उद्योग पर्व · अध्याय 131
कुरुसभा में श्रीकृष्ण का विश्वरूप-दर्शन
स्वयं को अकेला समझने के लिए श्रीकृष्ण दुर्योधन पर हँसते हैं और अपना विश्वरूप प्रकट करते हैं: उनके शरीर से देवता, पाण्डव और वृष्णि वीर निकल पड़ते हैं, उनके नेत्रों, नासिका और कानों से ज्वालाएँ फूटती हैं, और लोक, पर्वत तथा समुद्र उनके भीतर दिखाई देते हैं। भय से राजा आँखें मूँद लेते हैं; कृष्ण द्रोण, भीष्म, विदुर, संजय, धृतराष्ट्र और ऋषियों को दिव्य दृष्टि देते हैं, और देवता उनकी स्तुति कर उस रूप को समेटने की प्रार्थना करते हैं। उनका दर्शन कर चुके धृतराष्ट्र फिर से दृष्टिहीन होने का वर माँगते हैं। कृष्ण अपना रूप समेटकर सात्यकि और विदुर के साथ सभा से निकलते हैं, धृतराष्ट्र की सफाई सुनते हैं, बड़ों से विदा लेते हैं और अपनी बुआ कुन्ती से मिलने रथ पर चल पड़ते हैं।
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 1 (5.131.1)
विदुरेणैवमुक्तस्तु केशवः शत्रुपूगहा । दुर्योधनं धार्तराष्ट्रमभ्यभाषत वीर्यवान् ॥
vidureṇaivamuktastu keśavaḥ śatrupūgahā | duryodhanaṃ dhārtarāṣṭramabhyabhāṣata vīryavān
विदुर के ऐसा कहने पर शत्रुसमूहों का संहार करने वाले पराक्रमी केशव ने धृतराष्ट्रपुत्र दुर्योधन से कहा —
वासुदेव उवाच
श्लोक 2 (5.131.2)
एकोऽहमिति यन्मोहान्मन्यसे मां सुयोधन । परिभूय सुदुर्बुद्धे ग्रहीतुं मां चिकीर्षसि ॥
eko'hamiti yanmohānmanyase māṃ suyodhana | paribhūya sudurbuddhe grahītuṃ māṃ cikīrṣasi
सुयोधन! मोहवश तू मुझे अकेला समझता है, इसीलिए हे दुर्बुद्धि, मेरा तिरस्कार करके मुझे पकड़ना चाहता है।
श्लोक 3 (5.131.3)
इहैव पाण्डवाः सर्वे तथैवान्धकवृष्णयः । इहादित्याश्च रुद्राश्च वसवश्च महर्षिभिः ॥
ihaiva pāṇḍavāḥ sarve tathaivāndhakavṛṣṇayaḥ | ihādityāśca rudrāśca vasavaśca maharṣibhiḥ
यहीं सारे पाण्डव हैं, यहीं अन्धक और वृष्णि हैं; यहीं महर्षियों सहित आदित्य, रुद्र और वसु हैं।
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 4 (5.131.4)
एवमुक्त्वा जहासोच्चैः केशवः परवीरहा । तस्य संस्मयतः शौरेर्विद्युद्रूपा महात्मनः । युगपच्च विनिष्पेतुः साक्षात्सर्वास्तु देवताः ॥
evamuktvā jahāsoccaiḥ keśavaḥ paravīrahā | tasya saṃsmayataḥ śaurervidyudrūpā mahātmanaḥ | yugapacca viniṣpetuḥ sākṣātsarvāstu devatāḥ
