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स्वर्गारोहण पर्व · अध्याय 5

वीरों की गति और महाभारत की महिमा

जनमेजय पूछते हैं कि मारे गए राजा और वीर कहाँ गए, और वैशम्पायन व्यास के कथनानुसार बताते हैं कि प्रत्येक अपने मूल दिव्य स्वरूप में समा गया: भीष्म वसुओं में, द्रोण बृहस्पति में, कर्ण सूर्य में, अभिमन्यु सोम में, विदुर और युधिष्ठिर धर्म में, और वासुदेव नारायण में। जनमेजय यज्ञ पूरा करके हस्तिनापुर लौटते हैं। फिर सौति महाभारत की महिमा और उसे सुनने, पढ़ने तथा आदर देने के फल बताकर महाकाव्य का समापन करते हैं।

अध्याय 4अध्याय-सूचीअध्याय 6

जनमेजय उवाच

श्लोक 1 (18.5.1)

भीष्मद्रोणौ महात्मानौ धृतराष्ट्रश्च पार्थिवः । विराटद्रुपदौ चोभौ शङ्खश्चैवोत्तरस्तथा ॥

bhīṣmadroṇau mahātmānau dhṛtarāṣṭraśca pārthivaḥ | virāṭadrupadau cobhau śaṅkhaścaivottarastathā

"महात्मा भीष्म और द्रोण, राजा धृतराष्ट्र, विराट और द्रुपद दोनों, शङ्ख और उत्तर,"

श्लोक 2 (18.5.2)

धृष्टकेतुर्जयत्सेनो राजा चैव स सत्यजित् । दुर्योधनसुताश्चैव शकुनिश्चैव सौबलः ॥

dhṛṣṭaketurjayatseno rājā caiva sa satyajit | duryodhanasutāścaiva śakuniścaiva saubalaḥ

"धृष्टकेतु, जयत्सेन और राजा सत्यजित्, दुर्योधन के पुत्र और सुबलपुत्र शकुनि,"

श्लोक 3 (18.5.3)

कर्णपुत्राश्च विक्रान्ता राजा चैव जयद्रथः । घटोत्कचादयश्चैव ये चान्ये नानुकीर्तिताः ॥

karṇaputrāśca vikrāntā rājā caiva jayadrathaḥ | ghaṭotkacādayaścaiva ye cānye nānukīrtitāḥ

"कर्ण के पराक्रमी पुत्र, राजा जयद्रथ, घटोत्कच आदि, और वे सब जिनका नाम नहीं लिया गया —"

श्लोक 4 (18.5.4)

ये चान्ये कीर्तिता वीरा राजानो दीप्तमूर्तयः । स्वर्गे कालं कियन्तं ते तस्थुस्तदपि शंस मे ॥

ye cānye kīrtitā vīrā rājāno dīptamūrtayaḥ | svarge kālaṃ kiyantaṃ te tasthustadapi śaṃsa me

"और जो अन्य वीर तथा दीप्तिमान राजा गिनाए गए, वे स्वर्ग में कितने समय तक रहे? यह भी मुझे बताइए।"

श्लोक 5 (18.5.5)

आहोस्विच्छाश्वतं स्थानं तेषां तत्र द्विजोत्तम । अन्ते वा कर्मणां कां ते गतिं प्राप्ता नरर्षभाः ॥

āhosvicchāśvataṃ sthānaṃ teṣāṃ tatra dvijottama | ante vā karmaṇāṃ kāṃ te gatiṃ prāptā nararṣabhāḥ

"हे द्विजश्रेष्ठ! क्या वहाँ उनका निवास शाश्वत है? अथवा कर्मों का फल समाप्त होने पर उन नरश्रेष्ठों ने कौन-सी गति पाई?"

श्लोक 6 (18.5.6)

एतदिच्छाम्यहं श्रोतुं प्रोच्यमानं द्विजोत्तम । तपसा हि प्रदीप्तेन सर्वं त्वमनुपश्यसि ॥

etadicchāmyahaṃ śrotuṃ procyamānaṃ dvijottama | tapasā hi pradīptena sarvaṃ tvamanupaśyasi

"हे द्विजश्रेष्ठ! मैं आपके मुख से यही सुनना चाहता हूँ; क्योंकि अपनी प्रदीप्त तपस्या से आप सब कुछ देखते हैं।"

सौतिरुवाच

श्लोक 7 (18.5.7)

इत्युक्तः स तु विप्रर्षिरनुज्ञातो महात्मना । व्यासेन तस्य नृपतेराख्यातुमुपचक्रमे ॥

ityuktaḥ sa tu viprarṣiranujñāto mahātmanā | vyāsena tasya nṛpaterākhyātumupacakrame

ऐसा कहे जाने पर उन विप्रर्षि वैशम्पायन ने, महात्मा व्यास की आज्ञा पाकर, राजा को यह सब सुनाना आरम्भ किया।

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 8 (18.5.8)

गन्तव्यं कर्मणामन्ते सर्वेषां मनुजाधिप । शृणु गुह्यमिदं राजन्देवानां भरतर्षभ । यदुवाच महातेजा दिव्यचक्षुः प्रतापवान् ॥

gantavyaṃ karmaṇāmante sarveṣāṃ manujādhipa | śṛṇu guhyamidaṃ rājandevānāṃ bharatarṣabha | yaduvāca mahātejā divyacakṣuḥ pratāpavān

"हे नरेश्वर! कर्मों का फल समाप्त होने पर सभी को जाना ही पड़ता है। हे राजन्, भरतश्रेष्ठ! देवताओं का यह गुप्त रहस्य सुनिए, जिसे उन महातेजस्वी, दिव्यदृष्टि और प्रतापी मुनि ने कहा था —"

श्लोक 9 (18.5.9)

मुनिः पुराणः कौरव्य पाराशर्यो महाव्रतः । अगाधबुद्धिः सर्वज्ञो गतिज्ञः सर्वकर्मणाम् ॥

muniḥ purāṇaḥ kauravya pārāśaryo mahāvrataḥ | agādhabuddhiḥ sarvajño gatijñaḥ sarvakarmaṇām

"वे पुराण मुनि, हे कौरव्य, पराशरपुत्र व्यास — महाव्रती, अगाध बुद्धि वाले, सर्वज्ञ और सब कर्मों की गति को जानने वाले हैं।"

श्लोक 10 (18.5.10)

