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उद्योग पर्व · अध्याय 111

गरुड़ द्वारा उत्तर दिशा का वर्णन

गरुड़ उत्तर दिशा का वर्णन करते हैं, जो 'उत्तरा' इसलिए कहलाती है कि यहाँ मनुष्य पाप से पार उतरकर परम कल्याण पाता है। यहीं बदरिकाश्रम में नर-नारायण, हिमालय पर महेश्वर, कैलास पर कुबेर, सप्तर्षि और अरुन्धती, और गंगा के महाद्वार के रक्षक मुनि रहते हैं; प्रचलित पाठ यह भी कहता है कि महेश्वर यहाँ प्रकृति के साथ रहते हैं और नर-नारायण के सिवा कोई उन्हें नहीं देख पाता। चारों दिशाओं का वर्णन करके गरुड़ गालव से पूछते हैं कि वे कहाँ जाना चाहते हैं और उन्हें अपनी पीठ पर चढ़ने को कहते हैं।

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सुपर्ण उवाच

श्लोक 1 (5.111.1)

यस्मादुत्तार्यते पापाद्यस्मान्निःश्रेयसोऽश्नुते । अस्मादुत्तारणबलादुत्तरेत्युच्यते द्विज ॥

yasmāduttāryate pāpādyasmānniḥśreyaso'śnute | asmāduttāraṇabalāduttaretyucyate dvija

क्योंकि यहाँ मनुष्य पाप से पार उतारा जाता है और यहीं परम कल्याण पाता है, इसलिए हे द्विज, पार उतारने की इस शक्ति के कारण यह दिशा 'उत्तरा' कहलाती है।

श्लोक 2 (5.111.2)

उत्तरस्य हिरण्यस्य परिवापस्य गालव । मार्गः पश्चिमपूर्वाभ्यां दिग्भ्यां वै मध्यमः स्मृतः ॥

uttarasya hiraṇyasya parivāpasya gālava | mārgaḥ paścimapūrvābhyāṃ digbhyāṃ vai madhyamaḥ smṛtaḥ

हे गालव, उत्तर के स्वर्णमय प्रदेश का मार्ग पश्चिम और पूर्व दिशाओं के बीचोंबीच जाने वाला बताया गया है।

श्लोक 3 (5.111.3)

अस्यां दिशि वरिष्ठायामुत्तरायां द्विजर्षभ । नासौम्यो नाविधेयात्मा नाधर्मो वसते जनः ॥

asyāṃ diśi variṣṭhāyāmuttarāyāṃ dvijarṣabha | nāsaumyo nāvidheyātmā nādharmo vasate janaḥ

हे द्विजश्रेष्ठ, इस श्रेष्ठ उत्तर दिशा में न कोई कठोर स्वभाव का, न अजितात्मा और न अधर्मी मनुष्य रहता है।

श्लोक 4 (5.111.4)

अत्र नारायणः कृष्णो जिष्णुश्चैव नरोत्तमः । बदर्यामाश्रमपदे तथा ब्रह्मा च शाश्वतः ॥

atra nārāyaṇaḥ kṛṣṇo jiṣṇuścaiva narottamaḥ | badaryāmāśramapade tathā brahmā ca śāśvataḥ

यहीं बदरी के आश्रम में नारायण श्रीकृष्ण, नरश्रेष्ठ जिष्णु तथा सनातन ब्रह्मा निवास करते हैं।

श्लोक 5 (5.111.5)

अत्र वै हिमवत्पृष्ठे नित्यमास्ते महेश्वरः । प्रकृत्या पुरुषः सार्धं युगान्ताग्निसमप्रभः ॥

atra vai himavatpṛṣṭhe nityamāste maheśvaraḥ | prakṛtyā puruṣaḥ sārdhaṃ yugāntāgnisamaprabhaḥ

यहीं हिमालय के शिखर पर महेश्वर सदा निवास करते हैं — प्रकृति के साथ पुरुष के रूप में, युगान्त की अग्नि के समान तेजस्वी।

श्लोक 6 (5.111.6)

न स दृश्यो मुनिगणैस्तथा देवैः सवासवैः । गन्धर्वयक्षसिद्धैर्वा नरनारायणादृते ॥

na sa dṛśyo munigaṇaistathā devaiḥ savāsavaiḥ | gandharvayakṣasiddhairvā naranārāyaṇādṛte