ऐसा कहकर शत्रुवीरों का संहार करने वाले केशव ठहाका मारकर हँसे। उन महात्मा शौरि के मुस्कुराते ही बिजली के समान दमकते सभी देवता साक्षात् एक साथ उनसे निकल पड़े।
श्लोक 5 (5.131.5)
अङ्गुष्ठमात्रास्त्रिदशा बभूवुः पावकार्चिषः । तस्य ब्रह्मा ललाटस्थो रुद्रो वक्षसि चाभवत् ॥
aṅguṣṭhamātrāstridaśā babhūvuḥ pāvakārciṣaḥ | tasya brahmā lalāṭastho rudro vakṣasi cābhavat
अंगूठे भर के वे देवता अग्नि की लपटों के समान हो गए। उनके ललाट पर ब्रह्मा थे और वक्षःस्थल पर रुद्र;
श्लोक 6 (5.131.6)
लोकपाला भुजेष्वासन्नग्निरास्यादजायत । आदित्याश्चैव साध्याश्च वसवोऽथाश्विनावपि ॥
lokapālā bhujeṣvāsannagnirāsyādajāyata | ādityāścaiva sādhyāśca vasavo'thāśvināvapi
लोकपाल उनकी भुजाओं पर थे और अग्नि उनके मुख से प्रकट हुए। आदित्य, साध्य, वसु और दोनों अश्विनीकुमार भी,
श्लोक 7 (5.131.7)
मरुतश्च सहेन्द्रेण विश्वेदेवास्तथैव च । बभूवुश्चैव यक्षाश्च गन्धर्वोरगराक्षसाः ॥
marutaśca sahendreṇa viśvedevāstathaiva ca | babhūvuścaiva yakṣāśca gandharvoragarākṣasāḥ
इन्द्र सहित मरुद्गण, वैसे ही विश्वेदेव, और यक्ष, गन्धर्व, नाग तथा राक्षस भी प्रकट हुए।
श्लोक 8 (5.131.8)
प्रादुरास्तां तथा दोर्भ्यां सङ्कर्षणधनञ्जयौ । दक्षिणेऽथार्जुनो धन्वी हली रामश्च सव्यतः ॥
prādurāstāṃ tathā dorbhyāṃ saṅkarṣaṇadhanañjayau | dakṣiṇe'thārjuno dhanvī halī rāmaśca savyataḥ
उनकी दोनों भुजाओं से संकर्षण और धनञ्जय प्रकट हुए — दाहिनी ओर धनुर्धर अर्जुन और बाईं ओर हलधर बलराम।
श्लोक 9 (5.131.9)
भीमो युधिष्ठिरश्चैव माद्रीपुत्रौ च पृष्ठतः । अन्धका वृष्णयश्चैव प्रद्युम्नप्रमुखास्ततः ॥
bhīmo yudhiṣṭhiraścaiva mādrīputrau ca pṛṣṭhataḥ | andhakā vṛṣṇayaścaiva pradyumnapramukhāstataḥ
भीम, युधिष्ठिर और माद्री के दोनों पुत्र पीछे की ओर थे, और फिर प्रद्युम्न आदि अन्धक और वृष्णि
श्लोक 10 (5.131.10)
अग्रे बभूवुः कृष्णस्य समुद्यतमहायुधाः । शङ्खचक्रगदाशक्तिशार्ङ्गलाङ्गलनन्दकाः ॥
agre babhūvuḥ kṛṣṇasya samudyatamahāyudhāḥ | śaṅkhacakragadāśaktiśārṅgalāṅgalanandakāḥ
बड़े-बड़े आयुध उठाए कृष्ण के आगे खड़े थे। शंख, चक्र, गदा, शक्ति, शार्ङ्ग धनुष, हल और नन्दक खड्ग —
श्लोक 11 (5.131.11)
अदृश्यन्तोद्यतान्येव सर्वप्रहरणानि च । नानाबाहुषु कृष्णस्य दीप्यमानानि सर्वशः ॥
adṛśyantodyatānyeva sarvapraharaṇāni ca | nānābāhuṣu kṛṣṇasya dīpyamānāni sarvaśaḥ
