उद्योग पर्व · अध्याय 129
गान्धारी का दुर्योधन को उपदेश
श्रीकृष्ण के प्रस्ताव के बाद धृतराष्ट्र विदुर से गान्धारी को बुलवाते हैं, इस आशा में कि वे पुत्र को शान्त कर सकें। गान्धारी पहले धृतराष्ट्र को दुर्योधन के प्रति अत्यधिक मोह के लिए दोष देती हैं और उसे वापस बुलवाने को कहती हैं; विदुर क्रुद्ध राजकुमार को फिर सभा में ले आते हैं। तब गान्धारी दुर्योधन को समझाती हैं कि काम, क्रोध और लोभ को जीते, क्योंकि आत्मजयी ही राज्य पा और बचा सकता है; पाण्डवों को आधा राज्य दे और श्रीकृष्ण की शरण ले; और भीष्म, द्रोण तथा कृप के भरोसे न रहे, क्योंकि वे उसके प्रति निष्ठा से अधिक धर्म को महत्त्व देते हैं।
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 1 (5.129.1)
कृष्णस्य तु वचः श्रुत्वा धृतराष्ट्रो जनेश्वरः । विदुरं सर्वधर्मज्ञं त्वरमाणोऽभ्यभाषत ॥
kṛṣṇasya tu vacaḥ śrutvā dhṛtarāṣṭro janeśvaraḥ | viduraṃ sarvadharmajñaṃ tvaramāṇo'bhyabhāṣata
श्रीकृष्ण की बात सुनकर जनेश्वर धृतराष्ट्र ने सब धर्मों के ज्ञाता विदुर से शीघ्रतापूर्वक कहा—
धृतराष्ट्र उवाच
श्लोक 2 (5.129.2)
गच्छ तात महाप्राज्ञ गान्धारीं दीर्घदर्शिनीम् । आनयेह तया सार्धमनुनेष्यामि दुर्मतिम् ॥
gaccha tāta mahāprājña gāndhārīṃ dīrghadarśinīm | ānayeha tayā sārdhamanuneṣyāmi durmatim
"तात, हे महाप्राज्ञ, जाओ और दूरदर्शिनी गान्धारी को यहाँ ले आओ। उसके साथ मिलकर मैं इस दुर्बुद्धि को मनाने का प्रयत्न करूँगा।
श्लोक 3 (5.129.3)
यदि सा न दुरात्मानं शमयेद्दुष्टचेतसम् । अपि कृष्णस्य सुहृदस्तिष्ठेम वचने वयम् ॥
yadi sā na durātmānaṃ śamayedduṣṭacetasam | api kṛṣṇasya suhṛdastiṣṭhema vacane vayam
यदि वह इस दुष्टचित्त दुरात्मा को शान्त न कर सके, तो भी हम अपने सुहृद् श्रीकृष्ण के वचन पर तो चल ही सकते हैं।
श्लोक 4 (5.129.4)
अपि लोभाभिभूतस्य पन्थानमनुदर्शयेत् । दुर्बुद्धेर्दुःसहायस्य शमार्थं ब्रुवती वचः ॥
api lobhābhibhūtasya panthānamanudarśayet | durbuddherduḥsahāyasya śamārthaṃ bruvatī vacaḥ
सम्भव है, लोभ में डूबे इस दुर्बुद्धि और दुष्ट साथियों वाले को शान्ति के वचन कहकर वह मार्ग दिखा दे।
श्लोक 5 (5.129.5)
अपि नो व्यसनं घोरं दुर्योधनकृतं महत् । शमयेच्चिररात्राय योगक्षेमवदव्ययम् ॥
api no vyasanaṃ ghoraṃ duryodhanakṛtaṃ mahat | śamayeccirarātrāya yogakṣemavadavyayam
सम्भव है, दुर्योधन के द्वारा खड़ी की गई इस बड़ी भयंकर विपत्ति को वह दीर्घकाल के लिए शान्त कर दे और हमारा योगक्षेम अक्षुण्ण बना रहे।"
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 6 (5.129.6)
