उद्योग पर्व · अध्याय 127
दुर्योधन का इनकार: सुई की नोक भर भूमि भी नहीं
दुर्योधन कुरुसभा में कृष्ण को उत्तर देता है और शिकायत करता है कि कृष्ण, विदुर, राजा, द्रोण और भीष्म — सब पाण्डवों के पक्षपात में केवल उसी की निन्दा करते हैं। वह अपना कोई दोष नहीं मानता: पाण्डवों ने अपनी स्वीकृति से हुए द्यूत में राज्य हारा, और उनका वनवास उसका किया हुआ नहीं था। यह घोषणा करते हुए कि वह धर्म और ब्राह्मणों के सिवा किसी के आगे नहीं झुकेगा और युद्ध में मृत्यु ही क्षत्रिय का स्वर्ग है, वह प्रण करता है कि उसके जीते-जी पाण्डवों को उनका भाग नहीं मिलेगा — सुई की नोक जितनी भूमि भी नहीं।
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 1 (5.127.1)
श्रुत्वा दुर्योधनो वाक्यमप्रियं कुरुसंसदि । प्रत्युवाच महाबाहुं वासुदेवं यशस्विनम् ॥
śrutvā duryodhano vākyamapriyaṃ kurusaṃsadi | pratyuvāca mahābāhuṃ vāsudevaṃ yaśasvinam
कुरुसभा में ये अप्रिय वचन सुनकर दुर्योधन ने महाबाहु, यशस्वी वासुदेव को उत्तर दिया —
दुर्योधन उवाच
श्लोक 2 (5.127.2)
प्रसमीक्ष्य भवानेतद्वक्तुमर्हति केशव । मामेव हि विशेषेण विभाष्य परिगर्हसे ॥
prasamīkṣya bhavānetadvaktumarhati keśava | māmeva hi viśeṣeṇa vibhāṣya parigarhase
"केशव, आपको भली-भाँति सोच-समझकर ही यह बात कहनी चाहिए। पर आप विशेष रूप से मुझे ही कठोर वचन कहकर मेरी निन्दा करते हैं।
श्लोक 3 (5.127.3)
भक्तिवादेन पार्थानामकस्मान्मधुसूदन । भवान्गर्हयति नित्यं किं समीक्ष्य बलाबलम् ॥
bhaktivādena pārthānāmakasmānmadhusūdana | bhavāngarhayati nityaṃ kiṃ samīkṣya balābalam
मधुसूदन, पृथापुत्रों के प्रति पक्षपात के कारण आप अकारण ही सदा मेरी निन्दा करते हैं। आपने किस बल-अबल का विचार करके ऐसा किया है?
श्लोक 4 (5.127.4)
भवान्क्षत्ता च राजा वाऽप्याचार्यो वा पितामहः । मामेव परिगर्हन्ते नान्यं कंचन पाण्डवम् ॥
bhavānkṣattā ca rājā vā'pyācāryo vā pitāmahaḥ | māmeva parigarhante nānyaṃ kaṃcana pāṇḍavam
आप, क्षत्ता विदुर, राजा, आचार्य और पितामह — सब मेरी ही निन्दा करते हैं, किसी पाण्डव की नहीं।
श्लोक 5 (5.127.5)
न चाहं लक्षये कंचिद्व्यभिचारमिहात्मनः । अथ सर्वे भवन्तो मां विद्विषन्ति सराजकाः ॥
na cāhaṃ lakṣaye kaṃcidvyabhicāramihātmanaḥ | atha sarve bhavanto māṃ vidviṣanti sarājakāḥ
मैं इसमें अपना कोई दोष नहीं देखता; फिर भी आप सब राजाओं सहित मुझसे द्वेष करते हैं।
श्लोक 6 (5.127.6)
न चाहं कंचिदत्यर्थमपराधमरिन्दम । विचिन्तयन्प्रपश्यामि सुसूक्ष्ममपि केशव ॥
na cāhaṃ kaṃcidatyarthamaparādhamarindama | vicintayanprapaśyāmi susūkṣmamapi keśava
हे शत्रुदमन केशव, विचार करने पर भी मुझे अपना कोई बड़ा अपराध, अत्यन्त सूक्ष्म भी, दिखाई नहीं देता।
श्लोक 7 (5.127.7)
प्रियाभ्युपगते द्यूते पाण्डवा मधुसूदन । जिताः शकुनिना राज्यं तत्र किं मम दुष्कृतम् ॥
priyābhyupagate dyūte pāṇḍavā madhusūdana | jitāḥ śakuninā rājyaṃ tatra kiṃ mama duṣkṛtam
मधुसूदन, जिस द्यूत को उन्होंने प्रसन्नता से स्वीकार किया था, उसमें शकुनि ने पाण्डवों का राज्य जीत लिया। इसमें मेरा क्या दोष?
