उद्योग पर्व · अध्याय 124
कृष्ण का दुर्योधन को समझाना
धृतराष्ट्र नारद से कहते हैं कि वे शान्ति की सलाह से सहमत हैं, परन्तु अपने पुत्रों पर उनका वश नहीं चलता; फिर वे कृष्ण से हठी दुर्योधन को मनाने की विनती करते हैं। कृष्ण दुर्योधन की ओर मुड़कर मधुर वाणी में उसे समझाते हैं कि पिता, गुरुजनों और सुहृदों की इच्छा के अनुसार वह पाण्डवों से सन्धि कर ले, और बताते हैं कि धर्म ही अर्थ और काम का सच्चा उपाय है। वे चेतावनी देते हैं कि जिन सहायकों पर दुर्योधन भरोसा करता है, वे भीम या अर्जुन का सामना नहीं कर सकते, और एकत्र सेना में कोई अर्जुन को नहीं जीत सकता। अन्त में वे आग्रह करते हैं कि वह पाण्डवों को आधा राज्य देकर उनके साथ समृद्धि भोगे।
धृतराष्ट्र उवाच
श्लोक 1 (5.124.1)
भगवन्नेवमेवैतद्यथा वदसि नारद । इच्छामि चाहमप्येवं न त्वीशो भगवन्नहम् ॥
bhagavannevamevaitadyathā vadasi nārada | icchāmi cāhamapyevaṃ na tvīśo bhagavannaham
"भगवन् नारद, जैसा आप कहते हैं, बात ठीक वैसी ही है। मैं भी ऐसा ही चाहता हूँ, परन्तु भगवन्, यह मेरे वश में नहीं है।"
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 2 (5.124.2)
एवमुक्त्वा ततः कृष्णमभ्यभाषत कौरवः । स्वर्ग्यं लोक्यं च मामात्थ धर्म्यं न्याय्यं च केशव ॥
evamuktvā tataḥ kṛṣṇamabhyabhāṣata kauravaḥ | svargyaṃ lokyaṃ ca māmāttha dharmyaṃ nyāyyaṃ ca keśava
ऐसा कहकर कुरुराज ने फिर कृष्ण से कहा — "केशव, आपने मुझसे जो कहा है, वह स्वर्ग और लोक में यश देने वाला, धर्मसम्मत और न्यायोचित है।
धृतराष्ट्र उवाच
श्लोक 3 (5.124.3)
न त्वहं स्ववशस्तात क्रियमाणं न मे प्रियम् । न मंस्यन्ते दुरात्मानः पुत्रा मम जनार्दन ॥
na tvahaṃ svavaśastāta kriyamāṇaṃ na me priyam | na maṃsyante durātmānaḥ putrā mama janārdana
परन्तु तात, मैं अपने वश में नहीं हूँ; जो किया जा रहा है, वह मुझे प्रिय नहीं है। जनार्दन, मेरे दुष्ट पुत्र मेरी बात नहीं मानेंगे।
श्लोक 4 (5.124.4)
अङ्ग दुर्योधनं कृष्ण मन्दं शास्त्रातिगं मम । अनुनेतुं महाबाहो यतस्व पुरुषोत्तम ॥
aṅga duryodhanaṃ kṛṣṇa mandaṃ śāstrātigaṃ mama | anunetuṃ mahābāho yatasva puruṣottama
इसलिए हे महाबाहु पुरुषोत्तम कृष्ण, मेरे मूर्ख पुत्र दुर्योधन को, जो शास्त्र की मर्यादा लाँघ चुका है, मनाने का प्रयत्न कीजिए।
श्लोक 5 (5.124.5)
न श्रृणोति महाबाहो वचनं साधु भाषितम् । गान्धार्याश्च हृषीकेश विदुरस्य च धीमतः । अन्येषां चैव सुहृदां भीष्मादीनां हितैषिणाम् ॥
na śrṛṇoti mahābāho vacanaṃ sādhu bhāṣitam | gāndhāryāśca hṛṣīkeśa vidurasya ca dhīmataḥ | anyeṣāṃ caiva suhṛdāṃ bhīṣmādīnāṃ hitaiṣiṇām
हे महाबाहु हृषीकेश, वह भली प्रकार कही गई अच्छी बात नहीं सुनता — न गान्धारी की, न बुद्धिमान विदुर की, और न भीष्म आदि अन्य हितैषी सुहृदों की।
श्लोक 6 (5.124.6)
स त्वं पापमतिं क्रूरं पापचित्तमचेतनम् । अनुशाधि दुरात्मानं स्वयं दुर्योधनं नृपम् ॥
sa tvaṃ pāpamatiṃ krūraṃ pāpacittamacetanam | anuśādhi durātmānaṃ svayaṃ duryodhanaṃ nṛpam
