उद्योग पर्व · अध्याय 117
दिवोदास और प्रतर्दन का जन्म
गालव माधवी को काशी के धर्मात्मा राजा दिवोदास के पास ले जाते हैं, जो इस सौदे के बारे में पहले ही सुन चुके हैं और दो सौ घोड़ों के बदले एक पुत्र उत्पन्न करना सहर्ष स्वीकार करते हैं। नारद प्रसिद्ध देव-दम्पतियों और राज-दम्पतियों की लम्बी सूची के द्वारा माधवी के साथ राजा के आनन्द का वर्णन करते हैं। माधवी प्रतर्दन को जन्म देती है, और नियत समय पर दिवोदास उसे गालव को लौटा देते हैं, घोड़े अपने पास रख लेते हैं।
गालव उवाच
श्लोक 1 (5.117.1)
महावीर्यो महीपालः काशीनामीश्वरः प्रभुः । दिवोदास इति ख्यातो भैमसेनिर्नराधिपः ॥
mahāvīryo mahīpālaḥ kāśīnāmīśvaraḥ prabhuḥ | divodāsa iti khyāto bhaimasenirnarādhipaḥ
"काशी के स्वामी, महापराक्रमी और समर्थ एक राजा हैं, जो भीमसेन के पुत्र हैं और दिवोदास नाम से विख्यात हैं।
श्लोक 2 (5.117.2)
तत्र गच्छावहे भद्रे शनैरागच्छ मा शुचः । धार्मिकः संयमे युक्तः सत्ये चैव जनेश्वरः ॥
tatra gacchāvahe bhadre śanairāgaccha mā śucaḥ | dhārmikaḥ saṃyame yuktaḥ satye caiva janeśvaraḥ
हे भद्रे, हम दोनों वहीं चलें; धीरे-धीरे आओ और शोक मत करो। वह नरेश धर्मात्मा है, संयम और सत्य में लगा रहता है।"
नारद उवाच
श्लोक 3 (5.117.3)
तमुपागम्य स मुनिर्न्यायतस्तेन सत्कृतः । गालवः प्रसवस्यार्थे तं नृपं प्रत्यचोदयत् ॥
tamupāgamya sa munirnyāyatastena satkṛtaḥ | gālavaḥ prasavasyārthe taṃ nṛpaṃ pratyacodayat
मुनि गालव उसके पास पहुँचे और राजा ने विधिपूर्वक उनका सत्कार किया; तब गालव ने संतान उत्पन्न करने के लिए उस राजा को प्रेरित किया।
दिवोदास उवाच
श्लोक 4 (5.117.4)
श्रुतमेतन्मया पूर्वं किमुक्त्वा विस्तरं द्विज । काङ्क्षितो हि मयैषोऽर्थः श्रुत्वैव द्विजसत्तम ॥
śrutametanmayā pūrvaṃ kimuktvā vistaraṃ dvija | kāṅkṣito hi mayaiṣo'rthaḥ śrutvaiva dvijasattama
"हे ब्राह्मण, यह सब मैं पहले ही सुन चुका हूँ; विस्तार से कहने की क्या आवश्यकता? हे द्विजश्रेष्ठ, सुनते ही मैंने इसकी कामना की थी।
श्लोक 5 (5.117.5)
एतच्च मे बहुमतं यदुत्सृज्य नराधिपान् । मामेवमुपयातोऽसि भावि चैतदसंशयम् ॥
etacca me bahumataṃ yadutsṛjya narādhipān | māmevamupayāto'si bhāvi caitadasaṃśayam
और मैं इसे बड़ा सम्मान मानता हूँ कि आप दूसरे राजाओं को छोड़कर इस प्रकार मेरे पास आए हैं। यह निःसंदेह होनहार है।
श्लोक 6 (5.117.6)
स एव विभवोऽस्माकमश्वानामपि गालव । अहमप्येकमेवास्यां जनयिष्यामि पार्थिवम् ॥
sa eva vibhavo'smākamaśvānāmapi gālava | ahamapyekamevāsyāṃ janayiṣyāmi pārthivam
हे गालव, घोड़ों के विषय में मेरा वैभव भी वैसा ही है; मैं भी इससे केवल एक ही राजपुत्र उत्पन्न करूँगा।"
