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उद्योग पर्व · अध्याय 128

कृष्ण का कुरुओं से दुर्योधन को बाँधने का आग्रह

दुर्योधन के अपने को निर्दोष बताने पर श्रीकृष्ण पाण्डवों के प्रति उसके अपराध गिनाते हैं: कपट-द्यूत, द्रौपदी का अपमान, वारणावत का अग्निकाण्ड तथा विष और सर्पों से मारने के प्रयत्न। दुःशासन जब दुर्योधन को चेताता है कि बड़े लोग उसे बाँधकर पाण्डवों को सौंप देंगे, तब दुर्योधन क्रुद्ध होकर भाइयों और साथियों सहित सभा से निकल जाता है और भीष्म कहते हैं कि सारा क्षत्रिय-समाज काल के वश में पक चुका है। तब श्रीकृष्ण बड़ों से कहते हैं कि जैसे यादवों ने कंस को त्याग दिया और धर्म ने दैत्यों को बाँधकर वरुण को सौंप दिया, वैसे ही वे कुल की रक्षा के लिए दुर्योधन, कर्ण, शकुनि और दुःशासन को बाँधकर पाण्डवों को सौंप दें।

अध्याय 127अध्याय-सूचीअध्याय 129

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 1 (5.128.1)

ततः प्रहस्य दाशार्हः क्रोधपर्याकुलेक्षणः । दुर्योधनमिदं वाक्यमब्रवीत्कुरुसंसदि ॥

tataḥ prahasya dāśārhaḥ krodhaparyākulekṣaṇaḥ | duryodhanamidaṃ vākyamabravītkurusaṃsadi

तब दाशार्ह श्रीकृष्ण ने हँसकर, क्रोध से चंचल नेत्रों के साथ, कुरुसभा में दुर्योधन से यह वचन कहा—

वासुदेव उवाच

श्लोक 2 (5.128.2)

लप्स्यसे वीरशयनं काममेतदवाप्स्यसि । स्थिरो भव सहामात्यो विमर्दो भविता महान् ॥

lapsyase vīraśayanaṃ kāmametadavāpsyasi | sthiro bhava sahāmātyo vimardo bhavitā mahān

"तुझे वीरशय्या मिलेगी; जैसी तेरी इच्छा है, वह तुझे प्राप्त होगी। अपने मन्त्रियों सहित स्थिर रह, बड़ा भारी संहार होने वाला है।

श्लोक 3 (5.128.3)

यच्चैतन्मन्यसे मूढ न मे कश्चिद्व्यतिक्रमः । पाण्डवेष्विति तत्सर्वं निबोध त्वं नराधिप ॥

yaccaitanmanyase mūḍha na me kaścidvyatikramaḥ | pāṇḍaveṣviti tatsarvaṃ nibodha tvaṃ narādhipa

मूर्ख! तू जो यह मानता है कि पाण्डवों के प्रति मेरा कोई अपराध नहीं है, तो हे नरेश्वर, वह सब सुन ले।

श्लोक 4 (5.128.4)

श्रियां संतप्यमानेन पाण्डवानां महात्मनाम् । त्वया दुर्मन्त्रितं द्यूतं सौबलेन च भारत ॥

śriyāṃ saṃtapyamānena pāṇḍavānāṃ mahātmanām | tvayā durmantritaṃ dyūtaṃ saubalena ca bhārata

हे भारत, महात्मा पाण्डवों की समृद्धि से जलते हुए तूने और सौबल (शकुनि) ने मिलकर द्यूत का कुमन्त्रण रचा।

श्लोक 5 (5.128.5)

कथं च ज्ञातयस्तात श्रेयांसः साधुसंमताः । तथाऽन्याय्यमुपस्थातुं जिह्मेनाजिह्मचारिणः ॥

kathaṃ ca jñātayastāta śreyāṃsaḥ sādhusaṃmatāḥ | tathā'nyāyyamupasthātuṃ jihmenājihmacāriṇaḥ

तात, जो जाति-बन्धु तुझसे श्रेष्ठ थे, सज्जनों द्वारा सम्मानित थे और सरल आचरण वाले थे, उन पर एक कुटिल मनुष्य ऐसा अन्यायपूर्ण आक्रमण कैसे कर सकता था?

