उद्योग पर्व · अध्याय 109
गरुड़ द्वारा दक्षिण दिशा का वर्णन
गरुड़ बताते हैं कि दक्षिण दिशा 'दक्षिणा' इसलिए कहलाती है कि सूर्य ने इसे अपने गुरु को दक्षिणा में दिया था। यह पितरों और मृतकों का लोक है, जहाँ काल की सूक्ष्मतम गणना होती है, जहाँ पापी वैतरणी नदी के पास नरक में पकाए जाते हैं, जहाँ रावण ने वर पाया और सूर्य से उत्पन्न कपिल के कारण सगर-पुत्रों का विनाश हुआ। वे स्मरण करते हैं कि भूख लगने पर उन्हें यहीं लड़ते हुए हाथी और कछुआ मिले थे, नागों की नगरी भोगवती का उल्लेख करते हैं, और गालव से पूछते हैं कि वहाँ चलें या पश्चिम दिशा का वर्णन सुनें।
सुपर्ण उवाच
श्लोक 1 (5.109.1)
इयं विवस्वता पूर्वं श्रौतेन विधिना किल । गुरवे दक्षिणा दत्ता दक्षिणेत्युच्यते च दिक् ॥
iyaṃ vivasvatā pūrvaṃ śrautena vidhinā kila | gurave dakṣiṇā dattā dakṣiṇetyucyate ca dik
प्राचीन काल में विवस्वान् (सूर्य) ने वैदिक विधि से यह दिशा अपने गुरु को दक्षिणा में दी थी; इसीलिए यह दिशा 'दक्षिणा' कहलाती है।
श्लोक 2 (5.109.2)
अत्र लोकत्रयस्यास्य पितृपक्षः प्रतिष्ठितः । अत्रोष्मपाणां देवानां निवासः श्रूयते द्विज ॥
atra lokatrayasyāsya pitṛpakṣaḥ pratiṣṭhitaḥ | atroṣmapāṇāṃ devānāṃ nivāsaḥ śrūyate dvija
यहाँ इन तीनों लोकों के पितरों का लोक प्रतिष्ठित है; हे द्विज, सुना जाता है कि यहीं ऊष्मप नामक देवताओं का निवास है।
श्लोक 3 (5.109.3)
अत्र विश्वे सदा देवाः पितृभिः सार्धमासते । इज्यमानाः स्म लोकेषु संप्राप्तास्तुल्यभागताम् ॥
atra viśve sadā devāḥ pitṛbhiḥ sārdhamāsate | ijyamānāḥ sma lokeṣu saṃprāptāstulyabhāgatām
यहाँ विश्वेदेव सदा पितरों के साथ रहते हैं; लोकों में पूजित होकर उन्होंने हवि में पितरों के समान भाग प्राप्त किया है।
श्लोक 4 (5.109.4)
एतद्द्वितीयं देवस्य द्वारमाचक्षते द्विज । त्रुटिशो लवशश्चापि गण्यते कालनिश्चयः ॥
etaddvitīyaṃ devasya dvāramācakṣate dvija | truṭiśo lavaśaścāpi gaṇyate kālaniścayaḥ
हे द्विज, इसे धर्मदेव का दूसरा द्वार कहा जाता है; यहाँ त्रुटि और लव जैसे सूक्ष्म अंशों में काल की गणना होती है।
श्लोक 5 (5.109.5)
अत्र देवर्षयो नित्यं पितृलोकर्षयस्तथा । तथा राजर्षयः सर्वे निवसन्ति गतव्यथाः ॥
atra devarṣayo nityaṃ pitṛlokarṣayastathā | tathā rājarṣayaḥ sarve nivasanti gatavyathāḥ
यहाँ देवर्षि, पितृलोक के ऋषि तथा सभी राजर्षि सदा दुःख से मुक्त होकर निवास करते हैं।
श्लोक 6 (5.109.6)
अत्र धर्मश्च सत्यं च कर्म चात्र निगद्यते । गतिरेषा द्विजश्रेष्ठ कर्मणामवसायिनाम् ॥
atra dharmaśca satyaṃ ca karma cātra nigadyate | gatireṣā dvijaśreṣṭha karmaṇāmavasāyinām
यहाँ धर्म, सत्य और कर्म का निर्णय होता है। हे द्विजश्रेष्ठ, कर्मों का अवसान होने पर प्राणी इसी गति को पाते हैं।