राज्ञस्तु वचनं श्रुत्वा विदुरो दीर्घदर्शिनीम् । आनयामास गान्धारीं धृतराष्ट्रस्य शासनात् ॥
rājñastu vacanaṃ śrutvā viduro dīrghadarśinīm | ānayāmāsa gāndhārīṃ dhṛtarāṣṭrasya śāsanāt
राजा की बात सुनकर विदुर धृतराष्ट्र की आज्ञा से दूरदर्शिनी गान्धारी को ले आए।
धृतराष्ट्र उवाच
श्लोक 7 (5.129.7)
एष गान्धारि पुत्रस्ते दुरात्मा शासनातिगः । ऐश्वर्यलोभादैश्वर्यं जीवितं च प्रहास्यति ॥
eṣa gāndhāri putraste durātmā śāsanātigaḥ | aiśvaryalobhādaiśvaryaṃ jīvitaṃ ca prahāsyati
"गान्धारी, तुम्हारा यह पुत्र दुरात्मा है और आज्ञा का उल्लंघन करता है। ऐश्वर्य के लोभ से यह ऐश्वर्य और प्राण दोनों गँवा बैठेगा।
श्लोक 8 (5.129.8)
अशिष्टवदमर्यादः पापैः सह दुरात्मवान् । सभाया निर्गतो मूढो व्यतिक्रम्य सुहृद्वचः ॥
aśiṣṭavadamaryādaḥ pāpaiḥ saha durātmavān | sabhāyā nirgato mūḍho vyatikramya suhṛdvacaḥ
असभ्य की भाँति मर्यादाहीन, अपने पापी साथियों के साथ दुष्ट हृदय वाला वह मूर्ख हितैषियों की बात का उल्लंघन करके सभा से निकल गया है।"
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 9 (5.129.9)
सा भर्तृवचनं श्रुत्वा राजपुत्री यशस्विनी । अन्विच्छन्ती महच्छ्रेयो गान्धारी वाक्यमब्रवीत् ॥
sā bhartṛvacanaṃ śrutvā rājaputrī yaśasvinī | anvicchantī mahacchreyo gāndhārī vākyamabravīt
पति की बात सुनकर परम कल्याण चाहने वाली यशस्विनी राजकुमारी गान्धारी बोलीं—
गान्धार्युवाच
श्लोक 10 (5.129.10)
आनायय सुतं क्षिप्रं राज्यकामुकमातुरम् । नहि राज्यमशिष्टेन शक्यं धर्मार्थलोपिना । आप्तुमाप्तं तथाऽपीदमविनीतेन सर्वथा ॥
ānāyaya sutaṃ kṣipraṃ rājyakāmukamāturam | nahi rājyamaśiṣṭena śakyaṃ dharmārthalopinā | āptumāptaṃ tathā'pīdamavinītena sarvathā
"राज्य की कामना से रोगी हुए मेरे पुत्र को तुरन्त यहाँ बुलवाइए। धर्म और अर्थ का लोप करने वाला असभ्य मनुष्य राज्य नहीं पा सकता, और सर्वथा अविनीत व्यक्ति पाए हुए राज्य को भी बचा नहीं सकता।
श्लोक 11 (5.129.11)
त्वं ह्येवात्र भृशं गर्ह्यो धृतराष्ट्र सुतप्रियः । यो जानन्पापतामस्य तत्प्रज्ञामनुवर्तसे ॥
tvaṃ hyevātra bhṛśaṃ garhyo dhṛtarāṣṭra sutapriyaḥ | yo jānanpāpatāmasya tatprajñāmanuvartase
धृतराष्ट्र, इसमें सबसे अधिक निन्दा के पात्र तो पुत्र-प्रेमी आप ही हैं, जो उसकी पापवृत्ति जानते हुए भी उसी की बुद्धि के पीछे चलते हैं।
श्लोक 12 (5.129.12)
स एष काममन्युभ्यां प्रलब्धो लोभमास्थितः । अशक्योऽद्य त्वया राजन्विनिवर्तयितुं बलात् ॥
sa eṣa kāmamanyubhyāṃ pralabdho lobhamāsthitaḥ | aśakyo'dya tvayā rājanvinivartayituṃ balāt
