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उद्योग पर्व · अध्याय 132

युधिष्ठिर के लिए कुन्ती का सन्देश

श्रीकृष्ण कुन्ती के घर जाकर उन्हें प्रणाम करते हैं, कुरुसभा में जो हुआ उसे संक्षेप में सुनाते हैं और पूछते हैं कि वे अपने पुत्रों के लिए क्या सन्देश देना चाहती हैं। कुन्ती युधिष्ठिर से कहलवाती हैं कि वे केवल पाठ रटने वाले की संकीर्ण, निष्क्रिय धर्म-दृष्टि छोड़कर क्षत्रिय का कर्तव्य अपनाएँ। वे बताती हैं कि मुचुकुन्द ने कुबेर द्वारा दी जा रही पृथ्वी अस्वीकार कर दी और केवल अपने बाहुबल से जीता राज्य भोगा; वे सिखाती हैं कि युग का निर्माता राजा ही है, और पुत्र से हर उपाय द्वारा पैतृक भाग वापस लेने तथा युद्ध करने का आग्रह करती हैं।

अध्याय 131अध्याय-सूचीअध्याय 133

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 1 (5.132.1)

प्रविश्याथ गृहं तस्याश्चरणावभिवाद्य च । आचख्यौ तत्समासेन यद्वृत्तं कुरुसंसदि ॥

praviśyātha gṛhaṃ tasyāścaraṇāvabhivādya ca | ācakhyau tatsamāsena yadvṛttaṃ kurusaṃsadi

उनके घर में प्रवेश करके और उनके चरणों में प्रणाम करके श्रीकृष्ण ने कुरुसभा में जो कुछ हुआ था, वह संक्षेप में कह सुनाया।

वासुदेव उवाच

श्लोक 2 (5.132.2)

उक्तं बहुविधं वाक्यं ग्रहणीयं सहेतुकम् । ऋषिभिश्चैव च मया न चासौ तद्गृहीतवान् ॥

uktaṃ bahuvidhaṃ vākyaṃ grahaṇīyaṃ sahetukam | ṛṣibhiścaiva ca mayā na cāsau tadgṛhītavān

"ऋषियों ने और मैंने भी अनेक प्रकार के युक्तियुक्त और ग्रहण करने योग्य वचन कहे, परंतु उसने उन्हें स्वीकार नहीं किया।

श्लोक 3 (5.132.3)

कालपक्वमिदं सर्वं सुयोधनवशानुगम् । सर्वक्षत्रं क्षणेनैव दह्यते पार्थवह्निना । आपृच्छे भवतीं शीघ्रं प्रयास्ये पाण्डवान्प्रति ॥

kālapakvamidaṃ sarvaṃ suyodhanavaśānugam | sarvakṣatraṃ kṣaṇenaiva dahyate pārthavahninā | āpṛcche bhavatīṃ śīghraṃ prayāsye pāṇḍavānprati

सुयोधन के वश में चलने वाला यह सारा समूह काल के द्वारा पक चुका है। पार्थ-रूपी अग्नि से सारा क्षत्रिय-समाज क्षण भर में भस्म हो जाएगा। मैं आपसे विदा लेता हूँ; शीघ्र ही पाण्डवों के पास जाऊँगा।

श्लोक 4 (5.132.4)

किं वाच्याः पाण्डवेयास्ते भवत्या वचनान्मया । तद्ब्रूहि त्वं महाप्रज्ञे शुश्रूषे वचनं तव ॥

kiṃ vācyāḥ pāṇḍaveyāste bhavatyā vacanānmayā | tadbrūhi tvaṃ mahāprajñe śuśrūṣe vacanaṃ tava

हे महाबुद्धिमती, आपकी ओर से मैं पाण्डवों से क्या कहूँ? वह बताइए; मैं आपके वचन सुनना चाहता हूँ।"

कुन्त्युवाच

श्लोक 5 (5.132.5)

ब्रूयाः केशव राजानं धर्मात्मानं युधिष्ठिरम् । भूयांस्ते हीयते धर्मो मा पुत्रक वृथा कृथाः ॥

brūyāḥ keśava rājānaṃ dharmātmānaṃ yudhiṣṭhiram | bhūyāṃste hīyate dharmo mā putraka vṛthā kṛthāḥ

