उद्योग पर्व · अध्याय 120
माधवी का वन-वरण और स्वर्ग में ययाति का अभिमान
ययाति गंगा-यमुना के संगम पर एक आश्रम में माधवी का दूसरा स्वयंवर रचते हैं और उसके भाई पूरु तथा यदु उसे रथ में वहाँ लाते हैं; किन्तु वह सब वरों को छोड़कर वन को वरती है और मृगों के बीच तपस्विनी बनकर रहने लगती है। हज़ारों वर्षों की आयु के बाद ययाति देह त्यागकर स्वर्ग पहुँचते हैं। युगों बाद अहंकार से मोहित होकर वे मनुष्यों, देवताओं और ऋषियों का अपमान करते हैं; इन्द्र और राजर्षि यह जान लेते हैं, स्वर्गवासी उन्हें पहचानना छोड़ देते हैं और क्षणभर में उनका तेज नष्ट हो जाता है।
नारद उवाच
श्लोक 1 (5.120.1)
स तु राजा पुनस्तस्याः कर्तुकामः स्वयंवरम् । उपगम्याश्रमपदं गङ्गायामुनसङ्गमे ॥
sa tu rājā punastasyāḥ kartukāmaḥ svayaṃvaram | upagamyāśramapadaṃ gaṅgāyāmunasaṅgame
तब राजा (ययाति) उसका फिर से स्वयंवर करने की इच्छा से गंगा और यमुना के संगम पर स्थित एक आश्रम में गए।
श्लोक 2 (5.120.2)
गृहीतमाल्यदामां तां रथमारोप्य माधवीम् । पूरुर्यदुश्च भगिनीमाश्रमे पर्यधावताम् ॥
gṛhītamālyadāmāṃ tāṃ rathamāropya mādhavīm | pūruryaduśca bhaginīmāśrame paryadhāvatām
पूरु और यदु अपनी बहन माधवी को, जिसके हाथ में वरमाला थी, रथ पर बिठाकर आश्रम में चारों ओर घुमाते रहे।
श्लोक 3 (5.120.3)
नागयक्षमनुष्याणां गन्धर्वमृगपक्षिणाम् । शैलद्रुमवनौकानामासीत्तत्र समागमः ॥
nāgayakṣamanuṣyāṇāṃ gandharvamṛgapakṣiṇām | śailadrumavanaukānāmāsīttatra samāgamaḥ
वहाँ नागों, यक्षों, मनुष्यों, गन्धर्वों, पशुओं और पक्षियों तथा पर्वतों, वृक्षों और वनों में रहने वालों का समागम हुआ।
श्लोक 4 (5.120.4)
नानापुरुषदेश्यानामीश्वरैश्च समाकुलम् । ऋषिभिर्ब्रह्मकल्पैश्च समन्तादावृतं वनम् ॥
nānāpuruṣadeśyānāmīśvaraiśca samākulam | ṛṣibhirbrahmakalpaiśca samantādāvṛtaṃ vanam
वह वन अनेक जातियों और देशों के अधिपतियों से भरा था और चारों ओर से ब्रह्मा के समान ऋषियों से घिरा था।
श्लोक 5 (5.120.5)
निर्दिश्यमानेषु तु सा वरेषु वरवर्णिनी । वरानुत्क्रम्य सर्वास्तान्वरं वृतवती वनम् ॥
nirdiśyamāneṣu tu sā vareṣu varavarṇinī | varānutkramya sarvāstānvaraṃ vṛtavatī vanam
किन्तु जब उसे वरों का परिचय कराया जा रहा था, तब उस सुन्दरी ने उन सब वरों को लाँघकर वन को ही अपना वर चुना।
श्लोक 6 (5.120.6)
अवतीर्य रथात्कन्या नमस्कृत्य च बन्धुषु । उपगम्य वनं पुण्यं तपस्तेपे ययातिजा ॥
avatīrya rathātkanyā namaskṛtya ca bandhuṣu | upagamya vanaṃ puṇyaṃ tapastepe yayātijā
ययाति की पुत्री वह कन्या रथ से उतरी, बन्धुओं को प्रणाम करके पवित्र वन में गई और तप करने लगी।
श्लोक 7 (5.120.7)