काम और क्रोध से ग्रस्त होकर वह लोभ में पड़ गया है; हे राजन्, अब आप उसे बलपूर्वक भी लौटा नहीं सकते।
श्लोक 13 (5.129.13)
राष्ट्रप्रदाने मूढस्य बालिशस्य दुरात्मनः । दुःसहायस्य लुब्धस्य धृतराष्ट्रोऽश्नुते फलम् ॥
rāṣṭrapradāne mūḍhasya bāliśasya durātmanaḥ | duḥsahāyasya lubdhasya dhṛtarāṣṭro'śnute phalam
मूर्ख, नासमझ, दुरात्मा, लोभी और दुष्ट साथियों वाले पुत्र को राष्ट्र सौंपने का फल धृतराष्ट्र भोग रहे हैं।
श्लोक 14 (5.129.14)
कथं हि स्वजने भेदमुपेक्षेत महीपतिः । भिन्नं हि स्वजनेन त्वां प्रहरिष्यन्ति शत्रवः ॥
kathaṃ hi svajane bhedamupekṣeta mahīpatiḥ | bhinnaṃ hi svajanena tvāṃ prahariṣyanti śatravaḥ
कोई राजा अपने ही लोगों में फूट की उपेक्षा कैसे कर सकता है? अपने स्वजनों से अलग हो जाने पर शत्रु आप पर प्रहार करेंगे।
श्लोक 15 (5.129.15)
या हि शक्या महाराज साम्ना भेदेन वा पुनः । निस्तर्तुमापदः स्वेषु दण्डं कस्तत्र पातयेत् ॥
yā hi śakyā mahārāja sāmnā bhedena vā punaḥ | nistartumāpadaḥ sveṣu daṇḍaṃ kastatra pātayet
हे महाराज, जब अपनों के बीच की विपत्तियों को साम से या भेद से पार किया जा सकता है, तब वहाँ दण्ड का प्रयोग कौन करेगा?"
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 16 (5.129.16)
शासनाद्धृतराष्ट्रस्य दुर्योधनममर्षणम् । मातुश्च वचनात्क्षत्ता सभां प्रावेशयत्पुनः ॥
śāsanāddhṛtarāṣṭrasya duryodhanamamarṣaṇam | mātuśca vacanātkṣattā sabhāṃ prāveśayatpunaḥ
धृतराष्ट्र की आज्ञा और माता के कहने से क्षत्ता (विदुर) असहिष्णु दुर्योधन को फिर सभा में ले आए।
श्लोक 17 (5.129.17)
स मातुर्वचनाकाङ्क्षी प्रविवेश पुनः सभाम् । अभिताम्रेक्षणः क्रोधान्निश्वसन्निव पन्नगः ॥
sa māturvacanākāṅkṣī praviveśa punaḥ sabhām | abhitāmrekṣaṇaḥ krodhānniśvasanniva pannagaḥ
माता की बात सुनने की इच्छा से वह फिर सभा में आया; क्रोध से उसकी आँखें ताँबे-सी लाल थीं और वह सर्प की भाँति फुफकार रहा था।
श्लोक 18 (5.129.18)
तं प्रविष्टमभिप्रेक्ष्य पुत्रमुत्पथमास्थितम् । विगर्हमाणा गान्धारी शमार्थं वाक्यमब्रवीत् ॥
taṃ praviṣṭamabhiprekṣya putramutpathamāsthitam | vigarhamāṇā gāndhārī śamārthaṃ vākyamabravīt
कुमार्ग पर चलते हुए अपने पुत्र को भीतर आया देखकर गान्धारी ने उसकी निन्दा करते हुए शान्ति के लिए यह वचन कहा—
गान्धार्युवाच
श्लोक 19 (5.129.19)
दुर्योधन निबोधेदं वचनं मम पुत्रक । हितं ते सानुबन्धस्य तथाऽऽयत्यांसुखोदयम् ॥
duryodhana nibodhedaṃ vacanaṃ mama putraka | hitaṃ te sānubandhasya tathā''yatyāṃsukhodayam
