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उद्योग पर्व · अध्याय 134

विदुला का पुत्र को युद्ध के लिए उकसाना

विदुला अपनी फटकार जारी रखती है। वह कहती है कि सिन्धुराज की प्रजा असंतुष्ट है; संजय को सहायक जुटाने चाहिए, पर्वतीय दुर्गों में डटे रहकर शत्रु की विपत्ति की प्रतीक्षा करनी चाहिए और इस प्रकार अपने "संजय" (विजेता) नाम को सार्थक करना चाहिए। वह दरिद्रता की लज्जा, आश्रितों के छोड़ जाने और ब्राह्मण को मना करने की पीड़ा का वर्णन करती है, शम्बर के वचन और इन्द्र द्वारा वृत्र-वध का स्मरण कराती है, और अन्त में क्षत्रिय के उस सनातन हृदय का वर्णन करती है जो ब्राह्मणों और धर्म के अतिरिक्त किसी के आगे नहीं झुकता।

अध्याय 133अध्याय-सूचीअध्याय 135

विदुलोवाच

श्लोक 1 (5.134.1)

अथैतस्यामवस्थायां पौरुषं हातुमिच्छसि । निहीनसेवितं मार्गं गमिष्यस्यचिरादिव ॥

athaitasyāmavasthāyāṃ pauruṣaṃ hātumicchasi | nihīnasevitaṃ mārgaṃ gamiṣyasyacirādiva

और ऐसी दशा में भी तू पौरुष छोड़ देना चाहता है! लगता है, शीघ्र ही तू नीच लोगों के चले हुए मार्ग पर चलेगा।

श्लोक 2 (5.134.2)

यो हि तेजो यथाशक्ति न कर्शयति विक्रमात् । क्षत्रियो जीविताकाङ्क्षी स्तेन इत्येव तं विदुः ॥

yo hi tejo yathāśakti na karśayati vikramāt | kṣatriyo jīvitākāṅkṣī stena ityeva taṃ viduḥ

जो क्षत्रिय जीवन का लोभी होकर यथाशक्ति पराक्रम में अपना तेज नहीं खपाता, उसे लोग चोर ही कहते हैं।

श्लोक 3 (5.134.3)

अर्थवन्त्युपपन्नानि वाक्यानि गुणवन्ति च । नैव संप्राप्नुवन्ति त्वां मुमूर्षुमिव भेषजम् ॥

arthavantyupapannāni vākyāni guṇavanti ca | naiva saṃprāpnuvanti tvāṃ mumūrṣumiva bheṣajam

अर्थपूर्ण, युक्तियुक्त और हितकारी वचन भी तुझ तक बिल्कुल नहीं पहुँचते, जैसे मरणासन्न व्यक्ति तक औषधि नहीं पहुँचती।

श्लोक 4 (5.134.4)

सन्ति वै सिन्धुराजस्य सन्तुष्टा न तथा जनाः । दौर्बल्यादासते मूढा व्यसनौघप्रतीक्षिणः ॥

santi vai sindhurājasya santuṣṭā na tathā janāḥ | daurbalyādāsate mūḍhā vyasanaughapratīkṣiṇaḥ

सिन्धुराज के लोग उतने संतुष्ट नहीं हैं। वे दुर्बलता के कारण किंकर्तव्यविमूढ़ होकर बैठे हैं और उस पर विपत्तियों की बाढ़ आने की प्रतीक्षा कर रहे हैं।

श्लोक 5 (5.134.5)

सहायोपचितिं कृत्वा व्यवसाय्य ततस्ततः । अनुदुष्येयुरपरे पश्यन्तस्तव पौरुषम् ॥

sahāyopacitiṃ kṛtvā vyavasāyya tatastataḥ | anuduṣyeyurapare paśyantastava pauruṣam

सहायकों को जुटा और इधर-उधर से उन्हें उद्यम के लिए प्रेरित कर; तेरा पौरुष देखकर दूसरे लोग भी उससे विमुख हो सकते हैं।

श्लोक 6 (5.134.6)

तैः कृत्वा सह संघातं गिरिदुर्गालयं चर । काले व्यसनमाकाङ्क्षन्नैवायमजरामरः ॥

taiḥ kṛtvā saha saṃghātaṃ giridurgālayaṃ cara | kāle vyasanamākāṅkṣannaivāyamajarāmaraḥ

