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उद्योग पर्व · अध्याय 133

विदुला की अपने पुत्र को फटकार

युधिष्ठिर को जगाने के लिए कुन्ती श्रीकृष्ण को विदुला और उसके पुत्र का प्राचीन संवाद सुनाती हैं। स्वाभिमानी और दूरदर्शी क्षत्राणी विदुला अपने पुत्र संजय को सिन्धुराज से हारकर निराश पड़ा देखती है और उसे कठोर शब्दों में फटकारती है — देर तक धुआँ देने से क्षण भर प्रज्वलित होना श्रेष्ठ है, और जो अपने कर्मों से यश नहीं पाता वह पुरुष ही नहीं। जब पुत्र पूछता है कि उसके बिना माता के लिए संसार किस काम का, तो वह उत्तर देती है कि शत्रुओं से पीड़ित होकर जीने का कोई मूल्य नहीं, और सार्थक जीवन उसी का है जिसके सहारे दूसरे जीते हैं।

अध्याय 132अध्याय-सूचीअध्याय 134

कुन्त्युवाच

श्लोक 1 (5.133.1)

अत्राप्युदाहरन्तीममितिहासं पुरातनम् । विदुलायाश्च संवादं पुत्रस्य च परन्तप ॥

atrāpyudāharantīmamitihāsaṃ purātanam | vidulāyāśca saṃvādaṃ putrasya ca parantapa

हे परन्तप, इस विषय में विदुला और उसके पुत्र के संवाद रूपी इस प्राचीन इतिहास का भी उदाहरण दिया जाता है।

श्लोक 2 (5.133.2)

ततः श्रेयश्च भूयश्च यथावद्वक्तुमर्हसि । यशस्विनी मन्युमती कुले जाता विभावरी ॥

tataḥ śreyaśca bhūyaśca yathāvadvaktumarhasi | yaśasvinī manyumatī kule jātā vibhāvarī

उसमें से जो श्रेयस्कर और उससे भी बढ़कर है, वह तुम उसे यथावत् कहना। यशस्विनी, तेजस्विनी, उत्तम कुल में जन्मी, क्रोधशीला,

श्लोक 3 (5.133.3)

क्षत्रधर्मरता दान्ता विदुला दीर्घदर्शिनी । विश्रुता राजसंसत्सु श्रुतवाक्या बहुश्रुता ॥

kṣatradharmaratā dāntā vidulā dīrghadarśinī | viśrutā rājasaṃsatsu śrutavākyā bahuśrutā

क्षत्रिय-धर्म में रत, संयमी और दूरदर्शिनी थी विदुला; वह राजसभाओं में विख्यात, उपदेशों को सुनी हुई और बहुश्रुत थी।

श्लोक 4 (5.133.4)

विदुला नाम राजन्या जगर्हे पुत्रमौरसम् । निर्जितं सिन्धुराजेन शयानं दीनचेतसम् ॥

vidulā nāma rājanyā jagarhe putramaurasam | nirjitaṃ sindhurājena śayānaṃ dīnacetasam

विदुला नाम की उस क्षत्राणी ने अपने औरस पुत्र की निन्दा की, जो सिन्धुराज से पराजित होकर दीन मन से पड़ा हुआ था।

विदुलोवाच

श्लोक 5 (5.133.5)

अनन्दन मया जात द्विषतां हर्षवर्धन । न मया त्वं न पित्रा च जातः क्वाभ्यागतोह्यसि ॥

anandana mayā jāta dviṣatāṃ harṣavardhana | na mayā tvaṃ na pitrā ca jātaḥ kvābhyāgatohyasi

तू मुझसे जन्म लेकर भी मुझे आनन्द नहीं देता, शत्रुओं का ही हर्ष बढ़ाता है! न तुझे मैंने जन्म दिया, न तेरे पिता ने; तू कहाँ से आ गया?