मुनिगण, इन्द्र सहित देवता, गन्धर्व, यक्ष या सिद्ध — नर और नारायण के सिवा कोई उनका दर्शन नहीं कर पाता।

श्लोक 7 (5.111.7)

अत्र विष्णुः सहस्राक्षः सहस्रचरणोऽव्ययः । सहस्रशिरसः श्रीमानेकः पश्यति मायया ॥

atra viṣṇuḥ sahasrākṣaḥ sahasracaraṇo'vyayaḥ | sahasraśirasaḥ śrīmānekaḥ paśyati māyayā

यहाँ सहस्र नेत्रों, सहस्र चरणों और सहस्र सिरों वाले, अविनाशी, श्रीमान् विष्णु ही अपनी माया से उनका दर्शन करते हैं।

श्लोक 8 (5.111.8)

अत्र राज्येन विप्राणां चन्द्रमाश्चाभ्यषिच्यत । अत्र गङ्गां महादेवः पतन्तीं गगनाच्च्युताम् ॥

atra rājyena viprāṇāṃ candramāścābhyaṣicyata | atra gaṅgāṃ mahādevaḥ patantīṃ gaganāccyutām

यहीं चन्द्रमा का ब्राह्मणों के राजा के रूप में अभिषेक हुआ। यहीं आकाश से गिरती हुई गंगा को महादेव ने

श्लोक 9 (5.111.9)

प्रतिगृह्य ददौ लोके मानुषे ब्रह्मवित्तम । अत्र देव्या तपस्तप्तं महेश्वरपरीप्सया ॥

pratigṛhya dadau loke mānuṣe brahmavittama | atra devyā tapastaptaṃ maheśvaraparīpsayā

हे ब्रह्मवेत्ताओं में श्रेष्ठ, थामकर मनुष्यलोक को प्रदान किया। यहीं देवी उमा ने महेश्वर को पाने की इच्छा से तप किया।

श्लोक 10 (5.111.10)

अत्र कामश्च रोषश्च शैलश्चोमा च संबभुः । अत्र राक्षसयक्षाणां गन्धर्वाणां च गालव ॥

atra kāmaśca roṣaśca śailaścomā ca saṃbabhuḥ | atra rākṣasayakṣāṇāṃ gandharvāṇāṃ ca gālava

यहीं काम, क्रोध, हिमवान् पर्वत और उमा एक साथ प्रकट हुए। हे गालव, यहीं राक्षसों, यक्षों और गन्धर्वों के

श्लोक 11 (5.111.11)

आधिपत्येन कैलासे धनदोऽप्यभिषेचितः । अत्र चैत्ररथं रम्यमत्र वैखानसाश्रमः ॥

ādhipatyena kailāse dhanado'pyabhiṣecitaḥ | atra caitrarathaṃ ramyamatra vaikhānasāśramaḥ

अधिपति के पद पर कैलास पर धनद (कुबेर) का अभिषेक हुआ। यहीं रमणीय चैत्ररथ वन है, यहीं वैखानसों का आश्रम है;

श्लोक 12 (5.111.12)

अत्र मन्दाकिनी चैव मन्दरश्च द्विजर्षभ । अत्र सौगन्धिकवनं नैर्ऋतैरभिरक्ष्यते ॥

atra mandākinī caiva mandaraśca dvijarṣabha | atra saugandhikavanaṃ nairṛtairabhirakṣyate

हे द्विजश्रेष्ठ, यहीं मन्दाकिनी नदी और मन्दराचल हैं; यहीं सौगन्धिक वन है, जिसकी रक्षा नैर्ऋत करते हैं;

श्लोक 13 (5.111.13)

शाद्वलं कदलीस्कन्धमत्र सन्तानका नगाः । अत्र संयमनित्यानां सिद्धानां स्वैरचारिणाम् ॥

śādvalaṃ kadalīskandhamatra santānakā nagāḥ | atra saṃyamanityānāṃ siddhānāṃ svairacāriṇām

यहीं हरी घास के मैदान, केले के कुंज और सन्तानक वृक्ष हैं। यहीं सदा संयम में रहने वाले, स्वेच्छा से विचरने वाले सिद्धों के लिए

श्लोक 14 (5.111.14)

विमानान्यनुरूपाणि कामभोग्यानि गालव । अत्र ते ऋषयः सप्त देवी चारुन्धती तथा ॥

vimānānyanurūpāṇi kāmabhogyāni gālava | atra te ṛṣayaḥ sapta devī cārundhatī tathā