तेनोक्तं कर्मणामन्ते प्रविशन्ति स्विकां तनुम् ॥

tenoktaṃ karmaṇāmante praviśanti svikāṃ tanum

"उन्होंने कहा है कि कर्मों का अन्त होने पर वे अपने ही रूप में प्रवेश करते हैं।"

श्लोक 11 (18.5.11)

वसूनेव महातेजा भीष्मः प्राप महाद्युतिः । अष्टावेव हि दृश्यन्ते वसवो भरतर्षभ ॥

vasūneva mahātejā bhīṣmaḥ prāpa mahādyutiḥ | aṣṭāveva hi dṛśyante vasavo bharatarṣabha

"महातेजस्वी और महाद्युतिमान् भीष्म वसुओं में समा गए; क्योंकि हे भरतश्रेष्ठ, आठों वसु फिर पूरे दिखाई देते हैं।"

श्लोक 12 (18.5.12)

बृहस्पतिं विवेशाथ द्रोणो ह्यङ्गिरसां वरम् । कृतवर्मा तु हार्दिक्यः प्रविवेश मरुद्गणान् ॥

bṛhaspatiṃ viveśātha droṇo hyaṅgirasāṃ varam | kṛtavarmā tu hārdikyaḥ praviveśa marudgaṇān

"द्रोण अङ्गिराओं में श्रेष्ठ बृहस्पति में प्रविष्ट हुए; हृदिकपुत्र कृतवर्मा मरुद्गणों में समा गए।"

श्लोक 13 (18.5.13)

सनत्कुमारं प्रद्युम्नः प्रविवेश यथागतम् । धृतराष्ट्रो धनेशस्य लोकान्प्राप दुरासदान् ॥

sanatkumāraṃ pradyumnaḥ praviveśa yathāgatam | dhṛtarāṣṭro dhaneśasya lokānprāpa durāsadān

"प्रद्युम्न जहाँ से आए थे, उसी सनत्कुमार में प्रविष्ट हो गए; धृतराष्ट्र ने धन के स्वामी कुबेर के दुर्लभ लोक प्राप्त किए।"

श्लोक 14 (18.5.14)

धृतराष्ट्रेण सहिता गन्धारी च यशस्विनी । पत्नीभ्यां सहितः पाण्डुर्महेन्द्रसदनं ययौ ॥

dhṛtarāṣṭreṇa sahitā gandhārī ca yaśasvinī | patnībhyāṃ sahitaḥ pāṇḍurmahendrasadanaṃ yayau

"यशस्विनी गान्धारी धृतराष्ट्र के साथ गईं; और पाण्डु अपनी दोनों पत्नियों के साथ महेन्द्र के धाम को गए।"

श्लोक 15 (18.5.15)

विराटद्रुपदौ चोभौ धृष्टकेतुश्च पार्थिवः । निशठाक्रूरसाम्बाश्च भानुः कण्वो विदूरथः ॥

virāṭadrupadau cobhau dhṛṣṭaketuśca pārthivaḥ | niśaṭhākrūrasāmbāśca bhānuḥ kaṇvo vidūrathaḥ

"विराट और द्रुपद दोनों, राजा धृष्टकेतु, निशठ, अक्रूर, साम्ब, भानु, कण्व और विदूरथ —"

श्लोक 16 (18.5.16)

भूरिश्रवाः शलश्चैव भूरिश्च पृथिवीपतिः । कंसश्चैवोग्रसेनश्च वसुदेवस्तथैव च ॥

bhūriśravāḥ śalaścaiva bhūriśca pṛthivīpatiḥ | kaṃsaścaivograsenaśca vasudevastathaiva ca

"भूरिश्रवा, शल, राजा भूरि, कंस, उग्रसेन और वसुदेव भी —"

श्लोक 17 (18.5.17)

उत्तरश्च सह भ्रात्रा शङ्खेन नरपुङ्गवः । विश्वेषां देवतानां ते विविशुर्नरसत्तमाः ॥

uttaraśca saha bhrātrā śaṅkhena narapuṅgavaḥ | viśveṣāṃ devatānāṃ te viviśurnarasattamāḥ

"तथा अपने भाई शङ्ख के साथ नरश्रेष्ठ उत्तर — ये नरश्रेष्ठ विश्वेदेवों में प्रविष्ट हुए।"

श्लोक 18 (18.5.18)

वर्चा नाम महातेजाः सोमपुत्रः प्रतापवान् । सोऽभिमन्युर्नृसिंहस्य फल्गुनस्य सुतोऽभवत् ॥

varcā nāma mahātejāḥ somaputraḥ pratāpavān | so'bhimanyurnṛsiṃhasya phalgunasya suto'bhavat

"वर्चा नाम के एक महातेजस्वी और प्रतापी सोमपुत्र थे; वे ही नरसिंह फल्गुन (अर्जुन) के पुत्र अभिमन्यु हुए।"

श्लोक 19 (18.5.19)

स युद्ध्वा क्षत्रधर्मेण यथा नान्यः पुमान्क्वचित् । विवेश सोमं धर्मात्मा कर्मणोऽन्ते महारथः ॥

sa yuddhvā kṣatradharmeṇa yathā nānyaḥ pumānkvacit | viveśa somaṃ dharmātmā karmaṇo'nte mahārathaḥ

"क्षत्रिय-धर्म के अनुसार उन्होंने ऐसा युद्ध किया जैसा और कोई पुरुष कभी नहीं कर सका; फिर वे धर्मात्मा महारथी कर्मों का अन्त होने पर सोम में प्रविष्ट हो गए।"

श्लोक 20 (18.5.20)

आविवेश रविं कर्णो निहतः पुरुषर्षभ । द्वापरं शकुनिः प्राप धृष्टद्युम्नस्तु पावकम् ॥

āviveśa raviṃ karṇo nihataḥ puruṣarṣabha | dvāparaṃ śakuniḥ prāpa dhṛṣṭadyumnastu pāvakam

"मारे गए कर्ण, हे पुरुषश्रेष्ठ, सूर्य में प्रविष्ट हुए; शकुनि द्वापर को प्राप्त हुआ; और धृष्टद्युम्न अग्नि में समा गए।"

श्लोक 21 (18.5.21)

धृतराष्ट्रात्मजाः सर्वे यातुधानान्प्रपेदिरे । धर्ममेवाविशत्क्षत्ता राजा चैव युधिष्ठिरः ॥

dhṛtarāṣṭrātmajāḥ sarve yātudhānānprapedire | dharmamevāviśatkṣattā rājā caiva yudhiṣṭhiraḥ