ये तथा अन्य सभी शस्त्र कृष्ण की अनेक भुजाओं में उठे हुए, चारों ओर दमकते दिखाई दिए।
श्लोक 12 (5.131.12)
नेत्राभ्यां नासिकाभ्यां च श्रोत्राभ्यां च समन्ततः । प्रादुरासन्महारौद्राः सधूमाः पावकार्चिषः ॥
netrābhyāṃ nāsikābhyāṃ ca śrotrābhyāṃ ca samantataḥ | prādurāsanmahāraudrāḥ sadhūmāḥ pāvakārciṣaḥ
उनके नेत्रों, नासिका और कानों से चारों ओर धुएँ सहित अत्यन्त भयंकर अग्नि-ज्वालाएँ निकलने लगीं,
श्लोक 13 (5.131.13)
रोमकूपेषु च तथा सूर्यस्येव मरीचयः । सहस्रचरणः श्रीमाञ्शतबाहुः सहस्रदृक् ॥
romakūpeṣu ca tathā sūryasyeva marīcayaḥ | sahasracaraṇaḥ śrīmāñśatabāhuḥ sahasradṛk
और रोमकूपों से सूर्य की किरणों के समान। वे श्रीमान् सहस्र चरणों, सौ भुजाओं और सहस्र नेत्रों वाले थे।
श्लोक 14 (5.131.14)
तस्य वै नागलोकश्च गुल्फाधो ददृशे तदा । चन्द्रसूर्यौ तथा नेत्रे ग्रहा वै सर्वतः स्थिताः ॥
tasya vai nāgalokaśca gulphādho dadṛśe tadā | candrasūryau tathā netre grahā vai sarvataḥ sthitāḥ
तब उनके टखनों के नीचे नागलोक दिखाई दिया; चन्द्रमा और सूर्य उनके नेत्र थे, और ग्रह चारों ओर स्थित थे।
श्लोक 15 (5.131.15)
ऊर्ध्वलोकाश्च सर्वेऽपि कुक्षौ तस्य व्यवस्थिताः । सरितः सागराश्चैव स्वेदस्तस्य महात्मनः ॥
ūrdhvalokāśca sarve'pi kukṣau tasya vyavasthitāḥ | saritaḥ sāgarāścaiva svedastasya mahātmanaḥ
सारे ऊर्ध्वलोक उनके उदर में स्थित थे; नदियाँ और समुद्र उन महात्मा का पसीना थे।
श्लोक 16 (5.131.16)
अस्थीनि पर्वताः सर्वे वृक्षा रोमाणि तस्य हि । निमेषणं रात्र्यहनी जिह्वायां शारदा तथा ॥
asthīni parvatāḥ sarve vṛkṣā romāṇi tasya hi | nimeṣaṇaṃ rātryahanī jihvāyāṃ śāradā tathā
सारे पर्वत उनकी अस्थियाँ थे और वृक्ष उनके रोम; रात और दिन उनकी पलकों का झपकना थे, और उनकी जिह्वा पर शारदा विराजमान थीं।
श्लोक 17 (5.131.17)
तं दृष्ट्वा घोरमात्मानं केशवस्य महात्मनः । न्यमीलयन्त नेत्राणि राजानस्त्रस्तचेतसः ॥
taṃ dṛṣṭvā ghoramātmānaṃ keśavasya mahātmanaḥ | nyamīlayanta netrāṇi rājānastrastacetasaḥ
महात्मा केशव के उस भयंकर रूप को देखकर भयभीत चित्त वाले राजाओं ने आँखें मूँद लीं —
श्लोक 18 (5.131.18)
ऋते द्रोणं च भीष्मं च विदुरं च महामतिम् । संजयं धृतराष्ट्रं च ऋषींश्चैव तपोधनान् ॥
ṛte droṇaṃ ca bhīṣmaṃ ca viduraṃ ca mahāmatim | saṃjayaṃ dhṛtarāṣṭraṃ ca ṛṣīṃścaiva tapodhanān
