उद्योग पर्व · अध्याय 112
उड़ान में गालव का भय
गालव गरुड़ से पूर्व दिशा में ले चलने को कहते हैं और उन पर सवार हो जाते हैं। गरुड़ के वेग, समुद्र की गर्जना और अन्धकार से घबराकर वे उन्हें लौटने को कहते हैं, और गुरु को वचन दिए गए एक श्याम कान वाले आठ सौ श्वेत घोड़े पाने का कोई उपाय न देखकर प्राण त्यागने की बात करते हैं। गरुड़ हँसकर कहते हैं कि मृत्यु अपनी इच्छा से नहीं आती, इसका उपाय है, और प्रस्ताव करते हैं कि पहले समुद्र-तट के ऋषभ पर्वत पर विश्राम और भोजन कर लिया जाए।
गालव उवाच
श्लोक 1 (5.112.1)
गरुत्मन्भुजगेन्द्रारे सुपर्ण विनतात्मज । नय मां तार्क्ष्य पूर्वेण यत्र धर्मस्य चक्षुषी ॥
garutmanbhujagendrāre suparṇa vinatātmaja | naya māṃ tārkṣya pūrveṇa yatra dharmasya cakṣuṣī
हे गरुत्मान्, नागराज के शत्रु, सुपर्ण, विनतानन्दन! हे तार्क्ष्य, मुझे पूर्व दिशा में वहाँ ले चलो जहाँ धर्म के दोनों नेत्र हैं।
श्लोक 2 (5.112.2)
पूर्वमेतां दिशं गच्छ या पूर्वं परिकीर्तिता । देवतानां हि सान्निध्यमत्र कीर्तितवानसि ॥
pūrvametāṃ diśaṃ gaccha yā pūrvaṃ parikīrtitā | devatānāṃ hi sānnidhyamatra kīrtitavānasi
पहले इसी दिशा में चलो, जिसका वर्णन तुमने सबसे पहले किया था। तुमने बताया था कि वहाँ देवताओं का सान्निध्य है।
श्लोक 3 (5.112.3)
अत्र सत्यं च धर्मश्च त्वया सम्यक्प्रकीर्तितः । इच्छेयं तु समागन्तुं समस्तैर्दैवतैरहम् । भूयश्च तान्सुरान्द्रष्टुमिच्छेयमरुणानुज ॥
atra satyaṃ ca dharmaśca tvayā samyakprakīrtitaḥ | iccheyaṃ tu samāgantuṃ samastairdaivatairaham | bhūyaśca tānsurāndraṣṭumiccheyamaruṇānuja
तुमने भली-भाँति बताया था कि वहाँ सत्य और धर्म का वास है। मैं समस्त देवताओं से मिलना चाहता हूँ; और हे अरुण के अनुज, मैं उन देवताओं के फिर से दर्शन करना चाहता हूँ।
नारद उवाच
श्लोक 4 (5.112.4)
तमाह विनतासूनुरारोहस्वेति वै द्विजम् । आरुरोहाथ स मुनिर्गरुडं गालवस्तदा ॥
tamāha vinatāsūnurārohasveti vai dvijam | ārurohātha sa munirgaruḍaṃ gālavastadā
विनतानन्दन ने उस ब्राह्मण से कहा — "चढ़ जाओ।" तब मुनि गालव गरुड़ पर सवार हो गए।
गालव उवाच
श्लोक 5 (5.112.5)
क्रममाणस्य ते रूपं दृश्यते पन्नगाशन । भास्करस्येव पूर्वाह्णे सहस्रांशोर्विवस्वतः ॥
kramamāṇasya te rūpaṃ dṛśyate pannagāśana | bhāskarasyeva pūrvāhṇe sahasrāṃśorvivasvataḥ
हे सर्पभक्षी, आकाश में बढ़ते हुए तुम्हारा रूप पूर्वाह्न के सहस्र किरणों वाले सूर्य विवस्वान् के समान दिखाई देता है।
श्लोक 6 (5.112.6)
पक्षवातप्रणुन्नानां वृक्षाणामनुगामिनाम् । प्रस्थितानामिव समं पश्यामीह गतिं खग ॥
pakṣavātapraṇunnānāṃ vṛkṣāṇāmanugāminām | prasthitānāmiva samaṃ paśyāmīha gatiṃ khaga
हे पक्षी, तुम्हारे पंखों की वायु से धकेले गए वृक्ष तुम्हारे पीछे-पीछे चलते हैं; मैं उन्हें तुम्हारे साथ ऐसे चलते देखता हूँ मानो वे भी यात्रा पर निकल पड़े हों।
