उद्योग पर्व · अध्याय 119
माधवी का विश्वामित्र को समर्पण
गरुड़ देखते हैं कि गालव के पास गुरु को देने के लिए आठ सौ में से अभी दो सौ घोड़े कम हैं। वे बताते हैं कि ऋचीक ने राजा गाधि को जो एक हज़ार विलक्षण घोड़े दिए थे, उनमें से छह सौ तीन राजाओं ने खरीद लिए और शेष चार सौ मार्ग में खो गए; इसलिए और घोड़े नहीं मिल सकते, और गालव को बचे हुए दो सौ के बदले माधवी विश्वामित्र को अर्पित कर देनी चाहिए। विश्वामित्र उसे स्वीकार करके उससे अष्टक को उत्पन्न करते हैं और उसे लौटा देते हैं; गुरुदक्षिणा चुकाकर गालव माधवी को उसके पिता ययाति को सौंप देता है और वन चला जाता है।
नारद उवाच
श्लोक 1 (5.119.1)
गालवं वैनतेयोऽथ प्रहसन्निदमब्रवीत् । दिष्ट्या कृतार्थं पश्यामि भवन्तमिह वै द्विज ॥
gālavaṃ vainateyo'tha prahasannidamabravīt | diṣṭyā kṛtārthaṃ paśyāmi bhavantamiha vai dvija
तब विनतानन्दन गरुड़ ने हँसते हुए गालव से यह कहा — "हे ब्राह्मण, सौभाग्य से मैं तुम्हें यहाँ कृतार्थ देख रहा हूँ।"
श्लोक 2 (5.119.2)
गालवस्तु वचः श्रुत्वा वैनतेयेन भाषितम् । चतुर्भागावशिष्टं तदाचख्यौ कार्यमस्य हि ॥
gālavastu vacaḥ śrutvā vainateyena bhāṣitam | caturbhāgāvaśiṣṭaṃ tadācakhyau kāryamasya hi
विनतानन्दन के कहे हुए वचन सुनकर गालव ने उन्हें बताया कि उसका कार्य अभी चौथाई शेष है।
श्लोक 3 (5.119.3)
सुपर्णस्त्वब्रवीदेनं गालवं वदतां वरः । प्रयत्नस्ते न कर्तव्यो नैष संपत्स्यते तव ॥
suparṇastvabravīdenaṃ gālavaṃ vadatāṃ varaḥ | prayatnaste na kartavyo naiṣa saṃpatsyate tava
तब वक्ताओं में श्रेष्ठ सुपर्ण ने गालव से कहा — "अब तुम्हें और प्रयत्न नहीं करना चाहिए; यह कार्य तुमसे पूरा नहीं होगा।"
सुपर्ण उवाच
श्लोक 4 (5.119.4)
पुरा हि कान्यकुब्जे वै गाधेः सत्यवतीं सुताम् । भार्यार्थे वरयत्कन्यामृचीकस्तेन भाषितः ॥
purā hi kānyakubje vai gādheḥ satyavatīṃ sutām | bhāryārthe varayatkanyāmṛcīkastena bhāṣitaḥ
प्राचीन काल में कान्यकुब्ज में ऋचीक ने गाधि की कन्या सत्यवती को पत्नी के रूप में माँगा, तब गाधि ने उनसे कहा —
श्लोक 5 (5.119.5)
एकतःश्यामकर्णानां हयानां चन्द्रवर्चसाम् । भगवन्दीयतां मह्यं सहस्रमिति गालव ॥
ekataḥśyāmakarṇānāṃ hayānāṃ candravarcasām | bhagavandīyatāṃ mahyaṃ sahasramiti gālava
"भगवन्, मुझे चन्द्रमा जैसी कान्ति वाले एक हज़ार ऐसे घोड़े दीजिए जिनका एक-एक कान श्याम हो।" हे गालव, उन्होंने ऐसा कहा।
श्लोक 6 (5.119.6)
ऋचीकस्तु तथेत्युक्त्वा वरुणस्यालयं गतः । अश्वतीर्थे हयाँल्लब्ध्वा दत्तवान्पार्थिवाय वै ॥
ṛcīkastu tathetyuktvā varuṇasyālayaṃ gataḥ | aśvatīrthe hayām̐llabdhvā dattavānpārthivāya vai
ऋचीक ने "ऐसा ही हो" कहकर वरुण के लोक में जाकर अश्वतीर्थ में घोड़े प्राप्त किए और उन्हें राजा को दे दिया।
श्लोक 7 (5.119.7)
इष्ट्वा ते पुण्डरीकेण दत्ता राज्ञा द्विजातिषु । तेभ्यो द्वे द्वे शते क्रीत्वा प्राप्ते तैः पार्थिवैस्तदा ॥
iṣṭvā te puṇḍarīkeṇa dattā rājñā dvijātiṣu | tebhyo dve dve śate krītvā prāpte taiḥ pārthivaistadā
