल की ध्वनि से गूँजता और पताकाओं तथा ध्वजाओं से शोभित है,
श्लोक 42 (18.6.42)
रत्नवेदिकसम्बाधं वैदूर्यमणितोरणम् । हेमजालपरिक्षिप्तं प्रवालवलभीमुखम् ॥
ratnavedikasambādhaṃ vaidūryamaṇitoraṇam | hemajālaparikṣiptaṃ pravālavalabhīmukham
जो रत्नजटित वेदियों से भरा है, जिसके तोरण वैदूर्य और मणियों के हैं, जो सुनहरे जाल से ढका है और जिसके छज्जे मूँगों के हैं,
श्लोक 43 (18.6.43)
गन्धर्वैर्गीतकुशलैरप्सरोभिश्च शोभितम् । विमानं सुकृतावासं सुखेनैवोपपद्यते ॥
gandharvairgītakuśalairapsarobhiśca śobhitam | vimānaṃ sukṛtāvāsaṃ sukhenaivopapadyate
जो गाने में कुशल गन्धर्वों और अप्सराओं से शोभित है, पुण्य से प्राप्त वह निवास है; वह उसे सहज ही पा लेता है।
श्लोक 44 (18.6.44)
मुकुटेनाग्निवर्णेन जांबूनदविभूषिणा । दिव्यचन्दनदिग्धाङ्गो दिव्यमाल्यविभूषितः ॥
mukuṭenāgnivarṇena jāṃbūnadavibhūṣiṇā | divyacandanadigdhāṅgo divyamālyavibhūṣitaḥ
जाम्बूनद स्वर्ण से सजे अग्नि के रंग के मुकुट सहित, दिव्य चन्दन से लिप्त अंगों वाला और दिव्य मालाओं से विभूषित,
श्लोक 45 (18.6.45)
दिव्याँल्लोकान्विचरति दिव्यैर्भोगैः समन्वितः । विबुधानां प्रसादेन श्रिया परमया युतः ॥
divyām̐llokānvicarati divyairbhogaiḥ samanvitaḥ | vibudhānāṃ prasādena śriyā paramayā yutaḥ
देवताओं की कृपा से दिव्य भोगों और परम शोभा से युक्त होकर वह दिव्य लोकों में विचरता है।
श्लोक 46 (18.6.46)
अथ वर्षगणानेवं स्वर्गलोके महीयते । ततो गन्धर्वसहितः सहस्राण्येकविंशतिम् ॥
atha varṣagaṇānevaṃ svargaloke mahīyate | tato gandharvasahitaḥ sahasrāṇyekaviṃśatim
इस प्रकार अनेक वर्षों तक वह स्वर्गलोक में सम्मानित होता है; फिर गन्धर्वों के साथ इक्कीस हजार वर्ष तक,
श्लोक 47 (18.6.47)
पुरंदरपुरे रम्ये शक्रेण सह मोदते । दिव्ययानविमानेषु लोकेषु विविधेषु च ॥
puraṃdarapure ramye śakreṇa saha modate | divyayānavimāneṣu lokeṣu vividheṣu ca
वह इन्द्र की रमणीय नगरी में इन्द्र के साथ, दिव्य यानों और विमानों में तथा अनेक लोकों में आनन्द करता है,
श्लोक 48 (18.6.48)
दिव्यनारीगणाकीर्णो निवसत्यमरो यथा । ततः सूर्यस्य भवने चन्द्रस्य भवने तथा ॥
divyanārīgaṇākīrṇo nivasatyamaro yathā | tataḥ sūryasya bhavane candrasya bhavane tathā
दिव्य स्त्रियों के समूहों से घिरा हुआ देवता की भाँति निवास करता है। फिर सूर्य के भवन में और वैसे ही चन्द्रमा के भवन में,
श्लोक 49 (18.6.49)
शिवस्य भवने राजन्विष्णोर्याति सलोकताम् । एवमेतन्महाराज नात्र कार्या विचारणा ॥
śivasya bhavane rājanviṣṇoryāti salokatām | evametanmahārāja nātra kāryā vicāraṇā
और हे राजन्, शिव के भवन में जाता है, और विष्णु के साथ एक ही लोक को प्राप्त करता है। हे महाराज, ऐसा ही है; इसमें कोई सन्देह नहीं करना चाहिए।
