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उद्योग पर्व · अध्याय 123

ब्रह्मा द्वारा ययाति के पतन का कारण और दुर्योधन को नारद का उपदेश

दौहित्रों द्वारा उठाए गए ययाति पुष्पवर्षा, संगीत और स्तुतियों के बीच स्वर्ग लौटते हैं, और ब्रह्मा उन्हें बताते हैं कि उन्होंने फिर से अक्षय लोक पा लिया है। जब ययाति पूछते हैं कि हज़ारों वर्षों में संचित पुण्य इतनी जल्दी कैसे नष्ट हो गया, तो ब्रह्मा उत्तर देते हैं कि केवल अभिमान ने उसे नष्ट किया, क्योंकि अभिमान, बल, हिंसा या छल से कोई लोक शाश्वत नहीं होता। नारद कथा को दुर्योधन के लिए शिक्षा के साथ समाप्त करते हैं: ययाति अभिमान से गिरे और गालव ने हठ से कष्ट पाया; इसलिए उसे हितैषियों की बात माननी चाहिए, अभिमान और क्रोध छोड़ना चाहिए और पाण्डवों से सन्धि कर लेनी चाहिए।

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नारद उवाच

श्लोक 1 (5.123.1)

सद्भिरारोपितः स्वर्गं पार्थिवैर्भूरिदक्षिणैः । अभ्यनुज्ञाय दौहित्रान्ययातिर्दिवमास्थितः ॥

sadbhirāropitaḥ svargaṃ pārthivairbhūridakṣiṇaiḥ | abhyanujñāya dauhitrānyayātirdivamāsthitaḥ

उदार दक्षिणा देने वाले उन सज्जन राजाओं द्वारा स्वर्ग पर चढ़ाए गए ययाति ने अपने दौहित्रों से विदा ली और स्वर्ग में स्थित हो गए।

श्लोक 2 (5.123.2)

अभिवृष्टश्च वर्षेण नानापुष्पसुगन्धिना । परिष्वक्तश्च पुण्येन वायुना पुण्यगन्धिना ॥

abhivṛṣṭaśca varṣeṇa nānāpuṣpasugandhinā | pariṣvaktaśca puṇyena vāyunā puṇyagandhinā

अनेक प्रकार के फूलों की सुगन्ध से भरी वर्षा उन पर हुई और पवित्र, सुगन्धित वायु ने उनका आलिंगन किया।

श्लोक 3 (5.123.3)

अचलं स्थानमासाद्य दौहित्रफलनिर्जितम् । कर्मभिः स्वैरुपचितो जज्वाल परया श्रिया ॥

acalaṃ sthānamāsādya dauhitraphalanirjitam | karmabhiḥ svairupacito jajvāla parayā śriyā

दौहित्रों के पुण्यफल से जीते गए अटल स्थान को पाकर और अपने कर्मों से समृद्ध होकर वह परम शोभा से दीप्त हो उठे।

श्लोक 4 (5.123.4)

उपगीतोपनृत्तश्च गन्धर्वाप्सरसां गणैः । प्रीत्या प्रतिगृहीतश्च स्वर्गे दुन्दुभिनिःस्वनैः ॥

upagītopanṛttaśca gandharvāpsarasāṃ gaṇaiḥ | prītyā pratigṛhītaśca svarge dundubhiniḥsvanaiḥ

गन्धर्वों और अप्सराओं के समूहों ने उनके लिए गान और नृत्य किया, और दुन्दुभियों के नाद के बीच स्वर्ग में प्रेम से उनका स्वागत हुआ।

श्लोक 5 (5.123.5)

अभिष्टुतश्च विविधैर्देवराजर्षिचारणैः । अर्चितश्चोत्तमार्घेण दैवतैरभिनन्दितः ॥

abhiṣṭutaśca vividhairdevarājarṣicāraṇaiḥ | arcitaścottamārgheṇa daivatairabhinanditaḥ

अनेक देवताओं, राजर्षियों और चारणों ने उनकी स्तुति की, उत्तम अर्घ्य से उनका पूजन हुआ और देवताओं ने उनका अभिनन्दन किया।