अतः आप स्वयं उस पापबुद्धि, क्रूर, पापी चित्त वाले, विवेकहीन और दुष्टात्मा राजा दुर्योधन को शिक्षा दीजिए।
श्लोक 7 (5.124.7)
सुहृत्कार्यं तु सुमहत्कृतं ते स्याञ्जनार्दन ॥
suhṛtkāryaṃ tu sumahatkṛtaṃ te syāñjanārdana
जनार्दन, ऐसा करके आप एक सुहृद् का बहुत बड़ा कार्य करेंगे।"
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 8 (5.124.8)
ततोऽभ्यावृत्य वार्ष्णेयो दुर्योधनममर्षणम् । अब्रवीन्मधुरां वाचं सर्वधर्मार्थतत्त्ववित् ॥
tato'bhyāvṛtya vārṣṇeyo duryodhanamamarṣaṇam | abravīnmadhurāṃ vācaṃ sarvadharmārthatattvavit
तब समस्त धर्म और अर्थ के तत्त्व को जानने वाले वृष्णिवंशी कृष्ण ने असहनशील दुर्योधन की ओर मुड़कर मधुर वाणी में कहा —
वासुदेव उवाच
श्लोक 9 (5.124.9)
दुर्योधन निबोधेदं मद्वाक्यं कुरुसत्तम । शर्मार्थं ते विशेषेण सानुबन्धस्य भारत ॥
duryodhana nibodhedaṃ madvākyaṃ kurusattama | śarmārthaṃ te viśeṣeṇa sānubandhasya bhārata
"कुरुश्रेष्ठ दुर्योधन, मेरी यह बात सुनो। भारत, यह विशेष रूप से तुम्हारे और तुमसे जुड़े सब लोगों के कल्याण के लिए है।
श्लोक 10 (5.124.10)
महाप्रज्ञकुले जातः साध्वेतत्कर्तुमर्हसि । श्रुतवृत्तोपसंपन्नः सर्वैः समुदितो गुणैः ॥
mahāprajñakule jātaḥ sādhvetatkartumarhasi | śrutavṛttopasaṃpannaḥ sarvaiḥ samudito guṇaiḥ
तुम महाज्ञानियों के कुल में जन्मे हो, शास्त्रज्ञान और सदाचार से सम्पन्न हो, सब गुणों से युक्त हो; तुम्हें यह उचित कार्य करना चाहिए।
श्लोक 11 (5.124.11)
दौष्कुलेया दुरात्मानो नृशंसा निरपत्रपाः । त एतदीदृशं कुर्युर्यथा त्वं तात मन्यसे ॥
dauṣkuleyā durātmāno nṛśaṃsā nirapatrapāḥ | ta etadīdṛśaṃ kuryuryathā tvaṃ tāta manyase
तात, जैसा तुम सोच रहे हो, वैसा काम तो नीच कुल में जन्मे, दुष्टात्मा, क्रूर और निर्लज्ज लोग करते हैं।
श्लोक 12 (5.124.12)
धर्मार्थयुक्ता लोकेऽस्मिन्प्रवृत्तिर्लक्ष्यते सताम् । असतां विपरीता तु लक्ष्यते भरतर्षभ । विपरीता त्वियं वृत्तिरसकृल्लक्ष्यते त्वयि ॥
dharmārthayuktā loke'sminpravṛttirlakṣyate satām | asatāṃ viparītā tu lakṣyate bharatarṣabha | viparītā tviyaṃ vṛttirasakṛllakṣyate tvayi
इस संसार में सज्जनों का आचरण धर्म और अर्थ से युक्त दिखाई देता है; हे भरतश्रेष्ठ, दुर्जनों का आचरण इसके विपरीत होता है। और यह विपरीत आचरण तुममें बार-बार देखा जाता है।
श्लोक 13 (5.124.13)
अधर्मश्चानुबन्धोऽत्र घोरः प्राणहरो महान् । अनिष्टश्चानिमित्तश्च न च शक्यश्च भारत ॥
adharmaścānubandho'tra ghoraḥ prāṇaharo mahān | aniṣṭaścānimittaśca na ca śakyaśca bhārata
इस विषय में तुम्हारा यह अधर्मपूर्ण हठ भयंकर, प्राणघातक और बहुत बड़ा है; भारत, यह अनिष्टकारी है, अकारण है और पूरा भी नहीं किया जा सकता।
श्लोक 14 (5.124.14)
तमनर्थं परिहरन्नात्मश्रेयः करिष्यसि । भ्रातॄणामथ भृत्यानां मित्राणां च परन्तप ॥
tamanarthaṃ pariharannātmaśreyaḥ kariṣyasi | bhrātṝṇāmatha bhṛtyānāṃ mitrāṇāṃ ca parantapa