उपवासैश्च विविधैर्दीक्षाभिर्नियमैस्तथा । आत्मनो लघुतां कृत्वा बभूव मृगचारिणी ॥
upavāsaiśca vividhairdīkṣābhirniyamaistathā | ātmano laghutāṃ kṛtvā babhūva mṛgacāriṇī
अनेक प्रकार के उपवासों, दीक्षाओं और नियमों से अपने शरीर को हल्का करके वह मृगों की भाँति विचरने लगी।
श्लोक 8 (5.120.8)
वैदूर्याङ्कुरकल्पानि मृदूनि हरितानि च । चरन्ती श्लक्ष्णशष्पाणि तिक्तानि मधुराणि च ॥
vaidūryāṅkurakalpāni mṛdūni haritāni ca | carantī ślakṣṇaśaṣpāṇi tiktāni madhurāṇi ca
वैदूर्य के अंकुरों जैसी कोमल, हरी और चिकनी घास — कड़वी भी और मीठी भी — चरती हुई,
श्लोक 9 (5.120.9)
स्रवन्तीनां च पुण्यानां सुरसानि शुचीनि च । पिबन्ती वारिमुख्यानि शीतानि विमलानि च ॥
sravantīnāṃ ca puṇyānāṃ surasāni śucīni ca | pibantī vārimukhyāni śītāni vimalāni ca
पवित्र नदियों का स्वादिष्ट, शुद्ध, शीतल और निर्मल उत्तम जल पीती हुई,
श्लोक 10 (5.120.10)
वनेषु मृगराजेषु व्याघ्रविप्रोषितेषु च । दावाग्निविप्रयुक्तेषु शून्येषु गहनेषु च ॥
vaneṣu mṛgarājeṣu vyāghraviproṣiteṣu ca | dāvāgniviprayukteṣu śūnyeṣu gahaneṣu ca
सिंहों के निवास और बाघों के विचरण वाले, दावानल से रहित, सूने और घने वनों में,
श्लोक 11 (5.120.11)
चरन्ती हरिणैः सार्धं मृगीव वनचारिणी । चचार विपुलं धर्मं ब्रह्मचर्येण संवृतम् ॥
carantī hariṇaiḥ sārdhaṃ mṛgīva vanacāriṇī | cacāra vipulaṃ dharmaṃ brahmacaryeṇa saṃvṛtam
हरिणों के साथ वनवासिनी हिरणी की तरह विचरती हुई वह ब्रह्मचर्य से सुरक्षित विपुल धर्म का आचरण करती रही।
श्लोक 12 (5.120.12)
ययातिरपि पूर्वेषां राज्ञां वृत्तमनुष्ठितः । बहुवर्षसहस्रायुर्युयुजे कालधर्मणा ॥
yayātirapi pūrveṣāṃ rājñāṃ vṛttamanuṣṭhitaḥ | bahuvarṣasahasrāyuryuyuje kāladharmaṇā
ययाति भी पूर्ववर्ती राजाओं के आचरण का पालन करते हुए हज़ारों वर्षों की आयु के बाद मृत्यु को प्राप्त हुए।
श्लोक 13 (5.120.13)
पूरुर्यदुश्च द्वौ वंशे वर्धमानौ नरोत्तमौ । ताभ्यां प्रतिष्ठितो लोके परलोके च नाहुषः ॥
pūruryaduśca dvau vaṃśe vardhamānau narottamau | tābhyāṃ pratiṣṭhito loke paraloke ca nāhuṣaḥ
पूरु और यदु, ये दोनों नरश्रेष्ठ, उनके वंश में फलते-फूलते रहे; उन्हीं के द्वारा नहुषपुत्र ययाति इस लोक में और परलोक में प्रतिष्ठित हुए।
श्लोक 14 (5.120.14)
महीपते नरपतिर्ययातिः स्वर्गमास्थितः । महर्षिकल्पो नृपतिः स्वर्गाग्र्यफलभुग्विभुः ॥
mahīpate narapatiryayātiḥ svargamāsthitaḥ | maharṣikalpo nṛpatiḥ svargāgryaphalabhugvibhuḥ
हे महीपते, राजा ययाति स्वर्ग में रहने लगे; महर्षियों के समान वह प्रभावशाली नरेश स्वर्ग के श्रेष्ठतम फलों का भोग करते रहे।
श्लोक 15 (5.120.15)
बहुवर्षसहस्राख्ये काले बहुगुणे गते । राजर्षिषु निषण्णेषु महीयःसु महर्धिषु ॥