केशव, धर्मात्मा राजा युधिष्ठिर से कहना — "बेटा, तुम्हारा धर्म बहुत क्षीण हो रहा है; व्यर्थ आचरण मत करो।

श्लोक 6 (5.132.6)

श्रोत्रियस्येव ते राजन्मन्दकस्याविपश्चितः । अनुवाकहता बुद्धिर्धर्ममेवैकमीक्षते ॥

śrotriyasyeva te rājanmandakasyāvipaścitaḥ | anuvākahatā buddhirdharmamevaikamīkṣate

हे राजन्, अर्थ न समझने वाले मन्दबुद्धि वेदपाठी की भाँति तुम्हारी बुद्धि भी केवल पाठ दोहराते-दोहराते कुण्ठित होकर एक ही प्रकार के धर्म को देखती है।

श्लोक 7 (5.132.7)

अङ्गावेक्षस्व धर्मं त्वं यथा सृष्टः स्वयंभुवा । बाहुभ्यां क्षत्रियाः सृष्टा बाहुवीर्योपजीविनः ॥

aṅgāvekṣasva dharmaṃ tvaṃ yathā sṛṣṭaḥ svayaṃbhuvā | bāhubhyāṃ kṣatriyāḥ sṛṣṭā bāhuvīryopajīvinaḥ

वत्स, स्वयम्भू ने धर्म को जैसा रचा है, उसी दृष्टि से उसे देखो। क्षत्रिय उनकी भुजाओं से उत्पन्न किए गए हैं, जो अपने बाहुबल से जीते हैं,

श्लोक 8 (5.132.8)

क्रूराय कर्मणे नित्यं प्रजानां परिपालने । श्रृणु चात्रोपमामेकां या वृद्धेभ्यः श्रुता मया ॥

krūrāya karmaṇe nityaṃ prajānāṃ paripālane | śrṛṇu cātropamāmekāṃ yā vṛddhebhyaḥ śrutā mayā

सदा कठोर कर्म करने और प्रजा की रक्षा करने के लिए। इस विषय में एक दृष्टान्त सुनो, जो मैंने बड़े-बूढ़ों से सुना है।

श्लोक 9 (5.132.9)

मुचुकुन्दस्य राजर्षेरददत्पृथिवीमिमाम् । पुरा वैश्रवणः प्रीतो न चासौ तद्गृहीतवान् ॥

mucukundasya rājarṣeradadatpṛthivīmimām | purā vaiśravaṇaḥ prīto na cāsau tadgṛhītavān

प्राचीन काल में वैश्रवण (कुबेर) ने प्रसन्न होकर राजर्षि मुचुकुन्द को यह पृथ्वी देनी चाही, परंतु उन्होंने उसे स्वीकार नहीं किया।

श्लोक 10 (5.132.10)

बाहुवीर्यार्जितं राज्यमश्नीयामिति कामये । ततो वैश्रवणः प्रीतो विस्मितः समपद्यत ॥

bāhuvīryārjitaṃ rājyamaśnīyāmiti kāmaye | tato vaiśravaṇaḥ prīto vismitaḥ samapadyata

(उन्होंने कहा —) "मैं अपने बाहुबल से अर्जित राज्य का ही उपभोग करना चाहता हूँ।" तब वैश्रवण प्रसन्न और विस्मित हो गए।

श्लोक 11 (5.132.11)

मुचुकुन्दस्ततो राजा सोऽन्वशासद्वसुन्धराम् । बाहुवीर्यार्जितां सम्यक् क्षत्रधर्ममनुव्रतः ॥

mucukundastato rājā so'nvaśāsadvasundharām | bāhuvīryārjitāṃ samyak kṣatradharmamanuvrataḥ

तत्पश्चात् क्षत्रिय-धर्म का पालन करने वाले राजा मुचुकुन्द ने अपने बाहुबल से अर्जित पृथ्वी पर भलीभाँति शासन किया।

श्लोक 12 (5.132.12)

यं हि धर्मं चरन्तीह प्रजा राज्ञा सुरक्षिताः । चतुर्थं तस्य धर्मस्य राजा विन्दति भारत ॥

yaṃ hi dharmaṃ carantīha prajā rājñā surakṣitāḥ | caturthaṃ tasya dharmasya rājā vindati bhārata