नारद उवाच
श्लोक 7 (5.117.7)
तथेत्युक्त्वा द्विजश्रेष्ठः प्रादात्कन्यां महीपतेः । विधिपूर्वां च तां राजा कन्यां प्रतिगृहीतवान् ॥
tathetyuktvā dvijaśreṣṭhaḥ prādātkanyāṃ mahīpateḥ | vidhipūrvāṃ ca tāṃ rājā kanyāṃ pratigṛhītavān
"ऐसा ही हो" कहकर द्विजश्रेष्ठ गालव ने वह कन्या राजा को दे दी, और राजा ने विधिपूर्वक उस कन्या को ग्रहण किया।
श्लोक 8 (5.117.8)
रेमे स तस्यां राजर्षिः प्रभावत्यां यथा रविः । स्वाहायां च यथा वह्निर्यथा शच्यां च वासवः ॥
reme sa tasyāṃ rājarṣiḥ prabhāvatyāṃ yathā raviḥ | svāhāyāṃ ca yathā vahniryathā śacyāṃ ca vāsavaḥ
वह राजर्षि उसके साथ वैसे ही रमण करने लगे जैसे सूर्य प्रभावती के साथ, अग्नि स्वाहा के साथ और इन्द्र शची के साथ,
श्लोक 9 (5.117.9)
यथा चन्द्रश्च रोहिण्यां यथा धूमोर्णया यमः । वरुणश्च यथा गौर्यां यथा चर्द्ध्यां धनेश्वरः ॥
yathā candraśca rohiṇyāṃ yathā dhūmorṇayā yamaḥ | varuṇaśca yathā gauryāṃ yathā carddhyāṃ dhaneśvaraḥ
जैसे चन्द्रमा रोहिणी के साथ, यम धूमोर्णा के साथ, वरुण गौरी के साथ और धनेश्वर कुबेर ऋद्धि के साथ,
श्लोक 10 (5.117.10)
यथा नारायणो लक्ष्म्यां जाह्नव्यां च यथोदधिः । यथा रुद्रश्च रुद्राण्यां यथा वेद्यां पितामहः ॥
yathā nārāyaṇo lakṣmyāṃ jāhnavyāṃ ca yathodadhiḥ | yathā rudraśca rudrāṇyāṃ yathā vedyāṃ pitāmahaḥ
जैसे नारायण लक्ष्मी के साथ, समुद्र जाह्नवी (गंगा) के साथ, रुद्र रुद्राणी के साथ और पितामह ब्रह्मा वेदी के साथ,
श्लोक 11 (5.117.11)
अदृश्यन्त्यां च वासिष्ठो वसिष्ठश्चाक्षमालया । च्यवनश्च सुकन्यायां पुलस्त्यः सन्ध्यया यथा ॥
adṛśyantyāṃ ca vāsiṣṭho vasiṣṭhaścākṣamālayā | cyavanaśca sukanyāyāṃ pulastyaḥ sandhyayā yathā
जैसे वसिष्ठ के पुत्र अदृश्यन्ती के साथ, वसिष्ठ अक्षमाला के साथ, च्यवन सुकन्या के साथ और पुलस्त्य सन्ध्या के साथ,
श्लोक 12 (5.117.12)
अगस्त्यश्चापि वैदर्भ्यां सावित्र्यां सत्यवान्यथा । यथा भृगुः पुलोमायामदित्यां कश्यपो यथा ॥
agastyaścāpi vaidarbhyāṃ sāvitryāṃ satyavānyathā | yathā bhṛguḥ pulomāyāmadityāṃ kaśyapo yathā
जैसे अगस्त्य विदर्भराजकुमारी के साथ, सत्यवान सावित्री के साथ, भृगु पुलोमा के साथ और कश्यप अदिति के साथ,
श्लोक 13 (5.117.13)
रेणुकायां यथार्चीको हैमवत्यां च कौशिकः । बृहस्पतिश्च तारायां शुक्रश्च शतपर्वणा ॥
reṇukāyāṃ yathārcīko haimavatyāṃ ca kauśikaḥ | bṛhaspatiśca tārāyāṃ śukraśca śataparvaṇā
जैसे ऋचीक के पुत्र (जमदग्नि) रेणुका के साथ, कौशिक हैमवती के साथ, बृहस्पति तारा के साथ और शुक्र शतपर्वा के साथ,
श्लोक 14 (5.117.14)