हे परन्तप, इस अनर्थ से बचकर तुम अपना कल्याण करोगे, और अपने भाइयों, सेवकों तथा मित्रों को
श्लोक 15 (5.124.15)
अधर्म्यादयशस्याच्च कर्मणस्त्वं प्रमोक्ष्यसे ॥
adharmyādayaśasyācca karmaṇastvaṃ pramokṣyase
अधर्मपूर्ण और अपयशकारी कर्म से छुड़ा लोगे।
श्लोक 16 (5.124.16)
प्राज्ञैः शूरैर्महोत्साहैरात्मवद्भिर्बहुश्रुतैः । सन्धत्स्व पुरुषव्याघ्र पाण्डवैर्भरतर्षभ । तद्धितं च प्रियं चैव धृतराष्ट्रस्य धीमतः ॥
prājñaiḥ śūrairmahotsāhairātmavadbhirbahuśrutaiḥ | sandhatsva puruṣavyāghra pāṇḍavairbharatarṣabha | taddhitaṃ ca priyaṃ caiva dhṛtarāṣṭrasya dhīmataḥ
हे पुरुषसिंह भरतश्रेष्ठ, बुद्धिमान, शूरवीर, अत्यन्त उत्साही, आत्मसंयमी और बहुश्रुत पाण्डवों से सन्धि कर लो। इसी में बुद्धिमान धृतराष्ट्र का हित भी है और प्रिय भी,
श्लोक 17 (5.124.17)
पितामहस्य द्रोणस्य विदुरस्य महामतेः । कृपस्य सोमदत्तस्य बाह्लीकस्य च धीमतः ॥
pitāmahasya droṇasya vidurasya mahāmateḥ | kṛpasya somadattasya bāhlīkasya ca dhīmataḥ
तथा पितामह, द्रोण, महामति विदुर, कृप, सोमदत्त और बुद्धिमान बाह्लीक का,
श्लोक 18 (5.124.18)
अश्वत्थाम्नो विकर्णस्य सञ्जयस्य विविंशतेः । ज्ञातीनां चैव भूयिष्ठं मित्राणां च परन्तप ॥
aśvatthāmno vikarṇasya sañjayasya viviṃśateḥ | jñātīnāṃ caiva bhūyiṣṭhaṃ mitrāṇāṃ ca parantapa
अश्वत्थामा, विकर्ण, संजय और विविंशति का, तथा तुम्हारे अधिकांश बन्धु-बान्धवों और मित्रों का भी, हे परन्तप।
श्लोक 19 (5.124.19)
शमे शर्म भवेत्तात सर्वस्य जगतस्तथा । ह्रीमानसि कुले जातः श्रुतवानानृशंस्यवान् । तिष्ठ तात पितुः शास्त्रे मातुश्च भरतर्षभ ॥
śame śarma bhavettāta sarvasya jagatastathā | hrīmānasi kule jātaḥ śrutavānānṛśaṃsyavān | tiṣṭha tāta pituḥ śāstre mātuśca bharatarṣabha
तात, शान्ति में ही सारे जगत् का कल्याण है। तुम लज्जाशील, कुलीन, विद्वान और दयालु हो; हे भरतश्रेष्ठ, पिता और माता की आज्ञा में रहो।
श्लोक 20 (5.124.20)
एतच्छ्रेयो हि मन्यन्ते पिता यच्छास्ति भारत । उक्तमापद्गतः पूर्वं पितुः स्मरसि शासनम् ॥
etacchreyo hi manyante pitā yacchāsti bhārata | uktamāpadgataḥ pūrvaṃ pituḥ smarasi śāsanam
भारत, पिता जो आज्ञा देता है, उसी को लोग श्रेयस्कर मानते हैं। विपत्ति में पड़ने पर तुम पिता की पहले कही हुई आज्ञा को याद करोगे।
श्लोक 21 (5.124.21)
रोचते ते पितुस्तात पाण्डवैः सह सङ्गमः । सामात्यस्य कुरुश्रेष्ठ तत्तुभ्यं तात रोचताम् ॥
rocate te pitustāta pāṇḍavaiḥ saha saṅgamaḥ | sāmātyasya kuruśreṣṭha tattubhyaṃ tāta rocatām
तात, पाण्डवों के साथ मेल तुम्हारे पिता और उनके मन्त्रियों को अच्छा लगता है; हे कुरुश्रेष्ठ, वह तुम्हें भी अच्छा लगे।
श्लोक 22 (5.124.22)
श्रुत्वा यः सुहृदां शास्त्रं मर्त्यो न प्रतिपद्यते । विपाकान्ते दहत्येनं किंपाकमिव भक्षितम् ॥
śrutvā yaḥ suhṛdāṃ śāstraṃ martyo na pratipadyate | vipākānte dahatyenaṃ kiṃpākamiva bhakṣitam
