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उद्योग पर्व · अध्याय 135

विदुला का पुत्र को युद्ध के लिए प्रेरित करना

कुन्ती विदुला की कथा आगे सुनाती हैं। उसका पुत्र संजय कहता है कि माँ का हृदय लोहे का बना है, और पूछता है कि उसके मरने पर उसे संसार से क्या मिलेगा। विदुला उत्तर देती है कि क्षत्रिय युद्ध और विजय के लिए जन्मा है, और थोड़े में सन्तुष्ट रहने वाला नष्ट हो जाता है। जब संजय पूछता है कि बिना कोष और सहायकों के वह कैसे जीते, तो वह उसे पिछली असफलताओं के कारण अपने को हीन न मानने, फल अनिश्चित होने पर भी कर्म करने, शत्रु पक्ष के क्रुद्ध और अपमानित लोगों को अपनी ओर करने, और शत्रु को सहायक बनाकर उस पर कभी विश्वास न करने का उपदेश देती है।

अध्याय 134अध्याय-सूचीअध्याय 136

पुत्र उवाच

श्लोक 1 (5.135.1)

कृष्णायसस्येव च ते संहत्य हृदयं कृतम् । मम मातस्त्वकरुणे वीरप्रज्ञे ह्यमर्षणे ॥

kṛṣṇāyasasyeva ca te saṃhatya hṛdayaṃ kṛtam | mama mātastvakaruṇe vīraprajñe hyamarṣaṇe

माँ, तुम्हारा हृदय मानो काले लोहे को कूट-कूटकर गढ़ा गया है; तुम निर्दय हो, वीर-बुद्धि वाली हो और असहनशील हो।

श्लोक 2 (5.135.2)

अहो क्षत्रसमाचारो यत्र मामितरं यथा । नियोजयसि युद्धाय परमातेव मां तथा ॥

aho kṣatrasamācāro yatra māmitaraṃ yathā | niyojayasi yuddhāya paramāteva māṃ tathā

धिक्कार है इस क्षत्रिय-आचार को, जिसके कारण तुम मुझे किसी पराये की भाँति युद्ध में झोंक रही हो, मानो तुम किसी दूसरे की माँ हो!

श्लोक 3 (5.135.3)

ईदृशं वचनं ब्रूयाद्भवती पुत्रमेकजम् । किं नु ते मामपश्यन्त्याः पृथिव्या अपि सर्वया ॥

īdṛśaṃ vacanaṃ brūyādbhavatī putramekajam | kiṃ nu te māmapaśyantyāḥ pṛthivyā api sarvayā

क्या तुम अपने इकलौते पुत्र से ऐसी बात कहोगी? मुझे न देख पाने पर तुम्हारे लिए सारी पृथ्वी भी किस काम की?

श्लोक 4 (5.135.4)

किमाभरणकृत्येन किं भोगैर्जीवितेन वा । मयि वा सङ्गरहते प्रियपुत्रे विशेषतः ॥

kimābharaṇakṛtyena kiṃ bhogairjīvitena vā | mayi vā saṅgarahate priyaputre viśeṣataḥ

यदि मैं — तुम्हारा सबसे प्रिय पुत्र — युद्ध में मारा गया, तो आभूषणों से, भोगों से या जीवन से ही तुम्हें क्या प्रयोजन?

मातोवाच

श्लोक 5 (5.135.5)

सर्वावस्था हि विदुषां तात धर्मार्थकारणात् । तावेवाभिसमीक्ष्याहं सञ्जय त्वामचूचुदम् ॥

sarvāvasthā hi viduṣāṃ tāta dharmārthakāraṇāt | tāvevābhisamīkṣyāhaṃ sañjaya tvāmacūcudam

बेटा, विद्वानों के लिए जीवन की सभी अवस्थाएँ धर्म और अर्थ के लिए ही होती हैं। उन्हीं दोनों को देखकर, संजय, मैंने तुम्हें प्रेरित किया है।

श्लोक 6 (5.135.6)

स समीक्ष्य क्रमोपेतो मुख्यः कालोऽयमागतः । अस्मिंश्चेदागते काले कार्यं न प्रतिपद्यसे ॥

sa samīkṣya kramopeto mukhyaḥ kālo'yamāgataḥ | asmiṃścedāgate kāle kāryaṃ na pratipadyase

भली-भाँति विचार करो — क्रम से आया हुआ यही वह मुख्य अवसर है। यदि इस समय के आ जाने पर भी तुम कर्तव्य को नहीं अपनाते,

श्लोक 7 (5.135.7)