श्लोक 50 (18.6.50)
श्रद्दधानेन वै भाव्यमेवमाह गुरुर्मम । वाचकस्य तु दातव्यं मनसा यद्यदिच्छति ॥
śraddadhānena vai bhāvyamevamāha gururmama | vācakasya tu dātavyaṃ manasā yadyadicchati
श्रद्धा रखनी चाहिए; ऐसा मेरे गुरु ने कहा है। वाचक को वह सब देना चाहिए जो वह मन से चाहे:
श्लोक 51 (18.6.51)
हस्त्यश्वरथयानानि वाहनानि विशेषतः । कटके कुण्डले चैव ब्रह्मसूत्रं तथा परम् ॥
hastyaśvarathayānāni vāhanāni viśeṣataḥ | kaṭake kuṇḍale caiva brahmasūtraṃ tathā param
हाथी, घोड़े, रथ और यान, विशेषकर वाहन; कंगन और कुण्डल, यज्ञोपवीत, और उससे भी अधिक;
श्लोक 52 (18.6.52)
वस्त्रं चैव विचित्रं च गन्धं चैव विशेषतः । देववत्पूजयेत्तं तु विष्णुलोकमवाप्नुयात् ॥
vastraṃ caiva vicitraṃ ca gandhaṃ caiva viśeṣataḥ | devavatpūjayettaṃ tu viṣṇulokamavāpnuyāt
अनेक प्रकार के वस्त्र और विशेषकर सुगन्ध; उसकी देवता के समान पूजा करे, और इस प्रकार विष्णुलोक को प्राप्त करे।
श्लोक 53 (18.6.53)
अतः परं प्रवक्ष्यामि यानि देयानि भारते । वाच्यमाने तु विप्रेभ्यो राजन्पर्वणिपर्वणि ॥
ataḥ paraṃ pravakṣyāmi yāni deyāni bhārate | vācyamāne tu viprebhyo rājanparvaṇiparvaṇi
अब मैं बताऊँगा कि भारत के पाठ के समय, हे राजन्, प्रत्येक पर्व पर ब्राह्मणों को क्या देना चाहिए:
श्लोक 54 (18.6.54)
जातिं देशं च सत्यं च माहात्म्यं भरतर्षभ । धर्मं वृत्तिं च विज्ञाय क्षत्रियाणां नराधिप ॥
jātiṃ deśaṃ ca satyaṃ ca māhātmyaṃ bharatarṣabha | dharmaṃ vṛttiṃ ca vijñāya kṣatriyāṇāṃ narādhipa
हे भरतश्रेष्ठ, हे नराधिप, क्षत्रियों की जाति, देश, सत्यनिष्ठा और महत्त्व, धर्म और जीविका को जानकर,
श्लोक 55 (18.6.55)
स्वस्ति वाच्य द्विजानादौ ततः कार्ये प्रवर्तिते । समाप्ते पर्वणि ततः स्वशक्त्या पूजयेद्द्विजान् ॥
svasti vācya dvijānādau tataḥ kārye pravartite | samāpte parvaṇi tataḥ svaśaktyā pūjayeddvijān
पहले ब्राह्मणों के लिए स्वस्तिवाचन करे; फिर कार्य आरम्भ होने पर; और पर्व समाप्त होने पर अपनी शक्ति के अनुसार ब्राह्मणों का सत्कार करे।
श्लोक 56 (18.6.56)
आदौ तु वाचकं चैव वस्त्रगन्धसमन्वितम् । विधिवद्भोजयेद्राजन्मधुपायसमुत्तमम् ॥
ādau tu vācakaṃ caiva vastragandhasamanvitam | vidhivadbhojayedrājanmadhupāyasamuttamam
पहले वस्त्र और गन्ध से सम्पन्न वाचक को, हे राजन्, विधिपूर्वक उत्तम मधुयुक्त खीर खिलाए।
श्लोक 57 (18.6.57)
ततो मूलफलप्रायं पायसं मधुसर्पिषा । आस्तीके भोजयेद्राजन्दद्याच्चैव गुडौदनम् ॥
tato mūlaphalaprāyaṃ pāyasaṃ madhusarpiṣā | āstīke bhojayedrājandadyāccaiva guḍaudanam
फिर मधु और घी के साथ मुख्यतः कन्द-मूल-फल की खीर; आस्तीक पर्व में, हे राजन्, भोजन कराए और गुड़ के साथ पका भात भी दे।
