उद्योग पर्व · अध्याय 114
ययाति के सामने गरुड़ की गालव के लिए याचना
गरुड़ गालव को सोने और धन का स्वरूप समझाते हैं — कुबेर उसकी रक्षा करते हैं और जो प्रारब्ध में नहीं, वह नहीं मिलता — और सलाह देते हैं कि वे किसी राजर्षि-वंशी राजा से याचना करें जो प्रजा को कष्ट दिए बिना दे सके। वे चन्द्रवंशी नहुषपुत्र ययाति को अपना मित्र बताते हैं। दोनों प्रतिष्ठानपुर में ययाति के पास जाते हैं, जहाँ गरुड़ राजा को बताते हैं कि क्रुद्ध विश्वामित्र ने गालव से गुरुदक्षिणा में एक श्याम कान वाले आठ सौ श्वेत घोड़े माँगे हैं, और राजा से दान का आग्रह करते हुए उन्हें गालव के तप में भाग और घोड़े के रोमों जितने लोक मिलने का आश्वासन देते हैं।
नारद उवाच
श्लोक 1 (5.114.1)
अथाह गालवं दीनं सुपर्णः पततां वरः । निर्मितं वह्निना भूमौ वायुना शोधितं तथा । यस्माद्धिरण्मयं सर्वं हिरण्यं तेन चोच्यते ॥
athāha gālavaṃ dīnaṃ suparṇaḥ patatāṃ varaḥ | nirmitaṃ vahninā bhūmau vāyunā śodhitaṃ tathā | yasmāddhiraṇmayaṃ sarvaṃ hiraṇyaṃ tena cocyate
तब पक्षियों में श्रेष्ठ सुपर्ण ने दुखी गालव से कहा — "सोना पृथ्वी के भीतर अग्नि से रचा जाता है और वायु से शुद्ध होता है; और क्योंकि यह सारा जगत् उससे भरा है, इसलिए उसे हिरण्य कहते हैं।"
सुपर्ण उवाच
श्लोक 2 (5.114.2)
धत्ते धारयते चेदमेतस्मात्कारणाद्धनम् । तदेतत्त्रिषु लोकेषु धनं तिष्ठति शाश्वतम् ॥
dhatte dhārayate cedametasmātkāraṇāddhanam | tadetattriṣu lokeṣu dhanaṃ tiṣṭhati śāśvatam
क्योंकि यह इस जगत् का पोषण और धारण करता है, इसी कारण इसे धन कहते हैं। यह धन तीनों लोकों में सदा स्थित रहता है।
श्लोक 3 (5.114.3)
नित्यं प्रोष्ठपदाभ्यां च शुक्रे धनपतौ तथा । मनुष्येभ्यः समादत्ते शुक्रश्चित्तार्जितं धनम् ॥
nityaṃ proṣṭhapadābhyāṃ ca śukre dhanapatau tathā | manuṣyebhyaḥ samādatte śukraścittārjitaṃ dhanam
दोनों प्रोष्ठपदा नक्षत्रों में और शुक्रवार के योग में, धनपति कुबेर के लिए, शुक्र सदा मनुष्यों से उनके मन से अर्जित धन ग्रहण करते हैं।
श्लोक 4 (5.114.4)
अजैकपादहिर्बुध्न्यौ रक्ष्येते धनदेन च । एवं न शक्यते लब्धुमलब्धव्यं द्विजर्षभ । ऋते च धनमश्वानां नावाप्तिर्विद्यते तव ॥
ajaikapādahirbudhnyau rakṣyete dhanadena ca | evaṃ na śakyate labdhumalabdhavyaṃ dvijarṣabha | ṛte ca dhanamaśvānāṃ nāvāptirvidyate tava
अजैकपाद, अहिर्बुध्न्य और धनद कुबेर उसकी रक्षा करते हैं। इस प्रकार हे द्विजश्रेष्ठ, जो पाने योग्य नहीं है, वह पाया नहीं जा सकता; और धन के बिना तुम्हें घोड़े नहीं मिल सकते।
श्लोक 5 (5.114.5)
स त्वं याचात्र राजानं कंचिद्राजर्षिवंशजम् । अपीड्य राजा पौरान्हि यो नौ कुर्यात्कृतार्थिनौ ॥