जो मनुष्य सुहृदों का उपदेश सुनकर भी उसे नहीं मानता, परिणाम आने पर वह उसे वैसे ही जलाता है जैसे खाया हुआ किंपाक फल।
श्लोक 23 (5.124.23)
यस्तु निःश्रेयसं वाक्यं मोहान्न प्रतिपद्यते । स दीर्घसूत्रो हीनार्थः पश्चात्तापेन युज्यते ॥
yastu niḥśreyasaṃ vākyaṃ mohānna pratipadyate | sa dīrghasūtro hīnārthaḥ paścāttāpena yujyate
जो मोहवश कल्याणकारी वचन को स्वीकार नहीं करता, वह दीर्घसूत्री अपने प्रयोजन से वंचित होकर बाद में पछताता है।
श्लोक 24 (5.124.24)
यस्तु निःश्रेयसं श्रुत्वा प्राक्तदेवाभिपद्यते । आत्मनो मतमुत्सृज्य स लोके सुखमेधते ॥
yastu niḥśreyasaṃ śrutvā prāktadevābhipadyate | ātmano matamutsṛjya sa loke sukhamedhate
किन्तु जो कल्याण की बात सुनकर अपना मत छोड़ तुरन्त उसे अपना लेता है, वह संसार में सुखपूर्वक उन्नति करता है।
श्लोक 25 (5.124.25)
योऽर्थकामस्य वचनं प्रातिकूल्यान्न मृष्यते । शृणोति प्रतिकूलानि द्विषतां वशमेति सः ॥
yo'rthakāmasya vacanaṃ prātikūlyānna mṛṣyate | śṛṇoti pratikūlāni dviṣatāṃ vaśameti saḥ
जो अपने हितैषी के वचन को प्रतिकूल लगने के कारण सहन नहीं करता और विपरीत बातें सुनता है, वह शत्रुओं के वश में पड़ जाता है।
श्लोक 26 (5.124.26)
सतां मतमतिक्रम्य योऽसतां वर्तते मते । शोचन्ते व्यसने तस्य सुहृदो नचिरादिव ॥
satāṃ matamatikramya yo'satāṃ vartate mate | śocante vyasane tasya suhṛdo nacirādiva
जो सज्जनों के मत का उल्लंघन करके दुर्जनों के मत पर चलता है, उसके संकट में पड़ने पर शीघ्र ही उसके सुहृद् शोक करते हैं।
श्लोक 27 (5.124.27)
मुख्यानमात्यानुत्सृज्य यो निहीनान्निषेवते । स घोरामापदं प्राप्य नोत्तारमधिगच्छति ॥
mukhyānamātyānutsṛjya yo nihīnānniṣevate | sa ghorāmāpadaṃ prāpya nottāramadhigacchati
जो मुख्य मन्त्रियों को त्यागकर नीच लोगों का संग करता है, वह घोर विपत्ति में पड़कर उससे पार नहीं पाता।
श्लोक 28 (5.124.28)
योऽसत्सेवी वृथाचारो न श्रोता सुहृदां सताम् । परान्वृणीते स्वान्द्वेष्टि तं गौस्त्यजति भारत ॥
yo'satsevī vṛthācāro na śrotā suhṛdāṃ satām | parānvṛṇīte svāndveṣṭi taṃ gaustyajati bhārata
जो दुर्जनों की सेवा करता है, व्यर्थ आचरण करता है, सज्जन सुहृदों की बात नहीं सुनता, परायों को अपनाता है और अपनों से द्वेष करता है, भारत, उसे पृथ्वी त्याग देती है।
श्लोक 29 (5.124.29)
तत्त्वं विरुध्य तैर्वीरैरन्येभ्यस्त्राणमिच्छसि । अशिष्टेभ्योऽसमर्थेभ्यो मूढेभ्यो भरतर्षभ ॥
tattvaṃ virudhya tairvīrairanyebhyastrāṇamicchasi | aśiṣṭebhyo'samarthebhyo mūḍhebhyo bharatarṣabha
हे भरतश्रेष्ठ, फिर भी तुम उन वीरों से विरोध करके दूसरों से — अशिष्ट, असमर्थ और मूर्ख लोगों से — रक्षा चाहते हो।
श्लोक 30 (5.124.30)
को हि शक्रसमाञ्ज्ञातीनतिक्रम्य महारथान् । अन्येभ्यस्त्राणमाशंसेत्त्वदन्यो भुवि मानवः ॥
ko hi śakrasamāñjñātīnatikramya mahārathān | anyebhyastrāṇamāśaṃsettvadanyo bhuvi mānavaḥ
इन्द्र के समान महारथी बन्धुओं को छोड़कर, तुम्हारे सिवा पृथ्वी पर कौन मनुष्य दूसरों से रक्षा की आशा करेगा?