श्लोक 8 (5.127.8)
यत्पुनर्द्रविणं किंचित्तत्राजीयन्त पाण्डवाः । तेभ्य एवाभ्यनुज्ञातं तत्तदा मधुसूदन ॥
yatpunardraviṇaṃ kiṃcittatrājīyanta pāṇḍavāḥ | tebhya evābhyanujñātaṃ tattadā madhusūdana
और मधुसूदन, उस समय पाण्डवों ने जो कुछ धन हारा था, वह उसी समय उन्हें लौटा दिया गया था।
श्लोक 9 (5.127.9)
अपराधो न चास्माकं यत्ते ह्यक्षैः पराजिताः । अजेया जयतां श्रेष्ठ पार्थाः प्रव्राजिता वनम् ॥
aparādho na cāsmākaṃ yatte hyakṣaiḥ parājitāḥ | ajeyā jayatāṃ śreṣṭha pārthāḥ pravrājitā vanam
हे विजेताओं में श्रेष्ठ, इसमें हमारा कोई अपराध नहीं कि पासों में हारकर वे अजेय पृथापुत्र वन में निर्वासित हुए।
श्लोक 10 (5.127.10)
केन वाऽप्यपवादेन विरुध्यन्त्यरिभिः सह । अशक्ताः पाण्डवाः कृष्ण प्रहृष्टाः प्रत्यमित्रवत् ॥
kena vā'pyapavādena virudhyantyaribhiḥ saha | aśaktāḥ pāṇḍavāḥ kṛṣṇa prahṛṣṭāḥ pratyamitravat
कृष्ण, किस आरोप पर असमर्थ होते हुए भी पाण्डव हर्ष के साथ शत्रुओं से मिलकर हमसे वैरियों जैसा विरोध करते हैं?
श्लोक 11 (5.127.11)
किमस्माभिः कृतं तेषां कस्मिन्वा पुनरागसि । धार्तराष्ट्राञ्जिघांसन्ति पाण्डवाः सृञ्जयैः सह ॥
kimasmābhiḥ kṛtaṃ teṣāṃ kasminvā punarāgasi | dhārtarāṣṭrāñjighāṃsanti pāṇḍavāḥ sṛñjayaiḥ saha
हमने उनका क्या बिगाड़ा है, या किस अपराध के कारण पाण्डव सृंजयों के साथ मिलकर धृतराष्ट्र के पुत्रों को मारना चाहते हैं?