sa tvaṃ yācātra rājānaṃ kaṃcidrājarṣivaṃśajam | apīḍya rājā paurānhi yo nau kuryātkṛtārthinau
इसलिए तुम यहाँ किसी राजर्षि-वंश में जन्मे राजा से याचना करो — ऐसे राजा से जो अपनी प्रजा को कष्ट दिए बिना हमारा प्रयोजन सिद्ध कर सके।
श्लोक 6 (5.114.6)
अस्ति सोमान्ववाये मे जातः कश्चिन्नृपः सखा । अभिगच्छावहे तं वै तस्यास्ति विभवो भुवि ॥
asti somānvavāye me jātaḥ kaścinnṛpaḥ sakhā | abhigacchāvahe taṃ vai tasyāsti vibhavo bhuvi
चन्द्रवंश में जन्मा एक राजा मेरा मित्र है। चलो, हम उसके पास चलें; पृथ्वी पर उसके पास बड़ा वैभव है।
श्लोक 7 (5.114.7)
ययातिर्नाम राजर्षिर्नाहुषः सत्यविक्रमः । स दास्यति मया चोक्तो भवता चार्थितः स्वयम् ॥
yayātirnāma rājarṣirnāhuṣaḥ satyavikramaḥ | sa dāsyati mayā cokto bhavatā cārthitaḥ svayam
वह नहुषपुत्र राजर्षि ययाति है, जिसका पराक्रम सत्य है। तुम्हारे स्वयं माँगने पर और मेरे कहने पर वह अवश्य देगा।
श्लोक 8 (5.114.8)
विभवश्चास्य सुमहानासीद्धनपतेरिव । एवं गुरुधनं विद्वन्दानेनैव विशोधय ॥
vibhavaścāsya sumahānāsīddhanapateriva | evaṃ gurudhanaṃ vidvandānenaiva viśodhaya
उसका वैभव धनपति कुबेर के समान अत्यन्त विशाल था। इसलिए हे विद्वन्, उसी के दान से गुरु का ऋण चुका दो।
नारद उवाच
श्लोक 9 (5.114.9)
तथा तौ कथयन्तौ च चिन्तयन्तौ च यत्क्षमम् । प्रतिष्ठाने नरपतिं ययातिं प्रत्युपस्थितौ ॥
tathā tau kathayantau ca cintayantau ca yatkṣamam | pratiṣṭhāne narapatiṃ yayātiṃ pratyupasthitau
इस प्रकार बातें करते और उचित उपाय पर विचार करते हुए वे दोनों प्रतिष्ठानपुर में राजा ययाति के पास पहुँचे।
श्लोक 10 (5.114.10)
प्रतिगृह्य च सत्कारैरर्घ्यपाद्यादिकं वरम् । पृष्टश्चागमने हेतुमुवाच विनतासुतः ॥
pratigṛhya ca satkārairarghyapādyādikaṃ varam | pṛṣṭaścāgamane hetumuvāca vinatāsutaḥ
अर्घ्य, पाद्य आदि उत्तम सत्कार ग्रहण करके, और आने का कारण पूछे जाने पर, विनतानन्दन ने कहा —
सुपर्ण उवाच
श्लोक 11 (5.114.11)
अयं मे नाहुष सखा गालवस्तपसो निधिः । विश्वामित्रस्य शिष्योऽभूद्वर्षाण्ययुतशो नृप ॥
ayaṃ me nāhuṣa sakhā gālavastapaso nidhiḥ | viśvāmitrasya śiṣyo'bhūdvarṣāṇyayutaśo nṛpa
हे नहुषनन्दन, तप के निधि ये गालव मेरे मित्र हैं। हे राजन्, ये दसियों हजार वर्षों तक विश्वामित्र के शिष्य रहे।
श्लोक 12 (5.114.12)
सोऽयं तेनाभ्यनुज्ञात उपकारेप्सया द्विजः । तमाह भगवान्किं ते ददानि गुरुदक्षिणाम् ॥
so'yaṃ tenābhyanujñāta upakārepsayā dvijaḥ | tamāha bhagavānkiṃ te dadāni gurudakṣiṇām
जब गुरु ने इन्हें जाने की अनुमति दी, तब उपकार का बदला चुकाने की इच्छा से इस ब्राह्मण ने उनसे कहा — "भगवन्, मैं आपको गुरुदक्षिणा में क्या दूँ?"
