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उद्योग पर्व · अध्याय 126

भीष्म और द्रोण की शान्ति के लिए विनती

धृतराष्ट्र के वचनों से व्यथित भीष्म और द्रोण मिलकर दुर्योधन से विनती करते हैं कि युद्ध आरम्भ होने से पहले ही वह यह वैर समाप्त कर दे — इससे पहले कि कृष्ण और अर्जुन कवच धारण करें, युधिष्ठिर क्रोध से उसकी सेना को देखें, और भीम की गदा तथा पाण्डवों के सहयोगियों के बाण राजाओं को गिराने लगें। इसके स्थान पर वे मेल का चित्र खींचते हैं: प्रणाम करते दुर्योधन को युधिष्ठिर उठा लें, भीम उसे गले लगाएँ, छोटे पाण्डव उसे प्रणाम करें, और भाईचारे से पृथ्वी के बँटने पर राजा आनन्द के आँसू बहाएँ।

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वैशम्पायन उवाच

श्लोक 1 (5.126.1)

धृतराष्ट्रवचः श्रुत्वा भीष्मद्रोणौ समव्यथौ । दुर्योधनमिदं वाक्यमूचतुः शासनातिगम् ॥

dhṛtarāṣṭravacaḥ śrutvā bhīṣmadroṇau samavyathau | duryodhanamidaṃ vākyamūcatuḥ śāsanātigam

धृतराष्ट्र के वचन सुनकर समान रूप से व्यथित भीष्म और द्रोण ने आज्ञा का उल्लंघन करने वाले दुर्योधन से यह कहा —

भीष्मद्रोणावूचतुः

श्लोक 2 (5.126.2)

यावत्कृष्णावसन्नद्धौ यावत्तिष्ठति गाण्डिवम् । यावद्धौम्यो न मेधाग्नौ जुहोतीह द्विषद्बलम् ॥

yāvatkṛṣṇāvasannaddhau yāvattiṣṭhati gāṇḍivam | yāvaddhaumyo na medhāgnau juhotīha dviṣadbalam

"जब तक दोनों कृष्ण (कृष्ण और अर्जुन) कवच धारण नहीं करते, जब तक गाण्डीव धनुष रखा हुआ है, जब तक धौम्य युद्धरूपी यज्ञ की अग्नि में शत्रु-सेना की आहुति नहीं देते,

श्लोक 3 (5.126.3)

यावन्न प्रेक्षते क्रुद्धः सेनां तव युधिष्ठिरः । ह्रीनिषेवो महेष्वासस्तावच्छाम्यतु वैशसम् ॥

yāvanna prekṣate kruddhaḥ senāṃ tava yudhiṣṭhiraḥ | hrīniṣevo maheṣvāsastāvacchāmyatu vaiśasam

जब तक लज्जाशील महाधनुर्धर युधिष्ठिर क्रोध से तुम्हारी सेना की ओर नहीं देखते, तब तक यह वैर शान्त हो जाए।

श्लोक 4 (5.126.4)

यावन्न दृश्यते पार्थः स्वेऽप्यनीके व्यवस्थितः । भीमसेनो महेष्वासस्तावच्छाम्यतु वैशसम् ॥

yāvanna dṛśyate pārthaḥ sve'pyanīke vyavasthitaḥ | bhīmaseno maheṣvāsastāvacchāmyatu vaiśasam

जब तक महाधनुर्धर पार्थ भीमसेन अपनी सेना में खड़े दिखाई नहीं देते, तब तक यह वैर शान्त हो जाए।

श्लोक 5 (5.126.5)

यावन्न चरते मार्गान्पृतनामभिधर्षयन् । भीमसेनो गदापाणिस्तावत्संशाम्य पाण्डवैः ॥

yāvanna carate mārgānpṛtanāmabhidharṣayan | bhīmaseno gadāpāṇistāvatsaṃśāmya pāṇḍavaiḥ

जब तक हाथ में गदा लिए भीमसेन सेना को रौंदते हुए रणमार्गों पर विचरण नहीं करते, तब तक पाण्डवों से सन्धि कर लो।

