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उद्योग पर्व · अध्याय 130

श्रीकृष्ण को बंदी बनाने का दुर्योधन का षड्यंत्र

माता की सलाह की उपेक्षा कर दुर्योधन फिर सभा से निकल जाता है; दुःशासन के इस भय से उकसाया जाकर कि बड़े-बूढ़े उन्हें पाण्डवों को सौंप देंगे, वह कर्ण, शकुनि और दुःशासन के साथ मिलकर कृष्ण को बंदी बनाने की योजना बनाता है। सात्यकि उनका अभिप्राय भाँप लेता है, कृतवर्मा को सेना सहित द्वार पर तैनात करता है और कृष्ण, धृतराष्ट्र तथा विदुर को सब बता देता है। विदुर चेताते हैं कि कृष्ण को पकड़ा नहीं जा सकता, और कृष्ण कहते हैं कि वे स्वयं उन सबको पकड़ सकते हैं, पर राजा के सामने कोई निंदित कर्म नहीं करेंगे। धृतराष्ट्र दुर्योधन को वापस बुलवाकर उसे फटकारते हैं, और विदुर पूतना-वध से लेकर मधु-कैटभ-वध तक कृष्ण के पुराने पराक्रम गिनाकर दिखाते हैं कि उन्हें कोई बंदी नहीं बना सकता।

अध्याय 129अध्याय-सूचीअध्याय 131

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 1 (5.130.1)

तत्तु वाक्यमनादृत्य सोऽर्थवन्मातृभाषितम् । पुनः प्रतस्थे संरम्भात्सकाशमकृतात्मनाम् ॥

tattu vākyamanādṛtya so'rthavanmātṛbhāṣitam | punaḥ pratasthe saṃrambhātsakāśamakṛtātmanām

किंतु माता के कहे उन सार्थक वचनों की उपेक्षा करके वह क्रोध में भरकर फिर उन अविवेकी लोगों के पास चला गया।

श्लोक 2 (5.130.2)

ततः सभाया निर्गम्य मन्त्रयामास कौरवः । सौबलेन मताक्षेण राज्ञा शकुनिना सह ॥

tataḥ sabhāyā nirgamya mantrayāmāsa kauravaḥ | saubalena matākṣeṇa rājñā śakuninā saha

तब सभा से निकलकर उस कौरव ने पासों के पारखी सुबलपुत्र राजा शकुनि के साथ मन्त्रणा की।

श्लोक 3 (5.130.3)

दुर्योधनं धार्तराष्ट्रं कर्णं दुःशासनोऽब्रवीत् । नोचेत्सन्धास्यसे राजन्स्वेन कामेन पाण्डवैः । बद्ध्वैव त्वां प्रदास्यन्ति पाण्डुपुत्राय भारत ॥

duryodhanaṃ dhārtarāṣṭraṃ karṇaṃ duḥśāsano'bravīt | nocetsandhāsyase rājansvena kāmena pāṇḍavaiḥ | baddhvaiva tvāṃ pradāsyanti pāṇḍuputrāya bhārata

दुःशासन ने धृतराष्ट्रपुत्र दुर्योधन और कर्ण से कहा — राजन्! यदि आप अपनी इच्छा से पाण्डवों के साथ संधि नहीं करेंगे, तो हे भारत, वे आपको बाँधकर पाण्डुपुत्र को सौंप देंगे।

दुःशासन उवाच

श्लोक 4 (5.130.4)

वैकर्तनं त्वां च मां च त्रीनेतान्भरतर्षभ । पाण्डवेभ्यः प्रदास्यन्ति भीष्मद्रोणौ पिता च ते ॥

vaikartanaṃ tvāṃ ca māṃ ca trīnetānbharatarṣabha | pāṇḍavebhyaḥ pradāsyanti bhīṣmadroṇau pitā ca te

हे भरतश्रेष्ठ! वैकर्तन (कर्ण) को, आपको और मुझे — हम तीनों को भीष्म, द्रोण और आपके पिता पाण्डवों के हवाले कर देंगे।

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 5 (5.130.5)

दुःशासनस्य तद्वाक्यं निशम्य भरतर्षभ । दुर्योधनो धार्तराष्ट्रो निश्वस्य प्रहसन्निव ॥

duḥśāsanasya tadvākyaṃ niśamya bharatarṣabha | duryodhano dhārtarāṣṭro niśvasya prahasanniva

हे भरतश्रेष्ठ! दुःशासन की वह बात सुनकर धृतराष्ट्रपुत्र दुर्योधन ने लंबी साँस ली और मानो हँसते हुए

श्लोक 6 (5.130.6)

एकान्तमुपसृत्येह मन्त्रं पुनरमन्त्रयत् । सौबलेन मताक्षेण राज्ञा शकुनिना सह ॥

ekāntamupasṛtyeha mantraṃ punaramantrayat | saubalena matākṣeṇa rājñā śakuninā saha

एकान्त में जाकर पासों के पारखी सुबलपुत्र राजा शकुनि के साथ फिर से मन्त्रणा की।

श्लोक 7 (5.130.7)