श्लोक 13 (5.114.13)
असकृत्तेन चोक्तेन किंचिदागतमन्युना । अयमुक्तः प्रयच्छेति जानता विभवं लघु ॥
asakṛttena coktena kiṃcidāgatamanyunā | ayamuktaḥ prayaccheti jānatā vibhavaṃ laghu
जब इन्होंने बार-बार यही कहा, तब कुछ क्रुद्ध होकर, इनके अल्प वैभव को जानते हुए, उन्होंने इनसे कहा — "दो!"
श्लोक 14 (5.114.14)
एकतःश्यामकर्णानां शुभ्राणां शुद्धजन्मनाम् । अष्टौ शतानि मे देहि हयानां चन्द्रवर्चसाम् ॥
ekataḥśyāmakarṇānāṃ śubhrāṇāṃ śuddhajanmanām | aṣṭau śatāni me dehi hayānāṃ candravarcasām
"मुझे आठ सौ घोड़े दो — श्वेत, शुद्ध नस्ल के, चन्द्रमा-सी कान्ति वाले, जिनका एक-एक कान श्याम हो।"
श्लोक 15 (5.114.15)
गुर्वर्थो दीयतामेव यदि गालव मन्यसे । इत्येवमाह सक्रोधो विश्वामित्रस्तपोधनः ॥
gurvartho dīyatāmeva yadi gālava manyase | ityevamāha sakrodho viśvāmitrastapodhanaḥ
"गालव, यदि तुम ठीक समझते हो तो गुरुदक्षिणा दे ही दो।" — तपोधन विश्वामित्र ने क्रोध में यही कहा।
श्लोक 16 (5.114.16)
सोऽयं शोकेन महता तप्यमानो द्विजर्षभः । अशक्तः प्रतिकर्तुं तद्भवन्तं शरणं गतः ॥
so'yaṃ śokena mahatā tapyamāno dvijarṣabhaḥ | aśaktaḥ pratikartuṃ tadbhavantaṃ śaraṇaṃ gataḥ
अब यह श्रेष्ठ ब्राह्मण महान शोक से संतप्त है, और वह दक्षिणा चुकाने में असमर्थ होकर आपकी शरण में आया है।
श्लोक 17 (5.114.17)
प्रतिगृह्य नरव्याघ्र त्वत्तो भिक्षां गतव्यथः । कृत्वाऽऽपवर्गं गुरवे चरिष्यति महत्तपः ॥
pratigṛhya naravyāghra tvatto bhikṣāṃ gatavyathaḥ | kṛtvā''pavargaṃ gurave cariṣyati mahattapaḥ
हे नरश्रेष्ठ, आपसे भिक्षा पाकर यह व्यथा से मुक्त होगा, और गुरु का ऋण चुकाकर महान तप करेगा।
श्लोक 18 (5.114.18)
तपसः संविभागेन भवन्तमपि योक्ष्यते । स्वेन राजर्षितपसा पूर्णं त्वां पूरयिष्यति ॥
tapasaḥ saṃvibhāgena bhavantamapi yokṣyate | svena rājarṣitapasā pūrṇaṃ tvāṃ pūrayiṣyati
अपने तप का भाग देकर यह आपको भी उससे जोड़ेगा; अपने राजर्षि-तप से पूर्ण आपको यह और भी परिपूर्ण कर देगा।
श्लोक 19 (5.114.19)
यावन्ति रोमाणि हये भवन्तीह नरेश्वर । तावन्तो वाजिनो लोकान्प्राप्नुवन्ति महीपते ॥
yāvanti romāṇi haye bhavantīha nareśvara | tāvanto vājino lokānprāpnuvanti mahīpate
हे नरेश्वर, घोड़े के शरीर पर जितने रोम होते हैं, हे महीपते, अश्वदान से उतने ही लोक प्राप्त होते हैं।
श्लोक 20 (5.114.20)
पात्रं प्रतिग्रहस्यायं दातुं पात्रं तथा भवान् । शङ्खे क्षीरमिवासक्तं भवत्वेतत्तथोपमम् ॥
pātraṃ pratigrahasyāyaṃ dātuṃ pātraṃ tathā bhavān | śaṅkhe kṣīramivāsaktaṃ bhavatvetattathopamam
यह दान ग्रहण करने का सुपात्र है और आप देने के सुपात्र हैं। यह दान शंख में डाले गए दूध के समान हो।