उद्योग पर्व · अध्याय 118
उशीनर और शिबि का जन्म
फिर से कन्या बनी माधवी गालव के साथ भोजनगर में राजा उशीनर के पास जाती है। गालव संतानहीन राजा से चार सौ विशेष घोड़ों के बदले उससे पुत्र उत्पन्न करने का आग्रह करते हैं, किन्तु उशीनर के पास ऐसे केवल दो सौ घोड़े हैं और वे प्रजा के धन से शेष मूल्य चुकाना नहीं चाहते, इसलिए वे एक पुत्र उत्पन्न करना स्वीकार करते हैं। माधवी उन्हें श्रेष्ठ राजा शिबि प्रदान करती है, और उसके साथ लौटते हुए गालव को विनता-पुत्र गरुड़ मिलते हैं।
नारद उवाच
श्लोक 1 (5.118.1)
तथैव तां श्रियं त्यक्त्वा कन्या भूत्वा यशस्विनी । माधवी गालवं विप्रमभ्ययात्सत्यसङ्गरा ॥
tathaiva tāṃ śriyaṃ tyaktvā kanyā bhūtvā yaśasvinī | mādhavī gālavaṃ vipramabhyayātsatyasaṅgarā
उसी प्रकार वह यशस्विनी, सत्यप्रतिज्ञ माधवी उस राजलक्ष्मी को त्यागकर, फिर कन्या होकर, ब्राह्मण गालव के पास आ गई।
श्लोक 2 (5.118.2)
गालवो विमृशन्नेव स्वकार्यगतमानसः । जगाम भोजनगरं द्रष्टुमौशीनरं नृपम् ॥
gālavo vimṛśanneva svakāryagatamānasaḥ | jagāma bhojanagaraṃ draṣṭumauśīnaraṃ nṛpam
गालव, विचार करते हुए और मन को अपने कार्य में लगाए हुए, राजा उशीनर से मिलने भोजनगर गए।
श्लोक 3 (5.118.3)
तमुवाचाथ गत्वा स नृपतिं सत्यविक्रमम् । इयं कन्या सुतौ द्वौ ते जनयिष्यति पार्थिवौ ॥
tamuvācātha gatvā sa nṛpatiṃ satyavikramam | iyaṃ kanyā sutau dvau te janayiṣyati pārthivau
वहाँ पहुँचकर उन्होंने उस सत्यपराक्रमी राजा से कहा — "यह कन्या आपके लिए दो राजपुत्रों को जन्म देगी।
गालव उवाच
श्लोक 4 (5.118.4)
अस्यां भवानवाप्तार्थो भविता प्रेत्य चेह च । सोमार्कप्रतिसङ्काशौ जनयित्वा सुतौ नृप ॥
asyāṃ bhavānavāptārtho bhavitā pretya ceha ca | somārkapratisaṅkāśau janayitvā sutau nṛpa
हे राजन्, इससे चन्द्रमा और सूर्य के समान दो पुत्र उत्पन्न करके आप इस लोक में भी और परलोक में भी कृतार्थ हो जाएँगे।
श्लोक 5 (5.118.5)
शुल्कं तु सर्वधर्मज्ञ हयानां चन्द्रवर्चसाम् । एकतःश्यामकर्णानां देयं मह्यं चतुःशतम् ॥
śulkaṃ tu sarvadharmajña hayānāṃ candravarcasām | ekataḥśyāmakarṇānāṃ deyaṃ mahyaṃ catuḥśatam
हे सर्वधर्मज्ञ, शुल्क के रूप में आपको मुझे चन्द्रमा के समान कान्ति वाले, एक कान से श्याम, चार सौ घोड़े देने होंगे।
श्लोक 6 (5.118.6)
गुर्वर्थोऽयं समारम्भो न हयैः कृत्यमस्ति मे । यदि शक्यं महाराज क्रियतामविचारितम् ॥
gurvartho'yaṃ samārambho na hayaiḥ kṛtyamasti me | yadi śakyaṃ mahārāja kriyatāmavicāritam
यह सारा उद्यम गुरु के लिए है; मुझे स्वयं घोड़ों से कोई प्रयोजन नहीं। हे महाराज, यदि सम्भव हो तो बिना सोच-विचार के यह कीजिए।