श्लोक 31 (5.124.31)
जन्मप्रभृति कौन्तेया नित्यं विनिकृतास्त्वया । न च ते जातु कुप्यन्ति धर्मात्मानो हि पाण्डवाः ॥
janmaprabhṛti kaunteyā nityaṃ vinikṛtāstvayā | na ca te jātu kupyanti dharmātmāno hi pāṇḍavāḥ
जन्म से ही तुमने कुन्तीपुत्रों के साथ सदा छल किया है, फिर भी वे कभी क्रोध नहीं करते, क्योंकि पाण्डव धर्मात्मा हैं।
श्लोक 32 (5.124.32)
मिथ्योपचरितास्तात जन्मप्रभृति बान्धवाः । त्वयि सम्यङ्महाबाहो प्रतिपन्ना यशस्विनः ॥
mithyopacaritāstāta janmaprabhṛti bāndhavāḥ | tvayi samyaṅmahābāho pratipannā yaśasvinaḥ
तात, जन्म से ही उनके साथ कपटपूर्ण व्यवहार हुआ, फिर भी हे महाबाहु, तुम्हारे वे यशस्वी बान्धव तुम्हारे प्रति सदा उचित ही बरतते रहे।
श्लोक 33 (5.124.33)
त्वयाऽपि प्रतिपत्तव्यं तथैव भरतर्षभ । स्वेषु बन्धुषु मुख्येषु मा मन्युवशमन्वगाः ॥
tvayā'pi pratipattavyaṃ tathaiva bharatarṣabha | sveṣu bandhuṣu mukhyeṣu mā manyuvaśamanvagāḥ
हे भरतश्रेष्ठ, तुम्हें भी उनके प्रति वैसा ही व्यवहार करना चाहिए। अपने ही प्रमुख बन्धुओं के प्रति क्रोध के वश में मत होओ।
श्लोक 34 (5.124.34)
त्रिवर्गयुक्तः प्राज्ञानामारम्भो भरतर्षभ । धर्मार्थावनुरुध्यन्ते त्रिवर्गासंभवे नराः ॥
trivargayuktaḥ prājñānāmārambho bharatarṣabha | dharmārthāvanurudhyante trivargāsaṃbhave narāḥ
हे भरतश्रेष्ठ, बुद्धिमानों के कार्य धर्म, अर्थ और काम — तीनों से युक्त होते हैं; जहाँ तीनों सम्भव न हों, वहाँ मनुष्य धर्म और अर्थ का अनुसरण करते हैं।
श्लोक 35 (5.124.35)
पृथक्तु विनिविष्टानां धर्मं धीरोऽनुरुध्यते । मध्यमोऽर्थं कलिं बालः काममेवानुरुध्यते ॥
pṛthaktu viniviṣṭānāṃ dharmaṃ dhīro'nurudhyate | madhyamo'rthaṃ kaliṃ bālaḥ kāmamevānurudhyate
जब ये तीनों अलग-अलग हों, तब धीर पुरुष धर्म का, मध्यम पुरुष अर्थ का और मूर्ख कलह की जड़ काम का ही अनुसरण करता है।
श्लोक 36 (5.124.36)
इन्द्रियैः प्राकृतो लोभाद्धर्मं विप्रजहाति यः । कामार्थावनुपायेन लिप्समानो विनश्यति ॥
indriyaiḥ prākṛto lobhāddharmaṃ viprajahāti yaḥ | kāmārthāvanupāyena lipsamāno vinaśyati
जो साधारण बुद्धि वाला मनुष्य इन्द्रिय-सुखों के लोभ से धर्म को छोड़ देता है और अनुचित उपाय से अर्थ और काम पाना चाहता है, वह नष्ट हो जाता है।
श्लोक 37 (5.124.37)
कामार्थौ लिप्समानस्तु धर्ममेवादितश्चरेत् । न हि धर्मादपैत्यर्थः कामो वाऽपि कदाचन ॥
kāmārthau lipsamānastu dharmamevāditaścaret | na hi dharmādapaityarthaḥ kāmo vā'pi kadācana
जो अर्थ और काम चाहता है, उसे आरम्भ से ही धर्म का आचरण करना चाहिए, क्योंकि धर्म से अर्थ और काम कभी अलग नहीं होते।
श्लोक 38 (5.124.38)
उपायं धर्ममेवाहुस्त्रिवर्गस्य विशांपते । लिप्समानो हि तेनाशु कक्षेऽग्निरिव वर्धते ॥
upāyaṃ dharmamevāhustrivargasya viśāṃpate | lipsamāno hi tenāśu kakṣe'gniriva vardhate
हे प्रजापालक, धर्म को ही त्रिवर्ग की प्राप्ति का उपाय कहा गया है; उसके द्वारा इन्हें चाहने वाला सूखी घास में आग की तरह शीघ्र बढ़ता है।
श्लोक 39 (5.124.39)
स त्वं तातानुपायेन लिप्ससे भरतर्षभ । आधिराज्यं महद्दीप्तं प्रथितं सर्वराजसु ॥
sa tvaṃ tātānupāyena lipsase bharatarṣabha | ādhirājyaṃ mahaddīptaṃ prathitaṃ sarvarājasu