राजा ने पुण्डरीक यज्ञ करके वे घोड़े ब्राह्मणों को दान कर दिए; फिर उन ब्राह्मणों से दो-दो सौ घोड़े खरीदकर उन राजाओं ने उन्हें प्राप्त किया।
श्लोक 8 (5.119.8)
अपराण्यपि चत्वारि शतानि द्विजसत्तम । नीयमानानि संतारे हृतान्यासन्नितस्ततः ॥
aparāṇyapi catvāri śatāni dvijasattama | nīyamānāni saṃtāre hṛtānyāsannitastataḥ
हे द्विजश्रेष्ठ, शेष चार सौ घोड़े मार्ग में ले जाए जाते समय इधर-उधर हर लिए गए।
श्लोक 9 (5.119.9)
एवं न शक्यमप्राप्यं प्राप्तुं गालव कर्हिचित् । इमामश्वशताभ्यां वै द्वाभ्यां तस्मै निवेदय ॥
evaṃ na śakyamaprāpyaṃ prāptuṃ gālava karhicit | imāmaśvaśatābhyāṃ vai dvābhyāṃ tasmai nivedaya
इसलिए हे गालव, जो अप्राप्य है उसे कभी भी पाया नहीं जा सकता। तुम दो सौ घोड़ों के बदले यह कन्या उन्हें अर्पित कर दो —
श्लोक 10 (5.119.10)
विश्वामित्राय धर्मात्मन्षड्भिरश्वशतैः सह । ततोऽसि गतसंमोहः कृतकृत्यो द्विजोत्तम ॥
viśvāmitrāya dharmātmanṣaḍbhiraśvaśataiḥ saha | tato'si gatasaṃmohaḥ kṛtakṛtyo dvijottama
हे धर्मात्मा, छह सौ घोड़ों के साथ विश्वामित्र को। तब तुम्हारा मोह दूर हो जाएगा और हे द्विजोत्तम, तुम कृतकृत्य हो जाओगे।
नारद उवाच
श्लोक 11 (5.119.11)
गालवस्तं तथेत्युक्त्वा सुपर्णसहितस्ततः । आदायाश्वांश्च कन्यां च विश्वामित्रमुपागमत् ॥
gālavastaṃ tathetyuktvā suparṇasahitastataḥ | ādāyāśvāṃśca kanyāṃ ca viśvāmitramupāgamat
गालव "ठीक है" कहकर सुपर्ण के साथ घोड़ों और कन्या को लेकर विश्वामित्र के पास गया।
गालव उवाच
श्लोक 12 (5.119.12)
अश्वानां काङ्क्षितार्थानां षडिमानि शतानि वै । शतद्वयेन कन्येयं भवता प्रतिगृह्यताम् ॥
aśvānāṃ kāṅkṣitārthānāṃ ṣaḍimāni śatāni vai | śatadvayena kanyeyaṃ bhavatā pratigṛhyatām
आपके चाहे हुए घोड़ों में से ये छह सौ हैं। शेष दो सौ के बदले आप यह कन्या स्वीकार करें।
श्लोक 13 (5.119.13)
अस्यां राजर्षिभिः पुत्रा जाता वै धार्मिकास्त्रयः । चतुर्थं जनयत्वेकं भवानपि नरोत्तमम् ॥
asyāṃ rājarṣibhiḥ putrā jātā vai dhārmikāstrayaḥ | caturthaṃ janayatvekaṃ bhavānapi narottamam
इससे राजर्षियों के तीन धर्मात्मा पुत्र उत्पन्न हो चुके हैं। आप भी इससे एक चौथा नरश्रेष्ठ पुत्र उत्पन्न करें।
श्लोक 14 (5.119.14)
पूर्णान्येवं शतान्यष्टौ तुरगाणां भवन्तु ते । भवतो ह्यनृणो भूत्वा तपः कुर्यां यथासुखम् ॥
pūrṇānyevaṃ śatānyaṣṭau turagāṇāṃ bhavantu te | bhavato hyanṛṇo bhūtvā tapaḥ kuryāṃ yathāsukham
इस प्रकार आपके आठ सौ घोड़े पूरे हो जाएँ, और मैं आपके ऋण से मुक्त होकर सुखपूर्वक तप करूँ।
नारद उवाच
श्लोक 15 (5.119.15)
विश्वामित्रस्तु तं दृष्ट्वा गालवं सह पक्षिणा । कन्यां च तां वरारोहामिदमित्यब्रवीद्वचः ॥
viśvāmitrastu taṃ dṛṣṭvā gālavaṃ saha pakṣiṇā | kanyāṃ ca tāṃ varārohāmidamityabravīdvacaḥ
पक्षिराज के साथ गालव को और उस सुन्दरी कन्या को देखकर विश्वामित्र ने यह वचन कहा —
विश्वामित्र उवाच
श्लोक 16 (5.119.16)
किमियं पूर्वमेवेह न दत्ता मम गालव । पुत्रा ममैव चत्वारो भवेयुः कुलभावनाः ॥