"धृतराष्ट्र के सभी पुत्र यातुधानों (राक्षसों) को प्राप्त हुए; क्षत्ता (विदुर) और राजा युधिष्ठिर धर्म में समा गए।"

श्लोक 22 (18.5.22)

अनन्तो भगवान्देवः प्रविवेश रसातलम् । पितामहनियोगाद्वै यो योगाद्गामधारयत् ॥

ananto bhagavāndevaḥ praviveśa rasātalam | pitāmahaniyogādvai yo yogādgāmadhārayat

"भगवान् देव अनन्त रसातल में प्रविष्ट हुए — वे जिन्होंने पितामह (ब्रह्मा) की आज्ञा से अपने योगबल से पृथ्वी को धारण किया था।"

श्लोक 23 (18.5.23)

यः स नारायणो नाम देवदेवः सनातनः । तस्यांशो वासुदेवस्तु कर्मणोऽन्ते विवेश ह ॥

yaḥ sa nārāyaṇo nāma devadevaḥ sanātanaḥ | tasyāṃśo vāsudevastu karmaṇo'nte viveśa ha

"जो देवों के देव, सनातन नारायण हैं, वासुदेव उन्हीं के अंश थे; और कर्मों का अन्त होने पर वे उनमें प्रविष्ट हो गए।"

श्लोक 24 (18.5.24)

षोडशस्त्रीसहस्राणि वासुदेवपरिग्रहाः । अमज्जंस्ताः सरस्वत्यां कालेन जनमेजय ॥

ṣoḍaśastrīsahasrāṇi vāsudevaparigrahāḥ | amajjaṃstāḥ sarasvatyāṃ kālena janamejaya

"वासुदेव की जो सोलह हज़ार पत्नियाँ थीं, हे जनमेजय, उन्होंने समय आने पर सरस्वती में डुबकी लगा दी।"

श्लोक 25 (18.5.25)

तत्र त्यक्त्वा शरीराणि दिवमारुरुहुः पुनः । ताश्चैवाप्सरसो भूत्वा वासुदेवमुपाविशन् ॥

tatra tyaktvā śarīrāṇi divamāruruhuḥ punaḥ | tāścaivāpsaraso bhūtvā vāsudevamupāviśan

"वहाँ उन्होंने अपने शरीर त्याग दिए और फिर स्वर्ग में चढ़ गईं; और अप्सराएँ बनकर वासुदेव की सेवा में उपस्थित हुईं।"

श्लोक 26 (18.5.26)

हतास्तस्मिन्महायुद्धे ये वीरास्तु महारथाः । घटोत्कचादयश्चैव देवान्यक्षांश्च भेजिरे ॥

hatāstasminmahāyuddhe ye vīrāstu mahārathāḥ | ghaṭotkacādayaścaiva devānyakṣāṃśca bhejire

"उस महायुद्ध में जो वीर महारथी मारे गए थे, घटोत्कच आदि सब, वे देवताओं और यक्षों में जा मिले।"

श्लोक 27 (18.5.27)

दुर्योधनसहायाश्च राक्षसा येऽनुकीर्तिताः । प्राप्तास्ते क्रमशो राजन्सर्वलोकाननुत्तमान् ॥

duryodhanasahāyāśca rākṣasā ye'nukīrtitāḥ | prāptāste kramaśo rājansarvalokānanuttamān

"जो राक्षस दुर्योधन के सहायक बताए गए थे, वे हे राजन्, क्रम से सब उत्तम लोकों को प्राप्त हुए।"

श्लोक 28 (18.5.28)

भवनं च महेन्द्रस्य कुबेरस्य च धीमतः । वरुणस्य तथा लोकान्विविशुः पुरुषर्षभाः ॥

bhavanaṃ ca mahendrasya kuberasya ca dhīmataḥ | varuṇasya tathā lokānviviśuḥ puruṣarṣabhāḥ

"वे पुरुषश्रेष्ठ महेन्द्र के भवन में, बुद्धिमान कुबेर के भवन में और वरुण के लोकों में प्रविष्ट हुए।"

श्लोक 29 (18.5.29)

एतत्ते सर्वमाख्यातं विस्तरेण महाद्युते । कुरूणां चरितं कृत्स्नं पाण्डवानां च भारत ॥

etatte sarvamākhyātaṃ vistareṇa mahādyute | kurūṇāṃ caritaṃ kṛtsnaṃ pāṇḍavānāṃ ca bhārata

"हे महातेजस्वी! यह सब मैंने आपको विस्तार से सुना दिया — कुरुओं और पाण्डवों का सम्पूर्ण चरित, हे भारत।"

सौतिरुवाच

श्लोक 30 (18.5.30)

एतच्छ्रुत्वा द्विजश्रेष्ठात्स राजा जनमेजयः । विस्मितोऽभवदत्यर्थं यज्ञकर्मान्तरेष्वथ ॥

etacchrutvā dvijaśreṣṭhātsa rājā janamejayaḥ | vismito'bhavadatyarthaṃ yajñakarmāntareṣvatha

द्विजश्रेष्ठ से यह सुनकर राजा जनमेजय यज्ञ-कर्म के बीच के समय में अत्यन्त विस्मित हुए।

श्लोक 31 (18.5.31)

ततः समापयामासुः कर्म तत्तस्य याजकाः । आस्तिकश्चाभवत्प्रीतः परिमोक्ष्य भुजङ्गमान् ॥

tataḥ samāpayāmāsuḥ karma tattasya yājakāḥ | āstikaścābhavatprītaḥ parimokṣya bhujaṅgamān

तब उनके याजकों ने उस यज्ञ-कर्म को पूरा कर दिया; और सर्पों को मुक्त कराकर आस्तीक प्रसन्न हुए।

श्लोक 32 (18.5.32)

ततो द्विजातीन्सर्वांस्तान्दक्षिणाभिरतोषयत् । पूजिताश्चापि ते राज्ञा ततो जग्मुर्यथागतम् ॥

tato dvijātīnsarvāṃstāndakṣiṇābhiratoṣayat | pūjitāścāpi te rājñā tato jagmuryathāgatam

फिर उन्होंने उन सब ब्राह्मणों को दक्षिणाओं से सन्तुष्ट किया; राजा से सम्मानित होकर वे जैसे आए थे वैसे ही लौट गए।

श्लोक 33 (18.5.33)