श्लोक 6 (5.133.6)

निर्मन्युश्चाप्यसङ्ख्येयः पुरुषः क्लीबसाधनः । यावज्जीवं निराशोऽसि कल्याणाय धुरं वह ॥

nirmanyuścāpyasaṅkhyeyaḥ puruṣaḥ klībasādhanaḥ | yāvajjīvaṃ nirāśo'si kalyāṇāya dhuraṃ vaha

तू तेजहीन है, गिनती के योग्य नहीं, नपुंसक के-से साधनों वाला पुरुष है; जीवन भर तू आशाहीन रहेगा। अपने कल्याण के लिए धुरा उठा।

श्लोक 7 (5.133.7)

माऽऽत्मानमवमन्यस्व मैनमल्पेन बीभरः । मनः कृत्वा सुकल्याणं मा भैस्त्वं प्रतिसंहर ॥

mā''tmānamavamanyasva mainamalpena bībharaḥ | manaḥ kṛtvā sukalyāṇaṃ mā bhaistvaṃ pratisaṃhara

अपना अपमान मत कर; थोड़े-से में अपना पालन मत कर। मन को कल्याण के लिए दृढ़ बना; डर मत, भय को दूर कर।

श्लोक 8 (5.133.8)

उत्तिष्ठ हे कापुरुष मा शेष्वैवं पराजितः । अमित्रान्नन्दयन्सर्वान्निर्मानो बन्धुशोकदः ॥

uttiṣṭha he kāpuruṣa mā śeṣvaivaṃ parājitaḥ | amitrānnandayansarvānnirmāno bandhuśokadaḥ

उठ, हे कायर! इस तरह पराजित होकर मत पड़ा रह। तू सब शत्रुओं को प्रसन्न कर रहा है, मानहीन है और बन्धुओं को शोक दे रहा है।

श्लोक 9 (5.133.9)

सुपूरा वै कुनदिका सुपूरो मूषिकाञ्जलिः । सुसंतोषः कापुरुषः स्वल्पकेनैव तुष्यति ॥

supūrā vai kunadikā supūro mūṣikāñjaliḥ | susaṃtoṣaḥ kāpuruṣaḥ svalpakenaiva tuṣyati

छोटी नदी सहज ही भर जाती है, चूहे की अंजलि सहज ही भर जाती है; कायर भी सहज ही संतुष्ट हो जाता है और थोड़े-से में ही प्रसन्न रहता है।

श्लोक 10 (5.133.10)

अप्यहेरारुजन्दंष्ट्रामाश्वेव निधनं व्रज । अपि वा संशयं प्राप्य जीवितेऽपि पराक्रमेः ॥

apyaherārujandaṃṣṭrāmāśveva nidhanaṃ vraja | api vā saṃśayaṃ prāpya jīvite'pi parākrameḥ

चाहे साँप के दाँत तोड़ते हुए शीघ्र ही मृत्यु को प्राप्त हो जा; अथवा प्राणों के संकट में पड़कर भी पराक्रम कर।

श्लोक 11 (5.133.11)

अप्यरेः श्येनवच्छिद्रं पश्येस्त्वं विपरिक्रमन् । विवदन्वाऽथवा तूष्णीं व्योम्नीवापरिशङ्कितः ॥

apyareḥ śyenavacchidraṃ paśyestvaṃ viparikraman | vivadanvā'thavā tūṣṇīṃ vyomnīvāpariśaṅkitaḥ

आकाश में निर्भय होकर मँडराते बाज़ की तरह, चाहे अपने उपाय प्रकट करते हुए या चुप रहकर, तू शत्रु की दुर्बलता पर दृष्टि रख।

श्लोक 12 (5.133.12)

त्वमेवं प्रेतवच्छेषे कस्माद्वज्रहतो यथा । उत्तिष्ठ हे कापुरुष मा स्वाप्सीः शत्रुनिर्जितः ॥

tvamevaṃ pretavaccheṣe kasmādvajrahato yathā | uttiṣṭha he kāpuruṣa mā svāpsīḥ śatrunirjitaḥ