श्लोक 12 (5.127.12)
न चापि वयमुग्रेण कर्मणा वचनेन वा । प्रभ्रष्टाः प्रणमामेह भयादपि शतक्रतुम् ॥
na cāpi vayamugreṇa karmaṇā vacanena vā | prabhraṣṭāḥ praṇamāmeha bhayādapi śatakratum
हम किसी उग्र कर्म या वचन से विचलित होकर यहाँ झुकने वाले नहीं — भय के कारण इन्द्र के आगे भी नहीं।
श्लोक 13 (5.127.13)
न च तं कृष्ण पश्यामि क्षत्रधर्ममनुष्ठितम् । उत्सहेत युधा जेतुं यो नः शत्रुनिबर्हण ॥
na ca taṃ kṛṣṇa paśyāmi kṣatradharmamanuṣṭhitam | utsaheta yudhā jetuṃ yo naḥ śatrunibarhaṇa
हे शत्रुसंहारक कृष्ण, मुझे क्षत्रियधर्म का पालन करने वाला ऐसा कोई नहीं दिखता, जो युद्ध में हमें जीतने का साहस कर सके।
श्लोक 14 (5.127.14)
न हि भीष्मकृपद्रोणाः सकर्णा मधुसूदन । देवैरपि युधा जेतुं शक्याः किमुत पाण्डवैः ॥
na hi bhīṣmakṛpadroṇāḥ sakarṇā madhusūdana | devairapi yudhā jetuṃ śakyāḥ kimuta pāṇḍavaiḥ
मधुसूदन, कर्ण सहित भीष्म, कृप और द्रोण को युद्ध में देवता भी नहीं जीत सकते, फिर पाण्डवों की तो बात ही क्या!
श्लोक 15 (5.127.15)
स्वधर्ममनुपश्यन्तो यदि माधव संयुगे । अस्त्रेण निधनं काले प्राप्स्यामः स्वर्ग्यमेव तत् ॥
svadharmamanupaśyanto yadi mādhava saṃyuge | astreṇa nidhanaṃ kāle prāpsyāmaḥ svargyameva tat
माधव, यदि अपने धर्म का ध्यान रखते हुए हम समय आने पर युद्ध में शस्त्र से मृत्यु पाएँ, तो वह भी स्वर्ग देने वाली ही होगी।
श्लोक 16 (5.127.16)
मुख्यश्चैवैष नो धर्मः क्षत्रियाणां जनार्दन । यच्छयीमहि सङ्ग्रामे शरतल्पगता वयम् ॥
mukhyaścaivaiṣa no dharmaḥ kṣatriyāṇāṃ janārdana | yacchayīmahi saṅgrāme śaratalpagatā vayam
जनार्दन, हम क्षत्रियों का यही मुख्य धर्म है कि हम संग्राम में बाणों की शय्या पर सोएँ।
श्लोक 17 (5.127.17)
ते वयं वीरशयनं प्राप्स्यामो यदि संयुगे । अप्रणम्यैव शत्रूणां न नस्तप्स्यन्ति माधव ॥
te vayaṃ vīraśayanaṃ prāpsyāmo yadi saṃyuge | apraṇamyaiva śatrūṇāṃ na nastapsyanti mādhava
माधव, यदि शत्रुओं के आगे झुके बिना हम युद्ध में वीरशय्या पा लें, तो हमें कोई पछतावा नहीं होगा।
श्लोक 18 (5.127.18)
कश्च जातु कुले जातः क्षत्रधर्मेण वर्तयन् । भयाद्वृत्तिं समीक्ष्यैवं प्रणमेदिह कर्हिचित् ॥
kaśca jātu kule jātaḥ kṣatradharmeṇa vartayan | bhayādvṛttiṃ samīkṣyaivaṃ praṇamediha karhicit
उत्तम कुल में जन्मा, क्षत्रियधर्म से जीवन बिताने वाला कौन पुरुष अपनी आजीविका का विचार करके भय से यहाँ कभी झुकेगा?