केवल द्रोण, भीष्म, महाबुद्धिमान विदुर, संजय, धृतराष्ट्र और तपोधन ऋषियों को छोड़कर।
श्लोक 19 (5.131.19)
प्रादात्तेषां स भगवान्दिव्यं चक्षुर्जनार्दनः ॥
prādātteṣāṃ sa bhagavāndivyaṃ cakṣurjanārdanaḥ
उन्हें भगवान् जनार्दन ने दिव्य दृष्टि प्रदान की।
श्लोक 20 (5.131.20)
धृतराष्ट्राय प्रददौ भगवान्दिव्यचक्षुषी । ददर्श परमं रूपं धृतराष्ट्रोऽम्बिकासुतः ॥
dhṛtarāṣṭrāya pradadau bhagavāndivyacakṣuṣī | dadarśa paramaṃ rūpaṃ dhṛtarāṣṭro'mbikāsutaḥ
भगवान् ने धृतराष्ट्र को दिव्य नेत्र दिए, और अम्बिकापुत्र धृतराष्ट्र ने वह परम रूप देखा।
श्लोक 21 (5.131.21)
ततो देवाः सगन्धर्वाः किन्नराश्च महोरगाः । ऋषयश्च महाभागा लोकपालैः समन्विताः । प्रणम्य शिरसा देवं तुष्टुवुः प्राञ्जलिस्थिताः ॥
tato devāḥ sagandharvāḥ kinnarāśca mahoragāḥ | ṛṣayaśca mahābhāgā lokapālaiḥ samanvitāḥ | praṇamya śirasā devaṃ tuṣṭuvuḥ prāñjalisthitāḥ
तब गन्धर्वों, किन्नरों और महानागों सहित देवता, और लोकपालों सहित महाभाग ऋषि, हाथ जोड़कर खड़े हुए, सिर झुकाकर उस देव की स्तुति करने लगे —
देवा ऊचुः
श्लोक 22 (5.131.22)
क्रोधं प्रभो संहर संहर स्वं । रूपं च यद्दर्शितमात्मसंस्थम् । यावत्त्विमे देवगणैः समेता । लोकाः समस्ता भुवि नाशमीयुः ॥
krodhaṃ prabho saṃhara saṃhara svaṃ | rūpaṃ ca yaddarśitamātmasaṃstham | yāvattvime devagaṇaiḥ sametā | lokāḥ samastā bhuvi nāśamīyuḥ
हे प्रभो! अपना क्रोध समेट लीजिए, अपने भीतर से प्रकट किए इस रूप को समेट लीजिए, इससे पहले कि देवगणों सहित ये सारे लोक पृथ्वी पर नष्ट हो जाएँ।
श्लोक 23 (5.131.23)
त्वं च कर्ता विकर्ता च त्वमेव परिरक्षसे । त्वया व्याप्तमिदं सर्वं जगत्स्थावरजङ्गमम् ॥
tvaṃ ca kartā vikartā ca tvameva parirakṣase | tvayā vyāptamidaṃ sarvaṃ jagatsthāvarajaṅgamam
आप ही कर्ता हैं और आप ही संहर्ता; आप ही रक्षा करते हैं। यह समस्त चराचर जगत् आपसे ही व्याप्त है।
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 24 (5.131.24)
कियन्मात्रा महीपालाः किंवीर्याः किंपराक्रमाः । तेषामर्थे महाबाहो दिव्यं रूपं प्रदर्शिवान् । एवमुच्चारिता वाचः सह देवैर्विभुं तदा ॥
kiyanmātrā mahīpālāḥ kiṃvīryāḥ kiṃparākramāḥ | teṣāmarthe mahābāho divyaṃ rūpaṃ pradarśivān | evamuccāritā vācaḥ saha devairvibhuṃ tadā