श्लोक 58 (18.6.58)
अपूपैश्चैव पूपैश्च मोदकैश्च समन्वितम् । सभापर्वणि राजेन्द्र हविष्यं भोजयेद्द्विजान् ॥
apūpaiścaiva pūpaiśca modakaiśca samanvitam | sabhāparvaṇi rājendra haviṣyaṃ bhojayeddvijān
दोनों प्रकार के पूओं और लड्डुओं के साथ, हे राजेन्द्र, सभापर्व में ब्राह्मणों को हविष्यान्न खिलाए।
श्लोक 59 (18.6.59)
आरण्यके मूलफलैस्तर्पयेत्तु द्विजोत्तमान् । अरणीपर्व चासाद्य जलकुम्भान्प्रदापयेत् ॥
āraṇyake mūlaphalaistarpayettu dvijottamān | araṇīparva cāsādya jalakumbhānpradāpayet
आरण्यक पर्व में कन्द-मूल-फलों से श्रेष्ठ ब्राह्मणों को तृप्त करे; अरणी पर्व पर पहुँचकर जल के घड़े दिलवाए।
श्लोक 60 (18.6.60)
तर्पणानि च मुख्यानि वन्यमूलफलानि च । सर्वकामगुणोपेतं विप्रेभ्योऽन्नं प्रदापयेत् ॥
tarpaṇāni ca mukhyāni vanyamūlaphalāni ca | sarvakāmaguṇopetaṃ viprebhyo'nnaṃ pradāpayet
तृप्ति देने वाली मुख्य वस्तुएँ, वन के कन्द-मूल-फल; और सब इच्छित गुणों से युक्त अन्न ब्राह्मणों को दिलवाए।
श्लोक 61 (18.6.61)
विराटपर्वणि तथा वासांसि विविधानि च । उद्योगे भरतश्रेष्ठ सर्वकामगुणान्वितम् ॥
virāṭaparvaṇi tathā vāsāṃsi vividhāni ca | udyoge bharataśreṣṭha sarvakāmaguṇānvitam
विराट पर्व में उसी प्रकार अनेक वस्त्र; उद्योग पर्व में, हे भरतश्रेष्ठ, सब इच्छित गुणों से युक्त भोजन;
श्लोक 62 (18.6.62)
भोजनं भोजयेद्विप्रान्गन्धमाल्यैरलङ्कृतान् । भीष्मपर्वणि राजेन्द्र दत्त्वा यानमनुत्तमम् ॥
bhojanaṃ bhojayedviprāngandhamālyairalaṅkṛtān | bhīṣmaparvaṇi rājendra dattvā yānamanuttamam
गन्ध और मालाओं से अलंकृत ब्राह्मणों को भोजन कराए। भीष्म पर्व में, हे राजेन्द्र, उत्तम यान देकर,
श्लोक 63 (18.6.63)
ततः सर्वगुणोपेतमन्नं दद्यात्सुसंस्कृतम् । द्रोणपर्वणि विप्रेभ्यो भोजनं परमार्चितम् ॥
tataḥ sarvaguṇopetamannaṃ dadyātsusaṃskṛtam | droṇaparvaṇi viprebhyo bhojanaṃ paramārcitam
फिर सब गुणों से युक्त, भली-भाँति बना हुआ अन्न दे। द्रोण पर्व में ब्राह्मणों को अत्यन्त सम्मान के साथ भोजन;
श्लोक 64 (18.6.64)
शराश्च देया राजेन्द्र चापान्यसिवरास्तथा । कर्णपर्वण्यपि तथा भोजनं सार्वकामिकम् ॥
śarāśca deyā rājendra cāpānyasivarāstathā | karṇaparvaṇyapi tathā bhojanaṃ sārvakāmikam
हे राजेन्द्र, बाण देने चाहिए, और धनुष तथा उत्तम तलवारें भी; कर्ण पर्व में भी सब कामनाएँ पूरी करने वाला भोजन,
श्लोक 65 (18.6.65)
विप्रेभ्यः संस्कृतं सम्यग्दद्यात्संयतमानसः । शल्यपर्वणि राजेन्द्र मोदकैः सगुडौदनैः ॥
viprebhyaḥ saṃskṛtaṃ samyagdadyātsaṃyatamānasaḥ | śalyaparvaṇi rājendra modakaiḥ saguḍaudanaiḥ
भली-भाँति बना हुआ, संयत मन से ब्राह्मणों को दे। शल्य पर्व में, हे राजेन्द्र, लड्डुओं और गुड़ के भात के साथ,