तू इस तरह मुर्दे की भाँति, वज्र से मारे हुए की तरह क्यों पड़ा है? उठ, हे कायर! शत्रु से पराजित होकर मत सो।

श्लोक 13 (5.133.13)

माऽस्तं गमस्त्वं कृपणो विश्रूयस्व स्वकर्मणा । मा मध्ये मा जघन्ये त्वं माऽधो भूस्तिष्ठ गर्जितः ॥

mā'staṃ gamastvaṃ kṛpaṇo viśrūyasva svakarmaṇā | mā madhye mā jaghanye tvaṃ mā'dho bhūstiṣṭha garjitaḥ

दीन होकर अस्त मत हो; अपने कर्म से विख्यात बन। मध्यम मत रह, अधम मत रह, नीचे मत गिर — गर्जना करता हुआ खड़ा हो।

श्लोक 14 (5.133.14)

अलातं तिन्दुकस्येव मुहूर्तमपि हि ज्वल । मा तुषाग्निरिवानर्चिर्धूमायस्व जिजीविषुः ॥

alātaṃ tindukasyeva muhūrtamapi hi jvala | mā tuṣāgnirivānarcirdhūmāyasva jijīviṣuḥ

तिन्दुक की लकड़ी की मशाल की तरह क्षण भर के लिए ही सही, प्रज्वलित हो; केवल जीने की लालसा में भूसी की लपटहीन आग की तरह धुआँ मत दे।

श्लोक 15 (5.133.15)

मुहूर्तं ज्वलितं श्रेयो न च धूमायितं चिरम् । मा ह स्म कस्यचिद्गेहे जनी राज्ञः खरीमृदुः ॥

muhūrtaṃ jvalitaṃ śreyo na ca dhūmāyitaṃ ciram | mā ha sma kasyacidgehe janī rājñaḥ kharīmṛduḥ

देर तक धुआँ देने से क्षण भर प्रज्वलित होना श्रेष्ठ है। किसी भी राजा के घर में गधी जैसा कोमल (निकम्मा) पुत्र जन्म न ले।

श्लोक 16 (5.133.16)

कृत्वा मानुष्यकं कर्म सृत्वाऽऽजिं यावदुत्तमम् । धर्मस्यानृण्यमाप्नोति न चात्मानं विगर्हते ॥

kṛtvā mānuṣyakaṃ karma sṛtvā''jiṃ yāvaduttamam | dharmasyānṛṇyamāpnoti na cātmānaṃ vigarhate

जो पुरुषोचित कर्म करके युद्ध में अन्त तक आगे बढ़ता है, वह धर्म के ऋण से मुक्त हो जाता है और अपनी निन्दा नहीं करता।

श्लोक 17 (5.133.17)

अलब्ध्वा यदि वा लब्ध्वा नानुशोचति पण्डितः । आनन्तर्यं चारभते न प्राणानां धनायते ॥

alabdhvā yadi vā labdhvā nānuśocati paṇḍitaḥ | ānantaryaṃ cārabhate na prāṇānāṃ dhanāyate

लाभ हो या न हो, बुद्धिमान शोक नहीं करता; वह बिना रुके कर्म करता जाता है और अपने प्राणों का भी लोभ नहीं करता।

श्लोक 18 (5.133.18)

उद्भावयस्व वीर्यं वा तां वा गच्छ ध्रुवां गतिम् । धर्मं पुत्राग्रतः कृत्वा किंनिमित्तं हि जीवसि ॥

udbhāvayasva vīryaṃ vā tāṃ vā gaccha dhruvāṃ gatim | dharmaṃ putrāgrataḥ kṛtvā kiṃnimittaṃ hi jīvasi

या तो अपना पराक्रम प्रकट कर, या उस निश्चित गति (मृत्यु) को प्राप्त हो। बेटा, धर्म को पीछे छोड़कर तू किसलिए जी रहा है?