श्लोक 7 (5.109.7)
एषा दिक्सा द्विजश्रेष्ठ यां सर्वः प्रतिपद्यते । वृता त्वनवबोधेन सुखं तेन न गम्यते ॥
eṣā diksā dvijaśreṣṭha yāṃ sarvaḥ pratipadyate | vṛtā tvanavabodhena sukhaṃ tena na gamyate
हे द्विजश्रेष्ठ, यह वही दिशा है जहाँ सबको पहुँचना ही पड़ता है; पर अज्ञान से ढकी होने के कारण कोई इसमें सुखपूर्वक नहीं जाता।
श्लोक 8 (5.109.8)
नैर्ऋतानां सहस्राणि बहून्यत्र द्विजर्षभ । सृष्टानि प्रतिकूलानि द्रष्टव्यान्यकृतात्मभिः ॥
nairṛtānāṃ sahasrāṇi bahūnyatra dvijarṣabha | sṛṣṭāni pratikūlāni draṣṭavyānyakṛtātmabhiḥ
हे द्विजश्रेष्ठ, यहाँ सहस्रों प्रतिकूल नैर्ऋत (राक्षस) रचे गए हैं, जो अजितात्मा लोगों को दिखाई देते हैं।
श्लोक 9 (5.109.9)
अत्र मन्दरकुञ्जेषु विप्रर्षिसदनेषु च । गायन्ति गाथा गन्धर्वाश्चित्तबुद्धिहरा द्विज ॥
atra mandarakuñjeṣu viprarṣisadaneṣu ca | gāyanti gāthā gandharvāścittabuddhiharā dvija
हे द्विज, यहाँ मन्दर के कुंजों में और ब्रह्मर्षियों के आश्रमों में गन्धर्व ऐसी गाथाएँ गाते हैं जो चित्त और बुद्धि को हर लेती हैं।
श्लोक 10 (5.109.10)
अत्र सामानि गाथाभिः श्रुत्वा गीतानि रैवतः । गतदारो गतामात्यो गतराज्यो वनं गतः ॥
atra sāmāni gāthābhiḥ śrutvā gītāni raivataḥ | gatadāro gatāmātyo gatarājyo vanaṃ gataḥ
यहीं गाथाओं के साथ गाए गए सामगान सुनकर रैवत अपनी पत्नी, मन्त्रियों और राज्य को छोड़कर वन चले गए।
श्लोक 11 (5.109.11)
अत्र सावर्णिना चैव यवक्रीतात्मजेन च । मर्यादा स्थापिता ब्रह्मन्यां सूर्यो नातिवर्तते ॥
atra sāvarṇinā caiva yavakrītātmajena ca | maryādā sthāpitā brahmanyāṃ sūryo nātivartate
हे ब्रह्मन्, यहाँ सावर्णि और यवक्रीत के पुत्र ने एक मर्यादा स्थापित की, जिसका सूर्य भी उल्लंघन नहीं करते।
श्लोक 12 (5.109.12)
अत्र राक्षसराजेन पौलस्त्येन महात्मना । रावणेन तपः कृत्वा सुरेभ्योऽमरता वृता ॥
atra rākṣasarājena paulastyena mahātmanā | rāvaṇena tapaḥ kṛtvā surebhyo'maratā vṛtā
यहीं पुलस्त्यवंशी महात्मा राक्षसराज रावण ने तप करके देवताओं से अमरत्व का वर माँगा।
श्लोक 13 (5.109.13)
अत्र वृत्तेन वृत्रोऽपि शक्रशत्रुत्वमीयिवान् । अत्र सर्वासवः प्राप्ताः पुनर्गच्छन्ति पञ्चधा ॥
atra vṛttena vṛtro'pi śakraśatrutvamīyivān | atra sarvāsavaḥ prāptāḥ punargacchanti pañcadhā
यहीं अपने आचरण के कारण वृत्र भी इन्द्र का शत्रु बना। यहीं सभी प्राण आकर फिर पाँच रूपों में लौट जाते हैं।
श्लोक 14 (5.109.14)
अत्र दुष्कृतकर्माणो नराः पच्यन्ति गालव । अत्र वैतरणी नाम नदी वैतरणैर्वृता ॥
atra duṣkṛtakarmāṇo narāḥ pacyanti gālava | atra vaitaraṇī nāma nadī vaitaraṇairvṛtā