दुर्योधनस्य कर्णस्य शकुनेः सौबलस्य च । दुःशासनचतुर्थानामिदमासीद्विचेष्टितम् ॥

duryodhanasya karṇasya śakuneḥ saubalasya ca | duḥśāsanacaturthānāmidamāsīdviceṣṭitam

दुर्योधन, कर्ण, सुबलपुत्र शकुनि और चौथे दुःशासन — इन चारों की यह योजना बनी:

दुर्योधनादय ऊचुः

श्लोक 8 (5.130.8)

पुराऽयमस्मान्गृह्णाति क्षिप्रकारी जनार्दनः । सहितो धृतराष्ट्रेण राज्ञा शान्तनवेन च ॥

purā'yamasmāngṛhṇāti kṣiprakārī janārdanaḥ | sahito dhṛtarāṣṭreṇa rājñā śāntanavena ca

इससे पहले कि यह शीघ्रकारी जनार्दन राजा धृतराष्ट्र और शान्तनुपुत्र भीष्म के साथ मिलकर हमें पकड़ ले,

श्लोक 9 (5.130.9)

वयमेव हृषीकेशं निगृह्णीम बलादिव । प्रसह्य पुरुषव्याघ्रमिन्द्रो वैरोचनिं यथा ॥

vayameva hṛṣīkeśaṃ nigṛhṇīma balādiva | prasahya puruṣavyāghramindro vairocaniṃ yathā

हम ही बलपूर्वक हृषीकेश को पकड़ लें — उस पुरुषसिंह को वैसे ही दबोच लें जैसे इन्द्र ने विरोचनपुत्र (बलि) को दबोचा था।

श्लोक 10 (5.130.10)

श्रुत्वा गृहीतं वार्ष्णेयं पाण्डवा हतचेतसः । निरुत्साहा भविष्यन्ति भग्नदंष्ट्रा इवोरगाः ॥

śrutvā gṛhītaṃ vārṣṇeyaṃ pāṇḍavā hatacetasaḥ | nirutsāhā bhaviṣyanti bhagnadaṃṣṭrā ivoragāḥ

वृष्णिवंशी (कृष्ण) के पकड़े जाने की बात सुनकर पाण्डव हताश और उत्साहहीन हो जाएँगे, जैसे दाँत टूटे साँप।

श्लोक 11 (5.130.11)

अयं ह्येषां महाबाहुः सर्वेषां शर्म वर्म च । अस्मिन्गृहीते वरदे ऋषभे सर्वसात्वताम् । निरुद्यमा भविष्यन्ति पाण्डवाः सोमकैः सह ॥

ayaṃ hyeṣāṃ mahābāhuḥ sarveṣāṃ śarma varma ca | asmingṛhīte varade ṛṣabhe sarvasātvatām | nirudyamā bhaviṣyanti pāṇḍavāḥ somakaiḥ saha

क्योंकि यह महाबाहु ही उन सबका आश्रय और कवच है। समस्त सात्वतों में श्रेष्ठ इस वरदायक के पकड़े जाने पर पाण्डव सोमकों सहित हाथ-पैर डाल देंगे।

श्लोक 12 (5.130.12)

तस्माद्वयमिहैवैकं केशवं क्षिप्रकारिणम् । क्रोशतो धृतराष्ट्रस्य बद्ध्वा योत्स्यामहे रिपून् ॥

tasmādvayamihaivaikaṃ keśavaṃ kṣiprakāriṇam | krośato dhṛtarāṣṭrasya baddhvā yotsyāmahe ripūn

इसलिए यहीं, धृतराष्ट्र के चिल्लाते रहने पर भी, इस अकेले शीघ्रकारी केशव को बाँधकर हम शत्रुओं से युद्ध करेंगे।

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 13 (5.130.13)

तेषां पापमभिप्रायं पापानां दुष्टचेतसाम् । इङ्गितज्ञः कविः क्षिप्रमन्वबुद्ध्यत सात्यकिः ॥

teṣāṃ pāpamabhiprāyaṃ pāpānāṃ duṣṭacetasām | iṅgitajñaḥ kaviḥ kṣipramanvabuddhyata sātyakiḥ

संकेतों को समझने वाले बुद्धिमान सात्यकि ने उन दुष्टचित्त पापियों के पापपूर्ण अभिप्राय को तुरंत भाँप लिया।

श्लोक 14 (5.130.14)

तदर्थमभिनिष्क्रम्य हार्दिक्येन सहास्थितः । अब्रवीत्कृतवर्माणं क्षिप्रं योजय वाहिनीम् ॥

tadarthamabhiniṣkramya hārdikyena sahāsthitaḥ | abravītkṛtavarmāṇaṃ kṣipraṃ yojaya vāhinīm

इसी कारण वह बाहर निकलकर हार्दिक्य के पास जा खड़ा हुआ और कृतवर्मा से बोला — "शीघ्र सेना को तैयार करो।

सात्यकिरुवाच

श्लोक 15 (5.130.15)