श्लोक 7 (5.112.7)
ससागरवनामुर्वीं सशैलवनकाननाम् । आकर्षन्निव चाभासि पक्षवातेन खेचर ॥
sasāgaravanāmurvīṃ saśailavanakānanām | ākarṣanniva cābhāsi pakṣavātena khecara
हे आकाशचारी, अपने पंखों की वायु से तुम मानो सागरों और वनों, पर्वतों, जंगलों और उपवनों सहित समूची पृथ्वी को खींचे लिए जा रहे हो।
श्लोक 8 (5.112.8)
समीननागनक्रं च खमिवारोप्यते जलम् । वायुना चैव महता पक्षवातेन चानिशम् ॥
samīnanāganakraṃ ca khamivāropyate jalam | vāyunā caiva mahatā pakṣavātena cāniśam
प्रचण्ड वायु और तुम्हारे पंखों के झोंकों से मछलियों, नागों और मगरों सहित समुद्र का जल मानो निरन्तर आकाश में उठाया जा रहा है।
श्लोक 9 (5.112.9)
तुल्यरूपाननान्मत्स्यांस्तथा तिमितिमिङ्गिलान् । नागाश्वनरवक्त्रांश्च पश्याम्युन्मथितानिव ॥
tulyarūpānanānmatsyāṃstathā timitimiṅgilān | nāgāśvanaravaktrāṃśca paśyāmyunmathitāniva
मैं एक-से मुखों वाली मछलियाँ, तिमि और तिमिंगिल, तथा नाग, घोड़े और मनुष्य जैसे मुखों वाले जलजन्तु देखता हूँ, मानो उन्हें मथकर ऊपर उछाल दिया गया हो।
श्लोक 10 (5.112.10)
महार्णवस्य च रवैः श्रोत्रे मे बधिरे कृते । न शृणोमि न पश्यामि नात्मनो वेद्मि कारणम् ॥
mahārṇavasya ca ravaiḥ śrotre me badhire kṛte | na śṛṇomi na paśyāmi nātmano vedmi kāraṇam
महासागर की गर्जना से मेरे कान बहरे हो गए हैं। न मैं सुन पाता हूँ, न देख पाता हूँ; अपनी इस दशा का कारण भी मैं नहीं जानता।
श्लोक 11 (5.112.11)
शनैः स तु भवान्यातु ब्रह्मवध्यामनुस्मरन् । न दृश्यते रविस्तात न दिशो न च खं खग ॥
śanaiḥ sa tu bhavānyātu brahmavadhyāmanusmaran | na dṛśyate ravistāta na diśo na ca khaṃ khaga
ब्राह्मण-वध के पाप का स्मरण करते हुए आप धीरे-धीरे चलिए। हे तात, न सूर्य दिखाई देता है, न दिशाएँ, न आकाश, हे पक्षी।
श्लोक 12 (5.112.12)
तम एव तु पश्यामि शरीरं ते न लक्षये । मणी व जात्यौ पश्यामि चक्षुषी तेऽहमण्डज ॥
tama eva tu paśyāmi śarīraṃ te na lakṣaye | maṇī va jātyau paśyāmi cakṣuṣī te'hamaṇḍaja
मुझे केवल अन्धकार दिखाई देता है; तुम्हारा शरीर मैं नहीं देख पाता। हे अण्डज, मुझे केवल तुम्हारे दोनों नेत्र दो उत्तम मणियों के समान दिखाई देते हैं।
श्लोक 13 (5.112.13)
शरीरं तु न पश्यामि तव चैवात्मनश्च ह । पदेपदे तु पश्यामि शरीरादग्निमुत्थितम् ॥
śarīraṃ tu na paśyāmi tava caivātmanaśca ha | padepade tu paśyāmi śarīrādagnimutthitam
न तुम्हारा शरीर दिखाई देता है, न मेरा अपना; पर पग-पग पर मैं तुम्हारे शरीर से अग्नि उठती देखता हूँ।
श्लोक 14 (5.112.14)
स मे निर्वाप्य सहसा चक्षुषी शाम्यते पुनः । तन्नियच्छ महावेगं गमने विनतात्मज ॥
sa me nirvāpya sahasā cakṣuṣī śāmyate punaḥ | tanniyaccha mahāvegaṃ gamane vinatātmaja
वह अग्नि सहसा मेरी आँखों को धुँधला कर देती है और फिर शान्त हो जाती है। इसलिए हे विनतानन्दन, अपनी उड़ान के इस प्रचण्ड वेग को रोको।