श्लोक 6 (5.123.6)

प्राप्तः स्वर्गफलं चैव तमुवाच पितामहः । निर्वृतं शान्तमनसं वचोभिस्तर्पयन्निव ॥

prāptaḥ svargaphalaṃ caiva tamuvāca pitāmahaḥ | nirvṛtaṃ śāntamanasaṃ vacobhistarpayanniva

जब वह स्वर्ग का फल पा चुके और उनका मन शान्त और संतुष्ट था, तब पितामह ब्रह्मा ने मानो अपने वचनों से उन्हें तृप्त करते हुए कहा —

पितामह उवाच

श्लोक 7 (5.123.7)

चतुष्पादस्त्वया धर्मश्चितो लोक्येन कर्मणा । अक्षयस्तव लोकोऽयं कीर्तिश्चैवाक्षया दिवि ॥

catuṣpādastvayā dharmaścito lokyena karmaṇā | akṣayastava loko'yaṃ kīrtiścaivākṣayā divi

तुमने लोकों को जीतने वाले कर्मों से चारों चरणों वाले धर्म का संचय किया था। तुम्हारा यह लोक अक्षय है और स्वर्ग में तुम्हारी कीर्ति भी अक्षय है।

श्लोक 8 (5.123.8)

पुनस्त्वयैव राजर्षे स्वकृतेन विघातितम् । आवृतं तमसा चेतः सर्वेषां स्वर्गवासिनाम् ॥

punastvayaiva rājarṣe svakṛtena vighātitam | āvṛtaṃ tamasā cetaḥ sarveṣāṃ svargavāsinām

किन्तु हे राजर्षि, फिर तुमने ही अपने किए से उसे नष्ट कर दिया; सब स्वर्गवासियों का चित्त अन्धकार से ढँक गया,

श्लोक 9 (5.123.9)

येन त्वां नाभिजानन्ति ततोऽज्ञातोसि पातितः । प्रीत्यैव चासि दौहित्रैस्तारितस्त्वमिहागतः ॥

yena tvāṃ nābhijānanti tato'jñātosi pātitaḥ | prītyaiva cāsi dauhitraistāritastvamihāgataḥ

जिससे उन्होंने तुम्हें नहीं पहचाना; इसीलिए अपरिचित होकर तुम गिराए गए। फिर प्रेमवश ही दौहित्रों ने तुम्हारा उद्धार किया और तुम यहाँ आए हो।

श्लोक 10 (5.123.10)

स्थानं च प्रतिपन्नोऽसि कर्मणा स्वेन निर्जितम् । अचलं शाश्वतं पुण्यमुत्तमं ध्रुवमव्ययम् ॥

sthānaṃ ca pratipanno'si karmaṇā svena nirjitam | acalaṃ śāśvataṃ puṇyamuttamaṃ dhruvamavyayam

और तुमने अपने कर्म से जीता हुआ वह स्थान पा लिया है जो अटल, शाश्वत, पवित्र, उत्तम, ध्रुव और अविनाशी है।

ययातिरुवाच

श्लोक 11 (5.123.11)

भगवन्संशयो मेऽस्ति कश्चित्तं छेत्तुमर्हसि । न ह्यन्यमहमर्हामि प्रष्टुं लोकपितामह ॥

bhagavansaṃśayo me'sti kaścittaṃ chettumarhasi | na hyanyamahamarhāmi praṣṭuṃ lokapitāmaha

भगवन्, मेरे मन में एक संशय है; आप उसे दूर करें। हे लोकपितामह, मैं किसी और से यह नहीं पूछ सकता।

श्लोक 12 (5.123.12)

बहुवर्षसहस्रान्तं प्रजापालनवर्धितम् । अनेकक्रतुदानौघैरर्जितं मे महत्फलम् ॥

bahuvarṣasahasrāntaṃ prajāpālanavardhitam | anekakratudānaughairarjitaṃ me mahatphalam

हज़ारों वर्षों तक प्रजापालन से बढ़ा हुआ और अनेक यज्ञों तथा दानों के प्रवाह से अर्जित मेरा जो महान फल था —