हे भारत, राजा द्वारा भलीभाँति सुरक्षित प्रजा यहाँ जो धर्म करती है, उस धर्म का चौथा भाग राजा को प्राप्त होता है।

श्लोक 13 (5.132.13)

राजा चरति चेद्धर्मं देवत्वायैव कल्पते । स चेदधर्मं चरति नरकायैव गच्छति ॥

rājā carati ceddharmaṃ devatvāyaiva kalpate | sa cedadharmaṃ carati narakāyaiva gacchati

यदि राजा धर्म का आचरण करता है तो वह देवत्व का अधिकारी होता है; और यदि अधर्म करता है तो नरक में जाता है।

श्लोक 14 (5.132.14)

दण्डनीतिः स्वधर्मेण चातुर्वर्ण्यं नियच्छति । प्रयुक्तास्वामिना सम्यगधर्मेभ्यो नियच्छति ॥

daṇḍanītiḥ svadharmeṇa cāturvarṇyaṃ niyacchati | prayuktāsvāminā samyagadharmebhyo niyacchati

दण्डनीति अपने स्वधर्म द्वारा चारों वर्णों को नियम में रखती है; स्वामी द्वारा भलीभाँति प्रयुक्त होने पर वह उन्हें अधर्म से रोकती है।

श्लोक 15 (5.132.15)

दण्डनीत्यां यदा राजा सम्यक्कार्त्स्न्येन वर्तते । तदा कृतयुगं नाम कालः श्रेष्ठः प्रवर्तते ॥

daṇḍanītyāṃ yadā rājā samyakkārtsnyena vartate | tadā kṛtayugaṃ nāma kālaḥ śreṣṭhaḥ pravartate

जब राजा पूर्ण रूप से और भलीभाँति दण्डनीति के अनुसार चलता है, तब कृतयुग नामक श्रेष्ठ काल प्रवृत्त होता है।

श्लोक 16 (5.132.16)

कालो वा कारणं राज्ञो राजा वा कालकारणम् । इति ते संशयो मा भूद्राजा कालस्य कारणम् ॥

kālo vā kāraṇaṃ rājño rājā vā kālakāraṇam | iti te saṃśayo mā bhūdrājā kālasya kāraṇam

काल राजा का कारण है या राजा काल का? इस विषय में तुम्हें संशय न हो — राजा ही काल का कारण है।

श्लोक 17 (5.132.17)

राजा कृतयुगस्रष्टा त्रेताया द्वापरस्य च । युगस्य च चतुर्थस्य राजा भवति कारणम् ॥

rājā kṛtayugasraṣṭā tretāyā dvāparasya ca | yugasya ca caturthasya rājā bhavati kāraṇam

राजा ही कृतयुग, त्रेता और द्वापर का स्रष्टा है; चौथे युग का कारण भी राजा ही होता है।

श्लोक 18 (5.132.18)

कृतस्य करणाद्राजा स्वर्गमत्यन्तमश्नुते । त्रेतायाः करणाद्राजा स्वर्गं नात्यन्तमश्नुते ॥

kṛtasya karaṇādrājā svargamatyantamaśnute | tretāyāḥ karaṇādrājā svargaṃ nātyantamaśnute

कृतयुग को लाने से राजा अनन्त काल तक स्वर्ग भोगता है; त्रेता को लाने से राजा स्वर्ग तो भोगता है, पर अनन्त काल तक नहीं।

श्लोक 19 (5.132.19)

प्रवर्तनाद्द्वापरस्य यथाभागमुपाश्नुते । कलेः प्रवर्तनाद्राजा पापमत्यन्तमश्नुते ॥

pravartanāddvāparasya yathābhāgamupāśnute | kaleḥ pravartanādrājā pāpamatyantamaśnute

द्वापर को प्रवृत्त करने से वह अपने भाग के अनुसार (स्वर्ग) भोगता है; और कलियुग को प्रवृत्त करने से राजा अनन्त पाप भोगता है।

श्लोक 20 (5.132.20)

ततो वसति दुष्कर्मा नरके शाश्वतीः समाः । राजदोषेण हि जगत्स्पृश्यते जगतः स च ॥

tato vasati duṣkarmā narake śāśvatīḥ samāḥ | rājadoṣeṇa hi jagatspṛśyate jagataḥ sa ca