व्यूढानीकः सभाद्वारमुपतिष्ठस्व दंशितः । यावदाख्याम्यहं चैतत्कृष्णायाक्लिष्टकारिणे ॥

vyūḍhānīkaḥ sabhādvāramupatiṣṭhasva daṃśitaḥ | yāvadākhyāmyahaṃ caitatkṛṣṇāyākliṣṭakāriṇe

सेना को व्यूह में सजाकर, कवच पहनकर सभा के द्वार पर डटे रहो, जब तक मैं यह बात अनायास कर्म करने वाले कृष्ण को बताता हूँ।"

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 16 (5.130.16)

स प्रविश्य सभां वीरः सिंहो गिरिगुहामिव । आचष्ट तमभिप्रायं केशवाय महात्मने ॥

sa praviśya sabhāṃ vīraḥ siṃho giriguhāmiva | ācaṣṭa tamabhiprāyaṃ keśavāya mahātmane

वह वीर सभा में वैसे ही प्रविष्ट हुआ जैसे सिंह पर्वत की गुफा में, और उसने महात्मा केशव को उन लोगों का अभिप्राय बता दिया।

श्लोक 17 (5.130.17)

धृतराष्ट्रं ततश्चैव विदुरं चान्वभाषत । तेषामेतमभिप्रायमाचचक्षे स्मयन्निव ॥

dhṛtarāṣṭraṃ tataścaiva viduraṃ cānvabhāṣata | teṣāmetamabhiprāyamācacakṣe smayanniva

फिर उसने धृतराष्ट्र और विदुर से भी बात की और मानो मुस्कुराते हुए उन लोगों की यह योजना उन्हें कह सुनाई —

सात्यकिरुवाच

श्लोक 18 (5.130.18)

धर्मादर्थाच्च कामाच्च कर्म साधुविगर्हितम् । मन्दाः कर्तुमिहेच्छन्ति न चावाप्यं कथंचन ॥

dharmādarthācca kāmācca karma sādhuvigarhitam | mandāḥ kartumihecchanti na cāvāpyaṃ kathaṃcana

ये मूर्ख यहाँ ऐसा कर्म करना चाहते हैं जिसकी सज्जन निंदा करते हैं, जो धर्म, अर्थ और काम तीनों के विरुद्ध है और जो किसी प्रकार सिद्ध नहीं हो सकता।

श्लोक 19 (5.130.19)

पुरा विकुर्वते मूढाः पापात्मानः समागताः । धर्षिताः काममन्युभ्यां क्रोधलोभवशानुगाः ॥

purā vikurvate mūḍhāḥ pāpātmānaḥ samāgatāḥ | dharṣitāḥ kāmamanyubhyāṃ krodhalobhavaśānugāḥ

काम और क्रोध से अभिभूत, क्रोध और लोभ के वश में चलने वाले ये मूढ़ पापात्मा एकजुट होकर शीघ्र ही उपद्रव करने वाले हैं।

श्लोक 20 (5.130.20)

इमं हि पुण्डरीकाक्षं जिघृक्षन्त्यल्पचेतसः । पटेनाग्निं प्रज्वलितं यथा बाला यथा जडाः ॥

imaṃ hi puṇḍarīkākṣaṃ jighṛkṣantyalpacetasaḥ | paṭenāgniṃ prajvalitaṃ yathā bālā yathā jaḍāḥ

ये अल्पबुद्धि इस कमलनयन को पकड़ना चाहते हैं — जैसे बालक या मूर्ख कपड़े से धधकती आग को पकड़ना चाहें।

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 21 (5.130.21)

सात्यकेस्तद्वचः श्रुत्वा विदुरो दीर्घदर्शिवान् । धृतराष्ट्रं महाबाहुमब्रवीत्कुरुसंसदि ॥

sātyakestadvacaḥ śrutvā viduro dīrghadarśivān | dhṛtarāṣṭraṃ mahābāhumabravītkurusaṃsadi

सात्यकि की वह बात सुनकर दूरदर्शी विदुर ने कुरुसभा में महाबाहु धृतराष्ट्र से कहा —

विदुर उवाच

श्लोक 22 (5.130.22)

राजन्परीतकालास्ते पुत्राः सर्वे परन्तप । अशक्यमयशस्यं च कर्तुं कर्म समुद्यताः ॥

rājanparītakālāste putrāḥ sarve parantapa | aśakyamayaśasyaṃ ca kartuṃ karma samudyatāḥ

हे शत्रुतापन राजन्! आपके सभी पुत्रों का काल आ पहुँचा है, क्योंकि वे ऐसा कर्म करने को उद्यत हैं जो असम्भव भी है और अपयश देने वाला भी।

श्लोक 23 (5.130.23)

इमं हि पुण्डरीकाक्षमभिभूय प्रसह्य च । निग्रहीतुं किलेच्छन्ति सहिता वासवानुजम् ॥

imaṃ hi puṇḍarīkākṣamabhibhūya prasahya ca | nigrahītuṃ kilecchanti sahitā vāsavānujam

सुनते हैं कि वे मिलकर इस कमलनयन, इन्द्र के अनुज को दबाकर बलपूर्वक बंदी बनाना चाहते हैं।