उनके साथ संगठित होकर पर्वतीय दुर्गों में निवास कर और समय आने पर उसकी विपत्ति की प्रतीक्षा कर; वह अजर-अमर तो है नहीं।

श्लोक 7 (5.134.7)

सञ्जयो नामतश्च त्वं न च पश्यामि तत्त्वयि । अन्वर्थनामा भव मे पुत्र मा व्यर्थनामकः ॥

sañjayo nāmataśca tvaṃ na ca paśyāmi tattvayi | anvarthanāmā bhava me putra mā vyarthanāmakaḥ

तेरा नाम संजय (विजेता) है, पर मुझे तुझमें वह गुण नहीं दिखता। बेटा, अपने नाम को सार्थक कर, व्यर्थ नाम वाला मत बन।

श्लोक 8 (5.134.8)

सम्यग्दृष्टिर्महाप्राज्ञो बालं त्वां ब्राह्मणोऽब्रवीत् । अयं प्राप्य महत्कृच्छ्रं पुनर्वृद्धिं गमिष्यति ॥

samyagdṛṣṭirmahāprājño bālaṃ tvāṃ brāhmaṇo'bravīt | ayaṃ prāpya mahatkṛcchraṃ punarvṛddhiṃ gamiṣyati

जब तू बालक था, तब एक सम्यक्-दृष्टि वाले महाज्ञानी ब्राह्मण ने तेरे विषय में कहा था — "यह बड़े संकट में पड़कर फिर उन्नति प्राप्त करेगा।"

श्लोक 9 (5.134.9)

तस्य स्मरन्ती वचनमाशंसे विजयं तव । तस्मात्तात ब्रवीमि त्वां वक्ष्यामि च पुनःपुनः ॥

tasya smarantī vacanamāśaṃse vijayaṃ tava | tasmāttāta bravīmi tvāṃ vakṣyāmi ca punaḥpunaḥ

उसके वचन को स्मरण करके मैं तेरी विजय की आशा करती हूँ। इसीलिए, बेटा, मैं तुझसे कह रही हूँ और बार-बार कहूँगी।

श्लोक 10 (5.134.10)

यस्य ह्यर्थाभिनिर्वृत्तौ भवन्त्याप्यायिताः परे । तस्यार्थसिद्धिर्नियता नयेष्वर्थानुसारिणः ॥

yasya hyarthābhinirvṛttau bhavantyāpyāyitāḥ pare | tasyārthasiddhirniyatā nayeṣvarthānusāriṇaḥ

जिसके उद्देश्य की सिद्धि से दूसरे लोग भी पुष्ट होते हैं, और जो नीति पर चलते हुए अपने लक्ष्य पर दृष्टि रखता है, उसकी सफलता निश्चित है।

श्लोक 11 (5.134.11)

समृद्धिरसमृद्धिर्वा पूर्वेषां मम सञ्जय । एवं विद्वान्युद्धमना भव मा प्रत्युपाहरः ॥

samṛddhirasamṛddhirvā pūrveṣāṃ mama sañjaya | evaṃ vidvānyuddhamanā bhava mā pratyupāharaḥ

हे संजय, मेरे पूर्वजों को भी समृद्धि और असफलता दोनों मिलीं। यह जानकर युद्ध में मन लगा; पीछे मत हट।

श्लोक 12 (5.134.12)

नातः पापीयसीं कांचिदवस्थां शम्बरोऽब्रवीत् । यत्र नैवाद्य न प्रातर्भोजनं प्रतिदृश्यते ॥

nātaḥ pāpīyasīṃ kāṃcidavasthāṃ śambaro'bravīt | yatra naivādya na prātarbhojanaṃ pratidṛśyate

शम्बर ने कहा है कि उससे बढ़कर बुरी कोई अवस्था नहीं, जिसमें न आज का भोजन दिखाई दे, न कल का।

श्लोक 13 (5.134.13)

पतिपुत्रवधादेतत्परमं दुःखमब्रवीत् । दारिद्र्यमिति यत्प्रोक्तं पर्यायमरणं हि तत् ॥

patiputravadhādetatparamaṃ duḥkhamabravīt | dāridryamiti yatproktaṃ paryāyamaraṇaṃ hi tat