श्लोक 19 (5.133.19)

इष्टापूर्तं हि ते क्लीब कीर्तिश्च सकला हता । विच्छिन्नं भोगमूलं ते किंनिमित्तं हि जीवसि ॥

iṣṭāpūrtaṃ hi te klība kīrtiśca sakalā hatā | vicchinnaṃ bhogamūlaṃ te kiṃnimittaṃ hi jīvasi

हे नपुंसक, तेरे यज्ञ और पुण्य-कर्म तथा सारी कीर्ति नष्ट हो गई; तेरे भोगों की जड़ कट गई। फिर तू किसलिए जी रहा है?

श्लोक 20 (5.133.20)

शत्रुर्निमज्जता ग्राह्यो जङ्घायां प्रपतिष्यता । विपरिच्छिन्नमूलोऽपि न विषीदेत्कथंचन ॥

śatrurnimajjatā grāhyo jaṅghāyāṃ prapatiṣyatā | viparicchinnamūlo'pi na viṣīdetkathaṃcana

डूबते हुए या गिरते हुए भी मनुष्य को शत्रु की टाँग पकड़ लेनी चाहिए; जड़ से कट जाने पर भी उसे कभी हताश नहीं होना चाहिए।

श्लोक 21 (5.133.21)

उद्यम्य धुरमुत्कर्षेदाजानेयकृतं स्मरन् । कुरु सत्वं च मानं च विद्धि पौरुषमात्मनः ॥

udyamya dhuramutkarṣedājāneyakṛtaṃ smaran | kuru satvaṃ ca mānaṃ ca viddhi pauruṣamātmanaḥ

उत्तम जाति के घोड़ों का आचरण स्मरण करते हुए धुरा उठाकर आगे खींचना चाहिए। साहस और स्वाभिमान धारण कर; अपने पौरुष को पहचान।

श्लोक 22 (5.133.22)

उद्भावय कुलं मग्नं त्वत्कृते स्वयमेव हि । यस्य वृत्तं न जल्पन्ति मानवा महदद्भुतम् ॥

udbhāvaya kulaṃ magnaṃ tvatkṛte svayameva hi | yasya vṛttaṃ na jalpanti mānavā mahadadbhutam

जो कुल तेरे कारण डूब गया है, उसका तू स्वयं ही उद्धार कर। जिसके महान् और अद्भुत आचरण की चर्चा लोग नहीं करते,

श्लोक 23 (5.133.23)

राशिवर्धनमात्रं स नैव स्त्री न पुनः पुमान् । दाने तपसि सत्ये च यस्य नोच्चरितं यशः ॥

rāśivardhanamātraṃ sa naiva strī na punaḥ pumān | dāne tapasi satye ca yasya noccaritaṃ yaśaḥ

वह केवल गिनती बढ़ाने वाला है; न वह स्त्री है, न पुरुष। जिसका यश दान, तप और सत्य के लिए प्रसिद्ध नहीं हुआ,

श्लोक 24 (5.133.24)

विद्यायामर्थलाभे वा मातुरुच्चार एव सः । श्रुतेन तपसा वाऽपि श्रिया वा विक्रमेण वा ॥

vidyāyāmarthalābhe vā māturuccāra eva saḥ | śrutena tapasā vā'pi śriyā vā vikrameṇa vā

न विद्या के लिए, न धन-अर्जन के लिए, वह अपनी माता का मल-मात्र है। किन्तु जो शास्त्रज्ञान, तप, सम्पत्ति अथवा पराक्रम से

श्लोक 25 (5.133.25)

जनान्योऽभिभवत्यन्यान्कर्मणा हि स वै पुमान् । न त्वेव जाल्मीं कापालीं वृत्तिमेषितुमर्हसि ॥

janānyo'bhibhavatyanyānkarmaṇā hi sa vai pumān | na tveva jālmīṃ kāpālīṃ vṛttimeṣitumarhasi

