उद्योग पर्व · अध्याय 121
ययाति का पतन और माधवी का पुण्यदान
स्वर्ग में अपने आसन से विचलित होकर ययाति सोचते हैं कि किस पाप से उनका पतन हो रहा है; इन्द्र का एक दूत उन्हें बताता है कि अभिमान के कारण उनका स्वर्ग छिन गया है। सज्जनों के बीच गिरने की इच्छा करते हुए वे नैमिषारण्य में वाजपेय यज्ञ के धुएँ के सहारे चार राजाओं — प्रतर्दन, वसुमना, उशीनरपुत्र शिबि और अष्टक — के बीच आ गिरते हैं। वे उन्हें अपने यज्ञों का फल देना चाहते हैं, पर ययाति क्षत्रिय होने के नाते उसे लेने से मना कर देते हैं। तब माधवी आकर बताती है कि ये चारों उनके दौहित्र हैं और अपने पुण्य का आधा भाग उन्हें देती है; राजा अपने नाना से स्वर्ग पर चढ़ने को कहते हैं, और गालव भी आकर अपने तप का आठवाँ भाग अर्पित करते हैं।
नारद उवाच
श्लोक 1 (5.121.1)
अथ प्रचलितः स्थानादासनाच्च परिच्युतः । कम्पितेनेव मनसा धर्षितः शोकवह्निना ॥
atha pracalitaḥ sthānādāsanācca paricyutaḥ | kampiteneva manasā dharṣitaḥ śokavahninā
तब वह अपने स्थान से विचलित और आसन से च्युत हो गए; मानो काँपते हुए मन से वह शोक की अग्नि से पीड़ित हो उठे।
श्लोक 2 (5.121.2)
म्लानस्रग्भ्रष्टविज्ञानः प्रभ्रष्टमुकुटाङ्गदः । विघूर्णन्स्रस्तसर्वाङ्गः प्रभ्रष्टाभरणाम्बरः ॥
mlānasragbhraṣṭavijñānaḥ prabhraṣṭamukuṭāṅgadaḥ | vighūrṇansrastasarvāṅgaḥ prabhraṣṭābharaṇāmbaraḥ
उनकी माला कुम्हला गई, बुद्धि भ्रष्ट हो गई, मुकुट और बाजूबन्द गिर पड़े; वह लड़खड़ाने लगे, सारे अंग शिथिल हो गए और आभूषण तथा वस्त्र खिसक गए।
श्लोक 3 (5.121.3)
अदृश्यमानस्तान्पश्यन्नपश्यंश्च पुनः पुनः । शून्यः शून्येन मनसा प्रपतिष्यन्महीतलम् ॥
adṛśyamānastānpaśyannapaśyaṃśca punaḥ punaḥ | śūnyaḥ śūnyena manasā prapatiṣyanmahītalam
स्वयं अदृश्य होकर वह उन्हें बार-बार कभी देखते और कभी न देख पाते; शून्य होकर, शून्य मन से, वह पृथ्वीतल पर गिरने ही वाले थे।
श्लोक 4 (5.121.4)
किं मया मनसा ध्यातमशुभं धर्मदूषणम् । येनाहं चलितः स्थानादिति राजा व्यचिन्तयत् ॥
kiṃ mayā manasā dhyātamaśubhaṃ dharmadūṣaṇam | yenāhaṃ calitaḥ sthānāditi rājā vyacintayat
राजा ने सोचा — "मैंने मन में ऐसा कौन-सा अशुभ, धर्म को दूषित करने वाला विचार किया, जिससे मैं अपने स्थान से गिराया जा रहा हूँ?"