श्लोक 6 (5.128.6)

अक्षद्यूतं महाप्रज्ञ सतां मतिविनाशनम् । असतां तत्र जायन्ते भेदाश्च व्यसनानि च ॥

akṣadyūtaṃ mahāprajña satāṃ mativināśanam | asatāṃ tatra jāyante bhedāśca vyasanāni ca

हे महाप्राज्ञ, पासों का जुआ सज्जनों की बुद्धि नष्ट कर देता है, और दुष्टों में उससे फूट और विपत्तियाँ उत्पन्न होती हैं।

श्लोक 7 (5.128.7)

तदिदं व्यसनं घोरं त्वया द्यूतमुखं कृतम् । असमीक्ष्य सदाचारान्सार्धं पापानुबन्धनैः ॥

tadidaṃ vyasanaṃ ghoraṃ tvayā dyūtamukhaṃ kṛtam | asamīkṣya sadācārānsārdhaṃ pāpānubandhanaiḥ

द्यूत से आरम्भ हुई यह भयंकर विपत्ति तूने अपने पापी साथियों के साथ मिलकर, सदाचार का कोई विचार किए बिना, खड़ी की है।

श्लोक 8 (5.128.8)

कश्चान्यो भ्रातृभार्यां वै विप्रकर्तुं तथार्हति । आनीय च सभां व्यक्तं यथोक्ता द्रौपदी त्वया ॥

kaścānyo bhrātṛbhāryāṃ vai viprakartuṃ tathārhati | ānīya ca sabhāṃ vyaktaṃ yathoktā draupadī tvayā

और कौन ऐसा है जो अपने भाई की पत्नी का इस प्रकार अपमान करे, उसे सभा में घसीट लाए और खुलेआम वैसे वचन कहे जैसे तूने द्रौपदी से कहे?

श्लोक 9 (5.128.9)

कुलीना शीलसंपन्ना प्राणेभ्योऽपि गरीयसी । महिषी पाण्डुपुत्राणां तथा विनिकृता त्वया ॥

kulīnā śīlasaṃpannā prāṇebhyo'pi garīyasī | mahiṣī pāṇḍuputrāṇāṃ tathā vinikṛtā tvayā

उच्च कुल में जन्मी, शीलवती, पाण्डवों को प्राणों से भी अधिक प्रिय, पाण्डुपुत्रों की महारानी—उसका तूने ऐसा अपमान किया।

श्लोक 10 (5.128.10)

जानन्ति कुरवः सर्वे यथोक्ताः कुरुसंसदि । दुःशासनेन कौन्तेयाः प्रव्रजन्तः परन्तपाः ॥

jānanti kuravaḥ sarve yathoktāḥ kurusaṃsadi | duḥśāsanena kaunteyāḥ pravrajantaḥ parantapāḥ

सब कुरुवंशी जानते हैं कि जब शत्रुओं को तपाने वाले कुन्तीपुत्र वन को जा रहे थे, तब दुःशासन ने कुरुसभा में उनसे कैसे वचन कहे थे।

श्लोक 11 (5.128.11)

सम्यग्वृत्तेष्वलुब्धेषु सततं धर्मचारिषु । स्वेषु बन्धुषु कः साधुश्चरेदेवमसांप्रतम् ॥

samyagvṛtteṣvalubdheṣu satataṃ dharmacāriṣu | sveṣu bandhuṣu kaḥ sādhuścaredevamasāṃpratam

जो अपने बन्धु सदा उचित आचरण करते हैं, लोभरहित हैं और निरन्तर धर्म पर चलते हैं, उनके साथ कौन सज्जन ऐसा अनुचित व्यवहार करेगा?