"ये राजा हैं ही कितने, इनका बल और पराक्रम ही क्या है, कि हे महाबाहो, इनके लिए आपने अपना दिव्य रूप दिखाया?" — इस प्रकार देवताओं के साथ उन्होंने तब उस सर्वव्यापी प्रभु से ये वचन कहे।
श्लोक 25 (5.131.25)
तद्दृष्ट्वा महदाश्चर्यं माधवस्य सभातले । देवदुन्दुभयो नेदुः पुष्पवर्षं पपात च ॥
taddṛṣṭvā mahadāścaryaṃ mādhavasya sabhātale | devadundubhayo neduḥ puṣpavarṣaṃ papāta ca
सभाभवन में माधव का वह महान आश्चर्य देखकर देवताओं की दुन्दुभियाँ बज उठीं और फूलों की वर्षा होने लगी।
धृतराष्ट्र उवाच
श्लोक 26 (5.131.26)
त्वमेव पुण्डरीकाक्ष सर्वस्य जगतो हितः । तस्मान्मे यादवश्रेष्ठ प्रसादं कर्तुमर्हसि ॥
tvameva puṇḍarīkākṣa sarvasya jagato hitaḥ | tasmānme yādavaśreṣṭha prasādaṃ kartumarhasi
हे कमलनयन! आप ही सम्पूर्ण जगत् के हितकारी हैं; इसलिए हे यादवश्रेष्ठ, मुझ पर कृपा कीजिए।
श्लोक 27 (5.131.27)
भगवन्मम नेत्राभ्यामन्तर्धानं वृणे पुनः । भवन्तं दृष्टवानस्मि नान्यं द्रष्टुमिहोत्सहे ॥
bhagavanmama netrābhyāmantardhānaṃ vṛṇe punaḥ | bhavantaṃ dṛṣṭavānasmi nānyaṃ draṣṭumihotsahe
भगवन्! मैं फिर से अपने नेत्रों की दृष्टि का लोप माँगता हूँ। आपको देख लेने के बाद अब मैं यहाँ और कुछ देखना नहीं चाहता।
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 28 (5.131.28)
ततोऽब्रवीन्महाबाहुर्धृतराष्ट्रं जनार्दनः । अदृश्यमाने नेत्रे द्वे भवेतां कुरुनन्दन ॥
tato'bravīnmahābāhurdhṛtarāṣṭraṃ janārdanaḥ | adṛśyamāne netre dve bhavetāṃ kurunandana
तब महाबाहु जनार्दन ने धृतराष्ट्र से कहा — "हे कुरुनन्दन, तुम्हारे दोनों नेत्र फिर से दृष्टिहीन हो जाएँ।"
श्लोक 29 (5.131.29)
तत्राद्भुतं महाराज धृतराष्ट्रश्च चक्षुषी । लब्धवान्वासुदेवाच्च विश्वरूपदिदृक्षया ॥
tatrādbhutaṃ mahārāja dhṛtarāṣṭraśca cakṣuṣī | labdhavānvāsudevācca viśvarūpadidṛkṣayā
हे महाराज! यह अद्भुत बात हुई कि विश्वरूप देखने की इच्छा से धृतराष्ट्र ने वासुदेव से नेत्र पाए थे।
श्लोक 30 (5.131.30)
लब्धचक्षुषमासीनं धृतराष्ट्रं नराधिपाः । विस्मिता ऋषिभिः सार्धं तुष्टुवुर्मधुसूदनम् ॥
labdhacakṣuṣamāsīnaṃ dhṛtarāṣṭraṃ narādhipāḥ | vismitā ṛṣibhiḥ sārdhaṃ tuṣṭuvurmadhusūdanam
धृतराष्ट्र को दृष्टि पाकर बैठे देख विस्मित राजाओं ने ऋषियों के साथ मधुसूदन की स्तुति की।