श्लोक 6 (5.126.6)

यावन्न शातयत्याजौ शिरांसि गजयोधिनाम् । गदया वीरघातिन्या फलानीव वनस्पतेः । कालेन परिपक्वानि तावच्छाम्यतु वैशसम् ॥

yāvanna śātayatyājau śirāṃsi gajayodhinām | gadayā vīraghātinyā phalānīva vanaspateḥ | kālena paripakvāni tāvacchāmyatu vaiśasam

जब तक वे वीरों का संहार करने वाली अपनी गदा से युद्ध में हाथियों पर सवार योद्धाओं के सिर वैसे नहीं गिराते, जैसे समय पर पके वृक्ष के फल गिरते हैं, तब तक यह वैर शान्त हो जाए।

श्लोक 7 (5.126.7)

नकुलः सहदेवश्च धृष्टद्युम्नश्च पार्षतः । विराटश्च शिखण्डी च शैशुपालिश्च दंशिताः ॥

nakulaḥ sahadevaśca dhṛṣṭadyumnaśca pārṣataḥ | virāṭaśca śikhaṇḍī ca śaiśupāliśca daṃśitāḥ

नकुल और सहदेव, पृषतवंशी धृष्टद्युम्न, विराट, शिखण्डी और शिशुपालपुत्र — ये सब कवच धारण किए हुए —

श्लोक 8 (5.126.8)

यावन्न प्रविशन्त्येते नक्रा इव महार्णवम् । कृतास्त्राः क्षिप्रमस्यन्तस्तावच्छाम्यतु वैशसम् ॥

yāvanna praviśantyete nakrā iva mahārṇavam | kṛtāstrāḥ kṣipramasyantastāvacchāmyatu vaiśasam

जब तक ये अस्त्रविद्या में निपुण योद्धा शीघ्रता से बाण छोड़ते हुए, महासागर में मगरमच्छों की तरह, तुम्हारी सेना में नहीं घुसते, तब तक यह वैर शान्त हो जाए।

श्लोक 9 (5.126.9)

यावन्न सुकुमारेषु शरीरेषु महीक्षिताम् । गार्ध्रपत्राः पतन्त्युग्रास्तावच्छाम्यतु वैशसम् ॥

yāvanna sukumāreṣu śarīreṣu mahīkṣitām | gārdhrapatrāḥ patantyugrāstāvacchāmyatu vaiśasam

जब तक गिद्ध के पंखों वाले भयंकर बाण राजाओं के कोमल शरीरों पर नहीं गिरते, तब तक यह वैर शान्त हो जाए।

श्लोक 10 (5.126.10)

चन्दनागुरुदिग्धेषु हारनिष्कधरेषु च । नोरस्सु यावद्योधानां महेष्वासैर्महेषवः ॥

candanāgurudigdheṣu hāraniṣkadhareṣu ca | norassu yāvadyodhānāṃ maheṣvāsairmaheṣavaḥ

जब तक चन्दन और अगुरु से लिप्त, हार और स्वर्णाभूषण धारण किए योद्धाओं की छातियों पर महाधनुर्धरों के लोहे के बड़े-बड़े बाण —

श्लोक 11 (5.126.11)

कृतास्त्रैः क्षिप्रमस्यद्भिर्दूरपातिभिरायसाः । अभिलक्ष्यैर्निपात्यन्ते तावच्छाम्यतु वैशसम् ॥

kṛtāstraiḥ kṣipramasyadbhirdūrapātibhirāyasāḥ | abhilakṣyairnipātyante tāvacchāmyatu vaiśasam

जिन्हें अस्त्रविद्या में निपुण, शीघ्रता से बाण छोड़ने वाले, दूर तक मार करने वाले और लक्ष्य पर अचूक धनुर्धर चलाते हैं — नहीं गिरते, तब तक यह वैर शान्त हो जाए।

श्लोक 12 (5.126.12)