श्लोक 12 (5.128.12)

नृशंसानामनार्याणां तथा परुषभाषणम् । कर्णदुःशासनाभ्यां च त्वया च बहुशः कृतम् ॥

nṛśaṃsānāmanāryāṇāṃ tathā paruṣabhāṣaṇam | karṇaduḥśāsanābhyāṃ ca tvayā ca bahuśaḥ kṛtam

कर्ण और दुःशासन ने तथा तूने भी अनेक बार क्रूर और नीच लोगों जैसे कठोर वचन कहे।

श्लोक 13 (5.128.13)

सह मात्रा प्रदग्धुं तान्बालकान्वारणावते । आस्थितः परमो यत्नो न समृद्धश्च तत्तव ॥

saha mātrā pradagdhuṃ tānbālakānvāraṇāvate | āsthitaḥ paramo yatno na samṛddhaśca tattava

वारणावत में उन बालकों को उनकी माता सहित जला डालने का तूने भरपूर प्रयत्न किया, पर तेरा वह प्रयत्न सफल नहीं हुआ।

श्लोक 14 (5.128.14)

ऊषुश्च सुचिरं कालं प्रच्छन्नाः पाण्डवास्तदा । मात्रा सहैकचक्रायां ब्राह्मणस्य निवेशने ॥

ūṣuśca suciraṃ kālaṃ pracchannāḥ pāṇḍavāstadā | mātrā sahaikacakrāyāṃ brāhmaṇasya niveśane

तब पाण्डव अपनी माता के साथ एकचक्रा नगरी में एक ब्राह्मण के घर बहुत समय तक छिपकर रहे।

श्लोक 15 (5.128.15)

विषेण सर्पबन्धैश्च यतिताः पाण्डवास्त्वया । सर्वोपायैर्विनाशाय न समृद्धं च तत्तव ॥

viṣeṇa sarpabandhaiśca yatitāḥ pāṇḍavāstvayā | sarvopāyairvināśāya na samṛddhaṃ ca tattava

विष देकर, सर्पों से बँधवाकर—सब उपायों से तूने पाण्डवों को नष्ट करने का प्रयत्न किया, पर वह भी सफल नहीं हुआ।

श्लोक 16 (5.128.16)

एवंबुद्धिः पाण्डवेषु मिथ्यावृत्तिः सदा भवान् । कथं ते नापराधोऽस्ति पाण्डवेषु महात्मसु ॥

evaṃbuddhiḥ pāṇḍaveṣu mithyāvṛttiḥ sadā bhavān | kathaṃ te nāparādho'sti pāṇḍaveṣu mahātmasu

पाण्डवों के प्रति ऐसी बुद्धि रखने वाला और सदा उनके साथ कपटपूर्ण व्यवहार करने वाला तू—महात्मा पाण्डवों के प्रति तेरा अपराध कैसे नहीं है?

श्लोक 17 (5.128.17)

एवंवृत्तः कथं राज्ये स्थातुमर्हसि पापकृत् । स राज्याच्च सुखाच्चैव हास्यसे कुलपांसन ॥

evaṃvṛttaḥ kathaṃ rājye sthātumarhasi pāpakṛt | sa rājyācca sukhāccaiva hāsyase kulapāṃsana

ऐसा आचरण करने वाला पापी तू राज्य पर बने रहने के योग्य कैसे है? हे कुलकलंक, तू राज्य से भी और सुख से भी हाथ धो बैठेगा।

श्लोक 18 (5.128.18)

यच्चैभ्यो याचमानेभ्यः पित्र्यमंशं न दित्ससि । तच्च पाप प्रदाताऽसि भ्रष्टैश्वर्यो निपातितः ॥

yaccaibhyo yācamānebhyaḥ pitryamaṃśaṃ na ditsasi | tacca pāpa pradātā'si bhraṣṭaiśvaryo nipātitaḥ

और जो पैतृक अंश तू इनके माँगने पर भी देना नहीं चाहता, हे पापी, ऐश्वर्य से भ्रष्ट होकर गिराए जाने पर वही तुझे देना पड़ेगा।