तब वह दुष्कर्मी अनन्त वर्षों तक नरक में वास करता है। क्योंकि राजा के दोष से जगत् दूषित होता है, और जगत् के दोष से वह राजा।

श्लोक 21 (5.132.21)

राजधर्मानवेक्षस्व पितृपैतामहोचितान् । नैतद्राजर्षिवृत्तं हि यत्र त्वं स्थातुमिच्छसि ॥

rājadharmānavekṣasva pitṛpaitāmahocitān | naitadrājarṣivṛttaṃ hi yatra tvaṃ sthātumicchasi

अपने पिता-पितामहों के योग्य राजधर्म पर दृष्टि डालो। तुम जिस मार्ग पर टिके रहना चाहते हो, वह राजर्षियों का आचरण नहीं है।

श्लोक 22 (5.132.22)

न हि वैक्लव्यसंसृष्ट आनृशंस्ये व्यवस्थितः । प्रजापालनसंभूतं फलं किंचन लब्धवान् ॥

na hi vaiklavyasaṃsṛṣṭa ānṛśaṃsye vyavasthitaḥ | prajāpālanasaṃbhūtaṃ phalaṃ kiṃcana labdhavān

जो कायरता से युक्त होकर केवल कोमलता में स्थित रहता है, उसने प्रजापालन से उत्पन्न होने वाला कोई भी फल कभी नहीं पाया।

श्लोक 23 (5.132.23)

न ह्येतामाशिषं पाण्डुर्न चाहं न पितामहः । प्रयुक्तवन्तः पूर्वं ते यया चरसि मेधया ॥

na hyetāmāśiṣaṃ pāṇḍurna cāhaṃ na pitāmahaḥ | prayuktavantaḥ pūrvaṃ te yayā carasi medhayā

पाण्डु ने, मैंने या तुम्हारे पितामह ने पहले कभी तुम्हारे लिए उस बुद्धि का आशीर्वाद नहीं माँगा था, जिससे तुम आज आचरण कर रहे हो।

श्लोक 24 (5.132.24)

यज्ञो दानं तपः शौर्यं प्रज्ञा सन्तानमेव च । माहात्म्यं बलमोजश्च नित्यमाशंसितं मया ॥

yajño dānaṃ tapaḥ śauryaṃ prajñā santānameva ca | māhātmyaṃ balamojaśca nityamāśaṃsitaṃ mayā

यज्ञ, दान, तप, शौर्य, बुद्धि और सन्तान, महत्ता, बल और ओज — इन्हीं की मैंने तुम्हारे लिए सदा कामना की।

श्लोक 25 (5.132.25)

नित्यं स्वाहा स्वधा नित्यं दद्युर्मानुषदेवताः । दीर्घमायुर्धनं पुत्रान्सम्यगाराधिताः शुभाः ॥

nityaṃ svāhā svadhā nityaṃ dadyurmānuṣadevatāḥ | dīrghamāyurdhanaṃ putrānsamyagārādhitāḥ śubhāḥ

भलीभाँति आराधित और प्रसन्न मनुष्य तथा देवता तुम्हें सदा स्वाहा और स्वधा (के कर्म), दीर्घ आयु, धन और पुत्र प्रदान करें।

श्लोक 26 (5.132.26)

पुत्रेष्वाशासते नित्यं पितरो दैवतानि च । दानमध्ययनं यज्ञः प्रजानां परिपालनम् ॥

putreṣvāśāsate nityaṃ pitaro daivatāni ca | dānamadhyayanaṃ yajñaḥ prajānāṃ paripālanam

पितर और देवता पुत्रों से सदा दान, अध्ययन, यज्ञ और प्रजापालन की ही आशा रखते हैं।

श्लोक 27 (5.132.27)

एतद्धर्ममधर्मं वा जन्मनैवाभ्यजायथाः । ते तु वैद्याः कुले जाता अवृत्त्या तात पीडिताः ॥

etaddharmamadharmaṃ vā janmanaivābhyajāyathāḥ | te tu vaidyāḥ kule jātā avṛttyā tāta pīḍitāḥ

यह धर्म है या अधर्म, यह तुम जन्म से ही जानते हो। फिर भी, हे तात, वे (तुम सब भाई) विद्वान् और उत्तम कुल में जन्मे होकर भी जीविका के अभाव में पीड़ित हैं।

श्लोक 28 (5.132.28)

यत्र दानपतिं शूरं क्षुधिताः पृथिवीचराः । प्राप्य तुष्टाः प्रतिष्ठन्ते धर्मः कोऽभ्यधिकस्ततः ॥

yatra dānapatiṃ śūraṃ kṣudhitāḥ pṛthivīcarāḥ | prāpya tuṣṭāḥ pratiṣṭhante dharmaḥ ko'bhyadhikastataḥ

जहाँ पृथ्वी पर विचरने वाले भूखे लोग किसी दानी और शूरवीर स्वामी को पाकर संतुष्ट होकर बस जाते हैं, उससे बढ़कर कौन-सा धर्म है?