श्लोक 24 (5.130.24)

इमं पुरुषशार्दूलमप्रधृष्यं दुरासदम् । आसाद्य नभविष्यन्ति पतङ्गा इव पावकम् ॥

imaṃ puruṣaśārdūlamapradhṛṣyaṃ durāsadam | āsādya nabhaviṣyanti pataṅgā iva pāvakam

इस अजेय और दुर्धर्ष पुरुषसिंह से टकराकर वे वैसे ही नष्ट हो जाएँगे जैसे आग में पड़कर पतंगे।

श्लोक 25 (5.130.25)

अयमिच्छन्हि तान्सर्वान्युध्यमानाञ्जनार्दनः । सिंहो नागानिव क्रुद्धो गमयेद्यमसादनम् ॥

ayamicchanhi tānsarvānyudhyamānāñjanārdanaḥ | siṃho nāgāniva kruddho gamayedyamasādanam

यदि जनार्दन चाहें तो युद्ध करते उन सबको वैसे ही यमलोक भेज दें जैसे क्रुद्ध सिंह हाथियों को।

श्लोक 26 (5.130.26)

न त्वयं निन्दितं कर्म कुर्यात्पापं कथंचन । न च धर्मादपक्रामेदच्युतः पुरुषोत्तमः ॥

na tvayaṃ ninditaṃ karma kuryātpāpaṃ kathaṃcana | na ca dharmādapakrāmedacyutaḥ puruṣottamaḥ

परंतु ये कभी कोई निंदित पापकर्म नहीं करेंगे; पुरुषोत्तम अच्युत धर्म से विचलित नहीं होंगे।

श्लोक 27 (5.130.27)

यथा वाराणसी दग्धा साश्वा सरथकुञ्जरा । सानुबन्धस्तु कृष्णेन काशीनामृषभो हतः ॥

yathā vārāṇasī dagdhā sāśvā sarathakuñjarā | sānubandhastu kṛṣṇena kāśīnāmṛṣabho hataḥ

जैसे कृष्ण ने वाराणसी को उसके घोड़ों, रथों और हाथियों सहित जला डाला था और काशियों के श्रेष्ठ राजा को उसके बन्धु-बान्धवों सहित मार गिराया था,

श्लोक 28 (5.130.28)

तथा नागपुरं दग्ध्वा शङ्खचक्रगदाधरः । स्वयं कालेश्वरो भूत्वा नाशयिष्यति कौरवान् ॥

tathā nāgapuraṃ dagdhvā śaṅkhacakragadādharaḥ | svayaṃ kāleśvaro bhūtvā nāśayiṣyati kauravān

वैसे ही शंख, चक्र और गदा धारण करने वाले ये स्वयं कालेश्वर बनकर नागपुर (हस्तिनापुर) को जलाकर कौरवों का नाश कर देंगे।

श्लोक 29 (5.130.29)

पारिजातहरं ह्येनमेकं यदुसुखावहम् । नाभ्यवर्तत संरब्धो वृत्रहा वसुभिः सह ॥

pārijātaharaṃ hyenamekaṃ yadusukhāvaham | nābhyavartata saṃrabdho vṛtrahā vasubhiḥ saha

जब इन्होंने यदुवंशियों के सुख के लिए अकेले ही पारिजात का हरण किया, तब वृत्रहन्ता इन्द्र क्रोध में भरकर वसुओं के साथ आए, फिर भी इनका सामना न कर सके।

श्लोक 30 (5.130.30)

प्राप्य निर्मोचने पाशान्षट्सहस्रांस्तरस्विनः । हृतास्ते वासुदेवेन ह्युपसङ्क्रम्य कौरवान् ॥

prāpya nirmocane pāśānṣaṭsahasrāṃstarasvinaḥ | hṛtāste vāsudevena hyupasaṅkramya kauravān

निर्मोचन में पाशधारी छः हजार बलवान शत्रुओं पर पहुँचकर वासुदेव ने उनका संहार कर दिया था; वैसे ही वे कौरवों पर भी टूट सकते हैं।

श्लोक 31 (5.130.31)

द्वारमासाद्य सौभस्य विधूय गदया गिरिम् । द्युमत्सेनः सहामात्यः कृष्णेन विनिपातितः ॥

dvāramāsādya saubhasya vidhūya gadayā girim | dyumatsenaḥ sahāmātyaḥ kṛṣṇena vinipātitaḥ

सौभ के द्वार पर पहुँचकर उन्होंने गदा से पर्वत को चूर-चूर कर दिया और कृष्ण ने मन्त्रियों सहित द्युमत्सेन को मार गिराया।

श्लोक 32 (5.130.32)

शेषवत्त्वात्कुरूणां तु धर्मापेक्षी तथाऽच्युतः । क्षमते पुण्डरीकाक्षः शक्तः सन्पापकर्मणाम् ॥

śeṣavattvātkurūṇāṃ tu dharmāpekṣī tathā'cyutaḥ | kṣamate puṇḍarīkākṣaḥ śaktaḥ sanpāpakarmaṇām