उसने इसे पति और पुत्रों के वध से भी बड़ा दुःख बताया। जिसे दरिद्रता कहा जाता है, वह मृत्यु का ही दूसरा नाम है।

श्लोक 14 (5.134.14)

अहं महाकुले जाता ह्रदाद्ध्रदमिवागता । ईश्वरी सर्वकल्याणी भर्त्रा परमपूजिता ॥

ahaṃ mahākule jātā hradāddhradamivāgatā | īśvarī sarvakalyāṇī bhartrā paramapūjitā

मैं एक महान् कुल में जन्मी और मानो एक सरोवर से दूसरे सरोवर में आई; मैं गृहस्वामिनी थी, सब प्रकार से कल्याणमयी थी और पति द्वारा अत्यन्त सम्मानित थी।

श्लोक 15 (5.134.15)

महार्हमाल्याभरणां सुमृष्टाम्बरवाससम् । पुरा हृष्टः सुहृद्वर्गो मामपश्यत्सुहृद्गताम् ॥

mahārhamālyābharaṇāṃ sumṛṣṭāmbaravāsasam | purā hṛṣṭaḥ suhṛdvargo māmapaśyatsuhṛdgatām

पहले मेरे सुहृद्-जन प्रसन्न होकर मुझे बहुमूल्य मालाओं और आभूषणों से सजी, स्वच्छ सुन्दर वस्त्र पहने, मित्रों के बीच देखा करते थे।

श्लोक 16 (5.134.16)

यदा मां चैव भार्यां च द्रष्टासि भृशदुर्बलाम् । न तदा जीवितेनार्थो भविता तव सञ्जय ॥

yadā māṃ caiva bhāryāṃ ca draṣṭāsi bhṛśadurbalām | na tadā jīvitenārtho bhavitā tava sañjaya

हे संजय, जब तू मुझे और अपनी पत्नी को अत्यन्त दुर्बल देखेगा, तब तेरे जीने का कोई अर्थ नहीं रहेगा।

श्लोक 17 (5.134.17)

दासकर्मकरान्भृत्यानाचार्यर्त्विक्पुरोहितान् । अवृत्त्याऽस्मान्प्रजहतो दृष्ट्वा किं जीवितेन ते ॥

dāsakarmakarānbhṛtyānācāryartvikpurohitān | avṛttyā'smānprajahato dṛṣṭvā kiṃ jīvitena te

जब तू दासों, मजदूरों, सेवकों, आचार्यों, ऋत्विजों और पुरोहितों को जीविका के अभाव में हमें छोड़कर जाते देखेगा, तब तेरे जीने से क्या लाभ?

श्लोक 18 (5.134.18)

यदि कृत्यं न पश्यामि तवाद्याहं यथा पुरा । श्लाघनीयं यशस्यं च का शान्तिर्हृदयस्य मे ॥

yadi kṛtyaṃ na paśyāmi tavādyāhaṃ yathā purā | ślāghanīyaṃ yaśasyaṃ ca kā śāntirhṛdayasya me

यदि आज मैं तुझे पहले की तरह कोई प्रशंसनीय और यशस्वी कर्म करते नहीं देखती, तो मेरे हृदय को क्या शान्ति मिलेगी?

श्लोक 19 (5.134.19)

नेति चेद्ब्राह्मणं ब्रूयां दीर्येत हृदयं मम । न ह्यहं न च मे भर्ता नेति ब्राह्मणमुक्तवान् ॥

neti cedbrāhmaṇaṃ brūyāṃ dīryeta hṛdayaṃ mama | na hyahaṃ na ca me bhartā neti brāhmaṇamuktavān

यदि मुझे किसी ब्राह्मण से "नहीं" कहना पड़े, तो मेरा हृदय फट जाएगा। क्योंकि न मैंने और न मेरे पति ने कभी किसी ब्राह्मण से "नहीं" कहा।

श्लोक 20 (5.134.20)

वयमाश्रयणीयाः स्म न श्रोतारः परस्य च । अन्यमासाद्य जीवन्ती परित्यक्ष्यामि जीवितम् ॥

vayamāśrayaṇīyāḥ sma na śrotāraḥ parasya ca | anyamāsādya jīvantī parityakṣyāmi jīvitam