"बेटा दुर्योधन, मेरी यह बात सुनो; यह तुम्हारे और तुम्हारे अनुयायियों के लिए हितकर है और आगे चलकर सुख देने वाली है।
श्लोक 20 (5.129.20)
दुर्योधन यदाह त्वां पिता भरतसत्तम । भीष्मो द्रोणः कृपः क्षत्ता सुहृदां कुरु तद्वचः ॥
duryodhana yadāha tvāṃ pitā bharatasattama | bhīṣmo droṇaḥ kṛpaḥ kṣattā suhṛdāṃ kuru tadvacaḥ
भरतश्रेष्ठ दुर्योधन, तुम्हारे पिता, भीष्म, द्रोण, कृप और क्षत्ता (विदुर)—ये तुम्हारे हितैषी जो कहते हैं, वही करो।
श्लोक 21 (5.129.21)
भीष्मस्य तु पितुश्चैव मम चापचितिः कृता । भवेद्द्रोणमुखानां च सुहृदां शाम्यता त्वया ॥
bhīṣmasya tu pituścaiva mama cāpacitiḥ kṛtā | bhaveddroṇamukhānāṃ ca suhṛdāṃ śāmyatā tvayā
शान्ति स्थापित करके तुम भीष्म का, अपने पिता का, मेरा और द्रोण आदि हितैषियों का सम्मान करोगे।
श्लोक 22 (5.129.22)
न हि राज्यं महाप्राज्ञ स्वेन कामेन शक्यते । अवाप्तुं रक्षितुं वाऽपि भोक्तुं भरतसत्तम ॥
na hi rājyaṃ mahāprājña svena kāmena śakyate | avāptuṃ rakṣituṃ vā'pi bhoktuṃ bharatasattama
हे महाप्राज्ञ भरतश्रेष्ठ, राज्य को केवल अपनी इच्छा से न पाया जा सकता है, न बचाया जा सकता है और न भोगा जा सकता है।
श्लोक 23 (5.129.23)
न ह्यवश्येन्द्रियो राज्यमश्नीयाद्दीर्घमन्तरम् । विजितात्मा तु मेधावी स राज्यमभिपालयेत् ॥
na hyavaśyendriyo rājyamaśnīyāddīrghamantaram | vijitātmā tu medhāvī sa rājyamabhipālayet
जिसकी इन्द्रियाँ वश में नहीं हैं, वह बहुत समय तक राज्य नहीं भोग सकता; जिसने अपने को जीत लिया है, वही बुद्धिमान राज्य की रक्षा करता है।
श्लोक 24 (5.129.24)
कामक्रोधौ हि पुरुषमर्थेभ्यो व्यपकर्षतः । तौ तु शत्रू विनिर्जित्य राजा विजयते महीम् ॥
kāmakrodhau hi puruṣamarthebhyo vyapakarṣataḥ | tau tu śatrū vinirjitya rājā vijayate mahīm
काम और क्रोध मनुष्य को उसके अर्थों से दूर खींच ले जाते हैं; पर जो राजा इन दोनों शत्रुओं को जीत लेता है, वह पृथ्वी को जीत लेता है।
श्लोक 25 (5.129.25)
लोकेश्वर प्रभुत्वंहि महदेतद्दुरात्मभिः । राज्यं नामेप्सितं स्थानं न शक्यमभिरक्षितुम् ॥
lokeśvara prabhutvaṃhi mahadetaddurātmabhiḥ | rājyaṃ nāmepsitaṃ sthānaṃ na śakyamabhirakṣitum
हे लोकेश्वर, प्रभुत्व एक महान् वस्तु है; राज्य नामक यह अभीष्ट पद दुरात्मा लोगों से सुरक्षित नहीं रखा जा सकता।
श्लोक 26 (5.129.26)
इन्द्रियाणि महत्प्रेप्सुर्नियच्छेदर्थधर्मयोः । इन्द्रियैर्नियतैर्बुद्धिर्वर्धतेऽग्निरिवेन्धनैः ॥
indriyāṇi mahatprepsurniyacchedarthadharmayoḥ | indriyairniyatairbuddhirvardhate'gnirivendhanaiḥ