परंतु कुरुओं का समय अभी शेष है, और धर्म का ध्यान रखने के कारण कमलनयन अच्युत समर्थ होते हुए भी इन पापकर्मियों को सह रहे हैं।

श्लोक 33 (5.130.33)

एते हि यदि गोविन्दमिच्छन्ति सह राजभिः । अद्यैवातिथयः सर्वे भविष्यन्ति यमस्य ते ॥

ete hi yadi govindamicchanti saha rājabhiḥ | adyaivātithayaḥ sarve bhaviṣyanti yamasya te

यदि ये राजाओं सहित गोविन्द को पकड़ना चाहते हैं, तो आज ही ये सब यमराज के अतिथि बन जाएँगे।

श्लोक 34 (5.130.34)

यथा वायोस्तृणाग्राणि वशं यान्ति बलीयसः । तथा चक्रभृतः सर्वे वशमेष्यन्ति कौरवाः ॥

yathā vāyostṛṇāgrāṇi vaśaṃ yānti balīyasaḥ | tathā cakrabhṛtaḥ sarve vaśameṣyanti kauravāḥ

जैसे तिनकों के सिरे बलवान वायु के वश में झुक जाते हैं, वैसे ही सब कौरव चक्रधारी के वश में आ जाएँगे।

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 35 (5.130.35)

विदुरेणैवमुक्ते तु केशवो वाक्यमब्रवीत् । धृतराष्ट्रमभिप्रेक्ष्य सुहृदां शृण्वतां मिथः ॥

vidureṇaivamukte tu keśavo vākyamabravīt | dhṛtarāṣṭramabhiprekṣya suhṛdāṃ śṛṇvatāṃ mithaḥ

विदुर के ऐसा कहने पर केशव ने धृतराष्ट्र की ओर देखकर, सब सुहृदों के सुनते हुए, यह बात कही —

वासुदेव उवाच

श्लोक 36 (5.130.36)

राजन्नेते यदि क्रुद्धा मां निगृह्णीयुरोजसा । एते वा मामहं वैनाननुजानीहि पार्थिव ॥

rājannete yadi kruddhā māṃ nigṛhṇīyurojasā | ete vā māmahaṃ vainānanujānīhi pārthiva

राजन्! यदि ये क्रोध में आकर बलपूर्वक मुझे पकड़ना चाहें, तो या तो ये मुझे पकड़ लें या मैं इन्हें — हे पृथ्वीपति, आप इसकी अनुमति दीजिए।

श्लोक 37 (5.130.37)

एतान्हि सर्वान्संरब्धान्नियन्तुमहमुत्सहे । न त्वहं निन्दितं कर्म कुर्यां पापं कथंचन ॥

etānhi sarvānsaṃrabdhānniyantumahamutsahe | na tvahaṃ ninditaṃ karma kuryāṃ pāpaṃ kathaṃcana

मैं इन सब क्रुद्ध लोगों को वश में करने में समर्थ हूँ; परंतु मैं कभी कोई निंदित पापकर्म नहीं करूँगा।

श्लोक 38 (5.130.38)

पाण्डवार्थे हि लुभ्यन्तः स्वार्थान्हास्यन्ति ते सुताः । एते चेदेवमिच्छन्ति कृतकार्यो युधिष्ठिरः ॥

pāṇḍavārthe hi lubhyantaḥ svārthānhāsyanti te sutāḥ | ete cedevamicchanti kṛtakāryo yudhiṣṭhiraḥ

पाण्डवों के धन का लोभ करते हुए आपके पुत्र अपना ही धन गँवा बैठेंगे। यदि ये ऐसा ही चाहते हैं, तो युधिष्ठिर का काम बन गया समझिए।

श्लोक 39 (5.130.39)

अद्यैव ह्यहमेनांश्च ये चैनाननु भारत । निगृह्य राजन्पार्थेभ्यो दद्यां किं दुष्कृतं भवेत् ॥

adyaiva hyahamenāṃśca ye cainānanu bhārata | nigṛhya rājanpārthebhyo dadyāṃ kiṃ duṣkṛtaṃ bhavet

हे भारत! आज ही मैं इन्हें और इनके अनुयायियों को पकड़कर पार्थों को सौंप दूँ, तो हे राजन्, इसमें क्या बुराई होगी?

श्लोक 40 (5.130.40)

एष मे निश्चयो राजन्यद्येषोऽस्य विनिश्चयः । नर्दन्तु सहिताः शङ्खाः पणवानकनिस्वनैः ॥

eṣa me niścayo rājanyadyeṣo'sya viniścayaḥ | nardantu sahitāḥ śaṅkhāḥ paṇavānakanisvanaiḥ

हे राजन्! यदि इस (दुर्योधन) का यही निश्चय है, तो मेरा भी यही निश्चय है। तब ढोल और नगाड़ों की ध्वनि के साथ सारे शंख एक साथ गूँज उठें।

श्लोक 41 (5.130.41)

अनायासेन पार्थानां वर्ततां च शिवं महत् । निगृह्य राजन्पार्थेभ्यो दद्यां चेत्सुकृतं भवेत् ॥

anāyāsena pārthānāṃ vartatāṃ ca śivaṃ mahat | nigṛhya rājanpārthebhyo dadyāṃ cetsukṛtaṃ bhavet

