Skip to main content

उद्योग पर्व · अध्याय 122

दौहित्रों द्वारा ययाति का स्वर्गारोहण

सज्जन राजाओं द्वारा पहचाने जाते ही ययाति दिव्य रूप धारण कर, व्यथा से मुक्त होकर पृथ्वी से ऊपर उठने लगते हैं। उनके दौहित्र एक-एक करके उन्हें अपना पुण्य अर्पित करते हैं: वसुमना अपने दान, क्षमा और अग्न्याधान का फल; प्रतर्दन अपने क्षत्रिय जीवन का यश और वीरता; उशीनरपुत्र शिबि अपनी अटूट सत्यनिष्ठा का बल; और अष्टक अपने सैकड़ों यज्ञों का फल। जैसे-जैसे वे बोलते जाते हैं, ययाति पृथ्वी से ऊपर उठते जाते हैं, और अंततः चारों दौहित्र अपने नाना को फिर स्वर्ग पहुँचा देते हैं।

अध्याय 121अध्याय-सूचीअध्याय 123

नारद उवाच

श्लोक 1 (5.122.1)

प्रत्यभिज्ञातमात्रोऽथ सद्भिस्तैर्नरपुङ्गवः । समारुरोह नृपतिरस्पृशन्वसुधातलम् । ययातिर्दिव्यसंस्थानो बभूव विगतज्वरः ॥

pratyabhijñātamātro'tha sadbhistairnarapuṅgavaḥ | samāruroha nṛpatiraspṛśanvasudhātalam | yayātirdivyasaṃsthāno babhūva vigatajvaraḥ

उन सज्जनों द्वारा पहचाने जाते ही वह नरश्रेष्ठ राजा पृथ्वीतल को छुए बिना ऊपर उठने लगे; ययाति ने दिव्य रूप धारण किया और उनकी व्यथा दूर हो गई।

श्लोक 2 (5.122.2)

दिव्यमाल्याम्बरधरो दिव्याभरणभूषितः । दिव्यगन्धगुणोपेतो न पृथ्वीमस्पृशत्पदा ॥

divyamālyāmbaradharo divyābharaṇabhūṣitaḥ | divyagandhaguṇopeto na pṛthvīmaspṛśatpadā

दिव्य माला और वस्त्र धारण किए, दिव्य आभूषणों से विभूषित और दिव्य सुगन्ध से युक्त वह अपने पैरों से पृथ्वी को नहीं छू रहे थे।

श्लोक 3 (5.122.3)

ततो वसुमनाः पूर्वमुच्चैरुच्चारयन्वचः । ख्यातो दानपतिर्लोके व्याजहार नृपं तदा ॥

tato vasumanāḥ pūrvamuccairuccārayanvacaḥ | khyāto dānapatirloke vyājahāra nṛpaṃ tadā

तब संसार में दानपति के रूप में विख्यात वसुमना ने सबसे पहले ऊँचे स्वर में राजा से कहा —

वसुमना उवाच

श्लोक 4 (5.122.4)

प्राप्तवानस्मि यल्लोके सर्ववर्णेष्वगर्हया । तदप्यथ च दास्यामि तेन संयुज्यतां भवान् ॥

prāptavānasmi yalloke sarvavarṇeṣvagarhayā | tadapyatha ca dāsyāmi tena saṃyujyatāṃ bhavān

सब वर्णों में निन्दा से रहित रहकर मैंने संसार में जो कुछ पाया है, वह भी मैं अब देता हूँ; वह आपको प्राप्त हो।

श्लोक 5 (5.122.5)

यत्फलं दानशीलस्य क्षमाशीलस्य यत्फलम् । यच्च मे फलमाधाने तेन संयुज्यतां भवान् ॥

yatphalaṃ dānaśīlasya kṣamāśīlasya yatphalam | yacca me phalamādhāne tena saṃyujyatāṃ bhavān

दानशील का जो फल है, क्षमाशील का जो फल है, और अग्न्याधान से मुझे जो फल मिला है — वह आपको प्राप्त हो।

नारद उवाच

श्लोक 6 (5.122.6)