हम दूसरों के आश्रयदाता हैं, दूसरों की आज्ञा सुनने वाले नहीं। यदि मुझे किसी दूसरे के सहारे जीना पड़े, तो मैं प्राण त्याग दूँगी।

श्लोक 21 (5.134.21)

अपारे भव नः पारमप्लवे भव नः प्लवः । कुरुष्व स्थानमस्थाने मृतान्सञ्जीवयस्व नः ॥

apāre bhava naḥ pāramaplave bhava naḥ plavaḥ | kuruṣva sthānamasthāne mṛtānsañjīvayasva naḥ

जहाँ कोई किनारा नहीं, वहाँ हमारा किनारा बन; जहाँ कोई नौका नहीं, वहाँ हमारी नौका बन। जहाँ कोई ठिकाना नहीं, वहाँ हमें ठिकाना दे; हम मरे हुओं को फिर जीवित कर।

श्लोक 22 (5.134.22)

सर्वे ते शत्रवः शक्या न चेज्जीवितुमर्हसि । अथ चेदीदृशीं वृत्तिं क्लीबामभ्युपपद्यसे ॥

sarve te śatravaḥ śakyā na cejjīvitumarhasi | atha cedīdṛśīṃ vṛttiṃ klībāmabhyupapadyase

तेरे सभी शत्रु जीते जा सकते हैं; यदि नहीं, तो तू जीने के योग्य नहीं। और यदि तू ऐसी नपुंसकों-जैसी वृत्ति अपनाता है,

श्लोक 23 (5.134.23)

निर्विण्णात्मा हतमना मुञ्चैतां पापजीविकाम् । एकशत्रुवधेनैव शूरो गच्छति विश्रुतिम् ॥

nirviṇṇātmā hatamanā muñcaitāṃ pāpajīvikām | ekaśatruvadhenaiva śūro gacchati viśrutim

खिन्न चित्त और टूटे संकल्प के साथ — तो इस पापमयी जीविका को छोड़ दे! एक ही शत्रु का वध करके शूर ख्याति प्राप्त कर लेता है।

श्लोक 24 (5.134.24)

इन्द्रो वृत्रवधेनैव महेन्द्रः समपद्यत । माहेन्द्रं च ग्रहं लेभे लोकानां चेश्वरोऽभवत् ॥

indro vṛtravadhenaiva mahendraḥ samapadyata | māhendraṃ ca grahaṃ lebhe lokānāṃ ceśvaro'bhavat

वृत्र का वध करके ही इन्द्र महेन्द्र बने; उन्होंने माहेन्द्र ग्रह (सोमपात्र) प्राप्त किया और लोकों के स्वामी हो गए।

श्लोक 25 (5.134.25)

नाम विश्राव्य वै सङ्ख्ये शत्रूनाहूय दंशितान् । सेनाग्रं चापि विद्राव्य हत्वा वा पुरुषं वरम् ॥

nāma viśrāvya vai saṅkhye śatrūnāhūya daṃśitān | senāgraṃ cāpi vidrāvya hatvā vā puruṣaṃ varam

युद्ध में अपना नाम घोषित करके, कवचधारी शत्रुओं को ललकारकर, उनकी सेना के अग्रभाग को भगाकर या उनके श्रेष्ठ योद्धा को मारकर —

श्लोक 26 (5.134.26)

यदैव लभते वीरः सुयुद्धेन महद्यशः । तदैव प्रव्यथन्तेऽस्य शत्रवो विनमन्ति च ॥

yadaiva labhate vīraḥ suyuddhena mahadyaśaḥ | tadaiva pravyathante'sya śatravo vinamanti ca

जब वीर उत्तम युद्ध द्वारा महान् यश प्राप्त करता है, तभी उसके शत्रु भयभीत होते हैं और उसके आगे झुक जाते हैं।

श्लोक 27 (5.134.27)

त्यक्त्वात्मानं रणे दक्षं शूरं कापुरुषा जनाः । अवशास्तर्पयन्ति स्म सर्वकामसमृद्धिभिः ॥

tyaktvātmānaṃ raṇe dakṣaṃ śūraṃ kāpuruṣā janāḥ | avaśāstarpayanti sma sarvakāmasamṛddhibhiḥ