तब पार्थों का बिना परिश्रम महान कल्याण हो जाए। हे राजन्! यदि मैं इन्हें पकड़कर पार्थों को सौंप दूँ तो यह अच्छा ही काम होगा।

श्लोक 42 (5.130.42)

इदं तु न प्रवर्तेयं निन्दितं कर्म भारत । सन्निधौ ते महाराज क्रोधजं पापबुद्धिजम् ॥

idaṃ tu na pravarteyaṃ ninditaṃ karma bhārata | sannidhau te mahārāja krodhajaṃ pāpabuddhijam

परंतु हे भारत, हे महाराज! आपके सामने मैं क्रोध और पापबुद्धि से उपजा यह निंदित कर्म नहीं करूँगा।

श्लोक 43 (5.130.43)

एष दुर्योधनो राजन्यथेच्छति तथाऽस्तु तत् । अहं तु सर्वांस्तनयाननुजानामि ते नृप ॥

eṣa duryodhano rājanyathecchati tathā'stu tat | ahaṃ tu sarvāṃstanayānanujānāmi te nṛpa

हे राजन्! यह दुर्योधन जैसा चाहता है वैसा ही हो। हे नरेश, मैं तो आपके सब पुत्रों को (जो चाहें करने की) छूट देता हूँ।

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 44 (5.130.44)

एतच्छ्रुत्वा तु विदुरं धृतराष्ट्रोऽभ्यभाषत । क्षिप्रमानय तं पापं राज्यलुब्धं सुयोधनम् ॥

etacchrutvā tu viduraṃ dhṛtarāṣṭro'bhyabhāṣata | kṣipramānaya taṃ pāpaṃ rājyalubdhaṃ suyodhanam

यह सुनकर धृतराष्ट्र ने विदुर से कहा — "उस राज्यलोभी पापी सुयोधन को शीघ्र यहाँ ले आओ,

धृतराष्ट्र उवाच

श्लोक 45 (5.130.45)

सहमित्रं सहामात्यं ससोदर्यं सहानुगम् । शक्नुयां यदि पन्थानमवतारयितुं पुनः ॥

sahamitraṃ sahāmātyaṃ sasodaryaṃ sahānugam | śaknuyāṃ yadi panthānamavatārayituṃ punaḥ

उसके मित्रों, मन्त्रियों, भाइयों और अनुचरों सहित — कदाचित् मैं उसे फिर से सही मार्ग पर ला सकूँ।"

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 46 (5.130.46)

ततो दुर्योधनं क्षत्ता पुनः प्रावेशयत्सभाम् । अकामं भ्रातृभिः सार्धं राजभिः परिवारितम् ॥

tato duryodhanaṃ kṣattā punaḥ prāveśayatsabhām | akāmaṃ bhrātṛbhiḥ sārdhaṃ rājabhiḥ parivāritam

तब क्षत्ता (विदुर) अनिच्छुक दुर्योधन को उसके भाइयों के साथ, राजाओं से घिरे हुए, फिर सभा में ले आए।

श्लोक 47 (5.130.47)

अथ दुर्योधनं राजा धृतराष्ट्रोऽभ्यभाषत । कर्णदुःशासनाभ्यां च राजभिश्चापि संवृतम् ॥

atha duryodhanaṃ rājā dhṛtarāṣṭro'bhyabhāṣata | karṇaduḥśāsanābhyāṃ ca rājabhiścāpi saṃvṛtam

तब कर्ण, दुःशासन और राजाओं से घिरे दुर्योधन से राजा धृतराष्ट्र ने कहा —

धृतराष्ट्र उवाच

श्लोक 48 (5.130.48)

नृशंस पापभूयिष्ठ क्षुद्रकर्मसहायवान् । पापैः सहायैः संहत्य पापं कर्म चिकीर्षसि ॥

nṛśaṃsa pāpabhūyiṣṭha kṣudrakarmasahāyavān | pāpaiḥ sahāyaiḥ saṃhatya pāpaṃ karma cikīrṣasi

अरे क्रूर, महापापी, नीच कर्म करने वालों के साथी! तू पापी सहायकों के साथ मिलकर पापकर्म करना चाहता है —

श्लोक 49 (5.130.49)

अशक्यमयशस्यं च सद्भिश्चापि विगर्हितम् । यथा त्वादृशको मूढो व्यवस्येत्कुलपांसनः ॥

aśakyamayaśasyaṃ ca sadbhiścāpi vigarhitam | yathā tvādṛśako mūḍho vyavasyetkulapāṃsanaḥ

ऐसा कर्म जो असम्भव है, अपयशकारी है और सज्जनों द्वारा निंदित है — जिसे तेरे जैसा कुलकलंक मूढ़ ही करने की ठान सकता है।

श्लोक 50 (5.130.50)