असंभावितरूपस्त्वमानृशंस्यं करिष्यसि । तं त्वामयशसा स्पृष्टं न ब्रूयां यदि सञ्जय ॥

asaṃbhāvitarūpastvamānṛśaṃsyaṃ kariṣyasi | taṃ tvāmayaśasā spṛṣṭaṃ na brūyāṃ yadi sañjaya

और दया दिखाते हो, तो तुम तिरस्कार के पात्र बन जाओगे। संजय, अपयश से कलंकित होने पर भी यदि मैं तुमसे कुछ न कहूँ,

श्लोक 8 (5.135.8)

खरीवात्सल्यमाहुस्तन्निःसामर्थ्यमहेतुकम् । सद्भिर्विगर्हितं मार्गं त्यज मूर्खनिषेवितम् ॥

kharīvātsalyamāhustanniḥsāmarthyamahetukam | sadbhirvigarhitaṃ mārgaṃ tyaja mūrkhaniṣevitam

तो मेरा स्नेह वैसा ही होगा जिसे गधी का वात्सल्य कहते हैं — निष्फल और निरर्थक। सज्जनों द्वारा निन्दित और मूर्खों द्वारा अपनाए गए इस मार्ग को छोड़ दो।

श्लोक 9 (5.135.9)

अविद्या वै महत्यस्ति यामिमां संश्रिताः प्रजाः । तव स्याद्यदि सद्वृत्तं तेन मे त्वं प्रियो भवेः ॥

avidyā vai mahatyasti yāmimāṃ saṃśritāḥ prajāḥ | tava syādyadi sadvṛttaṃ tena me tvaṃ priyo bhaveḥ

यह अज्ञान सचमुच बड़ा है जिसका ये लोग आश्रय लिए बैठे हैं। यदि तुम्हारा आचरण सज्जनों जैसा हो, तभी तुम मुझे प्रिय हो सकते हो —

श्लोक 10 (5.135.10)

धर्मार्थगुणयुक्तेन नेतरेण कथञ्चन । दैवमानुषयुक्तेन सद्भिराचरितेन च ॥

dharmārthaguṇayuktena netareṇa kathañcana | daivamānuṣayuktena sadbhirācaritena ca

ऐसा आचरण जो धर्म, अर्थ और गुणों से युक्त हो — किसी और प्रकार का कदापि नहीं; जिसमें दैव और पुरुषार्थ दोनों का योग हो और जिसका सज्जनों ने पालन किया हो।

श्लोक 11 (5.135.11)

यो ह्येवमविनीतेन रमते पुत्रनप्तृणा । अनुत्थानवता चापि दुर्विनीतेन दुर्धिया ॥

yo hyevamavinītena ramate putranaptṛṇā | anutthānavatā cāpi durvinītena durdhiyā

जो ऐसे अविनीत पुत्र या पौत्र से प्रसन्न रहता है — जो उद्यमहीन, उद्दण्ड और दुर्बुद्धि है —

श्लोक 12 (5.135.12)

रमते यस्तु पुत्रेण मोघं तस्य प्रजाफलम् । अकुर्वन्तो हि कर्माणि कुर्वन्तो निन्दितानि च ॥

ramate yastu putreṇa moghaṃ tasya prajāphalam | akurvanto hi karmāṇi kurvanto ninditāni ca

जो ऐसे पुत्र में सुख मानता है, उसका सन्तान पाना व्यर्थ है। जो कर्म नहीं करते और जो निन्दित कर्म करते हैं,

श्लोक 13 (5.135.13)

सुखं नैवेह नामुत्र लभन्ते पुरुषाधमाः । युद्धाय क्षत्रियः सृष्टः सञ्जयेह जयाय च । क्रूराय कर्मणे नित्यं प्रजानां परिपालने ॥

sukhaṃ naiveha nāmutra labhante puruṣādhamāḥ | yuddhāya kṣatriyaḥ sṛṣṭaḥ sañjayeha jayāya ca | krūrāya karmaṇe nityaṃ prajānāṃ paripālane

वे अधम पुरुष न इस लोक में सुख पाते हैं न परलोक में। संजय, क्षत्रिय की सृष्टि यहाँ युद्ध और विजय के लिए हुई है — सदा कठोर कर्म के लिए और प्रजा के पालन के लिए।

श्लोक 14 (5.135.14)

जयन्वा वध्यमानो वा प्राप्नोतीन्द्रसलोकताम् । न शक्रभवने पुण्ये दिवि तद्विद्यते सुखम् । यदमित्रान्वशे कृत्वा क्षत्रियः सुखमेधते ॥

jayanvā vadhyamāno vā prāpnotīndrasalokatām | na śakrabhavane puṇye divi tadvidyate sukham | yadamitrānvaśe kṛtvā kṣatriyaḥ sukhamedhate