श्लोक 5 (5.121.5)
ते तु तत्रैव राजानः सिद्धाश्चाप्सरसस्तथा । अपश्यन्त निरालम्बं तं ययातिं परिच्युतम् ॥
te tu tatraiva rājānaḥ siddhāścāpsarasastathā | apaśyanta nirālambaṃ taṃ yayātiṃ paricyutam
वहाँ के राजाओं, सिद्धों और अप्सराओं ने उस ययाति को निराधार गिरते हुए देखा।
श्लोक 6 (5.121.6)
अथैत्य पुरुषः कश्चित्क्षीणपुण्यनिपातकः । ययातिमब्रवीद्राजन्देवराजस्य शासनात् ॥
athaitya puruṣaḥ kaścitkṣīṇapuṇyanipātakaḥ | yayātimabravīdrājandevarājasya śāsanāt
हे राजन्, तब पुण्य क्षीण हो जाने वालों को नीचे गिराने वाला एक पुरुष आया और देवराज की आज्ञा से ययाति से बोला —
इन्द्रदूत उवाच
श्लोक 7 (5.121.7)
अतीव मदमत्तस्त्वं न कंचिन्नावमन्यसे । मानेन भ्रष्टः स्वर्गस्ते नार्हस्त्वं पार्थिवात्मज ॥
atīva madamattastvaṃ na kaṃcinnāvamanyase | mānena bhraṣṭaḥ svargaste nārhastvaṃ pārthivātmaja
तुम अत्यन्त मद से मतवाले हो; ऐसा कोई नहीं जिसका तुम अपमान न करते हो। अभिमान के कारण तुम्हारा स्वर्ग छिन गया है; हे राजपुत्र, तुम इसके योग्य नहीं हो।
नारद उवाच
श्लोक 8 (5.121.8)
न च प्रज्ञायसे गच्छ पतस्वेति तमब्रवीत् । पतेयं सत्स्विति वचस्त्रिरुक्त्वा नहुषात्मजः ॥
na ca prajñāyase gaccha patasveti tamabravīt | pateyaṃ satsviti vacastriruktvā nahuṣātmajaḥ
"यहाँ तुम्हें कोई नहीं पहचानता। जाओ, गिरो!" — उसने उनसे कहा। नहुषपुत्र ने तीन बार कहा — "मैं सज्जनों के बीच गिरूँ,"
श्लोक 9 (5.121.9)
पतिष्यंश्चिन्तयामास गतिं गतिमतां वरः । एतस्मिन्नेव काले तु नैमिषे पार्थिवर्षभान् ॥
patiṣyaṃścintayāmāsa gatiṃ gatimatāṃ varaḥ | etasminneva kāle tu naimiṣe pārthivarṣabhān
और गिरते हुए, गति जानने वालों में श्रेष्ठ उन ययाति ने अपनी गति के विषय में विचार किया। उसी समय नैमिषारण्य में उन्होंने श्रेष्ठ राजाओं को देखा —
श्लोक 10 (5.121.10)
चतुरोऽपश्यत नृपस्तेषां मध्ये पपात ह । प्रतर्दनो वसुमनाः शिबिरौशीनरोऽष्टकः ॥
caturo'paśyata nṛpasteṣāṃ madhye papāta ha | pratardano vasumanāḥ śibirauśīnaro'ṣṭakaḥ
चार राजाओं को राजा ने देखा और वह उन्हीं के बीच गिर पड़े — प्रतर्दन, वसुमना, उशीनरपुत्र शिबि और अष्टक।
श्लोक 11 (5.121.11)
वाजपेयेन यज्ञेन तर्पयन्ति सुरेश्वरम् । तेषामध्वरजं धूमं स्वर्गद्वारमुपस्थितम् ॥
vājapeyena yajñena tarpayanti sureśvaram | teṣāmadhvarajaṃ dhūmaṃ svargadvāramupasthitam
वे वाजपेय यज्ञ द्वारा देवराज इन्द्र को तृप्त कर रहे थे। उनके यज्ञ से उठा धुआँ स्वर्ग के द्वार तक पहुँचा हुआ था;
श्लोक 12 (5.121.12)
ययातिरुपजिघ्रन्वै निपपात महीं प्रति । भूमौ स्वर्गे च संबद्धां नदीं धूममयीमिव । गङ्गां गामिव गच्छन्तीमालम्ब्य जगतीपतिः ॥
yayātirupajighranvai nipapāta mahīṃ prati | bhūmau svarge ca saṃbaddhāṃ nadīṃ dhūmamayīmiva | gaṅgāṃ gāmiva gacchantīmālambya jagatīpatiḥ
उसे सूँघते हुए ययाति पृथ्वी की ओर गिरे। पृथ्वी और स्वर्ग को जोड़ने वाली, धुएँ की नदी-सी उस धारा को, जो पृथ्वी पर उतरती गंगा के समान थी, पकड़कर वह जगत्पति नीचे आए।
श्लोक 13 (5.121.13)
श्रीमत्स्ववभृथाग्र्येषु चतुर्षु प्रतिबन्धुषु । मध्ये निपतितो राजा लोकपालोपमेषु सः ॥
śrīmatsvavabhṛthāgryeṣu caturṣu pratibandhuṣu | madhye nipatito rājā lokapālopameṣu saḥ
श्रेष्ठ यज्ञ के अवभृथ-स्नान से शोभायमान, लोकपालों के समान उन चार बन्धुओं के बीच वह राजा आ गिरे।
श्लोक 14 (5.121.14)
चतुर्षु हुतकल्पेषु राजसिंहमहाग्निषु । पपात मध्ये राजर्षिर्ययातिः पुण्यसङ्क्षये ॥
caturṣu hutakalpeṣu rājasiṃhamahāgniṣu | papāta madhye rājarṣiryayātiḥ puṇyasaṅkṣaye
आहुतियों से प्रज्वलित महाग्नियों के समान उन चार सिंह-सरीखे राजाओं के बीच, पुण्य क्षीण होने पर राजर्षि ययाति गिरे।
श्लोक 15 (5.121.15)
तमाहुः पार्थिवाः सर्वे दीप्यमानमिव श्रिया । को भवान्कस्य वा बन्धुर्देशस्य नगरस्य वा ॥
tamāhuḥ pārthivāḥ sarve dīpyamānamiva śriyā | ko bhavānkasya vā bandhurdeśasya nagarasya vā
तेज से मानो दमकते हुए उनसे सब राजाओं ने कहा — "आप कौन हैं? किसके बन्धु हैं? किस देश या नगर के हैं?"