किन्तु तात, हे भरतश्रेष्ठ, तुम सब राजाओं में प्रसिद्ध, महान और देदीप्यमान साम्राज्य को अनुचित उपाय से पाना चाहते हो।
श्लोक 40 (5.124.40)
आत्मानं तक्षति ह्येष वनं परशुना यथा । यः सम्यग्वर्तमानेषु मिथ्या राजन्प्रवर्तते । न तस्य हि मतिं छिन्द्याद्यस्य नेच्छेत्पराभवम् ॥
ātmānaṃ takṣati hyeṣa vanaṃ paraśunā yathā | yaḥ samyagvartamāneṣu mithyā rājanpravartate | na tasya hi matiṃ chindyādyasya necchetparābhavam
राजन्, जो सद्व्यवहार करने वालों के साथ मिथ्या आचरण करता है, वह अपने आप को वैसे ही काटता है जैसे कुल्हाड़ी वन को। जिसका पराभव न चाहे, उसकी बुद्धि को खण्डित नहीं करना चाहिए।
श्लोक 41 (5.124.41)
अविच्छिन्नमतेरस्य कल्याणे धीयते मतिः । आत्मवान्नावमन्येत त्रिषु लोकेषु भारत ॥
avicchinnamaterasya kalyāṇe dhīyate matiḥ | ātmavānnāvamanyeta triṣu lokeṣu bhārata
जिसकी बुद्धि खण्डित नहीं होती, उसका मन कल्याण में लगता है। भारत, आत्मसंयमी पुरुष को तीनों लोकों में किसी का अपमान नहीं करना चाहिए,
श्लोक 42 (5.124.42)
अप्यन्यं प्राकृतं कञ्चित्किमु तान्पाण्डवर्षभान् । अमर्षवशमापन्नो न किंचिद्बुध्यते जनः ॥
apyanyaṃ prākṛtaṃ kañcitkimu tānpāṇḍavarṣabhān | amarṣavaśamāpanno na kiṃcidbudhyate janaḥ
किसी साधारण मनुष्य का भी नहीं, फिर उन श्रेष्ठ पाण्डवों की तो बात ही क्या। क्रोध के वश में पड़ा मनुष्य कुछ भी नहीं समझता।
श्लोक 43 (5.124.43)
छिद्यते ह्याततं सर्वं प्रमाणं पश्य भारत । श्रेयस्ते दुर्जनात्तात पाण्डवैः सह सङ्गतम् ॥
chidyate hyātataṃ sarvaṃ pramāṇaṃ paśya bhārata | śreyaste durjanāttāta pāṇḍavaiḥ saha saṅgatam
भारत, जो कुछ बहुत ताना जाता है, वह टूट जाता है — इसका प्रमाण देख लो। तात, दुर्जनों के साथ की अपेक्षा पाण्डवों से मेल तुम्हारे लिए श्रेयस्कर है।
श्लोक 44 (5.124.44)
तैर्हि संप्रीयमाणस्त्वं सर्वान्कामानवाप्स्यसि । पाण्डवैर्निर्मितां भूमिं भुञ्जानो राजसत्तम ॥
tairhi saṃprīyamāṇastvaṃ sarvānkāmānavāpsyasi | pāṇḍavairnirmitāṃ bhūmiṃ bhuñjāno rājasattama
हे राजश्रेष्ठ, उनकी प्रीति पाकर तुम पाण्डवों द्वारा वश में की गई पृथ्वी का भोग करते हुए अपनी सब कामनाएँ प्राप्त करोगे।
श्लोक 45 (5.124.45)
पाण्डवान्पृष्ठतः कृत्वा त्राणमाशंससेऽन्यतः । दुःशासने दुर्विषहे कर्णे चापि ससौबले ॥
pāṇḍavānpṛṣṭhataḥ kṛtvā trāṇamāśaṃsase'nyataḥ | duḥśāsane durviṣahe karṇe cāpi sasaubale
फिर भी तुम पाण्डवों से मुँह मोड़कर दूसरों से रक्षा की आशा करते हो — दुःशासन, दुर्विषह, कर्ण और सुबलपुत्र शकुनि से।
श्लोक 46 (5.124.46)
एतेष्वैश्वर्यमाधाय भूतिमिच्छसि भारत । न चैते तव पर्याप्ता ज्ञाने धर्मार्थयोस्तथा ॥
eteṣvaiśvaryamādhāya bhūtimicchasi bhārata | na caite tava paryāptā jñāne dharmārthayostathā
भारत, इन पर अपना ऐश्वर्य टिकाकर तुम समृद्धि चाहते हो। परन्तु ये धर्म और अर्थ के ज्ञान में तुम्हारे लिए पर्याप्त नहीं हैं,
श्लोक 47 (5.124.47)
विक्रमे चाप्यपर्याप्ताः पाण्डवान्प्रति भारत । न हीमे सर्वराजानः पर्याप्ताः सहितास्त्वया ॥
vikrame cāpyaparyāptāḥ pāṇḍavānprati bhārata | na hīme sarvarājānaḥ paryāptāḥ sahitāstvayā