श्लोक 19 (5.128.19)

कृत्वा बहून्यकार्याणि पाण्डवेषु नृशंसवत् । मिथ्यावृत्तिरनार्यः सन्नद्य विप्रतिपद्यसे ॥

kṛtvā bahūnyakāryāṇi pāṇḍaveṣu nṛśaṃsavat | mithyāvṛttiranāryaḥ sannadya vipratipadyase

क्रूर मनुष्य की भाँति पाण्डवों के प्रति अनेक अकर्म करके, कपटी और अनार्य होते हुए भी आज तू मुकर रहा है।

श्लोक 20 (5.128.20)

मातापितृभ्यां भीष्मेण द्रोणेन विदुरेण च । शाम्येति मुहुरुक्तोऽसि न च शाम्यसि पार्थिव ॥

mātāpitṛbhyāṃ bhīṣmeṇa droṇena vidureṇa ca | śāmyeti muhurukto'si na ca śāmyasi pārthiva

माता-पिता ने, भीष्म, द्रोण और विदुर ने तुझसे बार-बार कहा कि 'शान्त हो जा', पर हे राजन्, तू शान्त नहीं होता।

श्लोक 21 (5.128.21)

शमे हि सुमहाँल्लाभस्तव पार्थस्य चोभयोः । न च रोचयसे राजन्किमन्यद्बुद्धिलाघवात् ॥

śame hi sumahām̐llābhastava pārthasya cobhayoḥ | na ca rocayase rājankimanyadbuddhilāghavāt

शान्ति में तुम्हारा और पार्थ—दोनों का बहुत बड़ा लाभ है, पर हे राजन्, वह तुझे अच्छी नहीं लगती। यह बुद्धि के ओछेपन के सिवा और क्या है?

श्लोक 22 (5.128.22)

न शर्म प्राप्स्यसे राजन्नुत्क्रम्य सुहृदां वचः । अधर्म्यमयशस्यं च क्रियते पार्थिव त्वया ॥

na śarma prāpsyase rājannutkramya suhṛdāṃ vacaḥ | adharmyamayaśasyaṃ ca kriyate pārthiva tvayā

हे राजन्, हितैषियों की बात का उल्लंघन करके तुझे सुख नहीं मिलेगा। हे पृथ्वीपति, तू जो कर रहा है वह अधर्म और अपयश का काम है।"

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 23 (5.128.23)

एवं ब्रुवति दाशार्हे दुर्योधनममर्षणम् । दुःशासन इदं वाक्यमब्रवीत्कुरुसंसदि ॥

evaṃ bruvati dāśārhe duryodhanamamarṣaṇam | duḥśāsana idaṃ vākyamabravītkurusaṃsadi

जब दाशार्ह श्रीकृष्ण क्रोधी दुर्योधन से इस प्रकार कह रहे थे, तब दुःशासन ने कुरुसभा में यह बात कही—

दुःशासन उवाच

श्लोक 24 (5.128.24)

न चेत्सन्धास्यसे राजन्स्वेन कामेन पाण्डवैः । बद्ध्वा किल त्वां दास्यन्ति कुन्तीपुत्राय कौरवाः ॥

na cetsandhāsyase rājansvena kāmena pāṇḍavaiḥ | baddhvā kila tvāṃ dāsyanti kuntīputrāya kauravāḥ

"हे राजन्, यदि तुम अपनी इच्छा से पाण्डवों से सन्धि नहीं करोगे, तो लगता है कौरव तुम्हें बाँधकर कुन्तीपुत्र को सौंप देंगे।

श्लोक 25 (5.128.25)

वैकर्तनं त्वां च मां च त्रीनेतान्मनुजर्षभ । पाण्डवेभ्यः प्रदास्यन्ति भीष्मो द्रोणः पिता च ते ॥

vaikartanaṃ tvāṃ ca māṃ ca trīnetānmanujarṣabha | pāṇḍavebhyaḥ pradāsyanti bhīṣmo droṇaḥ pitā ca te