हे गालव, यहाँ पाप करने वाले मनुष्य (नरक में) पकाए जाते हैं। यहीं वैतरणी नाम की नदी है, जो उसी नाम के नरकों से घिरी है।
श्लोक 15 (5.109.15)
अत्र गत्वा सुखस्यान्तं दुःखस्यान्तं प्रपद्यते । अत्रावृत्तो दिनकरः सुरसं क्षरते पयः ॥
atra gatvā sukhasyāntaṃ duḥkhasyāntaṃ prapadyate | atrāvṛtto dinakaraḥ surasaṃ kṣarate payaḥ
यहाँ आकर मनुष्य सुख का भी अन्त पाता है और दुःख का भी। यहीं लौटकर सूर्य मधुर जल बरसाते हैं,
श्लोक 16 (5.109.16)
काष्ठां चासाद्य वासिष्ठीं हिममुत्सृजते पुनः । अत्राहं गालव पुरा क्षुधाऽऽर्तः परिचिन्तयन् ॥
kāṣṭhāṃ cāsādya vāsiṣṭhīṃ himamutsṛjate punaḥ | atrāhaṃ gālava purā kṣudhā''rtaḥ paricintayan
और वासिष्ठी दिशा (उत्तर) में पहुँचकर फिर हिम बरसाते हैं। हे गालव, यहीं प्राचीन काल में जब मैं भूख से पीड़ित होकर भोजन की खोज में था,
श्लोक 17 (5.109.17)
लब्धवान्युध्यमानौ द्वौ बृहन्तौ गजकच्छपौ । अत्र चक्रधनुर्नाम सूर्याञ्जातो महानृषिः ॥
labdhavānyudhyamānau dvau bṛhantau gajakacchapau | atra cakradhanurnāma sūryāñjāto mahānṛṣiḥ
मुझे आपस में लड़ते हुए दो विशाल प्राणी — एक हाथी और एक कछुआ — मिले थे। यहीं सूर्य से चक्रधनु नाम के महान् ऋषि उत्पन्न हुए,
श्लोक 18 (5.109.18)
विदुर्यं कपिलं देवं येनार्ताः सगरात्मजाः । अत्र सिद्धाः शिवा नाम ब्राह्मणा वेदपारगाः ॥
viduryaṃ kapilaṃ devaṃ yenārtāḥ sagarātmajāḥ | atra siddhāḥ śivā nāma brāhmaṇā vedapāragāḥ
जिन्हें लोग कपिल देव के नाम से जानते हैं और जिनके कारण सगर के पुत्र विनष्ट हुए। यहीं शिव नाम के सिद्ध ब्राह्मण, जो वेदों के पारगामी थे,
श्लोक 19 (5.109.19)
अधीत्य सकलान्वेदाँल्लेभिरे मोक्षमक्षयम् । अत्र भोगवती नाम पुरी वासुकिपालिता ॥
adhītya sakalānvedām̐llebhire mokṣamakṣayam | atra bhogavatī nāma purī vāsukipālitā
समस्त वेदों का अध्ययन करके अक्षय मोक्ष को प्राप्त हुए। यहीं वासुकि द्वारा रक्षित भोगवती नाम की नगरी है,
श्लोक 20 (5.109.20)
तक्षकेण च नागेन तथैवैरावतेन च । अत्र निर्याणकालेऽपि तमः संप्राप्यते महत् ॥
takṣakeṇa ca nāgena tathaivairāvatena ca | atra niryāṇakāle'pi tamaḥ saṃprāpyate mahat
जिसकी रक्षा तक्षक नाग और ऐरावत भी करते हैं। यहाँ प्राण छूटने के समय घोर अन्धकार मिलता है,
श्लोक 21 (5.109.21)
अभेद्यं भास्करेणापि स्वयं वा कृष्णवर्त्मना । एष तस्यापि ते मार्गः परिचारस्य गालव । ब्रूहि मे यदि गन्तव्यं प्रतीचीं शृणु चापराम् ॥
abhedyaṃ bhāskareṇāpi svayaṃ vā kṛṣṇavartmanā | eṣa tasyāpi te mārgaḥ paricārasya gālava | brūhi me yadi gantavyaṃ pratīcīṃ śṛṇu cāparām
जिसे न सूर्य भेद सकते हैं, न स्वयं अग्नि। हे गालव, तुम्हारी खोज के लिए यह भी एक मार्ग है। मुझे बताओ कि क्या वहाँ चलना है; या फिर दूसरी, पश्चिम दिशा के विषय में सुनो।