श्लोक 7 (5.118.7)
अनपत्योऽसि राजर्षे पुत्रौ जनय पार्थिव । पितॄन्पुत्रप्लवेन त्वमात्मानं चैव तारय ॥
anapatyo'si rājarṣe putrau janaya pārthiva | pitṝnputraplavena tvamātmānaṃ caiva tāraya
हे राजर्षि, आप संतानहीन हैं। हे राजन्, दो पुत्र उत्पन्न कीजिए और पुत्ररूपी नौका से अपने पितरों को तथा स्वयं को भी पार लगाइए।
श्लोक 8 (5.118.8)
न पुत्रफलभोक्ता हि राजर्षे पात्यते दिवः । न याति नरकं घोरं यत्र गच्छन्त्यनात्मजाः ॥
na putraphalabhoktā hi rājarṣe pātyate divaḥ | na yāti narakaṃ ghoraṃ yatra gacchantyanātmajāḥ
क्योंकि, हे राजर्षि, जो पुत्र का फल भोगता है वह स्वर्ग से नहीं गिराया जाता, और न ही उस भयंकर नरक में जाता है जहाँ पुत्रहीन जाते हैं।"
नारद उवाच
श्लोक 9 (5.118.9)
एतच्चान्यच्च विविधं श्रुत्वा गालवभाषितम् । उशीनरः प्रतिवचो ददौ तस्य नराधिपः ॥
etaccānyacca vividhaṃ śrutvā gālavabhāṣitam | uśīnaraḥ prativaco dadau tasya narādhipaḥ
गालव की कही हुई यह तथा और भी अनेक प्रकार की बातें सुनकर राजा उशीनर ने उन्हें उत्तर दिया —
उशीनर उवाच
श्लोक 10 (5.118.10)
श्रुतवानस्मि ते वाक्यं यथा वदसि गालव । विधिस्तु बलवान्ब्रह्मन्प्रवणं हि मनो मम ॥
śrutavānasmi te vākyaṃ yathā vadasi gālava | vidhistu balavānbrahmanpravaṇaṃ hi mano mama
"हे गालव, जैसा आप कह रहे हैं, आपकी बात मैंने सुन ली। किन्तु, हे ब्रह्मन्, विधाता बलवान है, और मेरा मन इस ओर झुका हुआ है।
श्लोक 11 (5.118.11)
शते द्वे तु ममाश्वानामीदृशानां द्विजोत्तम । इतरेषां सहस्राणि सुबहूनि चरन्ति मे ॥
śate dve tu mamāśvānāmīdṛśānāṃ dvijottama | itareṣāṃ sahasrāṇi subahūni caranti me
हे द्विजोत्तम, ऐसे घोड़े मेरे पास केवल दो सौ हैं; दूसरी तरह के तो मेरे अनेक हज़ार घोड़े विचरते हैं।
श्लोक 12 (5.118.12)
अहमप्येकमेवास्यां जनयिष्यामि गालव । पुत्रवद्भिर्गतं मार्गं गमिष्यामि परैरहम् ॥
ahamapyekamevāsyāṃ janayiṣyāmi gālava | putravadbhirgataṃ mārgaṃ gamiṣyāmi parairaham
हे गालव, मैं भी इससे केवल एक ही पुत्र उत्पन्न करूँगा, और इस प्रकार उस मार्ग पर चलूँगा जिस पर पुत्रवान दूसरे लोग चले हैं।
श्लोक 13 (5.118.13)
मूल्येनापि समं कुर्यां तवाहं द्विजसत्तम । पौरजानपदार्थं तु ममार्थो नात्मभोगतः ॥
mūlyenāpi samaṃ kuryāṃ tavāhaṃ dvijasattama | paurajānapadārthaṃ tu mamārtho nātmabhogataḥ
हे द्विजश्रेष्ठ, मैं शेष मूल्य भी किसी और धन से पूरा कर देता, किन्तु मेरा धन नगर और जनपद की प्रजा के लिए है, अपने भोग के लिए नहीं।
श्लोक 14 (5.118.14)
कामतो हि धनं राजा पारक्यं यः प्रयच्छति । न स धर्मेण धर्मात्मन्युज्यते यशसा न च ॥