विसर्जयित्वा विप्रांस्तान्राजाऽपि जनमेजयः । हृष्टस्तक्षशिलायाः स पुनरायाद्गजाह्वयम् ॥

visarjayitvā viprāṃstānrājā'pi janamejayaḥ | hṛṣṭastakṣaśilāyāḥ sa punarāyādgajāhvayam

उन ब्राह्मणों को विदा करके राजा जनमेजय भी हर्षित होकर तक्षशिला से फिर हस्तिनापुर लौट आए।

श्लोक 34 (18.5.34)

एतत्ते सर्वमाख्यातं वैशम्पायनकीर्तितम् । व्यासाज्ञया समाज्ञातं सर्पसत्रे नृपस्य हि ॥

etatte sarvamākhyātaṃ vaiśampāyanakīrtitam | vyāsājñayā samājñātaṃ sarpasatre nṛpasya hi

यह सब मैंने आपको सुना दिया, जैसा वैशम्पायन ने कहा था; व्यास की आज्ञा से राजा के सर्पयज्ञ में यह सुनाया गया था।

श्लोक 35 (18.5.35)

पुण्योऽयमितिहासाख्यः पवित्रं चेदमुत्तमम् । कृष्णेन मुनिना विप्र निर्मितं सत्यवादिना ॥

puṇyo'yamitihāsākhyaḥ pavitraṃ cedamuttamam | kṛṣṇena muninā vipra nirmitaṃ satyavādinā

यह इतिहास पुण्य देने वाला है और यह उत्तम ग्रन्थ पवित्र करने वाला है; हे विप्र! इसे सदा सत्य बोलने वाले मुनि कृष्ण ने रचा है —

श्लोक 36 (18.5.36)

सर्वज्ञेन विधिज्ञेन धर्मज्ञानवता सता । अतीन्द्रियेण शुचिना तपसा भावितात्मना ॥

sarvajñena vidhijñena dharmajñānavatā satā | atīndriyeṇa śucinā tapasā bhāvitātmanā

जो सर्वज्ञ, विधियों के ज्ञाता, धर्म के जानने वाले, सज्जन, इन्द्रियों से परे, शुद्ध और तप से परिष्कृत आत्मा वाले हैं;

श्लोक 37 (18.5.37)

ऐश्वर्ये वर्तता चैव साङ्ख्ययोगवता तथा । नैकतन्त्रविबुद्धेन दृष्ट्वा दिव्येन चक्षुषा ॥

aiśvarye vartatā caiva sāṅkhyayogavatā tathā | naikatantravibuddhena dṛṣṭvā divyena cakṣuṣā

जो ऐश्वर्य में स्थित हैं, साङ्ख्य और योग के ज्ञाता हैं, अनेक शास्त्रों के बोध से युक्त हैं, और जिन्होंने दिव्य दृष्टि से देखकर इसकी रचना की;

श्लोक 38 (18.5.38)

कीर्तिं प्रथयता लोके पाण्डवानां महात्मनाम् । अन्येषां क्षत्रियाणां च भूरिद्रविणतेजसाम् ॥

kīrtiṃ prathayatā loke pāṇḍavānāṃ mahātmanām | anyeṣāṃ kṣatriyāṇāṃ ca bhūridraviṇatejasām

जिन्होंने महात्मा पाण्डवों की तथा अपार धन और तेज वाले अन्य क्षत्रियों की कीर्ति लोक में फैलाई,

श्लोक 39 (18.5.39)

क्रीडां च वासुदेवस्य देवदेवस्य शाङ्गिणः । विश्वेषां देवभागानां जन्मसायुज्यमेव च ॥

krīḍāṃ ca vāsudevasya devadevasya śāṅgiṇaḥ | viśveṣāṃ devabhāgānāṃ janmasāyujyameva ca

तथा देवों के देव, शार्ङ्गधनुषधारी वासुदेव की लीला, और समस्त देवताओं के अंशों के जन्म तथा उनके पुनः मिलन का वर्णन भी किया।

श्लोक 40 (18.5.40)

य इदं शृणुयाद्विद्वान्पर्वसु द्विजसत्तमः । धूतपाप्मा जितस्वर्गो ब्रह्मभूयाय गच्छति ॥

ya idaṃ śṛṇuyādvidvānparvasu dvijasattamaḥ | dhūtapāpmā jitasvargo brahmabhūyāya gacchati

जो विद्वान् द्विजश्रेष्ठ पर्व के दिनों में इसे सुनता है, वह पाप धोकर, स्वर्ग को जीतकर ब्रह्मभाव को प्राप्त होता है।

श्लोक 41 (18.5.41)

कार्ष्णं वेदमिमं सर्वं शृणुयाद्यः समाहितः । ब्रह्महत्याकृतं पापं तत्क्षणादेव नश्यति ॥

kārṣṇaṃ vedamimaṃ sarvaṃ śṛṇuyādyaḥ samāhitaḥ | brahmahatyākṛtaṃ pāpaṃ tatkṣaṇādeva naśyati

जो समाहित चित्त से कृष्ण द्वैपायन के इस सम्पूर्ण वेद को सुनता है, ब्रह्महत्या से उत्पन्न उसका पाप उसी क्षण नष्ट हो जाता है।

श्लोक 42 (18.5.42)

यश्चेदं श्रावयेच्छ्राद्धे ब्राह्मणान्पादमन्ततः । अक्षय्यमन्नपानं वै पितॄंस्तस्योपतिष्ठते ॥

yaścedaṃ śrāvayecchrāddhe brāhmaṇānpādamantataḥ | akṣayyamannapānaṃ vai pitṝṃstasyopatiṣṭhate

जो श्राद्ध में अन्त में कम से कम एक चरण भी ब्राह्मणों को सुनाता है, उसके पितरों को अक्षय अन्न-पान प्राप्त होता है।

श्लोक 43 (18.5.43)

अह्ना यदेनः कुरुते इन्द्रियैर्मनसाऽपि वा । महाभारतमाख्याय सर्वपापैः प्रमुच्यते ॥

ahnā yadenaḥ kurute indriyairmanasā'pi vā | mahābhāratamākhyāya sarvapāpaiḥ pramucyate

दिन में इन्द्रियों या मन से जो पाप किया जाता है, महाभारत का पाठ करने से मनुष्य उन सब पापों से मुक्त हो जाता है।

श्लोक 44 (18.5.44)