अपने कर्मों द्वारा दूसरे लोगों से आगे बढ़ जाता है, वही सच्चा पुरुष है। तुझे खप्पर लेकर भीख माँगने वाले की नीच वृत्ति नहीं चाहनी चाहिए,

श्लोक 26 (5.133.26)

नृशंस्यामयशस्यां च दुःखां कापुरुषोचिताम् । यमेनमभिनन्देयुरमित्राः पुरुषं कृशम् ॥

nṛśaṃsyāmayaśasyāṃ ca duḥkhāṃ kāpuruṣocitām | yamenamabhinandeyuramitrāḥ puruṣaṃ kṛśam

जो क्रूर, अपयशकारी, दुःखदायी और कायरों के योग्य है। जिस दुर्बल पुरुष का शत्रु भी अभिनन्दन करें,

श्लोक 27 (5.133.27)

लोकस्य समवज्ञातं निहीनासनवाससम् । अहोलाभकरं हीनमल्पजीवनमल्पकम् ॥

lokasya samavajñātaṃ nihīnāsanavāsasam | aholābhakaraṃ hīnamalpajīvanamalpakam

जो संसार में तिरस्कृत हो, जिसके आसन और वस्त्र हीन हों, जो थोड़े-से लाभ पर भी "अहो, क्या लाभ हुआ!" कहे, जो हीन, अल्प-जीविका वाला और तुच्छ हो —

श्लोक 28 (5.133.28)

नेदृशं बन्धुमासाद्य बान्धवः सुखमेधते । अवृत्त्यैव विपत्स्यामो वयं राष्ट्रात्प्रवासिताः ॥

nedṛśaṃ bandhumāsādya bāndhavaḥ sukhamedhate | avṛttyaiva vipatsyāmo vayaṃ rāṣṭrātpravāsitāḥ

ऐसे बन्धु को पाकर कोई भी सम्बन्धी सुखी नहीं होता। राज्य से निकाले गए हम केवल जीविका के अभाव से ही नष्ट हो जाएँगे,

श्लोक 29 (5.133.29)

सर्वकामरसैर्हीनाः स्थानभ्रष्टा अकिंचनाः । अवल्गुकारिणं सत्सु कुलवंशस्य नाशनम् ॥

sarvakāmarasairhīnāḥ sthānabhraṣṭā akiṃcanāḥ | avalgukāriṇaṃ satsu kulavaṃśasya nāśanam

सभी इच्छित भोगों से वंचित, अपने स्थान से च्युत और अकिंचन होकर। सज्जनों के बीच अपमान कराने वाले, कुल और वंश के नाशक,

श्लोक 30 (5.133.30)

कलिं पुत्रप्रवादेन सञ्जय त्वामजीजनम् । निरमर्षं निरुत्साहं निर्वीर्यमरिनन्दनम् ॥

kaliṃ putrapravādena sañjaya tvāmajījanam | niramarṣaṃ nirutsāhaṃ nirvīryamarinandanam

हे संजय, पुत्र के नाम पर मैंने तेरे रूप में साक्षात् कलि को जन्म दिया — जो रोषहीन, उत्साहहीन, पराक्रमहीन और शत्रुओं को आनन्द देने वाला है।

श्लोक 31 (5.133.31)

मा स्म सीमन्तिनी काचिज्जनयेत्पुत्रमीदृशम् । मा धूमाय ज्वलात्यन्तमाक्रम्य जहि शात्रवान् ॥

mā sma sīmantinī kācijjanayetputramīdṛśam | mā dhūmāya jvalātyantamākramya jahi śātravān

कोई भी स्त्री ऐसे पुत्र को जन्म न दे! धुआँ मत दे; पूरी तरह प्रज्वलित हो, आक्रमण करके शत्रुओं को मार।

श्लोक 32 (5.133.32)

ज्वल मूर्धन्यमित्राणां मुहूर्तमपि वा क्षणम् । एतावानेव पुरुषो यदमर्षी यदक्षमी ॥

jvala mūrdhanyamitrāṇāṃ muhūrtamapi vā kṣaṇam | etāvāneva puruṣo yadamarṣī yadakṣamī