kimiyaṃ pūrvameveha na dattā mama gālava | putrā mamaiva catvāro bhaveyuḥ kulabhāvanāḥ
हे गालव, यह कन्या तुमने पहले ही मुझे क्यों नहीं दे दी? तब कुल को बढ़ाने वाले चारों पुत्र मेरे ही होते।
श्लोक 17 (5.119.17)
प्रतिगृह्णामि ते कन्यामेकपुत्रफलाय वै । अश्वाश्चाश्रममासाद्य चरन्तु मम सर्वशः ॥
pratigṛhṇāmi te kanyāmekaputraphalāya vai | aśvāścāśramamāsādya carantu mama sarvaśaḥ
मैं एक पुत्र के फल के लिए तुम्हारी कन्या स्वीकार करता हूँ। घोड़े मेरे आश्रम में आकर सब ओर विचरें।
नारद उवाच
श्लोक 18 (5.119.18)
स तया रममाणोऽथ विश्वामित्रो महाद्युतिः । आत्मजं जनयामास माधवीपुत्रमष्टकम् ॥
sa tayā ramamāṇo'tha viśvāmitro mahādyutiḥ | ātmajaṃ janayāmāsa mādhavīputramaṣṭakam
तब महातेजस्वी विश्वामित्र ने उसके साथ रमण करते हुए माधवी के पुत्र अष्टक को उत्पन्न किया।
श्लोक 19 (5.119.19)
जातमात्रं सुतं तं च विश्वामित्रो महामुनिः । संयोज्यार्थैस्तथा धर्मैरश्वैस्तैः समयोजयत् ॥
jātamātraṃ sutaṃ taṃ ca viśvāmitro mahāmuniḥ | saṃyojyārthaistathā dharmairaśvaistaiḥ samayojayat
पुत्र के जन्म लेते ही महामुनि विश्वामित्र ने उसे अर्थ और धर्म से युक्त किया और वे घोड़े भी उसे सौंप दिए।
श्लोक 20 (5.119.20)
अथाष्टकः पुरं प्रायात्तदा सोमपुरप्रभम् । निर्यात्य कन्यां शिष्याय कौशिकोपि वनं ययौ ॥
athāṣṭakaḥ puraṃ prāyāttadā somapuraprabham | niryātya kanyāṃ śiṣyāya kauśikopi vanaṃ yayau
तब अष्टक चन्द्रमा की पुरी के समान शोभायमान अपने नगर को चला गया, और कौशिक (विश्वामित्र) भी कन्या को शिष्य को लौटाकर वन को चले गए।
श्लोक 21 (5.119.21)
गालवोपि सुपर्णेन सह निर्यात्य दक्षिणाम् । मनसाऽतिप्रतीतेन कन्यामिदमुवाच ह ॥
gālavopi suparṇena saha niryātya dakṣiṇām | manasā'tipratītena kanyāmidamuvāca ha
गालव ने भी सुपर्ण के साथ गुरुदक्षिणा चुकाकर अत्यन्त प्रसन्न मन से कन्या से यह कहा —
गालव उवाच
श्लोक 22 (5.119.22)
जातो दानपतिः पुत्रस्त्वया शूरस्तथाऽपरः । सत्यधर्मरतश्चान्यो यज्वा चापि तथाऽपरः ॥
jāto dānapatiḥ putrastvayā śūrastathā'paraḥ | satyadharmarataścānyo yajvā cāpi tathā'paraḥ
तुमसे एक दानपति पुत्र उत्पन्न हुआ, दूसरा शूरवीर, एक और सत्य और धर्म में रत, और एक अन्य यज्ञ करने वाला।
श्लोक 23 (5.119.23)
तदागच्छ वरारोहे तारितस्ते पिता सुतैः । चत्वारश्चैव राजानस्तथा चाहं सुमध्यमे ॥
tadāgaccha varārohe tāritaste pitā sutaiḥ | catvāraścaiva rājānastathā cāhaṃ sumadhyame
तो आओ, हे सुन्दरी। तुम्हारे पुत्रों ने तुम्हारे पिता का उद्धार कर दिया है; हे सुमध्यमे, उन चारों राजाओं का और मेरा भी।
नारद उवाच
श्लोक 24 (5.119.24)
गालवस्त्वभ्यनुज्ञाय सुपर्णं पन्नगाशनम् । पितुर्निर्यात्य तां कन्यां प्रययौ वनमेव ह ॥
gālavastvabhyanujñāya suparṇaṃ pannagāśanam | piturniryātya tāṃ kanyāṃ prayayau vanameva ha
गालव ने सर्पभक्षी सुपर्ण से विदा ली और उस कन्या को उसके पिता को लौटाकर वन को ही चला गया।