जो महत्ता चाहता है, उसे अर्थ और धर्म के लिए इन्द्रियों को वश में रखना चाहिए; संयमित इन्द्रियों से बुद्धि वैसे ही बढ़ती है जैसे ईंधन से अग्नि।
श्लोक 27 (5.129.27)
अविधेयानि हीमानि व्यापादयितुमप्यलम् । अविधेया इवादान्ता हयाः पथि कुसारथिम् ॥
avidheyāni hīmāni vyāpādayitumapyalam | avidheyā ivādāntā hayāḥ pathi kusārathim
वश में न रखी जाएँ तो ये इन्द्रियाँ मनुष्य का नाश तक कर सकती हैं, जैसे बेकाबू, बिना सधे घोड़े मार्ग में बुरे सारथि को मार डालते हैं।
श्लोक 28 (5.129.28)
अविजित्य य आत्मानममात्यान्विजिगीषते । अमित्रान्वाऽजितामात्यः सोऽवशः परिहीयते ॥
avijitya ya ātmānamamātyānvijigīṣate | amitrānvā'jitāmātyaḥ so'vaśaḥ parihīyate
जो अपने को जीते बिना मन्त्रियों को, अथवा मन्त्रियों को जीते बिना शत्रुओं को जीतना चाहता है, वह विवश होकर नष्ट हो जाता है।
श्लोक 29 (5.129.29)
आत्मानमेव प्रथमं द्वेष्यरूपेण योजयेत् । ततोऽमात्यानमित्रांश्च न मोघं विजिगीषते ॥
ātmānameva prathamaṃ dveṣyarūpeṇa yojayet | tato'mātyānamitrāṃśca na moghaṃ vijigīṣate
पहले अपने आप को शत्रु मानकर वश में करना चाहिए; उसके बाद मन्त्रियों और शत्रुओं को जीतने की इच्छा व्यर्थ नहीं जाती।
श्लोक 30 (5.129.30)
वश्येन्द्रियं जितामात्यं धृतदण्डं विकारिषु । परीक्ष्यकारिणं धीरमत्यर्थं श्रीर्निषेवते ॥
vaśyendriyaṃ jitāmātyaṃ dhṛtadaṇḍaṃ vikāriṣu | parīkṣyakāriṇaṃ dhīramatyarthaṃ śrīrniṣevate
जिसने इन्द्रियों को वश में किया है, मन्त्रियों को जीत लिया है, अपराधियों पर दण्ड धारण करता है और सोच-परखकर काम करता है, उस धीर पुरुष की लक्ष्मी भरपूर सेवा करती है।
श्लोक 31 (5.129.31)
क्षुद्राक्षेणेव जालेन झषावपिहितावुभौ । कामक्रोधौ शरीरस्थौ प्रज्ञानं तौ विलुम्पतः ॥
kṣudrākṣeṇeva jālena jhaṣāvapihitāvubhau | kāmakrodhau śarīrasthau prajñānaṃ tau vilumpataḥ
छोटे छेदों वाले जाल में फँसी दो मछलियों की भाँति शरीर में रहने वाले काम और क्रोध—ये दोनों मनुष्य के विवेक को नष्ट कर देते हैं।
श्लोक 32 (5.129.32)
याभ्यां हि देवाः स्वर्यातुः स्वर्गस्य पिदधुर्मुखम् । बिभ्यतोऽनुपरागस्य कामक्रोधौ स्म वर्धितौ ॥
yābhyāṃ hi devāḥ svaryātuḥ svargasya pidadhurmukham | bibhyato'nuparāgasya kāmakrodhau sma vardhitau
स्वर्ग की ओर जाते हुए वैराग्यवान् पुरुष से भयभीत होकर देवताओं ने इन्हीं दोनों—काम और क्रोध—को उसमें बढ़ाकर स्वर्ग का द्वार बन्द कर दिया था।
श्लोक 33 (5.129.33)
कामं क्रोधं च लोभं च दम्भं दर्पं च भूमिपः । सम्यग्विजेतुं यो वेद स महीमभिजायते ॥
kāmaṃ krodhaṃ ca lobhaṃ ca dambhaṃ darpaṃ ca bhūmipaḥ | samyagvijetuṃ yo veda sa mahīmabhijāyate