श्लोक 13 (5.123.13)

कथं तदल्पकालेन क्षीणं येनास्मि पातितः । भगवन्वेत्थ लोकांश्च शाश्वतान्मम निर्मितान् । कथं नु मम तत्सर्वं विप्रनष्टं महाद्युते ॥

kathaṃ tadalpakālena kṣīṇaṃ yenāsmi pātitaḥ | bhagavanvettha lokāṃśca śāśvatānmama nirmitān | kathaṃ nu mama tatsarvaṃ vipranaṣṭaṃ mahādyute

वह इतने थोड़े समय में कैसे क्षीण हो गया कि मुझे गिरा दिया गया? भगवन्, आप मेरे द्वारा रचे गए शाश्वत लोकों को जानते हैं। हे महातेजस्वी, फिर मेरा वह सब कैसे नष्ट हो गया?

पितामह उवाच

श्लोक 14 (5.123.14)

बहुवर्षसहस्रान्तं प्रजापालनवर्धितम् । अनेकक्रतुदानौघैर्यत्त्वयोपार्जितं फलम् ॥

bahuvarṣasahasrāntaṃ prajāpālanavardhitam | anekakratudānaughairyattvayopārjitaṃ phalam

हज़ारों वर्षों के प्रजापालन से बढ़ा और अनेक यज्ञों तथा दानों के प्रवाह से जो फल तुमने अर्जित किया था —

श्लोक 15 (5.123.15)

तदनेनैव दोषेण क्षीणं येनासि पातितः । अभिमानेन राजेन्द्र धिक्कृतः स्वर्गवासिभिः ॥

tadanenaiva doṣeṇa kṣīṇaṃ yenāsi pātitaḥ | abhimānena rājendra dhikkṛtaḥ svargavāsibhiḥ

वह इसी एक दोष से क्षीण हुआ जिससे तुम गिराए गए — हे राजेन्द्र, अभिमान से; इसी के कारण स्वर्गवासियों ने तुम्हें धिक्कारा।

श्लोक 16 (5.123.16)

नायं मानेन राजर्षे न बलेन न हिंसया । न शाठ्येन न मायाभिर्लोको भवति शाश्वतः ॥

nāyaṃ mānena rājarṣe na balena na hiṃsayā | na śāṭhyena na māyābhirloko bhavati śāśvataḥ

हे राजर्षि, यह लोक न अभिमान से, न बल से, न हिंसा से, न शठता से और न छल-कपट से शाश्वत होता है।

श्लोक 17 (5.123.17)

नावमान्यास्त्वया राजन्नधमोत्कृष्टमध्यमाः । न हि मानप्रदग्धानां कश्चिदस्ति शमः क्वचित् ॥

nāvamānyāstvayā rājannadhamotkṛṣṭamadhyamāḥ | na hi mānapradagdhānāṃ kaścidasti śamaḥ kvacit

हे राजन्, तुम्हें अधम, उत्तम या मध्यम किसी का भी अपमान नहीं करना चाहिए। अभिमान से जले हुए लोगों को कहीं भी शान्ति नहीं मिलती।

श्लोक 18 (5.123.18)

पतनारोहणमिदं कथयिष्यन्ति ये नराः । विषमाण्यपि ते प्राप्तास्तरिष्यन्ति न संशयः ॥

patanārohaṇamidaṃ kathayiṣyanti ye narāḥ | viṣamāṇyapi te prāptāstariṣyanti na saṃśayaḥ

जो मनुष्य इस पतन और पुनः आरोहण की कथा कहेंगे, वे कठिन संकटों में पड़कर भी उनसे पार हो जाएँगे, इसमें संशय नहीं।

नारद उवाच

श्लोक 19 (5.123.19)

एष दोषोऽभिमानेन पुरा प्राप्तो ययातिना । निर्बध्नताऽतिमात्रं च गालवेन महीपते ॥

eṣa doṣo'bhimānena purā prāpto yayātinā | nirbadhnatā'timātraṃ ca gālavena mahīpate

हे महीपते, प्राचीन काल में अभिमान के कारण ययाति पर और अत्यधिक हठ के कारण गालव पर यह विपत्ति आई थी।

