उद्योग पर्व · अध्याय 110
गरुड़ द्वारा पश्चिम दिशा का वर्णन
गरुड़ पश्चिम दिशा का वर्णन करते हैं — यह जलों के स्वामी वरुण की प्रिय दिशा है, जो 'पश्चिमा' इसलिए कहलाती है कि दिन के अन्त में सूर्य यहाँ अपनी किरणें छोड़ देते हैं। यहीं कश्यप ने वरुण का अभिषेक किया, यहीं चन्द्रमा फिर नया होता है, यहीं अस्ताचल के पीछे सूर्य डूबते हैं और रात्रि तथा निद्रा निकलती हैं, यहीं इन्द्र ने दिति के गर्भ को काटकर मरुद्गण बनाए, और यहीं समुद्र में स्वर्भानु का कबन्ध दिखता है। वे अनन्त नाग, विष्णु, पवन और कश्यप के निवासों का उल्लेख करके गालव से पूछते हैं कि क्या वहाँ चलें।
सुपर्ण उवाच
श्लोक 1 (5.110.1)
इयं दिग्दयिता राज्ञो वरुणस्य तु गोपतेः । सदा सलिलराजस्य प्रतिष्ठा चादिरेव च ॥
iyaṃ digdayitā rājño varuṇasya tu gopateḥ | sadā salilarājasya pratiṣṭhā cādireva ca
यह दिशा इस दिशा के रक्षक राजा वरुण को प्रिय है; यह जलों के राजा का सदा का आश्रय भी है और उद्गम भी।
श्लोक 2 (5.110.2)
अत्र पश्चादहः सूर्यो विसर्जयति गाः स्वयम् । पश्चिमेत्यभिविख्याता दिगियं द्विजसत्तम ॥
atra paścādahaḥ sūryo visarjayati gāḥ svayam | paścimetyabhivikhyātā digiyaṃ dvijasattama
यहाँ दिन के पिछले भाग में सूर्य स्वयं अपनी किरणों को छोड़ देते हैं; इसीलिए हे द्विजश्रेष्ठ, यह दिशा 'पश्चिमा' नाम से विख्यात है।
श्लोक 3 (5.110.3)
यादसामत्र राज्येन सलिलस्य च गुप्तये । कश्यपो भगवान्देवो वरुणं स्माभ्यषेचयत् ॥
yādasāmatra rājyena salilasya ca guptaye | kaśyapo bhagavāndevo varuṇaṃ smābhyaṣecayat
यहीं भगवान् कश्यप देव ने जलचरों पर राज्य करने और जल की रक्षा के लिए वरुण का अभिषेक किया था।
श्लोक 4 (5.110.4)
अत्र पीत्वा समस्तान्वै वरुणस्य रसांस्तु षट् । जायते तरुणः सोमः शुक्लस्यादौ तमिस्रहा ॥
atra pītvā samastānvai varuṇasya rasāṃstu ṣaṭ | jāyate taruṇaḥ somaḥ śuklasyādau tamisrahā
यहीं वरुण के छहों रसों का पान करके अन्धकार का नाश करने वाला चन्द्रमा शुक्ल पक्ष के आरम्भ में फिर से नया होकर जन्म लेता है।
श्लोक 5 (5.110.5)
अत्र पश्चात्कृता दैत्या वायुना संयतास्तदा । निःश्वसन्तो महावातैरर्दिताः सुषुपुर्द्विज ॥
atra paścātkṛtā daityā vāyunā saṃyatāstadā | niḥśvasanto mahāvātairarditāḥ suṣupurdvija
हे द्विज, यहीं वायु ने दैत्यों को पीछे धकेलकर जकड़ लिया था; प्रचण्ड आँधियों से पीड़ित वे लम्बी साँसें भरते हुए सो गए।
श्लोक 6 (5.110.6)
अत्र सूर्यं प्रणयिनं प्रतिगृह्णाति पर्वतः । अस्तो नाम यतः सन्ध्या पश्चिमा प्रतिसर्पति ॥