जो राजा काम, क्रोध, लोभ, दम्भ और दर्प को भली-भाँति जीतना जानता है, वह पृथ्वी का स्वामी बनता है।
श्लोक 34 (5.129.34)
सततं निग्रहे युक्त इन्द्रियाणां भवेन्नृपः । ईप्सन्नर्थं च धर्मं च द्विषतां च पराभवम् ॥
satataṃ nigrahe yukta indriyāṇāṃ bhavennṛpaḥ | īpsannarthaṃ ca dharmaṃ ca dviṣatāṃ ca parābhavam
जो राजा अर्थ, धर्म और शत्रुओं की पराजय चाहता है, उसे सदा इन्द्रियों के संयम में लगे रहना चाहिए।
श्लोक 35 (5.129.35)
कामाभिभूतः क्रोधाद्वा यो मिथ्या प्रतिपद्यते । स्वेषु चान्येषु वा तस्य न सहाया भवन्त्युत ॥
kāmābhibhūtaḥ krodhādvā yo mithyā pratipadyate | sveṣu cānyeṣu vā tasya na sahāyā bhavantyuta
जो काम से अभिभूत होकर या क्रोधवश अपनों से या दूसरों से कपटपूर्ण व्यवहार करता है, उसके सहायक नहीं रहते।
श्लोक 36 (5.129.36)
एकीभूतैर्महाप्राज्ञैः शूरैररिनिबर्हणैः । पाण्डवैः पृथिवीं तात भोक्ष्यसे सहितः सुखी ॥
ekībhūtairmahāprājñaiḥ śūrairarinibarhaṇaiḥ | pāṇḍavaiḥ pṛthivīṃ tāta bhokṣyase sahitaḥ sukhī
बेटा, बुद्धिमान, शूरवीर और शत्रुनाशक पाण्डवों के साथ एक होकर तुम उनके संग सुखपूर्वक पृथ्वी का भोग करोगे।
श्लोक 37 (5.129.37)
यथा भीष्मः शान्तनवो द्रोणश्चापि महारथः । आहतुस्तात तत्सत्यमजेयौ कृष्णपाण्डवौ ॥
yathā bhīṣmaḥ śāntanavo droṇaścāpi mahārathaḥ | āhatustāta tatsatyamajeyau kṛṣṇapāṇḍavau
बेटा, शान्तनुनन्दन भीष्म और महारथी द्रोण ने जो कहा है, वह सत्य है—श्रीकृष्ण और पाण्डव (अर्जुन) अजेय हैं।
श्लोक 38 (5.129.38)
प्रपद्यस्व महाबाहुं कृष्णमक्लिष्टकारिणम् । प्रसन्नो हि सुखाय स्यादुभयोरेव केशवः ॥
prapadyasva mahābāhuṃ kṛṣṇamakliṣṭakāriṇam | prasanno hi sukhāya syādubhayoreva keśavaḥ
अनायास ही महान् कर्म करने वाले महाबाहु श्रीकृष्ण की शरण लो; प्रसन्न होने पर केशव दोनों पक्षों के लिए सुखदायक होंगे।
श्लोक 39 (5.129.39)
सुहृदामर्थकामानां यो न तिष्ठति शासने । प्राज्ञानां कृतविद्यानां स नरः शत्रुनन्दनः ॥
suhṛdāmarthakāmānāṃ yo na tiṣṭhati śāsane | prājñānāṃ kṛtavidyānāṃ sa naraḥ śatrunandanaḥ
जो मनुष्य अपना भला चाहने वाले, बुद्धिमान और विद्वान् हितैषियों की आज्ञा में नहीं रहता, वह शत्रुओं को ही आनन्दित करता है।
श्लोक 40 (5.129.40)
न युद्धे तात कल्याणं न धर्मार्थौ कुतः सुखम् । न चापि विजयो नित्यं मा युद्धे चेत आधिथाः ॥
na yuddhe tāta kalyāṇaṃ na dharmārthau kutaḥ sukham | na cāpi vijayo nityaṃ mā yuddhe ceta ādhithāḥ
बेटा, युद्ध में कल्याण नहीं है; उसमें न धर्म है, न अर्थ—फिर सुख कहाँ से होगा? विजय भी सदा निश्चित नहीं होती। युद्ध में मन मत लगाओ।