कायर लोग विवश होकर उस कुशल शूर को, जिसने युद्ध में अपने प्राणों की बाज़ी लगा दी, सभी इच्छित समृद्धियों से तृप्त करते हैं।

श्लोक 28 (5.134.28)

राज्यं चाप्युग्रविभ्रंशं संशयो जीवितस्य वा । न लब्धस्य हि शत्रोर्वै शेषं कुर्वन्ति साधवः ॥

rājyaṃ cāpyugravibhraṃśaṃ saṃśayo jīvitasya vā | na labdhasya hi śatrorvai śeṣaṃ kurvanti sādhavaḥ

दाँव पर या तो राज्य है, या भयानक पतन, या प्राणों का संकट; और सज्जन पराजित शत्रु का कुछ भी शेष नहीं छोड़ते।

श्लोक 29 (5.134.29)

स्वर्गद्वारोपमं राज्यमथवाप्यमृतोपमम् । रुद्धमेकायनं मत्वा पतोल्मुक इवारिषु ॥

svargadvāropamaṃ rājyamathavāpyamṛtopamam | ruddhamekāyanaṃ matvā patolmuka ivāriṣu

राज्य को स्वर्ग के द्वार के समान अथवा अमृत के समान मानकर, और उस तक पहुँचने का एकमात्र मार्ग रुका हुआ समझकर, जलती लकड़ी की तरह शत्रुओं पर टूट पड़।

श्लोक 30 (5.134.30)

जहि शत्रून्रणे राजन्स्वधर्ममनुपालय । मा त्वा दृशं सुकृपणं शत्रूणां भयवर्धनम् ॥

jahi śatrūnraṇe rājansvadharmamanupālaya | mā tvā dṛśaṃ sukṛpaṇaṃ śatrūṇāṃ bhayavardhanam

हे राजन्, युद्ध में शत्रुओं को मार और अपने धर्म का पालन कर। शत्रुओं का भय बढ़ाने वाले तुझको मैं इतना दीन न देखूँ।

श्लोक 31 (5.134.31)

अस्मदीयैश्च शोचद्भिर्नदद्भिश्च परैर्वृतम् । अपि त्वां नानुपश्येयं दीनाद्दीनमिवास्थितम् ॥

asmadīyaiśca śocadbhirnadadbhiśca parairvṛtam | api tvāṃ nānupaśyeyaṃ dīnāddīnamivāsthitam

मैं तुझे कभी ऐसी दशा में न देखूँ कि तू शोक करते हुए अपने लोगों और गरजते हुए शत्रुओं से घिरा, दीनों से भी अधिक दीन बना खड़ा हो।

श्लोक 32 (5.134.32)

हृष्य सौवीरकन्याभिः श्लाघस्वार्थैर्यथा पुरा । मा च सैन्धवकन्यानामवसन्नो वशं गमः ॥

hṛṣya sauvīrakanyābhiḥ ślāghasvārthairyathā purā | mā ca saindhavakanyānāmavasanno vaśaṃ gamaḥ

सौवीर-कन्याओं के साथ आनन्द कर और पहले की तरह अपने वैभव पर गर्व कर। हताश होकर सिन्धु-कन्याओं के वश में मत पड़।

श्लोक 33 (5.134.33)

युवा रूपेण संपन्नो विद्ययाभिजनेन च । यत्त्वादृशो विकुर्वीत यशस्वी लोकविश्रुतः ॥

yuvā rūpeṇa saṃpanno vidyayābhijanena ca | yattvādṛśo vikurvīta yaśasvī lokaviśrutaḥ

तेरे जैसा युवा, रूपवान्, विद्या और उत्तम कुल से सम्पन्न, यशस्वी और लोकविख्यात पुरुष (युद्ध से) पीछे हट जाए,

श्लोक 34 (5.134.34)

अधुर्यवच्च वोढव्ये मन्ये मरणमेव तत् । यदि त्वामनुपश्यामि परस्य प्रियवादिनम् ॥

adhuryavacca voḍhavye manye maraṇameva tat | yadi tvāmanupaśyāmi parasya priyavādinam