अभिवादयमानं त्वां शिरसा राजकुञ्जरः । पाणिभ्यां प्रतिगृह्णातु धर्मराजो युधिष्ठिरः ॥

abhivādayamānaṃ tvāṃ śirasā rājakuñjaraḥ | pāṇibhyāṃ pratigṛhṇātu dharmarājo yudhiṣṭhiraḥ

जब तुम सिर झुकाकर प्रणाम करो, तब राजाओं में श्रेष्ठ धर्मराज युधिष्ठिर तुम्हें अपने दोनों हाथों से थाम लें।

श्लोक 13 (5.126.13)

ध्वजाङ्कुशपताकाङ्कं दक्षिणं ते सुदक्षिणः । स्कन्धे निक्षिपतां बाहुं शान्तये भरतर्षभ ॥

dhvajāṅkuśapatākāṅkaṃ dakṣiṇaṃ te sudakṣiṇaḥ | skandhe nikṣipatāṃ bāhuṃ śāntaye bharatarṣabha

हे भरतश्रेष्ठ, शान्ति के लिए वह परम उदार पुरुष ध्वज, अंकुश और पताका के चिह्नों से अंकित अपनी दाहिनी भुजा तुम्हारे कन्धे पर रखें।

श्लोक 14 (5.126.14)

रत्नौषधिसमेतेन रत्नाङ्गुलितलेन च । उपविष्टस्य पृष्ठं ते पाणिना परिमार्जतु ॥

ratnauṣadhisametena ratnāṅgulitalena ca | upaviṣṭasya pṛṣṭhaṃ te pāṇinā parimārjatu

जब तुम बैठो, तब वे रत्नों और औषधियों से युक्त, रत्नजटित उँगलियों और हथेली वाले अपने हाथ से तुम्हारी पीठ सहलाएँ।

श्लोक 15 (5.126.15)

शालस्कन्धो महाबाहुस्त्वां स्वजानो वृकोदरः । साम्नाऽभिवदतां चापि शान्तये भरतर्षभ ॥

śālaskandho mahābāhustvāṃ svajāno vṛkodaraḥ | sāmnā'bhivadatāṃ cāpi śāntaye bharatarṣabha

हे भरतश्रेष्ठ, शाल वृक्ष के समान कन्धों वाले महाबाहु वृकोदर तुम्हें गले लगाकर शान्ति के लिए तुमसे मधुर वचन कहें।

श्लोक 16 (5.126.16)

अर्जुनेन यमाभ्यां च त्रिभिस्तैरभिवादितः । मूर्ध्नि तान्समुपाघ्राय प्रेम्णाऽभिवद पार्थिव ॥

arjunena yamābhyāṃ ca tribhistairabhivāditaḥ | mūrdhni tānsamupāghrāya premṇā'bhivada pārthiva

हे राजन्, अर्जुन और दोनों जुड़वाँ भाई — ये तीनों जब तुम्हें प्रणाम करें, तब प्रेम से उनका सिर सूँघकर उनसे स्नेहपूर्वक बोलो।

श्लोक 17 (5.126.17)

दृष्ट्वा त्वां पाण्डवैर्वीरैर्भ्रातृभिः सह संगतम् । यावदानन्दजाश्रूणि प्रमुञ्चन्तु नराधिपाः ॥

dṛṣṭvā tvāṃ pāṇḍavairvīrairbhrātṛbhiḥ saha saṃgatam | yāvadānandajāśrūṇi pramuñcantu narādhipāḥ

तुम्हें अपने वीर भाइयों पाण्डवों के साथ मिला हुआ देखकर राजा लोग आनन्द के आँसू बहाएँ।

श्लोक 18 (5.126.18)

घुष्यतां राजधानीषु सर्वसंपन्महीक्षिताम् । पृथिवी भ्रातृभावेन भुज्यतां विज्वरो भव ॥

ghuṣyatāṃ rājadhānīṣu sarvasaṃpanmahīkṣitām | pṛthivī bhrātṛbhāvena bhujyatāṃ vijvaro bhava

राजाओं की राजधानियों में यह घोषणा हो कि सब कुशल है; पृथ्वी का भोग भाईचारे से किया जाए; तुम इस सन्ताप से मुक्त हो जाओ।"

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