ततः प्रतर्दनोऽप्याह वाक्यं क्षत्रियपुङ्गवः । यथा धर्मरतिर्नित्यं नित्यं युद्धपरायणः ॥

tataḥ pratardano'pyāha vākyaṃ kṣatriyapuṅgavaḥ | yathā dharmaratirnityaṃ nityaṃ yuddhaparāyaṇaḥ

तब क्षत्रियश्रेष्ठ प्रतर्दन ने भी कहा — "जैसे मैं सदा धर्म में रत और सदा युद्ध में तत्पर रहा हूँ,"

प्रतर्दन उवाच

श्लोक 7 (5.122.7)

प्राप्तवानस्मि यल्लोके क्षत्रवंशोद्भवं यशः । वीरशब्दफलं चैव तेन संयुज्यतां भवान् । यथा धर्मे रतिर्नित्यं तेन सत्येन खं व्रज ॥

prāptavānasmi yalloke kṣatravaṃśodbhavaṃ yaśaḥ | vīraśabdaphalaṃ caiva tena saṃyujyatāṃ bhavān | yathā dharme ratirnityaṃ tena satyena khaṃ vraja

क्षत्रिय वंश में उत्पन्न जो यश मैंने संसार में पाया है और वीर कहलाने का जो फल है, वह आपको प्राप्त हो। जैसे धर्म में मेरी सदा प्रीति रही है, उस सत्य के बल से आप स्वर्ग जाएँ।

नारद उवाच

श्लोक 8 (5.122.8)

शिबिरौशीनरो धीमानुवाच मधुरां गिरम् । यथा बालेषु नारीषु वैवाह्येषु तथैव च ॥

śibirauśīnaro dhīmānuvāca madhurāṃ giram | yathā bāleṣu nārīṣu vaivāhyeṣu tathaiva ca

बुद्धिमान उशीनरपुत्र शिबि ने मधुर वाणी में कहा — "जैसे बालकों, स्त्रियों और विवाह-सम्बन्धियों के प्रति,"

शिबिरुवाच

श्लोक 9 (5.122.9)

सङ्गरेषु निपातेषु तथापद्व्यसनेषु च । अनृतं नोक्तपूर्वं मे तेन सत्येन खं व्रज ॥

saṅgareṣu nipāteṣu tathāpadvyasaneṣu ca | anṛtaṃ noktapūrvaṃ me tena satyena khaṃ vraja

युद्धों में, विपत्तियों में, आपदाओं और संकटों में मैंने पहले कभी असत्य नहीं बोला — उस सत्य के बल से आप स्वर्ग जाएँ।

श्लोक 10 (5.122.10)

यथा प्राणांश्च राज्यं च राजन्कामसुखानि च । त्यजेयं न पुनः सत्यं तेन सत्येन खं व्रज ॥

yathā prāṇāṃśca rājyaṃ ca rājankāmasukhāni ca | tyajeyaṃ na punaḥ satyaṃ tena satyena khaṃ vraja

जैसे मैं प्राण, राज्य और काम-सुख तक त्याग दूँ, पर सत्य को कभी न छोड़ूँ — हे राजन्, उस सत्य के बल से आप स्वर्ग जाएँ।

श्लोक 11 (5.122.11)

यथा सत्येन मे धर्मो यथा सत्येन पावकः । प्रीतः शतक्रतुश्चैव तेन सत्येन खं व्रज ॥

yathā satyena me dharmo yathā satyena pāvakaḥ | prītaḥ śatakratuścaiva tena satyena khaṃ vraja

जैसे मेरे सत्य से धर्म प्रसन्न हैं, जैसे मेरे सत्य से अग्नि प्रसन्न हैं और शतक्रतु इन्द्र भी — उस सत्य के बल से आप स्वर्ग जाएँ।

नारद उवाच

श्लोक 12 (5.122.12)

अष्टकस्त्वथ राजर्षिः कौशिको माधवीसुतः । अनेकशतयज्वानं नाहुषं प्राह धर्मवित् ॥

aṣṭakastvatha rājarṣiḥ kauśiko mādhavīsutaḥ | anekaśatayajvānaṃ nāhuṣaṃ prāha dharmavit