त्वमिमं पुण्डरीकाक्षमप्रधृष्यं दुरासदम् । पापैः सहायैः संहत्य निग्रहीतुं किलेच्छसि ॥

tvamimaṃ puṇḍarīkākṣamapradhṛṣyaṃ durāsadam | pāpaiḥ sahāyaiḥ saṃhatya nigrahītuṃ kilecchasi

सुनते हैं, तू पापी सहायकों के साथ मिलकर इस अजेय और दुर्धर्ष कमलनयन को बंदी बनाना चाहता है।

श्लोक 51 (5.130.51)

यो न शक्यो बलात्कर्तुं देवैरपि सवासवैः । तं त्वं प्रार्थयसे मन्द बालश्चन्द्रमसं यथा ॥

yo na śakyo balātkartuṃ devairapi savāsavaiḥ | taṃ tvaṃ prārthayase manda bālaścandramasaṃ yathā

जिसे इन्द्र सहित देवता भी बलपूर्वक वश में नहीं कर सकते, उसे हे मूर्ख, तू वैसे ही पाना चाहता है जैसे बालक चन्द्रमा को।

श्लोक 52 (5.130.52)

देवैर्मनुष्यैर्गन्धर्वैरसुरैरुरगैश्च यः । न सोढुं समरे शक्यस्तं न बुध्यसि केशवम् ॥

devairmanuṣyairgandharvairasurairuragaiśca yaḥ | na soḍhuṃ samare śakyastaṃ na budhyasi keśavam

देवता, मनुष्य, गन्धर्व, असुर और नाग — कोई भी जिसका युद्ध में सामना नहीं कर सकता, उस केशव को तू नहीं समझता।

श्लोक 53 (5.130.53)

दुर्ग्राह्यः पाणिना वायुर्दुस्पर्शः पाणिना शशी । दुर्धरा पृथिवी मूर्ध्ना दुर्ग्राह्यः केशवो बलात् ॥

durgrāhyaḥ pāṇinā vāyurdusparśaḥ pāṇinā śaśī | durdharā pṛthivī mūrdhnā durgrāhyaḥ keśavo balāt

हवा को हाथ से पकड़ना कठिन है, चन्द्रमा को हाथ से छूना कठिन है, पृथ्वी को सिर पर उठाना कठिन है — और केशव को बलपूर्वक पकड़ना कठिन है।

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 54 (5.130.54)

इत्युक्ते धृतराष्ट्रेण क्षत्ताऽपि विदुरोऽब्रवीत् । दुर्योधनमभिप्रेक्ष्य धार्तराष्ट्रममर्षणम् ॥

ityukte dhṛtarāṣṭreṇa kṣattā'pi viduro'bravīt | duryodhanamabhiprekṣya dhārtarāṣṭramamarṣaṇam

धृतराष्ट्र के ऐसा कहने पर क्षत्ता विदुर ने भी असहिष्णु धृतराष्ट्रपुत्र दुर्योधन की ओर देखकर कहा —

विदुर उवाच

श्लोक 55 (5.130.55)

दुर्योधन निबोधेदं वचनं मम सांप्रतम् । सौभद्वारे वानरेन्द्रो द्विविदो नाम नामतः । शिलावर्षेण महता छादयामास केशवम् ॥

duryodhana nibodhedaṃ vacanaṃ mama sāṃpratam | saubhadvāre vānarendro dvivido nāma nāmataḥ | śilāvarṣeṇa mahatā chādayāmāsa keśavam

दुर्योधन! मेरी यह समयोचित बात सुन। सौभ के द्वार पर द्विविद नामक वानरराज ने भारी शिलावर्षा से केशव को ढक दिया था;

श्लोक 56 (5.130.56)

ग्रहीतुकामो विक्रम्य सर्वयत्नेन माधवम् । ग्रहीतुं नाशकच्चैनं तं त्वं प्रार्थयसे बलात् ॥

grahītukāmo vikramya sarvayatnena mādhavam | grahītuṃ nāśakaccainaṃ taṃ tvaṃ prārthayase balāt

वह पूरे प्रयत्न से पराक्रम करके माधव को पकड़ना चाहता था, फिर भी उन्हें पकड़ न सका — और उन्हें तू बलपूर्वक पाना चाहता है!

श्लोक 57 (5.130.57)

प्राग्ज्योतिषगतं शौरिं नरकः सह दानवैः । ग्रहीतुं नाशकत्तत्र तं त्वं प्रार्थयसे बलात् ॥

prāgjyotiṣagataṃ śauriṃ narakaḥ saha dānavaiḥ | grahītuṃ nāśakattatra taṃ tvaṃ prārthayase balāt

प्राग्ज्योतिषपुर गए शौरि को नरकासुर दानवों सहित वहाँ पकड़ न सका — और उन्हें तू बलपूर्वक पाना चाहता है!