यद्रात्रौ कुरुते पापं ब्राह्मणः स्त्रीगणैर्वृतः । महाभारतमाख्याय पूर्वां सन्ध्यां प्रमुच्यते ॥

yadrātrau kurute pāpaṃ brāhmaṇaḥ strīgaṇairvṛtaḥ | mahābhāratamākhyāya pūrvāṃ sandhyāṃ pramucyate

रात में स्त्रियों से घिरा हुआ कोई ब्राह्मण जो पाप करता है, वह प्रातःसन्ध्या में महाभारत का पाठ करके उससे मुक्त हो जाता है।

श्लोक 45 (18.5.45)

महत्त्वाद्भारवत्त्वाच्च महाभारतमुच्यते । निरुक्तमस्य यो वेद सर्वपापैः प्रमुच्यते ॥

mahattvādbhāravattvācca mahābhāratamucyate | niruktamasya yo veda sarvapāpaiḥ pramucyate

महत्त्व और भार (गौरव) के कारण इसे महाभारत कहा जाता है; जो इस नाम की व्युत्पत्ति जानता है, वह सब पापों से मुक्त हो जाता है।

श्लोक 46 (18.5.46)

अष्टादशपुराणानि धर्मशास्त्राणि सर्वशः । वेदाः साङ्गास्तथैकत्र भारतं चैकतः स्थितम् ॥

aṣṭādaśapurāṇāni dharmaśāstrāṇi sarvaśaḥ | vedāḥ sāṅgāstathaikatra bhārataṃ caikataḥ sthitam

अठारह पुराण, सभी धर्मशास्त्र और अङ्गों सहित वेद एक ओर हैं, और भारत अकेला दूसरी ओर स्थित है।

श्लोक 47 (18.5.47)

श्रूयतां सिंहनादोऽयमृषेस्तस्य महात्मनः । अष्टादशपुराणानां कर्तुर्वेदमहोदधेः ॥

śrūyatāṃ siṃhanādo'yamṛṣestasya mahātmanaḥ | aṣṭādaśapurāṇānāṃ karturvedamahodadheḥ

अठारह पुराणों के रचयिता, वेद के महासागर उन महात्मा ऋषि की यह सिंहगर्जना सुनिए।

श्लोक 48 (18.5.48)

त्रिभिर्वर्षैर्महत्पुण्यं कृष्णद्वैपायनः प्रभुः । अखिलं भारतं चेदं चकार भगवान्मुनिः ॥

tribhirvarṣairmahatpuṇyaṃ kṛṣṇadvaipāyanaḥ prabhuḥ | akhilaṃ bhārataṃ cedaṃ cakāra bhagavānmuniḥ

तीन वर्षों में भगवान् मुनि प्रभु कृष्ण द्वैपायन ने इस महान् और पुण्यदायक सम्पूर्ण भारत की रचना की।

श्लोक 49 (18.5.49)

आकर्ण्य भक्त्या सततं जयाख्यं भारतं महत् । श्रीश्च कीर्तिस्तथा विद्या भवन्ति सहिताः सदा ॥

ākarṇya bhaktyā satataṃ jayākhyaṃ bhārataṃ mahat | śrīśca kīrtistathā vidyā bhavanti sahitāḥ sadā

जय नाम से प्रसिद्ध इस महान् भारत को भक्तिपूर्वक निरन्तर सुनने वाले के पास श्री, कीर्ति और विद्या सदा साथ-साथ रहती हैं।

श्लोक 50 (18.5.50)

धर्मे चार्थे च कामे च मोक्षे च भरतर्षभ । यदिहास्ति तदन्यत्र यन्नेहास्ति न कुत्रचित् ॥

dharme cārthe ca kāme ca mokṣe ca bharatarṣabha | yadihāsti tadanyatra yannehāsti na kutracit

हे भरतश्रेष्ठ! धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष के विषय में जो कुछ यहाँ है, वही अन्यत्र है; और जो यहाँ नहीं है, वह कहीं नहीं है।

श्लोक 51 (18.5.51)

वाच्यते यत्र सततं जयाख्यं भारतं महत् । श्रीश्च कीर्तिश्च विद्या च भवन्ति मुदिताः सदा ॥

vācyate yatra satataṃ jayākhyaṃ bhārataṃ mahat | śrīśca kīrtiśca vidyā ca bhavanti muditāḥ sadā

जहाँ जय नामक इस महान् भारत का निरन्तर पाठ होता है, वहाँ श्री, कीर्ति और विद्या सदा प्रसन्न रहती हैं।

श्लोक 52 (18.5.52)

भारतस्य तु वक्तारं ब्रह्मर्षिं च महागुरुम् । वैशंपायनमारोप्य स्वर्णभद्रासनं तदा ॥

bhāratasya tu vaktāraṃ brahmarṣiṃ ca mahāgurum | vaiśaṃpāyanamāropya svarṇabhadrāsanaṃ tadā

भारत के वक्ता, ब्रह्मर्षि और महान् गुरु वैशम्पायन को तब स्वर्णमय उत्तम आसन पर बैठाकर,

श्लोक 53 (18.5.53)

जनमेजयादिराजान आस्तिकाद्या द्विजातयः । धर्मदत्तादिवैश्याश्च सोम्यवंश्यादिशूद्रकाः ॥

janamejayādirājāna āstikādyā dvijātayaḥ | dharmadattādivaiśyāśca somyavaṃśyādiśūdrakāḥ

जनमेजय आदि राजाओं, आस्तीक आदि ब्राह्मणों, धर्मदत्त आदि वैश्यों और सोम्यवंश्य आदि शूद्रों ने

श्लोक 54 (18.5.54)

प्रयुतं चायुतं चेति सहस्रं शतमित्यपि । दशकं चेति निष्काणामानर्चुस्तं महागुरुम् ॥

prayutaṃ cāyutaṃ ceti sahasraṃ śatamityapi | daśakaṃ ceti niṣkāṇāmānarcustaṃ mahāgurum

उन महान् गुरु का सम्मान निष्कों के दान से किया — किसी ने एक प्रयुत, किसी ने एक अयुत, किसी ने एक सहस्र, किसी ने सौ, और किसी ने दस निष्क देकर।

श्लोक 55 (18.5.55)

निष्काणां दशकं दत्त्वा मृतपुत्रोऽमृतप्रजः । ऊष्मादिव्याधियुक्तश्च शतं दत्त्वा निरामयः ॥

niṣkāṇāṃ daśakaṃ dattvā mṛtaputro'mṛtaprajaḥ | ūṣmādivyādhiyuktaśca śataṃ dattvā nirāmayaḥ