राजान ऊचुः
श्लोक 16 (5.121.16)
यक्षो वाऽप्यथवा देवो गन्धर्वो राक्षसोऽपि वा । न हि मानुषरूपोसि कोवार्थः काङ्क्ष्यते त्वया ॥
yakṣo vā'pyathavā devo gandharvo rākṣaso'pi vā | na hi mānuṣarūposi kovārthaḥ kāṅkṣyate tvayā
आप यक्ष हैं, या देवता, गन्धर्व या राक्षस? क्योंकि आपका रूप मनुष्य जैसा नहीं है। आप क्या चाहते हैं?
ययातिरुवाच
श्लोक 17 (5.121.17)
ययातिरस्मि राजर्षिः क्षीणपुण्यश्च्युतो दिवः । पतेयं सत्स्विति ध्यायन्भवत्सु पतितस्ततः ॥
yayātirasmi rājarṣiḥ kṣīṇapuṇyaścyuto divaḥ | pateyaṃ satsviti dhyāyanbhavatsu patitastataḥ
मैं राजर्षि ययाति हूँ; पुण्य क्षीण हो जाने से स्वर्ग से गिरा हूँ। "मैं सज्जनों के बीच गिरूँ" — यह सोचते हुए मैं आप लोगों के बीच आ गिरा हूँ।
राजान ऊचुः
श्लोक 18 (5.121.18)
सत्यमेतद्भवतु ते काङ्क्षितं पुरुषर्षभ । सर्वेषां नः क्रतुफलं धर्मश्च प्रतिगृह्यताम् ॥
satyametadbhavatu te kāṅkṣitaṃ puruṣarṣabha | sarveṣāṃ naḥ kratuphalaṃ dharmaśca pratigṛhyatām
हे पुरुषश्रेष्ठ, आपकी यह इच्छा पूरी हो। हम सबके यज्ञों का फल और धर्म आप स्वीकार करें।
ययातिरुवाच
श्लोक 19 (5.121.19)
नाहं प्रतिग्रहधनो ब्राह्मणः क्षत्रियो ह्यहम् । न च मे प्रवणा बुद्धिः परपुण्यविनाशने ॥
nāhaṃ pratigrahadhano brāhmaṇaḥ kṣatriyo hyaham | na ca me pravaṇā buddhiḥ parapuṇyavināśane
मैं दान लेकर जीने वाला ब्राह्मण नहीं हूँ, मैं क्षत्रिय हूँ। दूसरों के पुण्य को नष्ट करने की ओर मेरी बुद्धि नहीं झुकती।
नारद उवाच
श्लोक 20 (5.121.20)
एतस्मिन्नेव काले तु मृगचर्याक्रमागताम् । माधवीं प्रेक्ष्य राजानस्तेऽभिवाद्येदमब्रुवन् ॥
etasminneva kāle tu mṛgacaryākramāgatām | mādhavīṃ prekṣya rājānaste'bhivādyedamabruvan
उसी समय मृगचर्या करती हुई माधवी वहाँ आ पहुँची। उसे देखकर राजाओं ने प्रणाम करके कहा —
राजान ऊचुः
श्लोक 21 (5.121.21)
किमागमनकृत्यं ते किं कुर्मः शासनं तव । आज्ञाप्या हि वयं सर्वे तव पुत्रास्तपोधने ॥
kimāgamanakṛtyaṃ te kiṃ kurmaḥ śāsanaṃ tava | ājñāpyā hi vayaṃ sarve tava putrāstapodhane
आपके आने का क्या प्रयोजन है? हम आपकी कौन-सी आज्ञा पूरी करें? हे तपस्विनी, हम सब आपके पुत्र हैं और आपकी आज्ञा के अधीन हैं।
नारद उवाच
श्लोक 22 (5.121.22)
तेषां तद्भाषितं श्रुत्वा माधवी परया मुदा । पितरं समुपागच्छद्ययातिं सा ववन्द च ॥
teṣāṃ tadbhāṣitaṃ śrutvā mādhavī parayā mudā | pitaraṃ samupāgacchadyayātiṃ sā vavanda ca
उनकी बात सुनकर माधवी अत्यन्त प्रसन्नता से अपने पिता ययाति के पास गई और उन्हें प्रणाम किया।
श्लोक 23 (5.121.23)
स्पृष्ट्वा मूर्धनि तान्पुत्रांस्तापसी वाक्यमब्रवीत् । दौहित्रास्तव राजेन्द्र मम पुत्रा न ते पराः ॥