श्लोक 66 (18.6.66)
अपूपैस्तर्पणैश्चैव सर्वमन्नं प्रदापयेत् । गदापर्वण्यपि तथा मुद्गमिश्रं प्रदापयेत् ॥
apūpaistarpaṇaiścaiva sarvamannaṃ pradāpayet | gadāparvaṇyapi tathā mudgamiśraṃ pradāpayet
पूओं और तृप्तिकारक पदार्थों के साथ सब प्रकार का अन्न दिलवाए; गदा पर्व में भी मूँग मिला अन्न दे।
श्लोक 67 (18.6.67)
स्त्रीपर्वणि तथा रत्नैस्तर्पयेत्तु द्विजोत्तमान् । घृतौदनं पुरस्ताच्च ऐषीके दापयेत्पुनः ॥
strīparvaṇi tathā ratnaistarpayettu dvijottamān | ghṛtaudanaṃ purastācca aiṣīke dāpayetpunaḥ
स्त्री पर्व में रत्नों से श्रेष्ठ ब्राह्मणों को तृप्त करे; पहले घी-भात, और ऐषीक में फिर वही दिलवाए।
श्लोक 68 (18.6.68)
ततः सर्वगुणोपेतमन्नं दद्यात्सुसंस्कृतम् । शान्तिपर्वण्यपि तथा हविष्यं भोजयेद्द्विजान् ॥
tataḥ sarvaguṇopetamannaṃ dadyātsusaṃskṛtam | śāntiparvaṇyapi tathā haviṣyaṃ bhojayeddvijān
फिर सब गुणों से युक्त, भली-भाँति बना अन्न दे; शान्ति पर्व में भी ब्राह्मणों को हविष्यान्न खिलाए।
श्लोक 69 (18.6.69)
आश्वमेधिकमासाद्य भोजनं सार्वकामिकम् । तथाऽऽश्रमनिवासे तु हविष्यं भोजयेद्द्विजान् ॥
āśvamedhikamāsādya bhojanaṃ sārvakāmikam | tathā''śramanivāse tu haviṣyaṃ bhojayeddvijān
आश्वमेधिक पर पहुँचकर सब कामनाएँ पूरी करने वाला भोजन; और आश्रमवास में ब्राह्मणों को हविष्यान्न खिलाए।
श्लोक 70 (18.6.70)
मौसले सार्वगुणिकं गन्धमाल्यानुलेपनम् । महाप्रास्थानिके तद्वत्सर्वकामगुणान्वितम् ॥
mausale sārvaguṇikaṃ gandhamālyānulepanam | mahāprāsthānike tadvatsarvakāmaguṇānvitam
मौसल में सब गुणों से युक्त अन्न, गन्ध, माला और अनुलेपन के साथ; वैसे ही महाप्रस्थानिक में सब इच्छित गुणों से युक्त।
श्लोक 71 (18.6.71)
स्वर्गपर्वण्यपि तथा हविष्यं भोजयेद्द्विजान् । हरिवंशसमाप्तौ तु सहस्रं भोजयेद्द्विजान् ॥
svargaparvaṇyapi tathā haviṣyaṃ bhojayeddvijān | harivaṃśasamāptau tu sahasraṃ bhojayeddvijān
स्वर्ग पर्व में भी ब्राह्मणों को हविष्यान्न खिलाए; और हरिवंश की समाप्ति पर एक हजार ब्राह्मणों को भोजन कराए।
श्लोक 72 (18.6.72)
गामेकां निष्कसंयुक्तां ब्राह्मणाय निवेदयेत् । तदर्धेनापि दातव्या दरिद्रेणापि पार्थिव ॥
gāmekāṃ niṣkasaṃyuktāṃ brāhmaṇāya nivedayet | tadardhenāpi dātavyā daridreṇāpi pārthiva
एक निष्क सहित एक गाय ब्राह्मण को अर्पित करे; हे राजन्, निर्धन भी उसका आधा दे।
श्लोक 73 (18.6.73)
प्रतिपर्वसमाप्तौ तु पुस्तकं वै विचक्षणः । सुवर्णेन च संयुक्तं वाचकाय निवेदयेत् ॥
pratiparvasamāptau tu pustakaṃ vai vicakṣaṇaḥ | suvarṇena ca saṃyuktaṃ vācakāya nivedayet
प्रत्येक पर्व की समाप्ति पर विचारशील पुरुष वाचक को सुवर्ण सहित पुस्तक अर्पित करे।
श्लोक 74 (18.6.74)