जैसे बोझ ढोने के समय बिना सधा बैल (अड़ जाए) — उसे मैं मृत्यु ही मानती हूँ। यदि मैं तुझे किसी दूसरे से चिकनी-चुपड़ी बातें करते हुए

श्लोक 35 (5.134.35)

पृष्ठतोऽनुव्रजन्तं वा का शान्तिर्हृदयस्य मे । नास्मिञ्जातु कुले जातो गच्छेद्योन्यस्य पृष्ठतः ॥

pṛṣṭhato'nuvrajantaṃ vā kā śāntirhṛdayasya me | nāsmiñjātu kule jāto gacchedyonyasya pṛṣṭhataḥ

या उसके पीछे-पीछे चलते देखूँ, तो मेरे हृदय को क्या शान्ति मिलेगी? इस कुल में जन्मा कोई भी कभी दूसरे के पीछे नहीं चलता।

श्लोक 36 (5.134.36)

न त्वं परस्यानुचरस्तात जीवितुमर्हसि । अहं हि क्षत्रहृदयं वेद यत्परिशाश्वतम् ॥

na tvaṃ parasyānucarastāta jīvitumarhasi | ahaṃ hi kṣatrahṛdayaṃ veda yatpariśāśvatam

बेटा, तुझे दूसरे का अनुचर बनकर नहीं जीना चाहिए। क्योंकि मैं क्षत्रिय के उस हृदय को जानती हूँ, जो सदा एक-सा रहता है,

श्लोक 37 (5.134.37)

पूर्वैः पूर्वतरैः प्रोक्तं परैः परतरैरपि । शाश्वतं चाव्ययं चैव प्रजापतिविनिर्मितम् ॥

pūrvaiḥ pūrvataraiḥ proktaṃ paraiḥ paratarairapi | śāśvataṃ cāvyayaṃ caiva prajāpativinirmitam

जैसा पूर्वजों और उनसे भी पहले के लोगों ने तथा बाद के और उनसे भी बाद के लोगों ने उसे बताया है — शाश्वत, अविनाशी और प्रजापति द्वारा रचा हुआ।

श्लोक 38 (5.134.38)

यो वै कश्चिदिहाजातः क्षत्रियः क्षत्रधर्मवित् । भयाद्वृत्तिसमीक्षो वा न नमेदिह कस्यचित् ॥

yo vai kaścidihājātaḥ kṣatriyaḥ kṣatradharmavit | bhayādvṛttisamīkṣo vā na namediha kasyacit

जो कोई यहाँ उत्तम कुल में जन्मा क्षत्रिय क्षत्रिय-धर्म को जानता है, वह भय से या जीविका का विचार करके किसी के आगे न झुके।

श्लोक 39 (5.134.39)

उद्यच्छेदेव न नमेदुद्यमो ह्येव पौरुषम् । अप्यपर्वणि भज्येत न नमेतेह कस्यचित् ॥

udyacchedeva na namedudyamo hyeva pauruṣam | apyaparvaṇi bhajyeta na nameteha kasyacit

वह सदा उद्यम करे, झुके नहीं; उद्यम ही पौरुष है। चाहे बिना जोड़ के ही टूट जाए, पर यहाँ किसी के आगे न झुके।

श्लोक 40 (5.134.40)

मातङ्गो मत्त इव च परीयात्स महामनाः । ब्राह्मणेभ्यो नमेन्नित्यं धर्मायैव च सञ्जय ॥

mātaṅgo matta iva ca parīyātsa mahāmanāḥ | brāhmaṇebhyo namennityaṃ dharmāyaiva ca sañjaya

वह महामना मतवाले हाथी की तरह विचरण करे। हे संजय, वह सदा केवल ब्राह्मणों को और धर्म को ही नमन करे।

श्लोक 41 (5.134.41)

नियच्छन्नितरान्वर्णान्विनिघ्नन्सर्वदुष्कृतः । ससहायोऽसहायो वा यावज्जीवं तथा भवेत् ॥

niyacchannitarānvarṇānvinighnansarvaduṣkṛtaḥ | sasahāyo'sahāyo vā yāvajjīvaṃ tathā bhavet

अन्य वर्णों को नियम में रखते हुए और सब दुष्कर्मियों का नाश करते हुए, सहायकों के साथ हो या बिना सहायकों के, वह जीवन भर ऐसा ही बना रहे।

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