और भारत, पराक्रम में भी ये पाण्डवों के सामने पर्याप्त नहीं हैं। ये सब राजा तुम्हारे साथ मिलकर भी
श्लोक 48 (5.124.48)
क्रुद्धस्य भीमसेनस्य प्रेक्षितुं मुखमाहवे । इदं संनिहितं तात समग्रं पार्थिवं बलम् ॥
kruddhasya bhīmasenasya prekṣituṃ mukhamāhave | idaṃ saṃnihitaṃ tāta samagraṃ pārthivaṃ balam
युद्ध में क्रुद्ध भीमसेन के मुख की ओर देखने में भी समर्थ नहीं हैं। तात, यहाँ एकत्र राजाओं की यह समूची सेना —
श्लोक 49 (5.124.49)
अयं भीष्मस्तथा द्रोणः कर्णश्चायं तथा कृपः । भूरिश्रवाः सौमदत्तिरश्वत्थामा जयद्रथः ॥
ayaṃ bhīṣmastathā droṇaḥ karṇaścāyaṃ tathā kṛpaḥ | bhūriśravāḥ saumadattiraśvatthāmā jayadrathaḥ
ये भीष्म और द्रोण, यह कर्ण और कृप, सोमदत्तपुत्र भूरिश्रवा, अश्वत्थामा और जयद्रथ —
श्लोक 50 (5.124.50)
अशक्ताः सर्व एवैते प्रतियोद्धुं धनञ्जयम् । अजेयो ह्यर्जुनः सङ्ख्ये सर्वैरपि सुरासुरैः । मानुषैरपि गन्धर्वैर्मा युद्धे चेत आधिथाः ॥
aśaktāḥ sarva evaite pratiyoddhuṃ dhanañjayam | ajeyo hyarjunaḥ saṅkhye sarvairapi surāsuraiḥ | mānuṣairapi gandharvairmā yuddhe ceta ādhithāḥ
ये सभी मिलकर भी धनंजय से लड़ने में असमर्थ हैं। अर्जुन को युद्ध में समस्त देवता, असुर, मनुष्य और गन्धर्व भी नहीं जीत सकते। युद्ध में मन मत लगाओ।
श्लोक 51 (5.124.51)
दृश्यतां वा पुमान्कश्चित्समग्रे पार्थिवे बले । योऽर्जुनं समरे प्राप्य स्वस्तिमानाव्रजेद्गृहान् ॥
dṛśyatāṃ vā pumānkaścitsamagre pārthive bale | yo'rjunaṃ samare prāpya svastimānāvrajedgṛhān
अथवा राजाओं की इस समूची सेना में कोई एक ऐसा पुरुष दिखा दो, जो युद्ध में अर्जुन से भिड़कर सकुशल घर लौट आए।
श्लोक 52 (5.124.52)
किं ते जनक्षयेणेह कृतेन भरतर्षभ । यस्मिञ्जिते जितं ते स्यात्पुमानेकः स दृश्यतां ॥
kiṃ te janakṣayeṇeha kṛtena bharatarṣabha | yasmiñjite jitaṃ te syātpumānekaḥ sa dṛśyatāṃ
हे भरतश्रेष्ठ, यह जनसंहार करके तुम्हें क्या मिलेगा? वह एक पुरुष दिखाओ जो उसे जीत सके, जिसके जीते जाने पर ही तुम्हारी विजय होगी।
श्लोक 53 (5.124.53)
यः सदेवान्सगन्धर्वान्सयक्षासुरपन्नगान् । अजयत्खाण्डवप्रस्थे कस्तं युध्येत मानवः ॥
yaḥ sadevānsagandharvānsayakṣāsurapannagān | ajayatkhāṇḍavaprasthe kastaṃ yudhyeta mānavaḥ
जिसने खाण्डवप्रस्थ में गन्धर्वों, यक्षों, असुरों और नागों सहित देवताओं को जीत लिया था, उससे कौन मनुष्य लड़ सकता है?
श्लोक 54 (5.124.54)
तथा विराटनगरे श्रूयते महदद्भुतम् । एकस्य च बहूनां च पर्याप्तं तन्निदर्शनम् ॥
tathā virāṭanagare śrūyate mahadadbhutam | ekasya ca bahūnāṃ ca paryāptaṃ tannidarśanam
इसी प्रकार विराटनगर में हुई वह महान अद्भुत घटना सुनी जाती है, जहाँ एक ने अनेकों का सामना किया; वही पर्याप्त प्रमाण है।
श्लोक 55 (5.124.55)
युद्धे येन महादेवः साक्षात्सन्तोषितः शिवः । तमजेयमनाधृष्यं विजेतुं जिष्णुमच्युतम् । आशंससीह समरे वीरमर्जुनमूर्जितम् ॥
yuddhe yena mahādevaḥ sākṣātsantoṣitaḥ śivaḥ | tamajeyamanādhṛṣyaṃ vijetuṃ jiṣṇumacyutam | āśaṃsasīha samare vīramarjunamūrjitam
जिसने युद्ध में स्वयं महादेव शिव को सन्तुष्ट किया था, उस अजेय, अदम्य, विजयी, अच्युत, बलशाली वीर अर्जुन को तुम यहाँ युद्ध में जीतने की आशा करते हो!