श्लोक 19 (5.127.19)
उद्यच्छेदेव न नमेदुद्यमो ह्येव पौरुषम् । अप्यपर्वणि भज्येत न नमेदिह कर्हिचित् ॥
udyacchedeva na namedudyamo hyeva pauruṣam | apyaparvaṇi bhajyeta na namediha karhicit
मनुष्य को तना रहना चाहिए, झुकना नहीं चाहिए, क्योंकि उद्यम ही पौरुष है; वह बिना जोड़ के स्थान पर भले टूट जाए, पर यहाँ कभी न झुके।
श्लोक 20 (5.127.20)
इति मातङ्गवचनं परीप्सन्ति हितेप्सवः । धर्माय चैव प्रणमेद्ब्राह्मणेभ्यश्च मद्विधः ॥
iti mātaṅgavacanaṃ parīpsanti hitepsavaḥ | dharmāya caiva praṇamedbrāhmaṇebhyaśca madvidhaḥ
यह मुनि मातंग का वचन है, जिसे अपना हित चाहने वाले अपनाते हैं। मुझ जैसे व्यक्ति को केवल धर्म और ब्राह्मणों के आगे झुकना चाहिए,
श्लोक 21 (5.127.21)
अचिन्तयन्कंचिदन्यं यावज्जीवं तथा चरेत् । एष धर्मः क्षत्रियाणां मतमेतच्च मे सदा ॥
acintayankaṃcidanyaṃ yāvajjīvaṃ tathā caret | eṣa dharmaḥ kṣatriyāṇāṃ matametacca me sadā
और किसी अन्य की परवाह न करते हुए जीवन भर ऐसा ही आचरण करना चाहिए। यही क्षत्रियों का धर्म है और यही सदा से मेरा मत है।
श्लोक 22 (5.127.22)
राज्यांशश्चाभ्यनुज्ञातो यो मे पित्रा पुराऽभवत् । न स लभ्यः पुनर्जातु मयि जीवति केशव ॥
rājyāṃśaścābhyanujñāto yo me pitrā purā'bhavat | na sa labhyaḥ punarjātu mayi jīvati keśava
केशव, मेरे पिता ने पहले राज्य का जो भाग उन्हें दे दिया था, वह मेरे जीते-जी उन्हें फिर कभी नहीं मिलेगा।
श्लोक 23 (5.127.23)
यावच्च राजा ध्रियते धृतराष्ट्रो जनार्दन । न्यस्तशस्त्रा वयं ते वाऽप्युपजीवाम माधव । अप्रदेयं पुरा दत्तं राज्यं परवतो मम ॥
yāvacca rājā dhriyate dhṛtarāṣṭro janārdana | nyastaśastrā vayaṃ te vā'pyupajīvāma mādhava | apradeyaṃ purā dattaṃ rājyaṃ paravato mama
जनार्दन, जब तक राजा धृतराष्ट्र जीवित हैं, तब तक माधव, हम या वे शस्त्र रखकर उन्हीं के आश्रय में जीवन बिताएँ। जो राज्य कभी दिया ही नहीं जाना चाहिए था, वह पहले, जब मैं पराधीन था,
श्लोक 24 (5.127.24)
अज्ञानाद्वा भयाद्वाऽपि मयि बाले जनार्दन । न तदद्य पुनर्लभ्यं पाण्डवैर्वृष्णिनन्दन ॥
ajñānādvā bhayādvā'pi mayi bāle janārdana | na tadadya punarlabhyaṃ pāṇḍavairvṛṣṇinandana
अज्ञान से या भय से, मेरे बचपन में दे दिया गया था, हे जनार्दन — हे वृष्णिनन्दन, वह आज पाण्डवों को फिर नहीं मिल सकता,
श्लोक 25 (5.127.25)
ध्रियमाणे महाबाहौ मयि संप्रति केशव । यावद्धि तीक्ष्णया सूच्या विध्येदग्रेण केशव । तावदप्यपरित्याज्यं भूमेर्नः पाण्डवान्प्रति ॥
dhriyamāṇe mahābāhau mayi saṃprati keśava | yāvaddhi tīkṣṇayā sūcyā vidhyedagreṇa keśava | tāvadapyaparityājyaṃ bhūmernaḥ pāṇḍavānprati
जब तक मैं महाबाहु अब जीवित हूँ, केशव। तीखी सुई की नोक से जितनी भूमि छिदती है, केशव, उतनी भी हम पाण्डवों के लिए नहीं छोड़ेंगे।"