हे गालव, उनके योग्य और इच्छानुसार भोग देने वाले विमान हैं। यहीं वे सप्तर्षि हैं, और देवी अरुन्धती भी।

श्लोक 15 (5.111.15)

अत्र तिष्ठति वै रात्रिन्दिवाप्यत्रावतिष्ठते । अत्र यज्ञं समासाद्य ध्रुवं स्थाता पितामहः ॥

atra tiṣṭhati vai rātrindivāpyatrāvatiṣṭhate | atra yajñaṃ samāsādya dhruvaṃ sthātā pitāmahaḥ

यहीं रात्रि ठहरती है, और दिन भी यहीं ठहरता है। यहीं यज्ञ को प्राप्त होकर पितामह (ब्रह्मा) स्थिर होकर रहते हैं;

श्लोक 16 (5.111.16)

ज्योतींषि चन्द्रसूर्यौ च परिवर्तन्ति नित्यशः । अत्र गङ्गामहाद्वारं रक्षन्ति द्विजसत्तम ॥

jyotīṃṣi candrasūryau ca parivartanti nityaśaḥ | atra gaṅgāmahādvāraṃ rakṣanti dvijasattama

चन्द्रमा, सूर्य और सब नक्षत्र निरन्तर उसकी परिक्रमा करते हैं। हे द्विजश्रेष्ठ, यहीं गंगा के महाद्वार की रक्षा

श्लोक 17 (5.111.17)

धामा नाम महात्मानो मुनयः सत्यवादिनः । न तेषां ज्ञायते मूर्तिर्नाकृतिर्न तपश्चितम् ॥

dhāmā nāma mahātmāno munayaḥ satyavādinaḥ | na teṣāṃ jñāyate mūrtirnākṛtirna tapaścitam

धाम नाम के सत्यवादी महात्मा मुनि करते हैं। न उनका शरीर जाना जाता है, न आकृति, न उनका संचित तप।

श्लोक 18 (5.111.18)

परिवर्तसहस्राणि कामभोज्यानि गालव । यथायथा प्रविशति तस्मात्परतरं नरः । तथातथा द्विजश्रेष्ठ प्रविलीयति गालव । नैतत्केनचिदन्येन गतपूर्वं द्विजर्षभ ॥

parivartasahasrāṇi kāmabhojyāni gālava | yathāyathā praviśati tasmātparataraṃ naraḥ | tathātathā dvijaśreṣṭha pravilīyati gālava | naitatkenacidanyena gatapūrvaṃ dvijarṣabha

हे गालव, यहाँ सहस्रों युगों तक इच्छानुसार भोगे जाने वाले भोग हैं। हे द्विजश्रेष्ठ गालव, मनुष्य इस स्थान से जितना आगे भीतर जाता है, उतना ही वह गलकर लीन होता जाता है। हे द्विजश्रेष्ठ, पहले कोई और वहाँ नहीं गया,

श्लोक 19 (5.111.19)

ऋते नारायणं देवं नरं वा जिष्णुमव्ययम् । अत्र कैलासमित्युक्तं स्थानमैलविलस्य तत् ॥

ṛte nārāyaṇaṃ devaṃ naraṃ vā jiṣṇumavyayam | atra kailāsamityuktaṃ sthānamailavilasya tat

सिवाय भगवान् नारायण के, या अविनाशी जिष्णु नर के। यहीं कैलास नाम का वह स्थान है, जो ऐलविल (कुबेर) का निवास है।

श्लोक 20 (5.111.20)

अत्र विद्युत्प्रभा नाम जज्ञिरेऽप्सरसो दश । अत्र विष्णुपदं नाम क्रमता विष्णुना कृतम् ॥

atra vidyutprabhā nāma jajñire'psaraso daśa | atra viṣṇupadaṃ nāma kramatā viṣṇunā kṛtam

यहीं विद्युत्प्रभा नाम की दस अप्सराएँ उत्पन्न हुईं। यहीं विष्णुपद नाम का स्थान है, जिसे विष्णु ने पग भरते हुए बनाया था

श्लोक 21 (5.111.21)