श्लोक 20 (5.123.20)

श्रोतव्यं हितकामानां सुहृदां हितमिच्छताम् । न कर्तव्यो हि निर्बन्धो निर्बन्धो हि क्षयोदयः ॥

śrotavyaṃ hitakāmānāṃ suhṛdāṃ hitamicchatām | na kartavyo hi nirbandho nirbandho hi kṣayodayaḥ

हित चाहने वाले, कल्याण के इच्छुक मित्रों की बात सुननी चाहिए। हठ नहीं करना चाहिए, क्योंकि हठ से विनाश उत्पन्न होता है।

श्लोक 21 (5.123.21)

तस्मात्त्वमपि गान्धारे मानं क्रोधं च वर्जय । सन्धत्स्व पाण्डवैर्वीर संरम्भं त्यज पार्थिव ॥

tasmāttvamapi gāndhāre mānaṃ krodhaṃ ca varjaya | sandhatsva pāṇḍavairvīra saṃrambhaṃ tyaja pārthiva

इसलिए हे गान्धारीनन्दन, तुम भी अभिमान और क्रोध को त्याग दो। हे वीर, पाण्डवों से सन्धि कर लो; हे राजन्, यह आवेश छोड़ दो।

श्लोक 22 (5.123.22)

स भवान्सुहृदां पथ्यं वचो गृह्णातु माऽनृतम् । समर्थैर्विग्रहं कृत्वा विषमस्थो भविष्यसि ॥

sa bhavānsuhṛdāṃ pathyaṃ vaco gṛhṇātu mā'nṛtam | samarthairvigrahaṃ kṛtvā viṣamastho bhaviṣyasi

अतः आप मित्रों के इस हितकारी और सच्चे वचन को स्वीकार करें। समर्थ लोगों से विग्रह करके आप संकट में पड़ जाएँगे।

श्लोक 23 (5.123.23)

ददाति यत्पार्थिव यत्करोति । यद्वा तपस्तप्यति यञ्जुहोति । न तस्य नाशोऽस्ति न चापकर्षो । नान्यस्तदश्नाति स एव कर्ता ॥

dadāti yatpārthiva yatkaroti | yadvā tapastapyati yañjuhoti | na tasya nāśo'sti na cāpakarṣo | nānyastadaśnāti sa eva kartā

हे राजन्, मनुष्य जो कुछ देता है, जो कुछ करता है, जो तप करता है या जो आहुति देता है — उसका न नाश होता है, न ह्रास; उसे कोई दूसरा नहीं भोगता, करने वाला ही भोगता है।

श्लोक 24 (5.123.24)

इदं महाख्यानमनुत्तमं हितं । बहुश्रुतानां गतरोषरागिणाम् । समीक्ष्य लोके बहुधा प्रधारितं । त्रिवर्गदृष्टिः पृथिवीमुपाश्नुते ॥

idaṃ mahākhyānamanuttamaṃ hitaṃ | bahuśrutānāṃ gataroṣarāgiṇām | samīkṣya loke bahudhā pradhāritaṃ | trivargadṛṣṭiḥ pṛthivīmupāśnute

क्रोध और राग से रहित बहुश्रुत विद्वानों का यह महान, अनुपम और हितकारी आख्यान संसार में अनेक प्रकार से निश्चित किया गया है। जो इस पर विचार करता है और धर्म, अर्थ तथा काम — इस त्रिवर्ग पर दृष्टि रखता है, वह पृथ्वी का भोग करता है।

श्लोक 25 (5.123.25)

एतत्पुण्यतमं राजन्ययातेश्चरितं महत् । यच्छ्रुत्वा श्रावयित्वा च स्वर्गं यान्तीह मानवाः ॥

etatpuṇyatamaṃ rājanyayāteścaritaṃ mahat | yacchrutvā śrāvayitvā ca svargaṃ yāntīha mānavāḥ

हे राजन्, यह ययाति का परम पवित्र और महान चरित्र है; इसे सुनकर और सुनाकर मनुष्य स्वर्ग जाते हैं।

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