जिसका पुत्र मर गया था, वह दस निष्क देकर ऐसी सन्तान वाला हुआ जो जीवित रहे; और ज्वर आदि रोगों से ग्रस्त मनुष्य सौ निष्क देकर नीरोग हो गया।

श्लोक 56 (18.5.56)

सहस्रदानात्संतानहीनः संतानपुत्रवान् । आयुरारोग्यमैश्वर्यं भेजुस्तेऽन्नं च पुत्रकान् ॥

sahasradānātsaṃtānahīnaḥ saṃtānaputravān | āyurārogyamaiśvaryaṃ bhejuste'nnaṃ ca putrakān

सहस्र का दान देने से सन्तानहीन को पुत्र मिला; उन्हें दीर्घायु, आरोग्य, ऐश्वर्य, अन्न और पुत्र प्राप्त हुए।

श्लोक 57 (18.5.57)

सुवर्णं रजतं रत्नं सर्वाण्याभरणानि च । सर्वोपकरणैर्युक्तं निधिनिक्षेपसंयुतम् ॥

suvarṇaṃ rajataṃ ratnaṃ sarvāṇyābharaṇāni ca | sarvopakaraṇairyuktaṃ nidhinikṣepasaṃyutam

सोना, चाँदी, रत्न और सब प्रकार के आभूषण; सब सामग्री से सम्पन्न, निधि और धरोहर से युक्त गृह,

श्लोक 58 (18.5.58)

इष्टकाभित्तिसंयुक्तमग्निबाधादिवर्जितम् । देवपूजाग्निहोत्रादिपाठार्थगृहसंयुतम् । सान्तर्बहिस्संवरणं सप्रासादं सगोगृहम् ॥

iṣṭakābhittisaṃyuktamagnibādhādivarjitam | devapūjāgnihotrādipāṭhārthagṛhasaṃyutam | sāntarbahissaṃvaraṇaṃ saprāsādaṃ sagogṛham

ईंट की दीवारों वाला, अग्नि आदि की बाधा से रहित, देवपूजा, अग्निहोत्र और पाठ के योग्य स्थान से युक्त, भीतर-बाहर घेरे वाला, ऊपरी भवन और गोशाला सहित —

श्लोक 59 (18.5.59)

व्यष्ट्या समष्ट्या वा दद्यात्स्वर्गारोहणपर्वणि । निवृत्तिकामो दद्याच्चेत्पुनर्जन्म न विद्यते ॥

vyaṣṭyā samaṣṭyā vā dadyātsvargārohaṇaparvaṇi | nivṛttikāmo dadyāccetpunarjanma na vidyate

इसे व्यक्तिगत रूप से या सामूहिक रूप से स्वर्गारोहण पर्व के समय दान करना चाहिए। मोक्ष चाहने वाला यदि दान करे तो उसका पुनर्जन्म नहीं होता;

श्लोक 60 (18.5.60)

सकामश्चेद्ब्रह्मकल्पं सुखं ब्रह्मगृहे वसेत् ॥

sakāmaścedbrahmakalpaṃ sukhaṃ brahmagṛhe vaset

और यदि वह कामना वाला हो तो एक ब्रह्मकल्प तक ब्रह्मलोक के भवन में सुखपूर्वक निवास करता है।

श्लोक 61 (18.5.61)

पुराणमुखतो यस्माद्वेदान्तज्ञानमाप्यते । स तेन गुरुराख्यातस्तत्पूजा हीशपूजनम् ॥

purāṇamukhato yasmādvedāntajñānamāpyate | sa tena gururākhyātastatpūjā hīśapūjanam

क्योंकि पुराण के वाचक के मुख से वेदान्त का ज्ञान प्राप्त होता है, इसलिए वे गुरु कहे गए हैं; उनकी पूजा ईश्वर की ही पूजा है।

श्लोक 62 (18.5.62)

भारतस्य तु वक्तारं श्रोतारं लेखकांस्तदा । प्रपूजयन्ति संहृष्टाः सिद्धाश्च परमर्षयः ॥

bhāratasya tu vaktāraṃ śrotāraṃ lekhakāṃstadā | prapūjayanti saṃhṛṣṭāḥ siddhāśca paramarṣayaḥ

सिद्ध और महर्षि प्रसन्न होकर भारत के वक्ता, श्रोता और लेखकों का आदर करते हैं।

श्लोक 63 (18.5.63)

महाभारतवक्तारं नार्चयन्तीह ये नराः । तेषां सर्वक्रियाहानिर्भवेद्देवाः शपन्ति च ॥

mahābhāratavaktāraṃ nārcayantīha ye narāḥ | teṣāṃ sarvakriyāhānirbhaveddevāḥ śapanti ca

जो मनुष्य यहाँ महाभारत के वक्ता का सम्मान नहीं करते, उनके सब कर्म निष्फल हो जाते हैं और देवता उन्हें शाप देते हैं।

श्लोक 64 (18.5.64)

जयो नामेतिहासोऽयं श्रोतव्यो जयमिच्छता । राज्ञा राजसुतैश्चैव गर्भिण्या चैव योषिता ॥

jayo nāmetihāso'yaṃ śrotavyo jayamicchatā | rājñā rājasutaiścaiva garbhiṇyā caiva yoṣitā

जय नामक इस इतिहास को विजय चाहने वाले को सुनना चाहिए — राजा को, राजकुमारों को और गर्भवती स्त्री को।

श्लोक 65 (18.5.65)

स्वर्गकामो लभेत्स्वर्गं जयकामो लभेज्जयम् । गर्भिणी लभते पुत्रं कन्यां वा बहुभागिनीम् ॥

svargakāmo labhetsvargaṃ jayakāmo labhejjayam | garbhiṇī labhate putraṃ kanyāṃ vā bahubhāginīm

स्वर्ग चाहने वाला स्वर्ग पाता है, विजय चाहने वाला विजय पाता है; गर्भवती स्त्री पुत्र को, या बड़े भाग्य वाली कन्या को जन्म देती है।

श्लोक 66 (18.5.66)

अनागतश्च मोक्षश्च कृष्णद्वैपायनः प्रभुः । संदर्भं भारतस्यास्य कृतवान्धर्मकाम्यया ॥

anāgataśca mokṣaśca kṛṣṇadvaipāyanaḥ prabhuḥ | saṃdarbhaṃ bhāratasyāsya kṛtavāndharmakāmyayā