kāmato hi dhanaṃ rājā pārakyaṃ yaḥ prayacchati | na sa dharmeṇa dharmātmanyujyate yaśasā na ca
क्योंकि, हे धर्मात्मन्, जो राजा पराये धन को अपनी इच्छा से दान कर देता है, उसे न धर्म मिलता है और न यश।
श्लोक 15 (5.118.15)
सोऽहं प्रतिग्रहीष्यामि ददात्वेतां भवान्मम । कुमारीं देवगर्भाभामेकपुत्रभवाय मे ॥
so'haṃ pratigrahīṣyāmi dadātvetāṃ bhavānmama | kumārīṃ devagarbhābhāmekaputrabhavāya me
इसलिए मैं इसे ग्रहण करूँगा। आप देव-कन्या के समान कान्तिमती यह कुमारी मुझे एक पुत्र की उत्पत्ति के लिए दे दीजिए।"
नारद उवाच
श्लोक 16 (5.118.16)
तथा तु बहुधा कन्यामुक्तवन्तं नराधिपम् । उशीनरं द्विजश्रेष्ठो गालवः प्रत्यपूजयत् ॥
tathā tu bahudhā kanyāmuktavantaṃ narādhipam | uśīnaraṃ dvijaśreṣṭho gālavaḥ pratyapūjayat
राजा उशीनर के कन्या के विषय में इस प्रकार बहुत-सी बातें कहने पर द्विजश्रेष्ठ गालव ने उनका सम्मान किया।
श्लोक 17 (5.118.17)
उशीनरं प्रतिग्राह्य गालवः प्रययौ वनम् । रेमे स तां समासाद्य कृतपुण्य इव श्रियम् ॥
uśīnaraṃ pratigrāhya gālavaḥ prayayau vanam | reme sa tāṃ samāsādya kṛtapuṇya iva śriyam
उशीनर को कन्या सौंपकर गालव वन को चले गए; और राजा उसे पाकर वैसे ही रमण करने लगे जैसे पुण्यात्मा लक्ष्मी को पाकर आनन्दित होता है —
श्लोक 18 (5.118.18)
कन्दरेषु च शैलानां नदीनां निर्झरेषु च । उद्यानेषु विचित्रेषु वनेषूपवनेषु च ॥
kandareṣu ca śailānāṃ nadīnāṃ nirjhareṣu ca | udyāneṣu vicitreṣu vaneṣūpavaneṣu ca
पर्वतों की कन्दराओं में, नदियों के झरनों के पास, सुन्दर उद्यानों में, वनों और उपवनों में,
श्लोक 19 (5.118.19)
हर्म्येषु रमणीयेषु प्रासादशिखरेषु च । वातायनविमानेषु तथा गर्भगृहेषु च ॥
harmyeṣu ramaṇīyeṣu prāsādaśikhareṣu ca | vātāyanavimāneṣu tathā garbhagṛheṣu ca
रमणीय भवनों में, महलों की छतों पर, झरोखों वाले विमानाकार मण्डपों में और भीतरी कक्षों में।
श्लोक 20 (5.118.20)
ततोऽस्य समये जज्ञे पुत्रो बालरविप्रभः । शिबिर्नाम्नाभिविख्यातो यः स पार्थिवसत्तमः ॥
tato'sya samaye jajñe putro bālaraviprabhaḥ | śibirnāmnābhivikhyāto yaḥ sa pārthivasattamaḥ
तब समय आने पर उसके यहाँ उगते सूर्य के समान तेजस्वी पुत्र उत्पन्न हुआ — वही जो शिबि नाम से विख्यात श्रेष्ठ राजा हुआ।
श्लोक 21 (5.118.21)
उपस्थाय स तं विप्रो गालवः प्रतिगृह्य च । कन्यां प्रयातस्तां राजन्दृष्टवान्विनतात्मजम् ॥
upasthāya sa taṃ vipro gālavaḥ pratigṛhya ca | kanyāṃ prayātastāṃ rājandṛṣṭavānvinatātmajam
ब्राह्मण गालव उसके पास आए और कन्या को वापस लेकर चल पड़े; और, हे राजन्, मार्ग में उन्होंने विनता के पुत्र गरुड़ को देखा।