हे नरश्रेष्ठ, वैकर्तन (कर्ण) को, तुम्हें और मुझे—हम तीनों को भीष्म, द्रोण और तुम्हारे पिता पाण्डवों को सौंप देंगे।"

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 26 (5.128.26)

भ्रातुरेतद्वचः श्रुत्वा धार्तराष्ट्रः सुयोधनः । क्रुद्धः प्रातिष्ठतोत्थाय महानाग इव श्वसन् ॥

bhrāturetadvacaḥ śrutvā dhārtarāṣṭraḥ suyodhanaḥ | kruddhaḥ prātiṣṭhatotthāya mahānāga iva śvasan

भाई की यह बात सुनकर धृतराष्ट्रपुत्र सुयोधन क्रोध में भरकर उठा और बड़े नाग की भाँति फुफकारता हुआ चल पड़ा।

श्लोक 27 (5.128.27)

विदुरं धृतराष्ट्रं च महाराजं च बाह्लिकम् । कृपं च सोमदत्तं च भीष्मं द्रोणं जनार्दनम् ॥

viduraṃ dhṛtarāṣṭraṃ ca mahārājaṃ ca bāhlikam | kṛpaṃ ca somadattaṃ ca bhīṣmaṃ droṇaṃ janārdanam

उसने विदुर, धृतराष्ट्र, महाराज बाह्लीक, कृप, सोमदत्त, भीष्म, द्रोण और जनार्दन—

श्लोक 28 (5.128.28)

सर्वानेताननादृत्य दुर्मतिर्निरपत्रपः । अशिष्टवदमर्यादो मानी मान्यावमानिता ॥

sarvānetānanādṛtya durmatirnirapatrapaḥ | aśiṣṭavadamaryādo mānī mānyāvamānitā

इन सबका अनादर करके वह दुर्बुद्धि, निर्लज्ज, असभ्य की भाँति मर्यादाहीन, अभिमानी और माननीयों का अपमान करने वाला (सभा से चला गया)।

श्लोक 29 (5.128.29)

तं प्रस्थितमभिप्रेक्ष्य भ्रातरो मनुजर्षभम् । अनुजग्मुः सहामात्या राजानश्चापि सर्वशः ॥

taṃ prasthitamabhiprekṣya bhrātaro manujarṣabham | anujagmuḥ sahāmātyā rājānaścāpi sarvaśaḥ

उस नरश्रेष्ठ को जाते देखकर उसके भाई, मन्त्री और सब राजा भी उसके पीछे चल पड़े।

श्लोक 30 (5.128.30)

सभायामुत्थितं क्रुद्धं प्रस्थितं भ्रातृभिः सह । दुर्योधनमभिप्रेक्ष्य भीष्मः शान्तनवोऽब्रवीत् ॥

sabhāyāmutthitaṃ kruddhaṃ prasthitaṃ bhrātṛbhiḥ saha | duryodhanamabhiprekṣya bhīṣmaḥ śāntanavo'bravīt

दुर्योधन को सभा में क्रोधपूर्वक उठकर भाइयों के साथ जाते देख शान्तनुनन्दन भीष्म बोले—

भीष्म उवाच

श्लोक 31 (5.128.31)

धर्मार्थावभिसन्त्यज्य संरम्भं योऽनुमन्यते । हसन्ति व्यसने तस्य दुर्हृदो नचिरादिव ॥

dharmārthāvabhisantyajya saṃrambhaṃ yo'numanyate | hasanti vyasane tasya durhṛdo nacirādiva

"जो धर्म और अर्थ को छोड़कर क्रोध का अनुसरण करता है, उसकी विपत्ति में उसके शत्रु शीघ्र ही उस पर हँसते हैं।

श्लोक 32 (5.128.32)