तब धर्म के ज्ञाता, कौशिकवंशी राजर्षि अष्टक ने, जो माधवी के पुत्र थे, सैकड़ों यज्ञ करने वाले नहुषपुत्र ययाति से कहा —

अष्टक उवाच

श्लोक 13 (5.122.13)

शतशः पुण्डरीका मे गोसवाश्चरिताः प्रभो । क्रतवो वाजपेयाश्च तेषां फलमवाप्नुहि ॥

śataśaḥ puṇḍarīkā me gosavāścaritāḥ prabho | kratavo vājapeyāśca teṣāṃ phalamavāpnuhi

हे प्रभो, मैंने सैकड़ों पुण्डरीक और गोसव यज्ञ तथा वाजपेय यज्ञ किए हैं; आप उनका फल प्राप्त करें।

श्लोक 14 (5.122.14)

न मे रत्नानि न धनं न तथाऽन्ये परिच्छदाः । क्रतुष्वनुपयुक्तानि तेन सत्येन खं व्रज ॥

na me ratnāni na dhanaṃ na tathā'nye paricchadāḥ | kratuṣvanupayuktāni tena satyena khaṃ vraja

मेरे पास कोई रत्न, धन या अन्य सामग्री ऐसी नहीं जो यज्ञों में न लगाई गई हो — उस सत्य के बल से आप स्वर्ग जाएँ।

नारद उवाच

श्लोक 15 (5.122.15)

यथायथा हि जल्पन्ति दौहित्रास्तं नराधिपम् । तथातथा वसुमतीं त्यक्त्वा राजा दिवं ययौ ॥

yathāyathā hi jalpanti dauhitrāstaṃ narādhipam | tathātathā vasumatīṃ tyaktvā rājā divaṃ yayau

जैसे-जैसे दौहित्र उस नरेश से कहते जाते, वैसे-वैसे राजा पृथ्वी को छोड़कर स्वर्ग की ओर बढ़ते गए।

श्लोक 16 (5.122.16)

एवं सर्वे समस्तैस्ते राजानः सुकृतैस्तदा । ययातिं स्वर्गतो भ्रष्टं तारयामासुरञ्जसा ॥

evaṃ sarve samastaiste rājānaḥ sukṛtaistadā | yayātiṃ svargato bhraṣṭaṃ tārayāmāsurañjasā

इस प्रकार उन सब राजाओं ने अपने समस्त पुण्यकर्मों से स्वर्ग से गिरे ययाति का शीघ्र ही उद्धार कर दिया।

श्लोक 17 (5.122.17)

दौहित्राः स्वेन धर्मेण यज्ञदानकृतेन वै । चतुर्षु राजवंशेषु संभूताः कुलवर्धनाः । मातामहं महाप्राज्ञं दिवमारोपयन्त ते ॥

dauhitrāḥ svena dharmeṇa yajñadānakṛtena vai | caturṣu rājavaṃśeṣu saṃbhūtāḥ kulavardhanāḥ | mātāmahaṃ mahāprājñaṃ divamāropayanta te

चार राजवंशों में उत्पन्न, कुल की वृद्धि करने वाले उन दौहित्रों ने यज्ञ और दान से अर्जित अपने धर्म द्वारा अपने महाबुद्धिमान नाना को स्वर्ग पर चढ़ा दिया।

राजान ऊचुः

श्लोक 18 (5.122.18)

राजधर्मगुणोपेताः सर्वधर्मगुणान्विताः । दौहित्रास्ते वयं राजन्दिवमारोह पार्थिव ॥

rājadharmaguṇopetāḥ sarvadharmaguṇānvitāḥ | dauhitrāste vayaṃ rājandivamāroha pārthiva

हे राजन्, हम राजधर्म के गुणों से युक्त और सब धर्मों के गुणों से सम्पन्न आपके दौहित्र हैं। हे पृथ्वीपति, आप स्वर्ग पर आरोहण करें।

अध्याय 121अध्याय-सूचीअध्याय 123