नित्यसिद्ध और स्वयं मोक्षस्वरूप प्रभु कृष्ण द्वैपायन ने धर्म की कामना से इस भारत का यह संग्रथित रूप रचा।

श्लोक 67 (18.5.67)

षष्टिं शतसहस्राणि चकारान्यां स संहिताम् । त्रिंशच्छतसहस्राणि देवलोके प्रतिष्ठितम् ॥

ṣaṣṭiṃ śatasahasrāṇi cakārānyāṃ sa saṃhitām | triṃśacchatasahasrāṇi devaloke pratiṣṭhitam

उन्होंने साठ लाख श्लोकों की एक और संहिता बनाई; उसमें से तीस लाख देवलोक में प्रतिष्ठित हैं;

श्लोक 68 (18.5.68)

पित्र्ये पञ्चदशं ज्ञेयं यक्षलोके चतुर्दश । एकं शतसहस्रं तु मानुषेषु प्रभाषितम् ॥

pitrye pañcadaśaṃ jñeyaṃ yakṣaloke caturdaśa | ekaṃ śatasahasraṃ tu mānuṣeṣu prabhāṣitam

पन्द्रह लाख पितृलोक में जानने चाहिए, चौदह लाख यक्षलोक में; और एक लाख मनुष्यों में प्रचारित हुआ है।

श्लोक 69 (18.5.69)

नारदोऽश्रावयद्देवानसितो देवलः पितॄन् । रक्षोयक्षाञ्शुको मर्त्यान्वैशम्पायन एव तु ॥

nārado'śrāvayaddevānasito devalaḥ pitṝn | rakṣoyakṣāñśuko martyānvaiśampāyana eva tu

नारद ने इसे देवताओं को सुनाया, असित देवल ने पितरों को, शुकदेव ने राक्षसों और यक्षों को, और वैशम्पायन ने मनुष्यों को।

श्लोक 70 (18.5.70)

इतिहासमिमं पुण्यं महार्थं वेदसंमितम् । व्यासोक्तं श्रूयते येन कृत्वा ब्राह्मणमग्रतः ॥

itihāsamimaṃ puṇyaṃ mahārthaṃ vedasaṃmitam | vyāsoktaṃ śrūyate yena kṛtvā brāhmaṇamagrataḥ

जो मनुष्य व्यास के कहे हुए, वेद के समान, महान् अर्थ वाले इस पुण्य इतिहास को ब्राह्मण को आगे रखकर सुनता है,

श्लोक 71 (18.5.71)

स नरः सर्वकामांश्च कीर्तिं प्राप्येह शौनक । गच्छेत्परमिकां सिद्धिमत्र मे नास्ति संशयः ॥

sa naraḥ sarvakāmāṃśca kīrtiṃ prāpyeha śaunaka | gacchetparamikāṃ siddhimatra me nāsti saṃśayaḥ

हे शौनक! वह मनुष्य सब कामनाओं और इस लोक में कीर्ति को पाकर परम सिद्धि को प्राप्त होगा; इसमें मुझे कोई संशय नहीं।

श्लोक 72 (18.5.72)

भारताध्ययनात्पुण्यादपि पादमधीयतः । श्रद्धया परया भक्त्या श्राव्यते चापि येन तु । य इमां संहितां पुण्यां पुत्रमध्यापयच्छुकम् ॥

bhāratādhyayanātpuṇyādapi pādamadhīyataḥ | śraddhayā parayā bhaktyā śrāvyate cāpi yena tu | ya imāṃ saṃhitāṃ puṇyāṃ putramadhyāpayacchukam

भारत के अध्ययन से पुण्य होता है, चाहे केवल एक चरण ही पढ़ा जाए; और उससे भी, जिसके द्वारा परम श्रद्धा और भक्ति से यह सुनाया गया — जिन्होंने इस पवित्र संहिता को अपने पुत्र शुकदेव को पढ़ाया।

व्यास उवाच

श्लोक 73 (18.5.73)

मातापितृसहस्राणि पुत्रदारशतानि च । संसारेष्वनुभूतानि यान्ति यास्यन्ति चापरे ॥

mātāpitṛsahasrāṇi putradāraśatāni ca | saṃsāreṣvanubhūtāni yānti yāsyanti cāpare

"संसार में हज़ारों माता-पिता और सैकड़ों पुत्र-पत्नियाँ अनुभव की जा चुकी हैं; वे जाते हैं, और दूसरे भी जाएँगे।"

श्लोक 74 (18.5.74)

हर्षस्थानसहस्राणि भयस्थानशतानि च । दिवसेदिवसे मूढमाविशन्ति न पण्डितम् ॥

harṣasthānasahasrāṇi bhayasthānaśatāni ca | divasedivase mūḍhamāviśanti na paṇḍitam

"हर्ष के हज़ारों और भय के सैकड़ों अवसर दिन-प्रतिदिन मूढ़ मनुष्य को घेरते हैं, पण्डित को नहीं।"

श्लोक 75 (18.5.75)

ऊर्ध्वबाहुर्विरौम्येष न च कश्चिच्छृणोति मे । धर्मादर्थश्च कामश्च स किमर्थं न सेव्यते ॥

ūrdhvabāhurviraumyeṣa na ca kaścicchṛṇoti me | dharmādarthaśca kāmaśca sa kimarthaṃ na sevyate

"मैं हाथ ऊपर उठाकर पुकार रहा हूँ, फिर भी कोई मेरी नहीं सुनता: धर्म से ही अर्थ और काम प्राप्त होते हैं, फिर उसका सेवन क्यों नहीं किया जाता?"