दुरात्मा राजपुत्रोऽयं धार्तराष्ट्रोऽनुपायवित् । मिथ्याभिमानी राज्यस्य क्रोधलोभवशानुगः ॥

durātmā rājaputro'yaṃ dhārtarāṣṭro'nupāyavit | mithyābhimānī rājyasya krodhalobhavaśānugaḥ

यह दुरात्मा राजपुत्र धृतराष्ट्रनन्दन उचित उपाय नहीं जानता; यह राज्य का झूठा अभिमान रखता है और क्रोध तथा लोभ के वश में चलता है।

श्लोक 33 (5.128.33)

कालपक्वमिदं मन्ये सर्वं क्षत्रं जनार्दन । सर्वे ह्यनुसृता मोहात्पार्थिवाः सह मन्त्रिभिः ॥

kālapakvamidaṃ manye sarvaṃ kṣatraṃ janārdana | sarve hyanusṛtā mohātpārthivāḥ saha mantribhiḥ

हे जनार्दन, मुझे लगता है कि यह सारा क्षत्रिय-समाज काल के वश में पक चुका है, क्योंकि सब राजा अपने मन्त्रियों सहित मोहवश इसके पीछे चल पड़े हैं।"

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 34 (5.128.34)

भीष्मस्याथ वचः श्रुत्वा दाशार्हः पुष्करेक्षणः । भीष्मद्रोणमुखान्सर्वानभ्यभाषत वीर्यवान् ॥

bhīṣmasyātha vacaḥ śrutvā dāśārhaḥ puṣkarekṣaṇaḥ | bhīṣmadroṇamukhānsarvānabhyabhāṣata vīryavān

भीष्म की बात सुनकर कमलनयन पराक्रमी दाशार्ह श्रीकृष्ण ने भीष्म और द्रोण आदि सब से कहा—

वासुदेव उवाच

श्लोक 35 (5.128.35)

सर्वेषां कुरुवृद्धानां महानयमतिक्रमः । प्रसह्य मन्दमैश्वर्ये न नियच्छन्ति यन्नृपम् ॥

sarveṣāṃ kuruvṛddhānāṃ mahānayamatikramaḥ | prasahya mandamaiśvarye na niyacchanti yannṛpam

"यह सब कुरुवृद्धों का बड़ा भारी दोष है कि वे इस मूर्ख राजा को ऐश्वर्य के मद में बलपूर्वक रोकते नहीं।

श्लोक 36 (5.128.36)

तत्र कार्यमहं मन्ये कालप्राप्तमरिन्दमाः । क्रियमाणे भवेच्छ्रेयस्तत्सर्वं शृणुतानघाः ॥

tatra kāryamahaṃ manye kālaprāptamarindamāḥ | kriyamāṇe bhavecchreyastatsarvaṃ śṛṇutānaghāḥ

हे शत्रुदमन वीरो, इस विषय में मैं एक ऐसा कर्तव्य समझता हूँ जिसका समय आ गया है; उसे करने से कल्याण होगा। हे निष्पाप जनो, वह सब सुनिए।

श्लोक 37 (5.128.37)

प्रत्यक्षमेतद्भवतां यद्वक्ष्यामि हितं वचः । भवतामानुकूल्येन यदि रोचेत भारताः ॥

pratyakṣametadbhavatāṃ yadvakṣyāmi hitaṃ vacaḥ | bhavatāmānukūlyena yadi roceta bhāratāḥ

हे भरतवंशियो, मैं जो हितकर बात कहने जा रहा हूँ, वह आपके सामने प्रत्यक्ष है—यदि आपको रुचे और आपकी सहमति हो।

श्लोक 38 (5.128.38)

पुत्रो वै भोजराजस्य दुराचारो ह्यनात्मवान् । जीवतः पितुरैश्वर्यं हृत्वा मृत्युवशं गतः ॥

putro vai bhojarājasya durācāro hyanātmavān | jīvataḥ pituraiśvaryaṃ hṛtvā mṛtyuvaśaṃ gataḥ

भोजराज का पुत्र दुराचारी और असंयमी था; पिता के जीवित रहते ही उनका ऐश्वर्य छीनकर वह मृत्यु के वश में जा पड़ा।