श्लोक 29 (5.132.29)

दानेनान्यं बलेनान्यं तथा सूनृतयाऽपरम् । सर्वतः प्रतिगृह्णीयाद्राज्यं प्राप्येह धार्मिकः ॥

dānenānyaṃ balenānyaṃ tathā sūnṛtayā'param | sarvataḥ pratigṛhṇīyādrājyaṃ prāpyeha dhārmikaḥ

किसी को दान से, किसी को बल से और किसी को मधुर वचन से — इस प्रकार राज्य पाकर धर्मात्मा राजा को सब ओर से लोगों को अपना बना लेना चाहिए।

श्लोक 30 (5.132.30)

ब्राह्मणः प्रचरेद्भैक्षं क्षत्रियः परिपालयेत् । वैश्यो धनार्जनं कुर्याच्छूद्रः परिचरेच्च तान् ॥

brāhmaṇaḥ pracaredbhaikṣaṃ kṣatriyaḥ paripālayet | vaiśyo dhanārjanaṃ kuryācchūdraḥ paricarecca tān

ब्राह्मण भिक्षा से जीवन चलाए, क्षत्रिय रक्षा करे, वैश्य धन कमाए और शूद्र उन सबकी सेवा करे।

श्लोक 31 (5.132.31)

भैक्षं विप्रतिषिद्धं ते कृषिर्नैवोपपद्यते । क्षत्रियोऽसि क्षतात्त्राता बाहुवीर्योपजीविता ॥

bhaikṣaṃ vipratiṣiddhaṃ te kṛṣirnaivopapadyate | kṣatriyo'si kṣatāttrātā bāhuvīryopajīvitā

तुम्हारे लिए भिक्षा वर्जित है और खेती भी उचित नहीं। तुम क्षत्रिय हो — संकट से रक्षा करने वाले और अपने बाहुबल से जीने वाले।

श्लोक 32 (5.132.32)

पित्र्यमंशं महाबाहो निमग्नं पुनरुद्धर । साम्ना भेदेन दानेन दण्डेनाथ नयेन वा ॥

pitryamaṃśaṃ mahābāho nimagnaṃ punaruddhara | sāmnā bhedena dānena daṇḍenātha nayena vā

हे महाबाहु, डूबे हुए अपने पैतृक भाग का फिर से उद्धार करो — साम, भेद, दान, दण्ड अथवा नीति से।

श्लोक 33 (5.132.33)

इतो दुःखतरं किं नु यदहं दीनबान्धवा । परपिण्डमुदीक्षे वै त्वां सूत्वा मित्रनन्दन ॥

ito duḥkhataraṃ kiṃ nu yadahaṃ dīnabāndhavā | parapiṇḍamudīkṣe vai tvāṃ sūtvā mitranandana

इससे बढ़कर दुःख क्या होगा कि मैं, जिसके बन्धु-बान्धव दीन हो गए हैं, हे मित्रों को आनन्द देने वाले, तुम्हें जन्म देकर भी दूसरों के अन्न की ओर ताकती हूँ?

श्लोक 34 (5.132.34)

युध्यस्व राजधर्मेण मा निमज्जीः पितामहान् । मा गमः क्षीणपुण्यस्त्वं सानुजः पापिकां गतिम् ॥

yudhyasva rājadharmeṇa mā nimajjīḥ pitāmahān | mā gamaḥ kṣīṇapuṇyastvaṃ sānujaḥ pāpikāṃ gatim

राजधर्म के अनुसार युद्ध करो; अपने पितामहों को (अपकीर्ति में) मत डुबाओ। अपना पुण्य क्षीण करके भाइयों सहित पापमयी गति को प्राप्त मत होओ।"

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