spṛṣṭvā mūrdhani tānputrāṃstāpasī vākyamabravīt | dauhitrāstava rājendra mama putrā na te parāḥ
अपने पुत्रों के सिर का स्पर्श करके उस तपस्विनी ने कहा — "हे राजेन्द्र, ये आपके दौहित्र हैं, मेरे पुत्र हैं; आपके लिए पराये नहीं हैं।"
माधव्युवाच
श्लोक 24 (5.121.24)
इमे त्वां तारयिष्यन्ति दिष्टमेतत्पुरातनम् । अहं ते दुहिता राजन्माधवी मृगचारिणी ॥
ime tvāṃ tārayiṣyanti diṣṭametatpurātanam | ahaṃ te duhitā rājanmādhavī mṛgacāriṇī
ये आपका उद्धार करेंगे; यह पहले से ही विधाता का विधान है। हे राजन्, मैं आपकी पुत्री माधवी हूँ, जो मृगों के साथ विचरती है।
श्लोक 25 (5.121.25)
मयाऽप्युपचितो धर्मस्ततोऽर्धं प्रतिगृह्यताम् । यस्माद्राजन्नराः सर्वे अपत्यफलभागिनः ॥
mayā'pyupacito dharmastato'rdhaṃ pratigṛhyatām | yasmādrājannarāḥ sarve apatyaphalabhāginaḥ
मैंने भी धर्म संचित किया है; उसका आधा भाग आप स्वीकार करें। हे राजन्, क्योंकि सभी मनुष्य संतान के फल के भागी होते हैं,
श्लोक 26 (5.121.26)
तस्मादिच्छन्ति दौहित्रान्यथा त्वं वसुधाधिप ॥
tasmādicchanti dauhitrānyathā tvaṃ vasudhādhipa
इसीलिए वे दौहित्रों की कामना करते हैं, जैसे आपने की थी, हे वसुधाधिप।
नारद उवाच
श्लोक 27 (5.121.27)
ततस्ते पार्थिवाः सर्वे शिरसा जननीं तदा ॥
tataste pārthivāḥ sarve śirasā jananīṃ tadā
तब उन सब राजाओं ने सिर झुकाकर अपनी माता को
श्लोक 28 (5.121.28)
अभिवाद्य नमस्कृत्य मातामहमथाब्रुवन् । उच्चैरनुपमैः स्निग्धैः स्वरैरापूर्य मेदिनीम् । मातामहं नृपतयस्तारयन्तो दिवश्च्युतम् ॥
abhivādya namaskṛtya mātāmahamathābruvan | uccairanupamaiḥ snigdhaiḥ svarairāpūrya medinīm | mātāmahaṃ nṛpatayastārayanto divaścyutam
प्रणाम और नमस्कार किया, फिर अपने नाना से बोले। ऊँचे, अनुपम और स्नेहभरे स्वरों से पृथ्वी को गुँजाते हुए उन राजाओं ने स्वर्ग से गिरे अपने नाना का उद्धार करते हुए कहा —
राजान ऊचुः
श्लोक 29 (5.121.29)
राजधर्मगुणोपेताः सत्यधर्मगुणान्विताः । दौहित्रास्ते वयं राजन्दिवमारोह पार्थिव ॥
rājadharmaguṇopetāḥ satyadharmaguṇānvitāḥ | dauhitrāste vayaṃ rājandivamāroha pārthiva
हे राजन्, हम राजधर्म के गुणों से युक्त और सत्य तथा धर्म के गुणों से सम्पन्न आपके दौहित्र हैं। हे पृथ्वीपति, आप स्वर्ग पर आरोहण करें।
नारद उवाच
श्लोक 30 (5.121.30)
अथाकस्मादुपगतो गालवोऽप्याह पार्थिवम् । तपसो मेऽष्टभागेन स्वर्गमारोहतां भवान् ॥
athākasmādupagato gālavo'pyāha pārthivam | tapaso me'ṣṭabhāgena svargamārohatāṃ bhavān
तब अचानक गालव भी वहाँ आ पहुँचे और राजा से बोले — "मेरे तप के आठवें भाग से आप स्वर्ग पर आरोहण करें।"