श्लोक 39 (5.128.39)

उग्रसेनसुतः कंसः परित्यक्तः स बान्धवैः । ज्ञातीनां हितकामेन मया शस्तो महामृधे ॥

ugrasenasutaḥ kaṃsaḥ parityaktaḥ sa bāndhavaiḥ | jñātīnāṃ hitakāmena mayā śasto mahāmṛdhe

उग्रसेन का पुत्र कंस अपने बन्धुओं द्वारा त्याग दिया गया, और जाति-बन्धुओं के हित की इच्छा से मैंने उसे महासंग्राम में मार डाला।

श्लोक 40 (5.128.40)

आहुकः पुनरस्माभिर्ज्ञातिभिश्चापि सत्कृतः । उग्रसेनः कृतो राजा भोजराजन्यवर्धनः ॥

āhukaḥ punarasmābhirjñātibhiścāpi satkṛtaḥ | ugrasenaḥ kṛto rājā bhojarājanyavardhanaḥ

फिर हमने और हमारे जाति-बन्धुओं ने आहुक का पुनः सत्कार किया और भोज-राजवंश की वृद्धि करने वाले उग्रसेन को राजा बनाया।

श्लोक 41 (5.128.41)

कंसमेकं परित्यज्य कुलार्थे सर्वयादवाः । संभूय सुखमेधन्ते भारतान्धकवृष्णयः ॥

kaṃsamekaṃ parityajya kulārthe sarvayādavāḥ | saṃbhūya sukhamedhante bhāratāndhakavṛṣṇayaḥ

हे भारत, कुल के हित के लिए अकेले कंस को त्यागकर सब यादव—अन्धक और वृष्णि—एक होकर सुखपूर्वक उन्नति कर रहे हैं।

श्लोक 42 (5.128.42)

अपि चाप्यवदद्राजन्परमेष्ठी प्रजापतिः । व्यूढे देवासुरे युद्धेऽभ्युद्यतेष्वायुधेषु च ॥

api cāpyavadadrājanparameṣṭhī prajāpatiḥ | vyūḍhe devāsure yuddhe'bhyudyateṣvāyudheṣu ca

हे राजन्, इसके अतिरिक्त, जब देवासुर-संग्राम के लिए सेनाएँ व्यूह में खड़ी थीं और शस्त्र उठ चुके थे, तब परमेष्ठी प्रजापति ने कहा था—

श्लोक 43 (5.128.43)

द्वैधीभूतेषु लोकेषु विनश्यत्सु च भारत । अब्रवीत्तु तदा देवो भगवाँल्लोकभावनः ॥

dvaidhībhūteṣu lokeṣu vinaśyatsu ca bhārata | abravīttu tadā devo bhagavām̐llokabhāvanaḥ

हे भारत, जब लोक दो भागों में बँटकर नष्ट हो रहे थे, तब लोकों के सृष्टिकर्ता भगवान् देव बोले—

श्लोक 44 (5.128.44)

पराभविष्यन्त्यसुरा दैतेया दानवैः सह । आदित्या वसवो रुद्रा भविष्यन्ति दिवौकसः ॥

parābhaviṣyantyasurā daiteyā dānavaiḥ saha | ādityā vasavo rudrā bhaviṣyanti divaukasaḥ

'असुर—दैत्य और दानव—पराजित होंगे; आदित्य, वसु और रुद्र स्वर्गवासी होंगे।

श्लोक 45 (5.128.45)

देवासुरमनुष्याश्च गन्धर्वोरगराक्षसाः । अस्मिन्युद्धे सुसंक्रुद्धा हनिष्यन्ति परस्परम् ॥

devāsuramanuṣyāśca gandharvoragarākṣasāḥ | asminyuddhe susaṃkruddhā haniṣyanti parasparam

देवता, असुर, मनुष्य, गन्धर्व, नाग और राक्षस इस युद्ध में अत्यन्त क्रुद्ध होकर एक-दूसरे का वध करेंगे।