त्रिलोकविक्रमे ब्रह्मन्नुत्तरां दिशमाश्रितम् । अत्र राज्ञा मरुत्तेन यज्ञेनेष्टं द्विजोत्तम ॥

trilokavikrame brahmannuttarāṃ diśamāśritam | atra rājñā maruttena yajñeneṣṭaṃ dvijottama

जब उन्होंने तीनों लोकों को लाँघा था, हे ब्रह्मन्; वह उत्तर दिशा में स्थित है। हे द्विजोत्तम, यहीं राजा मरुत्त ने यज्ञ किया था,

श्लोक 22 (5.111.22)

उशीरबीजे विप्रर्षे यत्र जाम्बूनदं सरः । जीमूतस्यात्र विप्रर्षेरुपतस्थे महात्मनः ॥

uśīrabīje viprarṣe yatra jāmbūnadaṃ saraḥ | jīmūtasyātra viprarṣerupatasthe mahātmanaḥ

हे विप्रर्षि, उशीरबीज नामक स्थान पर, जहाँ जाम्बूनद (स्वर्णिम) सरोवर है। यहीं महात्मा विप्रर्षि जीमूत के सामने

श्लोक 23 (5.111.23)

साक्षाद्धैमवतः पुण्यो विमलः कनकाकरः । ब्राह्मणेषु च यत्कृत्स्नं स्वन्तं कृत्वा धनं महत् ॥

sākṣāddhaimavataḥ puṇyo vimalaḥ kanakākaraḥ | brāhmaṇeṣu ca yatkṛtsnaṃ svantaṃ kṛtvā dhanaṃ mahat

हिमालय की एक पवित्र और निर्मल स्वर्ण-खान साक्षात् प्रकट हुई। उस समस्त विशाल धन को ब्राह्मणों में बाँटकर

श्लोक 24 (5.111.24)

वव्रे धनं महर्षिः स जैमूतं तद्धनं ततः । अत्र नित्यं दिशांपालाः सायंप्रातर्द्विजर्षभ ॥

vavre dhanaṃ maharṣiḥ sa jaimūtaṃ taddhanaṃ tataḥ | atra nityaṃ diśāṃpālāḥ sāyaṃprātardvijarṣabha

महर्षि ने केवल यह माँगा कि वह धन उनके नाम से जाना जाए; तभी से वह 'जैमूत' धन कहलाता है। हे द्विजश्रेष्ठ, यहाँ नित्य सायं और प्रातः दिक्पाल

श्लोक 25 (5.111.25)

कस्य कार्यं किमिति वै परिक्रोशन्ति गालव । एवमेषा द्विजश्रेष्ठ गुणैरन्यैर्दिगुत्तरा ॥

kasya kāryaṃ kimiti vai parikrośanti gālava | evameṣā dvijaśreṣṭha guṇairanyairdiguttarā

पुकारते हैं, "किसका कौन-सा कार्य है?" हे गालव, हे द्विजश्रेष्ठ, इस प्रकार इन तथा अन्य गुणों के कारण यह उत्तर दिशा

श्लोक 26 (5.111.26)

उत्तरेति परिख्याता सर्वकर्मसु चोत्तरा । एता विस्तरशस्तात तव सङ्कीर्तिता दिशः ॥

uttareti parikhyātā sarvakarmasu cottarā | etā vistaraśastāta tava saṅkīrtitā diśaḥ

'उत्तरा' नाम से प्रसिद्ध है, और सभी कर्मों में यह उत्कृष्ट है। तात, मैंने तुम्हें इन दिशाओं का विस्तार से वर्णन कर दिया है —

श्लोक 27 (5.111.27)

चतस्रः क्रमयोगेन कामाशां गन्तुमिच्छसि । उद्यतोऽहं द्विजश्रेष्ठ तव दर्शयितुं दिशः । पृथिवीं चाखिलां ब्रह्मंस्तस्मादारोह मां द्विज ॥

catasraḥ kramayogena kāmāśāṃ gantumicchasi | udyato'haṃ dvijaśreṣṭha tava darśayituṃ diśaḥ | pṛthivīṃ cākhilāṃ brahmaṃstasmādāroha māṃ dvija

चारों का, एक-एक करके। तुम किस दिशा में जाना चाहते हो? हे द्विजश्रेष्ठ, मैं तुम्हें सभी दिशाएँ और समूची पृथ्वी दिखाने को तैयार हूँ; इसलिए हे द्विज, मेरी पीठ पर चढ़ जाओ।

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