श्लोक 56 (5.124.56)
मद्द्वितीयं पुनः पार्थं कः प्रार्थयितुमर्हति । युद्धे प्रतीपमायान्तमपि साक्षात्पुरन्दरः ॥
maddvitīyaṃ punaḥ pārthaṃ kaḥ prārthayitumarhati | yuddhe pratīpamāyāntamapi sākṣātpurandaraḥ
और जब मैं उसके साथ हूँ, तब युद्ध में सामने आते पार्थ को कौन ललकार सकता है — चाहे साक्षात् इन्द्र ही क्यों न हो?
श्लोक 57 (5.124.57)
बाहुभ्यामुद्वहेद्भूमिं दहेत्क्रुद्ध इमाः प्रजाः । पातयेत्त्रिदिवाद्देवान्योऽर्जुनं समरे जयेत् ॥
bāhubhyāmudvahedbhūmiṃ dahetkruddha imāḥ prajāḥ | pātayettridivāddevānyo'rjunaṃ samare jayet
जो युद्ध में अर्जुन को जीत ले, वह अपनी भुजाओं से पृथ्वी उठा सकता है, क्रोध करके इन प्रजाओं को भस्म कर सकता है और देवताओं को स्वर्ग से गिरा सकता है।
श्लोक 58 (5.124.58)
पश्य पुत्रांस्तथा भ्रातॄञ्ज्ञातीन्संबन्धिनस्तथा । त्वत्कृते न विनश्येयुरिमे भरतसत्तमाः ॥
paśya putrāṃstathā bhrātṝñjñātīnsaṃbandhinastathā | tvatkṛte na vinaśyeyurime bharatasattamāḥ
अपने पुत्रों, भाइयों, जाति-बन्धुओं और सम्बन्धियों को देखो; ये श्रेष्ठ भरतवंशी तुम्हारे कारण नष्ट न हों।
श्लोक 59 (5.124.59)
अस्तु शेषं कौरवाणां मा पराभूदिदं कुलम् । कुलघ्न इति नोच्येथा नष्टकीर्तिर्नराधिप ॥
astu śeṣaṃ kauravāṇāṃ mā parābhūdidaṃ kulam | kulaghna iti nocyethā naṣṭakīrtirnarādhipa
कौरवों का कुछ शेष रहे, यह कुल नष्ट न हो। हे नरेश, कीर्ति खोकर तुम 'कुलघाती' न कहलाओ।
श्लोक 60 (5.124.60)
त्वामेव स्थापयिष्यन्ति यौवराज्ये महारथाः । महाराज्येऽपि पितरं धृतराष्ट्रं जनेश्वरम् ॥
tvāmeva sthāpayiṣyanti yauvarājye mahārathāḥ | mahārājye'pi pitaraṃ dhṛtarāṣṭraṃ janeśvaram
वे महारथी तुम्हें ही युवराज के पद पर और तुम्हारे पिता नरेश्वर धृतराष्ट्र को महाराज के पद पर प्रतिष्ठित करेंगे।
श्लोक 61 (5.124.61)
मा तात श्रियमायान्तीमवमंस्थाः समुद्यताम् । अर्धं प्रदाय पार्थेभ्यो महतीं श्रियमाप्नुहि ॥
mā tāta śriyamāyāntīmavamaṃsthāḥ samudyatām | ardhaṃ pradāya pārthebhyo mahatīṃ śriyamāpnuhi
तात, सामने आती हुई, तुम्हें सौंपी जा रही लक्ष्मी का अपमान मत करो। पृथा के पुत्रों को आधा राज्य देकर महान ऐश्वर्य प्राप्त करो।
श्लोक 62 (5.124.62)
पाण्डवैः संशमं कृत्वा कृत्वा च सुहृदां वचः । संप्रीयमाणो मित्रैश्च चिरं भद्राण्यवाप्स्यसि ॥
pāṇḍavaiḥ saṃśamaṃ kṛtvā kṛtvā ca suhṛdāṃ vacaḥ | saṃprīyamāṇo mitraiśca ciraṃ bhadrāṇyavāpsyasi
पाण्डवों से सन्धि करके और सुहृदों की बात मानकर, मित्रों के साथ प्रसन्न रहते हुए तुम चिरकाल तक कल्याण प्राप्त करोगे।"