श्लोक 41 (5.129.41)
भीष्मेण हि महाप्राज्ञ पित्रा ते बाह्लिकेन च । दत्तोंऽशः पाण्डुपुत्राणां भेदाद्भीतैररिन्दम ॥
bhīṣmeṇa hi mahāprājña pitrā te bāhlikena ca | dattoṃ'śaḥ pāṇḍuputrāṇāṃ bhedādbhītairarindama
हे महाप्राज्ञ शत्रुदमन, भीष्म ने, तुम्हारे पिता ने और बाह्लीक ने फूट के भय से ही पाण्डुपुत्रों को उनका अंश दिया था।
श्लोक 42 (5.129.42)
तस्य चैतत्प्रदानस्य फलमद्यानुपश्यसि । यद्भुङ्क्षे पृथिवीं कृत्स्नां शूरैर्निहतकण्टकाम् ॥
tasya caitatpradānasya phalamadyānupaśyasi | yadbhuṅkṣe pṛthivīṃ kṛtsnāṃ śūrairnihatakaṇṭakām
उस दान का फल तुम आज देख रहे हो कि शूरवीरों द्वारा निष्कण्टक की गई सारी पृथ्वी का तुम भोग कर रहे हो।
श्लोक 43 (5.129.43)
प्रयच्छ पाण्डुपुत्राणां यथोचितमरिन्दम । यदीच्छसि सहामात्यो भोक्तुमर्धं प्रदीयताम् ॥
prayaccha pāṇḍuputrāṇāṃ yathocitamarindama | yadīcchasi sahāmātyo bhoktumardhaṃ pradīyatām
हे शत्रुदमन, पाण्डुपुत्रों को उनका उचित भाग दे दो। यदि तुम मन्त्रियों के साथ (शेष राज्य) भोगना चाहते हो, तो उन्हें आधा राज्य दे दिया जाए।
श्लोक 44 (5.129.44)
अलमर्धं पृथिव्यास्ते महामात्यस्य जीवितुम् । सुहृदां वचने तिष्ठन्यशः प्राप्स्यति भारत ॥
alamardhaṃ pṛthivyāste mahāmātyasya jīvitum | suhṛdāṃ vacane tiṣṭhanyaśaḥ prāpsyati bhārata
तुम्हारे और तुम्हारे बड़े-बड़े मन्त्रियों के जीवन-निर्वाह के लिए आधी पृथ्वी पर्याप्त है। हे भारत, हितैषियों की बात मानने वाला यश पाता है।
श्लोक 45 (5.129.45)
श्रीमद्भिरात्मवद्भिस्तैर्बुद्धिमद्भिर्जितेन्द्रियैः । पाण्डवैर्विग्रहस्तात भ्रंशयेन्महतः सुखात् ॥
śrīmadbhirātmavadbhistairbuddhimadbhirjitendriyaiḥ | pāṇḍavairvigrahastāta bhraṃśayenmahataḥ sukhāt
बेटा, श्रीमान्, आत्मवान्, बुद्धिमान और जितेन्द्रिय पाण्डवों के साथ विरोध तुम्हें महान् सुख से गिरा देगा।
श्लोक 46 (5.129.46)
निगृह्य सुहृदां मन्युं शाधि राज्यं यथोचितम् । स्वमंशं पाण्डुपुत्रेभ्यः प्रदाय भरतर्षभ ॥
nigṛhya suhṛdāṃ manyuṃ śādhi rājyaṃ yathocitam | svamaṃśaṃ pāṇḍuputrebhyaḥ pradāya bharatarṣabha
हे भरतश्रेष्ठ, पाण्डुपुत्रों को उनका अपना अंश देकर, हितैषियों के क्रोध को शान्त करके यथोचित रूप से राज्य का शासन करो।
श्लोक 47 (5.129.47)
अलमङ्ग निकारोऽयं त्रयोदशसमाः कृतः । शमयैनं महाप्राज्ञ कामक्रोधसमेधितम् ॥
alamaṅga nikāro'yaṃ trayodaśasamāḥ kṛtaḥ | śamayainaṃ mahāprājña kāmakrodhasamedhitam
प्रिय पुत्र, बस करो! तेरह वर्षों तक उनका यह अपमान हो चुका। हे महाप्राज्ञ, काम और क्रोध से बढ़े हुए इस (वैर) को शान्त करो।