atra sūryaṃ praṇayinaṃ pratigṛhṇāti parvataḥ | asto nāma yataḥ sandhyā paścimā pratisarpati
यहीं अस्त नाम का पर्वत अपने प्रेमी सूर्य को ग्रहण करता है, और उसी से पश्चिम की संध्या आगे फैलती है।
श्लोक 7 (5.110.7)
अतो रात्रिश्च निद्रा च निर्गता दिवसक्षये । जायते जीवलोकस्य हर्तुमर्धमिवायुषः ॥
ato rātriśca nidrā ca nirgatā divasakṣaye | jāyate jīvalokasya hartumardhamivāyuṣaḥ
दिन ढलने पर यहीं से रात्रि और निद्रा निकलती हैं, मानो जीवलोक की आधी आयु हर लेने के लिए जन्म लेती हों।
श्लोक 8 (5.110.8)
अत्र देवीं दितिं सुप्तामात्मप्रसवधारिणीम् । विगर्भामकरोच्छक्रो यत्र जातो मरुद्गणः ॥
atra devīṃ ditiṃ suptāmātmaprasavadhāriṇīm | vigarbhāmakarocchakro yatra jāto marudgaṇaḥ
यहीं इन्द्र ने गर्भ धारण किए सोई हुई देवी दिति के गर्भ को काट डाला था, और उससे मरुद्गण उत्पन्न हुए।
श्लोक 9 (5.110.9)
अत्र मूलं हिमवतो मन्दरं याति शाश्वतम् । अपि वर्षसहस्रेण न चास्यान्तोऽधिगम्यते ॥
atra mūlaṃ himavato mandaraṃ yāti śāśvatam | api varṣasahasreṇa na cāsyānto'dhigamyate
यहीं हिमालय का मूल सनातन मन्दराचल तक जाता है; हज़ार वर्षों में भी उसका अन्त नहीं पाया जा सकता।
श्लोक 10 (5.110.10)
अत्र काञ्चनशैलस्य काञ्चनाम्बुरुहस्य च । उदधेस्तीरमासाद्य सुरभिः क्षरते पयः ॥
atra kāñcanaśailasya kāñcanāmburuhasya ca | udadhestīramāsādya surabhiḥ kṣarate payaḥ
यहीं स्वर्णमय पर्वत और सुनहरे कमलों वाले सागर के तट पर पहुँचकर सुरभि (कामधेनु) दूध बहाती है।
श्लोक 11 (5.110.11)
अत्र मध्ये समुद्रस्य कबन्धः प्रतिदृश्यते । स्वर्भानोः सूर्यकल्पस्य सोमसूर्यौ जिघांसतः ॥
atra madhye samudrasya kabandhaḥ pratidṛśyate | svarbhānoḥ sūryakalpasya somasūryau jighāṃsataḥ
यहीं समुद्र के बीच सूर्य के समान तेजस्वी स्वर्भानु (राहु) का कबन्ध दिखाई देता है, जो चन्द्रमा और सूर्य को मार डालना चाहता है।
श्लोक 12 (5.110.12)
सुवर्णशिरसोऽप्यत्र हरिरोम्णः प्रगायतः । अदृश्यस्याप्रमेयस्य श्रूयते विपुलो ध्वनिः ॥
suvarṇaśiraso'pyatra hariromṇaḥ pragāyataḥ | adṛśyasyāprameyasya śrūyate vipulo dhvaniḥ
यहीं सदा तरुण रहने वाले, अदृश्य और अपरिमेय मुनि सुवर्णशिरा के गान का विशाल स्वर भी सुनाई देता है।
श्लोक 13 (5.110.13)
अत्र ध्वजवती नाम कुमारी हरिमेधसः । आकाशे तिष्ठतिष्ठेति तस्थौ सूर्यस्य शासनात् ॥
atra dhvajavatī nāma kumārī harimedhasaḥ | ākāśe tiṣṭhatiṣṭheti tasthau sūryasya śāsanāt