श्लोक 46 (5.128.46)

वर्तमानं जगत्सर्वं मुहूर्तान्न भविष्यति । इति मत्वाऽब्रवीद्धर्मं परमेष्ठी प्रजापतिः । वरुणाय प्रयच्छैतान्बद्ध्वा दैतेयदानवान् ॥

vartamānaṃ jagatsarvaṃ muhūrtānna bhaviṣyati | iti matvā'bravīddharmaṃ parameṣṭhī prajāpatiḥ | varuṇāya prayacchaitānbaddhvā daiteyadānavān

यह सारा वर्तमान जगत् क्षण भर में नहीं रहेगा।' ऐसा विचारकर परमेष्ठी प्रजापति ने धर्म से कहा—'इन दैत्यों और दानवों को बाँधकर वरुण को सौंप दो।'

श्लोक 47 (5.128.47)

एवमुक्तस्ततो धर्मो नियोगात्परमेष्ठिनः । वरुणाय ददौ सर्वान्बद्ध्वा दैतेयदानवान् ॥

evamuktastato dharmo niyogātparameṣṭhinaḥ | varuṇāya dadau sarvānbaddhvā daiteyadānavān

ऐसा कहे जाने पर धर्म ने परमेष्ठी की आज्ञा से सब दैत्यों और दानवों को बाँधकर वरुण को सौंप दिया।

श्लोक 48 (5.128.48)

तान्बद्ध्वा धर्मपाशैश्च स्वैश्च पाशैर्जलेश्वरः । वरुणः सागरे यत्तो नित्यं रक्षति दानवान् ॥

tānbaddhvā dharmapāśaiśca svaiśca pāśairjaleśvaraḥ | varuṇaḥ sāgare yatto nityaṃ rakṣati dānavān

जल के स्वामी वरुण उन दानवों को धर्म के पाशों से और अपने पाशों से बाँधकर सदा सावधानी से समुद्र में उनकी रखवाली करते हैं।

श्लोक 49 (5.128.49)

तथा दुर्योधनं कर्णं शकुनिं चापि सौबलम् । बद्ध्वा दुःशासनं चापि पाण्डवेभ्यः प्रयच्छत ॥

tathā duryodhanaṃ karṇaṃ śakuniṃ cāpi saubalam | baddhvā duḥśāsanaṃ cāpi pāṇḍavebhyaḥ prayacchata

उसी प्रकार आप लोग दुर्योधन, कर्ण, सुबलपुत्र शकुनि और दुःशासन को भी बाँधकर पाण्डवों को सौंप दीजिए।

श्लोक 50 (5.128.50)

त्यजेत्कुलार्थे पुरुषं ग्रामस्यार्थे कुलं त्यजेत् । ग्रामं जनपदस्यार्थे आत्मार्थे पृथिवीं त्यजेत् ॥

tyajetkulārthe puruṣaṃ grāmasyārthe kulaṃ tyajet | grāmaṃ janapadasyārthe ātmārthe pṛthivīṃ tyajet

कुल के लिए एक पुरुष को त्याग दे, गाँव के लिए कुल को त्याग दे, जनपद के लिए गाँव को त्याग दे और आत्मा के लिए पृथ्वी को भी त्याग दे।

श्लोक 51 (5.128.51)

राजन्दुर्योधनं बद्ध्वा ततः संशाम्य पाण्डवैः । त्वत्कृते न विनश्येयुः क्षत्रियाः क्षत्रियर्षभ ॥

rājanduryodhanaṃ baddhvā tataḥ saṃśāmya pāṇḍavaiḥ | tvatkṛte na vinaśyeyuḥ kṣatriyāḥ kṣatriyarṣabha

हे राजन्, दुर्योधन को बाँधकर फिर पाण्डवों के साथ सन्धि कर लीजिए। हे क्षत्रियश्रेष्ठ, आपके कारण क्षत्रियों का विनाश न हो।"

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