हरिवंशे पर्वणि च पायसं तत्र भोजयेत् । पारणेपारणे राजन्यथावद्भरतर्षभ ॥
harivaṃśe parvaṇi ca pāyasaṃ tatra bhojayet | pāraṇepāraṇe rājanyathāvadbharatarṣabha
हरिवंश पर्व में भी हर पारण पर, हे राजन्, हे भरतर्षभ, विधिपूर्वक उन्हें खीर खिलाए।
श्लोक 75 (18.6.75)
समाप्य सर्वाः प्रयतः संहिताः शास्त्रकोविदः । शुभे देशे निवेश्याथ क्षौमवस्त्राभिसंवृताः ॥
samāpya sarvāḥ prayataḥ saṃhitāḥ śāstrakovidaḥ | śubhe deśe niveśyātha kṣaumavastrābhisaṃvṛtāḥ
संयमी और शास्त्रों का ज्ञाता, सब संहिताओं का पाठ पूरा करके, उन्हें रेशमी वस्त्रों में लपेटकर उचित स्थान पर रखकर,
श्लोक 76 (18.6.76)
शुक्लांबरधरः स्रग्वी शुचिर्भूत्वा स्वलङ्कृतः । अर्चयेत् यथान्यायं गन्धमाल्यैः पृथक्पृथक् ॥
śuklāṃbaradharaḥ sragvī śucirbhūtvā svalaṅkṛtaḥ | arcayet yathānyāyaṃ gandhamālyaiḥ pṛthakpṛthak
श्वेत वस्त्र पहने, माला धारण किए, पवित्र और सुसज्जित होकर, गन्ध और मालाओं से प्रत्येक की अलग-अलग यथोचित पूजा करे।
श्लोक 77 (18.6.77)
संहितापुस्तकान्राजन्प्रयतः सुसमाहितः । भक्ष्यैर्माल्यैश्च पेयैश्च कामैश्च विविधैः शुभैः ॥
saṃhitāpustakānrājanprayataḥ susamāhitaḥ | bhakṣyairmālyaiśca peyaiśca kāmaiśca vividhaiḥ śubhaiḥ
हे राजन्, संयत और पूर्ण सावधान होकर संहिता की पुस्तकों की भोज्य पदार्थों, मालाओं, पेयों और अनेक प्रकार की शुभ इच्छित वस्तुओं से पूजा करे।
श्लोक 78 (18.6.78)
हिरण्यं च सुवर्णं च दक्षिणामथ दापयेत् । सर्वत्र त्रिपलं स्वर्णं दातव्यं प्रयतात्मना ॥
hiraṇyaṃ ca suvarṇaṃ ca dakṣiṇāmatha dāpayet | sarvatra tripalaṃ svarṇaṃ dātavyaṃ prayatātmanā
वह हिरण्य और सुवर्ण दिलवाए और दक्षिणा भी; संयतात्मा पुरुष सर्वत्र तीन पल सोना दे,
श्लोक 79 (18.6.79)
तदर्धं पादशेषं वा वित्तशाठ्यविवर्जितम् । यद्यदेवात्मनोऽभीष्टं तत्तद्देयं द्विजातये ॥
tadardhaṃ pādaśeṣaṃ vā vittaśāṭhyavivarjitam | yadyadevātmano'bhīṣṭaṃ tattaddeyaṃ dvijātaye
या उसका आधा, या चौथाई, धन के विषय में कंजूसी छोड़कर; जो कुछ उसे स्वयं सबसे प्रिय हो वह ब्राह्मण को देना चाहिए।
श्लोक 80 (18.6.80)
सर्वथा तोषयेद्भक्त्या वाचकं गुरुमात्मनः । देवताः कीर्तयेत्सर्वा नरनारायणौ तथा ॥
sarvathā toṣayedbhaktyā vācakaṃ gurumātmanaḥ | devatāḥ kīrtayetsarvā naranārāyaṇau tathā
वह हर प्रकार से भक्तिपूर्वक अपने गुरु-रूप वाचक को सन्तुष्ट करे; सब देवताओं का, और नर-नारायण का भी कीर्तन करे।
श्लोक 81 (18.6.81)
ततो गन्धैश्च माल्यैश्च स्वलङ्कृत्य द्विजोत्तमान् । तर्पयेद्विविधैः कामैर्दानैश्चोच्चावचैस्तथा ॥
tato gandhaiśca mālyaiśca svalaṅkṛtya dvijottamān | tarpayedvividhaiḥ kāmairdānaiścoccāvacaistathā
फिर श्रेष्ठ ब्राह्मणों को गन्ध और मालाओं से सजाकर अनेक प्रकार की इच्छित वस्तुओं और छोटे-बड़े दानों से उन्हें तृप्त करे।