श्लोक 48 (5.129.48)
न चैष शक्तः पार्थानां यस्त्वदर्थमभीप्सति । सूतपुत्रो दृढक्रोधो भ्राता दुःशासनश्च ते ॥
na caiṣa śaktaḥ pārthānāṃ yastvadarthamabhīpsati | sūtaputro dṛḍhakrodho bhrātā duḥśāsanaśca te
जो तुम्हारे लिए यह सब चाहता है, वह दृढ़ क्रोध वाला सूतपुत्र (कर्ण) पार्थों का सामना करने में समर्थ नहीं है, और न तुम्हारा भाई दुःशासन ही।
श्लोक 49 (5.129.49)
भीष्मे द्रोणे कृपे कर्णे भीमसेने धनञ्जये । धृष्टद्युम्ने च संक्रुद्धे न स्युः सर्वाः प्रजा ध्रुवम् ॥
bhīṣme droṇe kṛpe karṇe bhīmasene dhanañjaye | dhṛṣṭadyumne ca saṃkruddhe na syuḥ sarvāḥ prajā dhruvam
भीष्म, द्रोण, कृप, कर्ण, भीमसेन, धनञ्जय और धृष्टद्युम्न के क्रुद्ध होने पर निश्चय ही कोई प्रजा जीवित नहीं बचेगी।
श्लोक 50 (5.129.50)
अमर्षवशमापन्नो मा कुरूंस्तात जीघनः । एषा हि पृथिवी कृत्स्ना मा गमत्त्वत्कृते वधम् ॥
amarṣavaśamāpanno mā kurūṃstāta jīghanaḥ | eṣā hi pṛthivī kṛtsnā mā gamattvatkṛte vadham
बेटा, क्रोध के वश में होकर कुरुओं का संहार मत करवाओ। तुम्हारे कारण यह सारी पृथ्वी विनाश को न प्राप्त हो।
श्लोक 51 (5.129.51)
यच्च त्वं मन्यसे मूढ भीष्मद्रोणकृपादयः । योत्स्यन्ते सर्वशक्त्येति नैतदद्योपपद्यते ॥
yacca tvaṃ manyase mūḍha bhīṣmadroṇakṛpādayaḥ | yotsyante sarvaśaktyeti naitadadyopapadyate
मूर्ख, तुम जो यह मानते हो कि भीष्म, द्रोण, कृप आदि पूरी शक्ति से (तुम्हारे लिए) लड़ेंगे, वह अब नहीं होने वाला।
श्लोक 52 (5.129.52)
समं हि राज्यं प्रीतिश्च स्थानं हि विदितात्मनाम् । पाण्डवेष्वथ युष्मासु धर्मस्त्वभ्यधिकस्ततः ॥
samaṃ hi rājyaṃ prītiśca sthānaṃ hi viditātmanām | pāṇḍaveṣvatha yuṣmāsu dharmastvabhyadhikastataḥ
आत्मज्ञानी इन महापुरुषों के लिए राज्य, प्रेम और पद—पाण्डवों के प्रति और तुम्हारे प्रति समान हैं; पर उनके लिए धर्म इन सबसे बढ़कर है।
श्लोक 53 (5.129.53)
राजपिण्डभयादेते यदि हास्यन्ति जीवितम् । न हि शक्ष्यन्ति राजानं युधिष्ठिरमुदीक्षितुम् ॥
rājapiṇḍabhayādete yadi hāsyanti jīvitam | na hi śakṣyanti rājānaṃ yudhiṣṭhiramudīkṣitum
राजा का अन्न खाने के कारण, उसके ऋण के भय से, ये भले ही प्राण त्याग दें, पर राजा युधिष्ठिर की ओर आँख उठाकर नहीं देख सकेंगे।
श्लोक 54 (5.129.54)
न लोभादर्थसंपत्तिर्नराणामिह दृश्यते । तदलं तात लोभेन प्रशाम्य भरतर्षभ ॥
na lobhādarthasaṃpattirnarāṇāmiha dṛśyate | tadalaṃ tāta lobhena praśāmya bharatarṣabha
इस संसार में लोभ से मनुष्यों को धन-सम्पत्ति मिलती नहीं देखी जाती। इसलिए बेटा, लोभ को छोड़ो; हे भरतश्रेष्ठ, शान्त हो जाओ।"