शत्रुओं के सिर पर, एक मुहूर्त या एक क्षण के लिए ही सही, प्रज्वलित हो। पुरुष उतना ही पुरुष है जितना वह अन्याय सहन नहीं करता और क्षमा नहीं करता।

श्लोक 33 (5.133.33)

क्षमावान्निरमर्षश्च नैव स्त्री न पुनः पुमान् । संतोषो वै श्रियं हन्ति तथाऽनुक्रोश एव च ॥

kṣamāvānniramarṣaśca naiva strī na punaḥ pumān | saṃtoṣo vai śriyaṃ hanti tathā'nukrośa eva ca

जो क्षमाशील है और जिसमें रोष नहीं, वह न स्त्री है, न पुरुष। संतोष लक्ष्मी का नाश करता है, और दया भी;

श्लोक 34 (5.133.34)

अनुत्थानभये चोभे निरीहो नाश्नुते महत् । एभ्यो निकृतिपापेभ्यः प्रमुञ्चात्मानमात्मना ॥

anutthānabhaye cobhe nirīho nāśnute mahat | ebhyo nikṛtipāpebhyaḥ pramuñcātmānamātmanā

उद्यमहीनता और भय — ये दोनों भी; जो उद्योग नहीं करता, वह कुछ भी महान् नहीं पाता। इन विनाशकारी दोषों से तू स्वयं अपने को मुक्त कर।

श्लोक 35 (5.133.35)

आयसं हृदयं कृत्वा मृगयस्व पुनः स्वकम् । परं विषहते यस्मात्तस्मात्पुरुष उच्यते ॥

āyasaṃ hṛdayaṃ kṛtvā mṛgayasva punaḥ svakam | paraṃ viṣahate yasmāttasmātpuruṣa ucyate

अपने हृदय को लोहे जैसा कठोर बनाकर फिर से अपना (राज्य) खोज। क्योंकि वह शत्रु को परास्त करता है, इसीलिए उसे "पुरुष" कहा जाता है;

श्लोक 36 (5.133.36)

तमाहुर्व्यर्थनामानं स्त्रीवद्य इह जीवति । शूरस्योर्जितसत्वस्य सिंहविक्रान्तचारिणः ॥

tamāhurvyarthanāmānaṃ strīvadya iha jīvati | śūrasyorjitasatvasya siṃhavikrāntacāriṇaḥ

जो यहाँ स्त्री की तरह जीता है, उसे व्यर्थ नाम वाला कहते हैं। जो शूर, प्रबल सामर्थ्य वाला और सिंह की तरह विचरने वाला है,

श्लोक 37 (5.133.37)

दिष्टभावं गतस्यापि विषये मोदते प्रजा । य आत्मनः प्रियसुखे हित्वा मृगयते श्रियम् ॥

diṣṭabhāvaṃ gatasyāpi viṣaye modate prajā | ya ātmanaḥ priyasukhe hitvā mṛgayate śriyam

उसकी मृत्यु हो जाने पर भी उसके राज्य में प्रजा आनन्दित रहती है। जो अपने प्रिय सुखों को त्यागकर लक्ष्मी को खोजता है,

श्लोक 38 (5.133.38)

अमात्यानामथो हर्षमादधात्यचिरेण सः ॥

amātyānāmatho harṣamādadhātyacireṇa saḥ

वह शीघ्र ही अपने मन्त्रियों को हर्षित करता है।

पुत्र उवाच

श्लोक 39 (5.133.39)

किं नु मे मामपश्यन्त्याः पृथिव्या अपि सर्वया । किमाभरणकृत्यं ते किं भोगैर्जीवितेन वा ॥

kiṃ nu me māmapaśyantyāḥ pṛthivyā api sarvayā | kimābharaṇakṛtyaṃ te kiṃ bhogairjīvitena vā

बताओ, यदि तुम मुझे न देख सको, तो सारी पृथ्वी से भी क्या लाभ? तुम्हें आभूषणों से, भोगों से या जीवन से ही क्या प्रयोजन रहेगा?