श्लोक 82 (18.6.82)
अतिरात्रस्य यज्ञस्य फलं प्राप्नोति मानवः । प्राप्नुयाच्च क्रतुफलं तथा पर्वणिपर्वणि ॥
atirātrasya yajñasya phalaṃ prāpnoti mānavaḥ | prāpnuyācca kratuphalaṃ tathā parvaṇiparvaṇi
मनुष्य अतिरात्र यज्ञ का फल पाता है; और प्रत्येक पर्व पर यज्ञ का फल प्राप्त करता है।
श्लोक 83 (18.6.83)
वाचको भरतश्रेष्ठ व्यक्ताक्षरपदस्वरः । भविष्यं श्रावयेद्विद्वाञ्भारतं भरतर्षभ ॥
vācako bharataśreṣṭha vyaktākṣarapadasvaraḥ | bhaviṣyaṃ śrāvayedvidvāñbhārataṃ bharatarṣabha
हे भरतश्रेष्ठ, स्पष्ट अक्षर, पद और स्वर वाला विद्वान् वाचक भविष्य और भारत का पाठ सुनाए, हे भरतर्षभ।
श्लोक 84 (18.6.84)
भुक्तवत्सु द्विजेन्द्रेषु यथावत्सम्प्रदापयेत् । वाचकं भरतश्रेष्ठ भोजयित्वा स्वलंकृतम् ॥
bhuktavatsu dvijendreṣu yathāvatsampradāpayet | vācakaṃ bharataśreṣṭha bhojayitvā svalaṃkṛtam
जब श्रेष्ठ ब्राह्मण भोजन कर चुकें, तब, हे भरतश्रेष्ठ, वाचक को भोजन कराकर और अलंकृत करके उसे विधिपूर्वक दान दे।
श्लोक 85 (18.6.85)
वाचके परितुष्टे तु शुभा प्रीतिरनुत्तमा । ब्राह्मणेषु तु तुष्टेषु प्रसन्नाः सर्वदेवताः ॥
vācake parituṣṭe tu śubhā prītiranuttamā | brāhmaṇeṣu tu tuṣṭeṣu prasannāḥ sarvadevatāḥ
वाचक के सन्तुष्ट होने पर परम शुभ प्रीति होती है; ब्राह्मणों के सन्तुष्ट होने पर सभी देवता प्रसन्न होते हैं।
श्लोक 86 (18.6.86)
ततो हि वरणं कार्यं द्विजानां भरतर्षभ । सर्वकामैर्यथान्यायं साधुभिश्च पृथग्विधैः ॥
tato hi varaṇaṃ kāryaṃ dvijānāṃ bharatarṣabha | sarvakāmairyathānyāyaṃ sādhubhiśca pṛthagvidhaiḥ
तब, हे भरतर्षभ, ब्राह्मणों का यथाविधि सब इच्छित वस्तुओं से और अनेक प्रकार के उत्तम दानों से सत्कार करना चाहिए।
श्लोक 87 (18.6.87)
इत्येष विधिरुद्दिष्टो मया ते द्विपदांवर । श्रद्दधानेन वै भाव्यं यन्मां त्वं परिपृच्छसि ॥
ityeṣa vidhiruddiṣṭo mayā te dvipadāṃvara | śraddadhānena vai bhāvyaṃ yanmāṃ tvaṃ paripṛcchasi
हे नरश्रेष्ठ, इस प्रकार यह विधि मैंने तुम्हारे लिए कही; श्रद्धा रखनी चाहिए, क्योंकि तुम मुझसे यही पूछ रहे हो।
श्लोक 88 (18.6.88)
भारतश्रवणे राजन्पारणे च नृपोत्तम । सदा यत्नवता भाव्यं श्रेयस्तु परमिच्छता ॥
bhārataśravaṇe rājanpāraṇe ca nṛpottama | sadā yatnavatā bhāvyaṃ śreyastu paramicchatā
हे राजन्, हे नृपोत्तम, भारत के श्रवण में और उसकी पारणाओं में परम कल्याण चाहने वाले को सदा यत्नशील रहना चाहिए।
श्लोक 89 (18.6.89)
भारतं शृणुयान्नित्यं भारतं परिकीर्तयेत् । भारतं भवने यस्य तस्य हस्तगतो जयः ॥
bhārataṃ śṛṇuyānnityaṃ bhārataṃ parikīrtayet | bhārataṃ bhavane yasya tasya hastagato jayaḥ