यथा भूम्यां भूमिपतिरुर्वश्यां च पुरूरवाः । ऋचीकः सत्यवत्यां च सरस्वत्यां यथा मनुः ॥
yathā bhūmyāṃ bhūmipatirurvaśyāṃ ca purūravāḥ | ṛcīkaḥ satyavatyāṃ ca sarasvatyāṃ yathā manuḥ
जैसे भूपति पृथ्वी के साथ, पुरूरवा उर्वशी के साथ, ऋचीक सत्यवती के साथ और मनु सरस्वती के साथ,
श्लोक 15 (5.117.15)
शकुन्तलायां दुष्यन्तो धृत्यां धर्मश्च शाश्वतः । दमयन्त्यां नलश्चैव सत्यवत्यां च नारदः ॥
śakuntalāyāṃ duṣyanto dhṛtyāṃ dharmaśca śāśvataḥ | damayantyāṃ nalaścaiva satyavatyāṃ ca nāradaḥ
जैसे दुष्यन्त शकुन्तला के साथ, सनातन धर्म धृति के साथ, नल दमयन्ती के साथ और नारद सत्यवती के साथ,
श्लोक 16 (5.117.16)
जरत्कारुर्जरत्कार्वां पुलस्त्यश्च प्रतीच्यया । मेनकायां यथोर्णायुस्तुम्बुरुश्चैव रम्भया ॥
jaratkārurjaratkārvāṃ pulastyaśca pratīcyayā | menakāyāṃ yathorṇāyustumburuścaiva rambhayā
जैसे जरत्कारु मुनि जरत्कारु नाग-कन्या के साथ, पुलस्त्य प्रतीच्या के साथ, ऊर्णायु मेनका के साथ और तुम्बुरु रम्भा के साथ,
श्लोक 17 (5.117.17)
वासुकिः शतशीर्षायां कुमार्यां च धनञ्जयः । वैदेह्यां च यथा रामो रुक्मिण्यां च जनार्दनः ॥
vāsukiḥ śataśīrṣāyāṃ kumāryāṃ ca dhanañjayaḥ | vaidehyāṃ ca yathā rāmo rukmiṇyāṃ ca janārdanaḥ
जैसे वासुकि शतशीर्षा के साथ, धनंजय कुमारी के साथ, राम वैदेही (सीता) के साथ और जनार्दन रुक्मिणी के साथ।
श्लोक 18 (5.117.18)
तथा तु रममाणस्य दिवोदासस्य भूपतेः । माधवी जनयामास पुत्रमेकं प्रतर्दनम् ॥
tathā tu ramamāṇasya divodāsasya bhūpateḥ | mādhavī janayāmāsa putramekaṃ pratardanam
इस प्रकार राजा दिवोदास के साथ रमण करते हुए माधवी ने एक पुत्र प्रतर्दन को जन्म दिया।
श्लोक 19 (5.117.19)
अथाजगाम भगवान्दिवोदासं स गालवः । समये समनुप्राप्ते वचनं चेदमब्रवीत् ॥
athājagāma bhagavāndivodāsaṃ sa gālavaḥ | samaye samanuprāpte vacanaṃ cedamabravīt
फिर नियत समय आने पर भगवान गालव दिवोदास के पास आए और यह वचन बोले —
गालव उवाच
श्लोक 20 (5.117.20)
निर्यातयतु मे कन्यां भवांस्तिष्ठन्तु वाजिनः । यावदन्यत्र गच्छामि शुल्कार्थं पृथिवीपते ॥
niryātayatu me kanyāṃ bhavāṃstiṣṭhantu vājinaḥ | yāvadanyatra gacchāmi śulkārthaṃ pṛthivīpate
"हे पृथ्वीपति, आप कन्या मुझे लौटा दीजिए और घोड़े यहीं रहें, जब तक मैं शुल्क के लिए कहीं और जाता हूँ।"
नारद उवाच
श्लोक 21 (5.117.21)
दिवोदासोऽथ धर्मात्मा समये गालवस्य ताम् । कन्यां निर्यातयामास स्थितः सत्ये महीपतिः ॥
divodāso'tha dharmātmā samaye gālavasya tām | kanyāṃ niryātayāmāsa sthitaḥ satye mahīpatiḥ
तब धर्मात्मा राजा दिवोदास ने सत्य पर स्थिर रहते हुए नियत समय पर वह कन्या गालव को लौटा दी।