श्लोक 31 (5.131.31)
चचाल च मही कृत्स्ना सागरश्चापि चुक्षुभे । विस्मयं परमं जग्मुः पार्थिवा भरतर्षभ ॥
cacāla ca mahī kṛtsnā sāgaraścāpi cukṣubhe | vismayaṃ paramaṃ jagmuḥ pārthivā bharatarṣabha
सारी पृथ्वी डोल उठी और समुद्र भी क्षुब्ध हो गया; हे भरतश्रेष्ठ, राजा परम विस्मय में पड़ गए।
श्लोक 32 (5.131.32)
ततः स पुरुषव्याघ्रः सञ्जहार वपुः स्वकम् । तां दिव्यामद्भुतां चित्रामृद्धिमत्तामरिन्दमः ॥
tataḥ sa puruṣavyāghraḥ sañjahāra vapuḥ svakam | tāṃ divyāmadbhutāṃ citrāmṛddhimattāmarindamaḥ
तब उस शत्रुदमन पुरुषसिंह ने अपना वह दिव्य, अद्भुत, विचित्र और ऐश्वर्यमय रूप समेट लिया।
श्लोक 33 (5.131.33)
ततः सात्यकिमादाय पाणौ विदुरमेव च । ऋषिभिस्तैरनुज्ञातो निर्ययौ मधुसूदनः ॥
tataḥ sātyakimādāya pāṇau vidurameva ca | ṛṣibhistairanujñāto niryayau madhusūdanaḥ
फिर सात्यकि और विदुर का हाथ पकड़कर, ऋषियों की अनुमति लेकर मधुसूदन बाहर निकल गए।
श्लोक 34 (5.131.34)
ऋषयोऽन्तर्हिता जग्मुस्ततस्ते नारदादयः । तस्मिन्कोलाहले वृत्ते तदद्भुतमिवाभवत् ॥
ṛṣayo'ntarhitā jagmustataste nāradādayaḥ | tasminkolāhale vṛtte tadadbhutamivābhavat
तब नारद आदि ऋषि अन्तर्धान होकर चले गए। उस कोलाहल के बीच वह सब एक अद्भुत-सा दृश्य था।
श्लोक 35 (5.131.35)
तं प्रस्थितमभिप्रेक्ष्य कौरवाः सह राजभिः । अनुजग्मुर्नरव्याघ्रं देवा इव शतक्रतुम् ॥
taṃ prasthitamabhiprekṣya kauravāḥ saha rājabhiḥ | anujagmurnaravyāghraṃ devā iva śatakratum
उन्हें प्रस्थान करते देख कौरव राजाओं के साथ उस पुरुषसिंह के पीछे वैसे ही चले जैसे देवता शतक्रतु इन्द्र के पीछे चलते हैं।
श्लोक 36 (5.131.36)
अचिन्तयन्नमेयात्मा सर्वं तद्राजमण्डलम् । निश्चक्राम ततः शौरिः सधूम इव पावकः ॥
acintayannameyātmā sarvaṃ tadrājamaṇḍalam | niścakrāma tataḥ śauriḥ sadhūma iva pāvakaḥ
अपरिमेय आत्मा वाले शौरि उस समस्त राजमण्डल की परवाह किए बिना धुएँ से घिरी अग्नि की भाँति बाहर निकल गए।
श्लोक 37 (5.131.37)
ततो रथेन शुभ्रेण महता किङ्किणीकिना । हेमजालविचित्रेण लघुना मेघनादिना ॥
tato rathena śubhreṇa mahatā kiṅkiṇīkinā | hemajālavicitreṇa laghunā meghanādinā
तब छोटी-छोटी घंटियों से युक्त, सोने की जाली से सजा, हल्का, मेघ के समान गर्जना करने वाला एक विशाल उज्ज्वल रथ —
श्लोक 38 (5.131.38)