मनुष्य सदा भारत सुने और सदा भारत का कीर्तन करे; जिसके घर में भारत है, विजय उसके हाथ में है।
श्लोक 90 (18.6.90)
भारतं परमं पुण्यं भारते विविधाः कथाः । भारतं सेव्यते देवैर्भारतं परमं पदम् ॥
bhārataṃ paramaṃ puṇyaṃ bhārate vividhāḥ kathāḥ | bhārataṃ sevyate devairbhārataṃ paramaṃ padam
भारत परम पवित्र है; भारत में अनेक प्रकार की कथाएँ हैं; भारत का सेवन देवता भी करते हैं; भारत परम पद है।
श्लोक 91 (18.6.91)
भारतं सर्वशास्त्राणामुत्तमं भरतर्षभ । भारतात्प्राप्यते मोक्षस्तत्त्वमेतद्ब्रवीमि तत् ॥
bhārataṃ sarvaśāstrāṇāmuttamaṃ bharatarṣabha | bhāratātprāpyate mokṣastattvametadbravīmi tat
हे भरतर्षभ, भारत सब शास्त्रों में उत्तम है; भारत से मोक्ष प्राप्त होता है; यह तत्त्व मैं तुमसे कहता हूँ।
श्लोक 92 (18.6.92)
महाभारतमाख्यानं क्षितिं गां च सरस्वतीम् । ब्राह्मणान्केशवं चैव कीर्तयन्नावसीदति ॥
mahābhāratamākhyānaṃ kṣitiṃ gāṃ ca sarasvatīm | brāhmaṇānkeśavaṃ caiva kīrtayannāvasīdati
जो महाभारत की कथा का, पृथ्वी का, गौ का, सरस्वती का, ब्राह्मणों का और केशव का कीर्तन करता है, वह दुःख नहीं पाता।
श्लोक 93 (18.6.93)
वेदे रामायणे पुण्ये भारते भरतर्षभ । आदौ चान्ते च मध्ये च हरिः सर्वत्र गीयते ॥
vede rāmāyaṇe puṇye bhārate bharatarṣabha | ādau cānte ca madhye ca hariḥ sarvatra gīyate
वेद में, पवित्र रामायण में और भारत में, हे भरतर्षभ, आदि, मध्य और अन्त में सर्वत्र हरि का ही गान किया गया है।
श्लोक 94 (18.6.94)
यत्र विष्णुकथा दिव्याः श्रुतयश्च सनातनाः । तच्छ्रोतव्यं मनुष्येण परं पदमिहेच्छता ॥
yatra viṣṇukathā divyāḥ śrutayaśca sanātanāḥ | tacchrotavyaṃ manuṣyeṇa paraṃ padamihecchatā
जहाँ विष्णु की दिव्य कथाएँ और सनातन श्रुतियाँ हों, उसे परम पद चाहने वाले मनुष्य को सुनना चाहिए।
श्लोक 95 (18.6.95)
एतत्पवित्रं परममेतद्धर्मनिदर्शनम् । एतत्सर्वगुणोपेतं श्रोतव्यं भूतिमिच्छता ॥
etatpavitraṃ paramametaddharmanidarśanam | etatsarvaguṇopetaṃ śrotavyaṃ bhūtimicchatā
यह पवित्र करने वाला, परम, धर्म का प्रदर्शक और सब गुणों से युक्त है; ऐश्वर्य चाहने वाले को इसे सुनना चाहिए।
श्लोक 96 (18.6.96)
कायिकं वाचिकं चैव मनसा समुपार्जितम् । तत्सर्वं नाशमायाति तमः सूर्योदये यथा ॥
kāyikaṃ vācikaṃ caiva manasā samupārjitam | tatsarvaṃ nāśamāyāti tamaḥ sūryodaye yathā
शरीर, वाणी और मन से जो कुछ अर्जित किया गया है वह सब नष्ट हो जाता है, जैसे सूर्योदय होने पर अन्धकार।
श्लोक 97 (18.6.97)
अष्टादशपुराणानां श्रवणाद्यत्फलं भवेत् । तत्फलं समवाप्नोति वैष्णवो नात्र संशयः ॥
aṣṭādaśapurāṇānāṃ śravaṇādyatphalaṃ bhavet | tatphalaṃ samavāpnoti vaiṣṇavo nātra saṃśayaḥ
अठारह पुराणों के श्रवण से जो फल होता है, उस फल को विष्णुभक्त पाता है; इसमें सन्देह नहीं।