bahuvarṣasahasrākhye kāle bahuguṇe gate | rājarṣiṣu niṣaṇṇeṣu mahīyaḥsu mahardhiṣu
जब हज़ारों वर्षों का, अनेक सुखों से भरा, लंबा समय बीत गया और महान, समृद्धिशाली राजर्षि वहाँ विराजमान थे,
श्लोक 16 (5.120.16)
अवमेने नरान्सर्वान्देवानृषिगणांस्तथा । ययातिर्मूढविज्ञानो विस्मयाविष्टचेतनः ॥
avamene narānsarvāndevānṛṣigaṇāṃstathā | yayātirmūḍhavijñāno vismayāviṣṭacetanaḥ
तब मूढ़बुद्धि और अहंकार से भरे चित्त वाले ययाति ने सब मनुष्यों, देवताओं और ऋषिगणों का अपमान किया।
श्लोक 17 (5.120.17)
ततस्तं बुबुधे देवः शक्रो बलनिषूदनः । ते च राजर्षयः सर्वे धिग्धिगित्येवमब्रुवन् ॥
tatastaṃ bubudhe devaḥ śakro balaniṣūdanaḥ | te ca rājarṣayaḥ sarve dhigdhigityevamabruvan
तब बलासुर का वध करने वाले देवराज इन्द्र को इसका पता चल गया, और वे सब राजर्षि "धिक्कार है, धिक्कार है" कहने लगे।
श्लोक 18 (5.120.18)
विचारश्च समुत्पन्नो निरीक्ष्य नहुषात्मजम् । कोऽन्वयं कस्य वा राज्ञः कथं वा स्वर्गमागतः ॥
vicāraśca samutpanno nirīkṣya nahuṣātmajam | ko'nvayaṃ kasya vā rājñaḥ kathaṃ vā svargamāgataḥ
नहुषपुत्र को देखकर उनके मन में विचार उठा — "यह कौन है? किस राजा का पुत्र है? यह स्वर्ग में कैसे आ गया?
श्लोक 19 (5.120.19)
कर्मणा केन सिद्धोऽयं क्व वाऽनेन तपश्चितम् । कथं वा ज्ञायते स्वर्गे केन वा ज्ञायतेऽप्युत ॥
karmaṇā kena siddho'yaṃ kva vā'nena tapaścitam | kathaṃ vā jñāyate svarge kena vā jñāyate'pyuta
किस कर्म से इसने यह सिद्धि पाई? इसने कहाँ तप संचित किया? स्वर्ग में यह किस रूप में जाना जाता है, और वास्तव में इसे कौन जानता है?"
श्लोक 20 (5.120.20)
एवं विचारयन्तस्ते राजानं स्वर्गवासिनः । दृष्ट्वा पप्रच्छुरन्योन्यं ययातिं नृपतिं प्रति ॥
evaṃ vicārayantaste rājānaṃ svargavāsinaḥ | dṛṣṭvā papracchuranyonyaṃ yayātiṃ nṛpatiṃ prati
इस प्रकार विचार करते हुए स्वर्गवासियों ने राजा को देखकर आपस में राजा ययाति के विषय में पूछा।
श्लोक 21 (5.120.21)
विमानपालाः शतशः स्वर्गद्वाराभिरक्षिणः । पृष्टा आसनपालाश्च न जानीमेत्यथाऽब्रुवन् ॥
vimānapālāḥ śataśaḥ svargadvārābhirakṣiṇaḥ | pṛṣṭā āsanapālāśca na jānīmetyathā'bruvan
विमानों के सैकड़ों रक्षकों, स्वर्ग के द्वारपालों और आसनों के रक्षकों से पूछा गया, तो उन्होंने कहा — "हम इसे नहीं जानते।"
श्लोक 22 (5.120.22)
सर्वे ते ह्यावृतज्ञाना नाभ्यजानन्त तं नृपम् । स मुहूर्तादथ नृपो हतौजाश्चाभवत्तदा ॥
sarve te hyāvṛtajñānā nābhyajānanta taṃ nṛpam | sa muhūrtādatha nṛpo hataujāścābhavattadā
उन सबका ज्ञान ढँक गया था, इसलिए कोई भी उस राजा को पहचान न सका। और क्षणभर में वह राजा तेजहीन हो गए।