श्लोक 58 (5.130.58)

अनेकयुगवर्षायुर्निहत्य नरकं मृधे । नीत्वा कन्यासहस्राणि उपयेमे यथाविधि ॥

anekayugavarṣāyurnihatya narakaṃ mṛdhe | nītvā kanyāsahasrāṇi upayeme yathāvidhi

उन्होंने अनेक युगों की आयु वाले नरकासुर को युद्ध में मारकर हजारों कन्याओं को ले आकर विधिपूर्वक उनसे विवाह किया।

श्लोक 59 (5.130.59)

निर्मोचने षट्सहस्राः पाशैर्बद्ध्वा महासुराः । ग्रहीतुं नाशकंश्चैनं तं त्वं प्रार्थयसे बलात् ॥

nirmocane ṣaṭsahasrāḥ pāśairbaddhvā mahāsurāḥ | grahītuṃ nāśakaṃścainaṃ taṃ tvaṃ prārthayase balāt

निर्मोचन में छः हजार महादैत्य उन्हें पाशों से बाँधकर भी पकड़ न सके — और उन्हें तू बलपूर्वक पाना चाहता है!

श्लोक 60 (5.130.60)

अनेन हि हता बाल्ये पूतना शिशुना तदा । गोवर्धनो धारितश्च गवार्थे भरतर्षभ ॥

anena hi hatā bālye pūtanā śiśunā tadā | govardhano dhāritaśca gavārthe bharatarṣabha

इन्होंने ही बचपन में शिशु रहते हुए पूतना को मारा था, और हे भरतश्रेष्ठ, गौओं की रक्षा के लिए गोवर्धन पर्वत को उठाया था।

श्लोक 61 (5.130.61)

अरिष्टो धेनुकश्चैव चाणूरश्च महाबलः । अश्वराजश्च निहतः कंसश्चारिष्टमाचरन् ॥

ariṣṭo dhenukaścaiva cāṇūraśca mahābalaḥ | aśvarājaśca nihataḥ kaṃsaścāriṣṭamācaran

अरिष्ट, धेनुक, महाबली चाणूर, अश्वराज और अनिष्ट करने वाला कंस — ये सब इनके हाथों मारे गए।

श्लोक 62 (5.130.62)

जरासन्धश्च वक्रश्च शिशुपालश्च वीर्यवान् । बाणश्च निहतः सङ्ख्ये राजानश्च निषूदिताः ॥

jarāsandhaśca vakraśca śiśupālaśca vīryavān | bāṇaśca nihataḥ saṅkhye rājānaśca niṣūditāḥ

जरासन्ध, वक्र, पराक्रमी शिशुपाल और बाण युद्ध में मारे गए, और अनेक राजाओं का संहार हुआ।

श्लोक 63 (5.130.63)

वरुणो निर्जितो राजा पावकश्चामितौजसा । पारिजातं च हरता जितः साक्षाच्छचीपतिः ॥

varuṇo nirjito rājā pāvakaścāmitaujasā | pārijātaṃ ca haratā jitaḥ sākṣācchacīpatiḥ

उन अमित तेजस्वी ने राजा वरुण और अग्नि को जीता, और पारिजात का हरण करते समय स्वयं शचीपति इन्द्र को परास्त किया।

श्लोक 64 (5.130.64)

एकार्णवे च स्वपता निहतौ मधुकैटभौ । जन्मान्तरमुपागम्य हयग्रीवस्तथा हतः ॥

ekārṇave ca svapatā nihatau madhukaiṭabhau | janmāntaramupāgamya hayagrīvastathā hataḥ

एकार्णव में शयन करते हुए उन्होंने मधु और कैटभ को मारा, और दूसरा जन्म लेकर उसी प्रकार हयग्रीव का वध किया।

श्लोक 65 (5.130.65)

अयं कर्ता न क्रियते कारणं चापि पौरुषे । यद्यदिच्छेदयं शौरिस्तत्तत्कुर्यादयत्नतः ॥

ayaṃ kartā na kriyate kāraṇaṃ cāpi pauruṣe | yadyadicchedayaṃ śauristattatkuryādayatnataḥ

ये कर्ता हैं, किसी के बनाए हुए नहीं; पुरुषार्थ के भी कारण यही हैं। शौरि जो-जो चाहें, वह सब बिना प्रयास कर सकते हैं।

श्लोक 66 (5.130.66)

तं न बुध्यसि गोविन्दं घोरविक्रममच्युतम् । आशीविषमिव क्रुद्धं तेजोराशिमनिन्दितम् ॥

taṃ na budhyasi govindaṃ ghoravikramamacyutam | āśīviṣamiva kruddhaṃ tejorāśimaninditam

तू भयानक पराक्रम वाले अच्युत गोविन्द को नहीं समझता, जो क्रुद्ध विषधर सर्प के समान हैं, तेज के पुंज हैं और अनिन्द्य हैं।

श्लोक 67 (5.130.67)

प्रधर्षयन्महाबाहुं कृष्णमक्लिष्टकारिणम् । पतङ्गोऽग्निमिवासाद्य सामात्यो नभविष्यसि ॥

pradharṣayanmahābāhuṃ kṛṣṇamakliṣṭakāriṇam | pataṅgo'gnimivāsādya sāmātyo nabhaviṣyasi

अनायास कर्म करने वाले महाबाहु कृष्ण पर आक्रमण करके तू मन्त्रियों सहित वैसे ही नष्ट हो जाएगा जैसे आग पर गिरकर पतंगा।

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