सूपस्करेण शुभ्रेण वैयाघ्रेण वरूथिना । शैब्यसुग्रीवयुक्तेन प्रत्यदृश्यत दारुकः ॥
sūpaskareṇa śubhreṇa vaiyāghreṇa varūthinā | śaibyasugrīvayuktena pratyadṛśyata dārukaḥ
साज-सामान से भरपूर, चमकीला, व्याघ्रचर्म से मढ़ा, रक्षा-आवरण वाला और शैब्य तथा सुग्रीव नामक घोड़ों से जुता — लेकर दारुक उपस्थित हुआ।
श्लोक 39 (5.131.39)
तथैव रथमास्थाय कृतवर्मा महारथः । वृष्णीनां संमतो वीरो हार्दिक्यः समदृश्यत ॥
tathaiva rathamāsthāya kṛtavarmā mahārathaḥ | vṛṣṇīnāṃ saṃmato vīro hārdikyaḥ samadṛśyata
इसी प्रकार वृष्णियों में सम्मानित वीर महारथी हार्दिक्य कृतवर्मा भी रथ पर बैठे दिखाई दिए।
श्लोक 40 (5.131.40)
उपस्थितरथं शौरिं प्रयास्यन्तमरिन्दमम् । धृतराष्ट्रो महाराजः पुनरेवाभ्यभाषत ॥
upasthitarathaṃ śauriṃ prayāsyantamarindamam | dhṛtarāṣṭro mahārājaḥ punarevābhyabhāṣata
रथ के उपस्थित होने पर जब शत्रुदमन शौरि प्रस्थान करने ही वाले थे, तब महाराज धृतराष्ट्र ने उनसे फिर कहा —
धृतराष्ट्र उवाच
श्लोक 41 (5.131.41)
यावद्बलं मे पुत्रेषु पश्यतस्ते जनार्दन । प्रत्यक्षं ते न ते किंचित्परोक्षं शत्रुकर्शन ॥
yāvadbalaṃ me putreṣu paśyataste janārdana | pratyakṣaṃ te na te kiṃcitparokṣaṃ śatrukarśana
हे जनार्दन! मेरे पुत्रों पर मेरा कितना वश चलता है, यह आपने स्वयं देख लिया। हे शत्रुसंहारक, आपसे कुछ भी छिपा नहीं, सब आपके सामने प्रत्यक्ष है।
श्लोक 42 (5.131.42)
कुरूणां शममिच्छन्तं यतमानं च केशव । विदित्वैतामवस्थां मे नातिशङ्कितुमर्हसि ॥
kurūṇāṃ śamamicchantaṃ yatamānaṃ ca keśava | viditvaitāmavasthāṃ me nātiśaṅkitumarhasi
हे केशव! मैं कुरुओं में शान्ति चाहता हूँ और उसके लिए प्रयत्न कर रहा हूँ — मेरी यह स्थिति जानकर आपको मुझ पर अधिक संदेह नहीं करना चाहिए।
श्लोक 43 (5.131.43)
न मे पापोऽस्त्यभिप्रायः पाण्डवान्प्रति केशव । ज्ञातमेव हितं वाक्यं यन्मयोक्तः सुयोधनः ॥
na me pāpo'styabhiprāyaḥ pāṇḍavānprati keśava | jñātameva hitaṃ vākyaṃ yanmayoktaḥ suyodhanaḥ
हे केशव! पाण्डवों के प्रति मेरे मन में कोई पाप-भाव नहीं है। मैंने सुयोधन से जो हितकर बात कही, वह आपको विदित ही है।
श्लोक 44 (5.131.44)
जानन्ति कुरवः सर्वे राजानश्चैव पार्थिवाः । शमे प्रयतमानं मां सर्वयत्नेन माधव ॥
jānanti kuravaḥ sarve rājānaścaiva pārthivāḥ | śame prayatamānaṃ māṃ sarvayatnena mādhava