श्लोक 15 (5.112.15)
न मे प्रयोजनं किंचिद्गमने पन्नगाशन । संनिवर्त महाभाग न वेगं विषहामि ते ॥
na me prayojanaṃ kiṃcidgamane pannagāśana | saṃnivarta mahābhāga na vegaṃ viṣahāmi te
हे सर्पभक्षी, इस यात्रा में अब मेरा कोई प्रयोजन नहीं है। हे महाभाग, लौट चलो; मैं तुम्हारा वेग सह नहीं सकता।
श्लोक 16 (5.112.16)
गुरवे संश्रुतानीह शतान्यष्टौ हि वाजिनाम् । एकतःश्यामकर्णानां शुभ्राणां चन्द्रवर्चसाम् ॥
gurave saṃśrutānīha śatānyaṣṭau hi vājinām | ekataḥśyāmakarṇānāṃ śubhrāṇāṃ candravarcasām
मैंने अपने गुरु को आठ सौ घोड़े देने का वचन दिया है — श्वेत, चन्द्रमा जैसी कान्ति वाले, जिनका एक-एक कान श्याम हो।
श्लोक 17 (5.112.17)
तेषां चैवापवर्गाय मार्गं पश्यामि नाण्डज । ततोऽयं जीवितत्यागे दृष्टो मार्गोमयाऽऽत्मनः ॥
teṣāṃ caivāpavargāya mārgaṃ paśyāmi nāṇḍaja | tato'yaṃ jīvitatyāge dṛṣṭo mārgomayā''tmanaḥ
हे अण्डज, उन्हें चुकाने का मुझे कोई मार्ग नहीं दिखता। इसलिए मैंने अपने लिए प्राण-त्याग का ही मार्ग देखा है।
श्लोक 18 (5.112.18)
नैव मेऽस्ति धनं किंचिन्न धनेनान्वितः सुहृत् । न चार्थेनापि महता शक्यमेतद्व्यपोहितुम् ॥
naiva me'sti dhanaṃ kiṃcinna dhanenānvitaḥ suhṛt | na cārthenāpi mahatā śakyametadvyapohitum
मेरे पास तनिक भी धन नहीं है, न कोई धनवान मित्र है; और बहुत धन से भी यह संकट दूर नहीं किया जा सकता।
नारद उवाच
श्लोक 19 (5.112.19)
एवं बहु च दीनं च ब्रुवाणं गालवं तदा । प्रत्युवाच व्रजन्नेव प्रहसन्विनतात्मजः ॥
evaṃ bahu ca dīnaṃ ca bruvāṇaṃ gālavaṃ tadā | pratyuvāca vrajanneva prahasanvinatātmajaḥ
गालव को इस प्रकार बहुत-सी दीन बातें कहते सुनकर विनतानन्दन ने उड़ते-उड़ते ही हँसकर उत्तर दिया।
सुपर्ण उवाच
श्लोक 20 (5.112.20)
नातिप्रज्ञोऽसि विप्रर्षे योत्मानं त्यक्तुमिच्छसि । न चापि कृत्रिमः कालः कालो हि परमेश्वरः ॥
nātiprajño'si viprarṣe yotmānaṃ tyaktumicchasi | na cāpi kṛtrimaḥ kālaḥ kālo hi parameśvaraḥ
हे विप्रर्षि, तुम प्राण त्यागना चाहते हो, इसलिए तुम बहुत बुद्धिमान नहीं हो। मृत्यु अपनी इच्छा से नहीं लाई जा सकती; काल ही परम ईश्वर है।
श्लोक 21 (5.112.21)
किमहं पूर्वमेवेह भवता नाभिचोदितः । उपायोऽत्र महानस्ति येनैतदुपपद्यते ॥
kimahaṃ pūrvameveha bhavatā nābhicoditaḥ | upāyo'tra mahānasti yenaitadupapadyate
तुमने यह बात मुझसे पहले ही क्यों नहीं कही? इसका एक बड़ा उपाय है, जिससे यह कार्य सिद्ध हो सकता है।
श्लोक 22 (5.112.22)
तदेष ऋषभो नाम पर्वतः सागरान्तिके । अत्र विश्रम्य भुक्त्वा च निवर्तिष्याव गालव ॥
tadeṣa ṛṣabho nāma parvataḥ sāgarāntike | atra viśramya bhuktvā ca nivartiṣyāva gālava
यह समुद्र के निकट ऋषभ नाम का पर्वत है। गालव, यहाँ विश्राम और भोजन करके हम लौट चलेंगे।