श्लोक 76 (18.5.76)

न जातु कामान्न भयान्न लोभाद्धर्मं त्यजेज्जीवितस्यापि हेतोः । नित्यो धर्मः सुखदुःखे त्वनित्ये जीवो नित्यो हेतुरस्य त्वनित्यः ॥

na jātu kāmānna bhayānna lobhāddharmaṃ tyajejjīvitasyāpi hetoḥ | nityo dharmaḥ sukhaduḥkhe tvanitye jīvo nityo heturasya tvanityaḥ

"कामना, भय या लोभ से, यहाँ तक कि प्राण बचाने के लिए भी, धर्म को कभी नहीं छोड़ना चाहिए। धर्म नित्य है, सुख-दुःख अनित्य हैं; जीव नित्य है, उसका हेतु अनित्य है।"

सौतिरुवाच

श्लोक 77 (18.5.77)

इमां भारतसावित्रीं प्रातरुत्थाय यः पठेत् । स भारतफलं प्राप्य परं ब्रह्माधिगच्छति ॥

imāṃ bhāratasāvitrīṃ prātarutthāya yaḥ paṭhet | sa bhārataphalaṃ prāpya paraṃ brahmādhigacchati

जो प्रातःकाल उठकर इस भारत-सावित्री का पाठ करता है, वह भारत का फल पाकर परब्रह्म को प्राप्त होता है।

श्लोक 78 (18.5.78)

यथा समुद्रो भगवान्यथा हि हिमवान्गिरिः । ख्यातावुभौ रत्ननिधी तथा भारतमुच्यते ॥

yathā samudro bhagavānyathā hi himavāngiriḥ | khyātāvubhau ratnanidhī tathā bhāratamucyate

जैसे भगवान् समुद्र और पर्वत हिमालय दोनों रत्नों के भण्डार के रूप में प्रसिद्ध हैं, वैसे ही भारत भी कहा जाता है।

श्लोक 79 (18.5.79)

कार्ष्णं वेदमिमं विद्वाञ्श्रावयित्वाऽर्थमश्नुते । इदं भारतमाख्यानं यः पठेत्सुसमाहितः । स गच्छेत्परमां सिद्धिमिति मे नास्ति संशयः ॥

kārṣṇaṃ vedamimaṃ vidvāñśrāvayitvā'rthamaśnute | idaṃ bhāratamākhyānaṃ yaḥ paṭhetsusamāhitaḥ | sa gacchetparamāṃ siddhimiti me nāsti saṃśayaḥ

जो विद्वान् इस कृष्ण-वेद को सुनवाता है, वह अपना अभीष्ट प्राप्त करता है; और जो एकाग्र होकर इस भारत-आख्यान का पाठ करता है, वह परम सिद्धि को प्राप्त होता है — इसमें मुझे कोई संशय नहीं।

श्लोक 80 (18.5.80)

द्वैपायनोष्ठपुटनिस्सृतमप्रमेयं । पुण्यं पवित्रमथ पापहरं शिवं च । यो भारतं समधिगच्छति वाच्यमानं । किं तस्य पुष्करजलैरभिषेचनेन ॥

dvaipāyanoṣṭhapuṭanissṛtamaprameyaṃ | puṇyaṃ pavitramatha pāpaharaṃ śivaṃ ca | yo bhārataṃ samadhigacchati vācyamānaṃ | kiṃ tasya puṣkarajalairabhiṣecanena

द्वैपायन के मुख से निकला हुआ यह अपरिमेय, पुण्य, पवित्र, पापनाशक और कल्याणकारी भारत जो पाठ होते समय ग्रहण करता है, उसे पुष्कर के जल में स्नान से क्या प्रयोजन?

श्लोक 81 (18.5.81)

यो गोशतं कनकशृङ्गमयं ददाति । विप्राय वेदविदुषे सुबहुश्रुताय । पुण्यां च भारतकथां सततं शृणोति । तुल्यं फलं भवति तस्य च तस्य चैव ॥

yo gośataṃ kanakaśṛṅgamayaṃ dadāti | viprāya vedaviduṣe subahuśrutāya | puṇyāṃ ca bhāratakathāṃ satataṃ śṛṇoti | tulyaṃ phalaṃ bhavati tasya ca tasya caiva

जो वेदज्ञ और बहुश्रुत ब्राह्मण को सोने के सींगों वाली सौ गायें दान करता है, और जो पवित्र भारत-कथा को निरन्तर सुनता है — दोनों को समान फल मिलता है।

श्लोक 82 (18.5.82)

यद्यदिष्टतमं कामं लभते श्रद्धयाऽन्वितः । शृणुयान्मुदितो भूत्वा आस्तिको बुद्धिसंयुतः ॥

yadyadiṣṭatamaṃ kāmaṃ labhate śraddhayā'nvitaḥ | śṛṇuyānmudito bhūtvā āstiko buddhisaṃyutaḥ

श्रद्धा और बुद्धि से युक्त आस्तिक जो प्रसन्न होकर इसे सुनता है, वह जो भी अत्यन्त प्रिय कामना हो, उसे प्राप्त करता है।

श्लोक 83 (18.5.83)

वासुदेवं स्मरन्विद्वान्पुण्डरीकायतेक्षणम् । इतिहासमिमं पुण्यं महार्थं वेदसंमितम् ॥

vāsudevaṃ smaranvidvānpuṇḍarīkāyatekṣaṇam | itihāsamimaṃ puṇyaṃ mahārthaṃ vedasaṃmitam

कमलनयन वासुदेव का स्मरण करते हुए विद्वान् पुरुष वेद के समान, महान् अर्थ वाले इस पुण्य इतिहास को सुनाए,

श्लोक 84 (18.5.84)

श्रावयेद्यस्तु वर्णादीन्कृत्वा ब्राह्मणमग्रतः । सर्वपापविशुद्धात्मा शुचिस्तद्गतमानसः ॥

śrāvayedyastu varṇādīnkṛtvā brāhmaṇamagrataḥ | sarvapāpaviśuddhātmā śucistadgatamānasaḥ

जो ब्राह्मण को आगे रखकर वर्णों आदि को इसे सुनवाता है, वह सब पापों से शुद्ध आत्मा वाला, पवित्र और उसी में मन लगाने वाला हो जाता है।

श्लोक 85 (18.5.85)

इह कीर्तिं महत्प्राप्य भोगवान्सुखमश्नुते । व्यासप्रसादेन पुनः स्वर्गलोकं स गच्छति ॥

iha kīrtiṃ mahatprāpya bhogavānsukhamaśnute | vyāsaprasādena punaḥ svargalokaṃ sa gacchati

इस लोक में महान् कीर्ति पाकर वह भोग और सुख पाता है; और व्यास की कृपा से आगे स्वर्गलोक को जाता है।

श्लोक 86 (18.5.86)

एतद्विदित्वा सर्वं तु सर्ववेदार्थविद्भवेत् । पूजनीयश्च सततं माननीयो भवेद्द्विजः ॥

etadviditvā sarvaṃ tu sarvavedārthavidbhavet | pūjanīyaśca satataṃ mānanīyo bhaveddvijaḥ

यह सब जानकर मनुष्य सब वेदों के अर्थ का ज्ञाता हो जाता है, और ऐसा द्विज सदा पूजनीय और माननीय होता है।

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