हे माधव! सब कुरु और पृथ्वी के सब राजा जानते हैं कि मैं पूरे प्रयत्न से शान्ति के लिए यत्न कर रहा हूँ।
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 45 (5.131.45)
ततोऽब्रवीन्महाबाहुर्धृतराष्ट्रं जनार्दनः । द्रोणं पितामहं भीष्मं क्षत्तारं बाह्लिकं कृपम् ॥
tato'bravīnmahābāhurdhṛtarāṣṭraṃ janārdanaḥ | droṇaṃ pitāmahaṃ bhīṣmaṃ kṣattāraṃ bāhlikaṃ kṛpam
तब महाबाहु जनार्दन ने धृतराष्ट्र से तथा द्रोण, पितामह भीष्म, क्षत्ता विदुर, बाह्लीक और कृप से कहा —
वासुदेव उवाच
श्लोक 46 (5.131.46)
प्रत्यक्षमेतद्भवतां यद्वृत्तं कुरुसंसदि । यथा चाशिष्टवन्मन्दो रोषादद्य समुत्थितः ॥
pratyakṣametadbhavatāṃ yadvṛttaṃ kurusaṃsadi | yathā cāśiṣṭavanmando roṣādadya samutthitaḥ
कुरुसभा में जो हुआ वह आप सबने स्वयं देखा है — कैसे वह मूर्ख आज अशिष्ट की तरह क्रोध में उठ खड़ा हुआ,
श्लोक 47 (5.131.47)
वदत्यनीशमात्मानं धृतराष्ट्रो महीपतिः । आपृच्छे भवतः सर्वान्गमिष्यामि युधिष्ठिरम् ॥
vadatyanīśamātmānaṃ dhṛtarāṣṭro mahīpatiḥ | āpṛcche bhavataḥ sarvāngamiṣyāmi yudhiṣṭhiram
और पृथ्वीपति राजा धृतराष्ट्र अपने को असमर्थ बताते हैं। मैं आप सबसे विदा लेता हूँ; अब युधिष्ठिर के पास जाऊँगा।
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 48 (5.131.48)
आमन्त्र्य प्रस्थितं शौरिं रथस्थं पुरुषर्षभ । अनुजग्मुर्महेष्वासाः प्रवीरा भरतर्षभाः ॥
āmantrya prasthitaṃ śauriṃ rathasthaṃ puruṣarṣabha | anujagmurmaheṣvāsāḥ pravīrā bharatarṣabhāḥ
विदा लेकर रथ पर सवार हो प्रस्थान करते पुरुषश्रेष्ठ शौरि के पीछे भरतवंश के श्रेष्ठ महाधनुर्धर वीर चले —
श्लोक 49 (5.131.49)
भीष्मो द्रोणः कृपः क्षत्ता धृतराष्ट्रोऽथ बाह्लिकः । अश्वत्थामा विकर्णश्च युयुत्सुश्च महारथः ॥
bhīṣmo droṇaḥ kṛpaḥ kṣattā dhṛtarāṣṭro'tha bāhlikaḥ | aśvatthāmā vikarṇaśca yuyutsuśca mahārathaḥ
भीष्म, द्रोण, कृप, क्षत्ता विदुर, धृतराष्ट्र और बाह्लीक, अश्वत्थामा, विकर्ण तथा महारथी युयुत्सु।
श्लोक 50 (5.131.50)
ततो रथेन शुभ्रेण महता किङ्किणीकिना । कुरूणां पश्यतां द्रष्टुं स्वसारं स पितुर्ययौ ॥
tato rathena śubhreṇa mahatā kiṅkiṇīkinā | kurūṇāṃ paśyatāṃ draṣṭuṃ svasāraṃ sa pituryayau
फिर छोटी-छोटी घंटियों वाले उस विशाल उज्ज्वल रथ पर बैठकर, कुरुओं के देखते-देखते, वे अपनी बुआ से मिलने चल पड़े।