यहीं हरिमेधा की कुमारी कन्या ध्वजवती सूर्य की "ठहरो, ठहरो" की आज्ञा से आकाश में ठहर गई।
श्लोक 14 (5.110.14)
अत्र वायुस्तथा वह्निरापः खं चापि गालव । आह्निकं चैव नैशं च दुःखं स्पर्शं विमुञ्चति ॥
atra vāyustathā vahnirāpaḥ khaṃ cāpi gālava | āhnikaṃ caiva naiśaṃ ca duḥkhaṃ sparśaṃ vimuñcati
हे गालव, यहाँ वायु, अग्नि, जल और आकाश दिन में भी और रात में भी अपने दुःखदायी स्पर्श को त्याग देते हैं।
श्लोक 15 (5.110.15)
अतःप्रभृति सूर्यस्य तिर्यगावर्तते गतिः । अत्र ज्योतींषि सर्वाणि विशन्त्यादित्यमण्डलम् ॥
ataḥprabhṛti sūryasya tiryagāvartate gatiḥ | atra jyotīṃṣi sarvāṇi viśantyādityamaṇḍalam
यहीं से आगे सूर्य की गति तिरछी हो जाती है। यहीं सभी ज्योतिर्गण सूर्यमण्डल में प्रवेश करते हैं,
श्लोक 16 (5.110.16)
अष्टाविंशतिरात्रं च चङ्क्रम्य सह भानुना । निष्पतन्ति पुनः सूर्यात्सोमसंयोगयोगतः ॥
aṣṭāviṃśatirātraṃ ca caṅkramya saha bhānunā | niṣpatanti punaḥ sūryātsomasaṃyogayogataḥ
और अट्ठाईस रातों तक सूर्य के साथ विचरण करके चन्द्रमा के संयोग से फिर सूर्य से बाहर निकल आते हैं।
श्लोक 17 (5.110.17)
अत्र नित्यं स्रवन्तीनां प्रभवः सागरोदयः । अत्र लोकत्रयस्यापस्तिष्ठन्ति वरुणालये ॥
atra nityaṃ sravantīnāṃ prabhavaḥ sāgarodayaḥ | atra lokatrayasyāpastiṣṭhanti varuṇālaye
यहीं नदियों का वह निरन्तर बहने वाला स्रोत है जिससे सागर भरता है। यहीं वरुण के धाम में तीनों लोकों का जल स्थित है।
श्लोक 18 (5.110.18)
अत्र पन्नगराजस्याप्यनन्तस्य निवेशनम् । अनादिनिधनस्यात्र विष्णोः स्थानमनुत्तमम् ॥
atra pannagarājasyāpyanantasya niveśanam | anādinidhanasyātra viṣṇoḥ sthānamanuttamam
यहीं नागराज अनन्त का निवास है; यहीं आदि और अन्त से रहित भगवान् विष्णु का सर्वोत्तम धाम है।
श्लोक 19 (5.110.19)
अत्रानलसखस्यापि पवनस्य निवेशनम् । महर्षेः कश्यपस्यात्र मारीचस्य निवेशनम् ॥
atrānalasakhasyāpi pavanasya niveśanam | maharṣeḥ kaśyapasyātra mārīcasya niveśanam
यहीं अग्नि के सखा पवन का निवास है; यहीं मरीचि-पुत्र महर्षि कश्यप का निवास है।
श्लोक 20 (5.110.20)
एष ते पश्चिमो मार्गो दिग्द्वारेण प्रकीर्तितः । ब्रूहि गालव गच्छावो बुद्धिः का द्विजसत्तम ॥
eṣa te paścimo mārgo digdvāreṇa prakīrtitaḥ | brūhi gālava gacchāvo buddhiḥ kā dvijasattama
इस प्रकार मैंने तुम्हें संक्षेप में पश्चिम का मार्ग बता दिया। हे द्विजश्रेष्ठ गालव, बताओ, क्या हम चलें? तुम्हारा क्या विचार है?