मातोवाच

श्लोक 40 (5.133.40)

परैर्विहन्यमानस्य जीवितेनापि किं फलम् । निर्मन्युकानां ये लोका द्विषन्तस्तानवाप्नुयुः । ये त्वादृतात्मनां लोकाः सुहृदस्तान्व्रजन्तु नः ॥

parairvihanyamānasya jīvitenāpi kiṃ phalam | nirmanyukānāṃ ye lokā dviṣantastānavāpnuyuḥ | ye tvādṛtātmanāṃ lokāḥ suhṛdastānvrajantu naḥ

शत्रुओं द्वारा कुचले जाते हुए मनुष्य के जीवन से भी क्या लाभ? तेजहीन लोगों को जो लोक मिलते हैं, वे हमारे शत्रुओं को मिलें; और जो लोक आत्मसम्मानी लोगों को मिलते हैं, वे हमारे मित्रों को मिलें।

श्लोक 41 (5.133.41)

भृत्यैर्विहीयमानानां परपिण्डोपजीविनाम् । कृपणानामसत्वानां मा वृत्तिमनुवर्तिथाः ॥

bhṛtyairvihīyamānānāṃ parapiṇḍopajīvinām | kṛpaṇānāmasatvānāṃ mā vṛttimanuvartithāḥ

जो सेवकों द्वारा त्याग दिए गए हैं और दूसरों के अन्न पर जीते हैं, ऐसे दीन और सत्त्वहीन लोगों के आचरण का अनुसरण मत कर।

श्लोक 42 (5.133.42)

अनु त्वां तात जीवन्तु ब्राह्मणाः सुहृदस्तथा । पर्जन्यमिव भूतानि देवा इव शतक्रतुम् ॥

anu tvāṃ tāta jīvantu brāhmaṇāḥ suhṛdastathā | parjanyamiva bhūtāni devā iva śatakratum

बेटा, ब्राह्मण और मित्र तेरे सहारे वैसे ही जीएँ, जैसे प्राणी मेघ के सहारे और देवता शतक्रतु इन्द्र के सहारे जीते हैं।

श्लोक 43 (5.133.43)

यमाजीवन्ति पुरुषं सर्वभूतानि संजय । पक्वं द्रुममिवासाद्य तस्य जीवितमर्थवत् ॥

yamājīvanti puruṣaṃ sarvabhūtāni saṃjaya | pakvaṃ drumamivāsādya tasya jīvitamarthavat

हे संजय, जिस पुरुष के सहारे सब प्राणी वैसे ही जीते हैं, जैसे पके फलों वाले वृक्ष को पाकर, उसी का जीवन सार्थक है।

श्लोक 44 (5.133.44)

यस्य शूरस्य विक्रान्तैरेधन्ते बान्धवाः सुखम् । त्रिदशा इव शक्रस्य साधु तस्येह जीवितम् ॥

yasya śūrasya vikrāntairedhante bāndhavāḥ sukham | tridaśā iva śakrasya sādhu tasyeha jīvitam

जिस शूर के पराक्रम से उसके बन्धु-बान्धव वैसे ही सुखपूर्वक फलते-फूलते हैं जैसे इन्द्र के पराक्रम से देवता, उसी का जीवन इस संसार में श्रेष्ठ है।

श्लोक 45 (5.133.45)

स्वबाहुबलमाश्रित्य योहि जीवति मानवः । स लोके लभते कीर्तिं परत्र च शुभां गतिम् ॥

svabāhubalamāśritya yohi jīvati mānavaḥ | sa loke labhate kīrtiṃ paratra ca śubhāṃ gatim

जो मनुष्य अपने बाहुबल का आश्रय लेकर जीता है, वह इस लोक में कीर्ति और परलोक में शुभ गति प्राप्त करता है।

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