श्लोक 98 (18.6.98)
स्त्रियश्च पुरुषाश्चैव वैष्णवं पदमाप्नुयुः । स्त्रीभिश्च पुत्रकामाभिः श्रोतव्यं वैष्णवं यशः ॥
striyaśca puruṣāścaiva vaiṣṇavaṃ padamāpnuyuḥ | strībhiśca putrakāmābhiḥ śrotavyaṃ vaiṣṇavaṃ yaśaḥ
स्त्रियाँ और पुरुष दोनों विष्णु के पद को प्राप्त होते हैं; पुत्र की कामना करने वाली स्त्रियों को विष्णु का यह यश सुनना चाहिए।
श्लोक 99 (18.6.99)
दक्षिणा चात्र देया वै निष्कपञ्चसुवर्णकम् । वाचकाय यथाशक्त्या यथोक्तं फलमिच्छता ॥
dakṣiṇā cātra deyā vai niṣkapañcasuvarṇakam | vācakāya yathāśaktyā yathoktaṃ phalamicchatā
और यहाँ वाचक को पाँच निष्क सोने की दक्षिणा शक्ति के अनुसार देनी चाहिए, जो कहे हुए फल की इच्छा रखता हो।
श्लोक 100 (18.6.100)
स्वर्णशृङ्गीं च कपिलां सवत्सां वस्त्रसंवृताम् । वाचकाय च दद्याद्धि आत्मनः श्रेय इच्छता ॥
svarṇaśṛṅgīṃ ca kapilāṃ savatsāṃ vastrasaṃvṛtām | vācakāya ca dadyāddhi ātmanaḥ śreya icchatā
अपना कल्याण चाहने वाले को वाचक के लिए सोने के सींगों वाली, बछड़े सहित, वस्त्र से ढकी हुई कपिला गाय देनी चाहिए।
श्लोक 101 (18.6.101)
अलङ्कारं प्रदद्याच्च पाण्योर्वै भरतर्षभ । कर्णस्याभरणं दद्याद्धनं चैव विशेषतः ॥
alaṅkāraṃ pradadyācca pāṇyorvai bharatarṣabha | karṇasyābharaṇaṃ dadyāddhanaṃ caiva viśeṣataḥ
हे भरतर्षभ, वह हाथों का आभूषण दे, कान का आभूषण दे, और विशेषकर धन दे।
श्लोक 102 (18.6.102)
भूमिदानं समादद्याद्वाचकाय नराधिप । भूमिदानसमं दानं न भूतं भविष्यति ॥
bhūmidānaṃ samādadyādvācakāya narādhipa | bhūmidānasamaṃ dānaṃ na bhūtaṃ bhaviṣyati
हे नराधिप, वाचक को भूमिदान दे; भूमिदान के समान कोई दान न हुआ है, न होगा।
श्लोक 103 (18.6.103)
शृणोति श्रावयेद्वाऽपि सततं चैव यो नरः । सर्वपापविनिर्मुक्तो वैष्णवं पदमाप्नुयात् ॥
śṛṇoti śrāvayedvā'pi satataṃ caiva yo naraḥ | sarvapāpavinirmukto vaiṣṇavaṃ padamāpnuyāt
जो मनुष्य इसे सदा सुनता है या सुनवाता है, वह सब पापों से मुक्त होकर विष्णु के पद को प्राप्त करता है।
श्लोक 104 (18.6.104)
पितॄनुद्धरते सर्वानेकादशसमुद्भवान् । आत्मानं ससुतं चैव स्त्रियं च भरतर्षभ ॥
pitṝnuddharate sarvānekādaśasamudbhavān | ātmānaṃ sasutaṃ caiva striyaṃ ca bharatarṣabha
हे भरतर्षभ, वह ग्यारह पीढ़ियों में उत्पन्न अपने सब पितरों का, और पुत्रों तथा पत्नी सहित स्वयं का उद्धार कर देता है।
श्लोक 105 (18.6.105)
दशांशश्चैव होमोपि कर्तव्योत्र नराधिप । इदं मया तवाग्रे च प्रोक्तं सर्वं नरर्षभ ॥
daśāṃśaścaiva homopi kartavyotra narādhipa | idaṃ mayā tavāgre ca proktaṃ sarvaṃ nararṣabha
और यहाँ, हे नराधिप, दशमांश का होम भी करना चाहिए। हे नरश्रेष्ठ, यह सब मैंने तुम्हें कह दिया।