वह जीते या मारा जाए, इन्द्रलोक को प्राप्त होता है। शत्रुओं को वश में करके क्षत्रिय जिस सुख से फलता-फूलता है, वैसा सुख स्वर्ग में इन्द्र के पवित्र भवन में भी नहीं है।

श्लोक 15 (5.135.15)

मन्युना दह्यमानेन पुरुषेण मनस्विना । निकृतेनेह बहुशः शत्रून्प्रति जिगीषया ॥

manyunā dahyamānena puruṣeṇa manasvinā | nikṛteneha bahuśaḥ śatrūnprati jigīṣayā

क्रोध से जलता हुआ और अनेक बार छला गया स्वाभिमानी पुरुष शत्रुओं को जीतने की इच्छा से (अवश्य) उनके विरुद्ध निकल पड़े।

श्लोक 16 (5.135.16)

आत्मानं वा परित्यज्य शत्रुं वा विनिपात्य च । प्राप्यते नेह शान्तिर्हि नित्यमेव तु सञ्जय । अतोऽन्येन प्रकारेण शान्तिरस्य कुतो भवेत् ॥

ātmānaṃ vā parityajya śatruṃ vā vinipātya ca | prāpyate neha śāntirhi nityameva tu sañjaya | ato'nyena prakāreṇa śāntirasya kuto bhavet

या तो वह अपने प्राण त्याग दे या शत्रु को मार गिराए; इसके बिना, संजय, उसे यहाँ कभी शान्ति नहीं मिलती। इसके अतिरिक्त और किस उपाय से उसे शान्ति मिल सकती है?

श्लोक 17 (5.135.17)

इह प्राज्ञो हि पुरुषः स्वल्पमप्रियमिच्छति । यस्य स्वल्पं प्रियं लोके ध्रुवं तस्याल्पमप्रियम् ॥

iha prājño hi puruṣaḥ svalpamapriyamicchati | yasya svalpaṃ priyaṃ loke dhruvaṃ tasyālpamapriyam

बुद्धिमान पुरुष यहाँ थोड़े को अवांछनीय मानता है। जो संसार में थोड़े से ही सन्तुष्ट है, उसका वह थोड़ा निश्चय ही उसके अनिष्ट का कारण बनता है।

श्लोक 18 (5.135.18)

प्रियाभावाच्च पुरुषो नैव प्राप्नोति शोभनम् । ध्रुवं चाभावमभ्येति गत्वा गङ्गेव सागरम् ॥

priyābhāvācca puruṣo naiva prāpnoti śobhanam | dhruvaṃ cābhāvamabhyeti gatvā gaṅgeva sāgaram

प्रिय (ऐश्वर्य) के अभाव में मनुष्य कभी कल्याण नहीं पाता; वह निश्चय ही वैसे नष्ट हो जाता है जैसे गंगा सागर में जाकर (विलीन हो जाती है)।

पुत्र उवाच

श्लोक 19 (5.135.19)

नेयं मतिस्त्वया वाच्या मातः पुत्रे विशेषतः । कारुण्यमेव पश्य त्वं भूत्वेह जडमूकवत् ॥

neyaṃ matistvayā vācyā mātaḥ putre viśeṣataḥ | kāruṇyameva paśya tvaṃ bhūtveha jaḍamūkavat

माँ, तुम्हें ऐसा विचार प्रकट नहीं करना चाहिए, विशेषकर अपने पुत्र से। यहाँ जड़ और मूक-सी होकर केवल करुणा की ओर देखो।

मातोवाच

श्लोक 20 (5.135.20)

अतो मे भूयसी नन्दिर्यदेवमनुपश्यसि । चोद्यं मां चोदयस्येतद्भृशं वै चोदयामि ते ॥

ato me bhūyasī nandiryadevamanupaśyasi | codyaṃ māṃ codayasyetadbhṛśaṃ vai codayāmi te

इससे मेरा आनन्द और बढ़ता है कि तुम ऐसा देखते हो। तुम मुझ पर वही आपत्ति उठाते हो जिसका उत्तर देना ही है; इसलिए मैं तुम्हें और भी ज़ोर से प्रेरित करती हूँ।

श्लोक 21 (5.135.21)

अथ त्वां पूजयिष्यामि हत्वा वै सर्वसैन्धवान् । अहं पश्यामि विजयं कृच्छ्रभाविनमेव ते ॥

atha tvāṃ pūjayiṣyāmi hatvā vai sarvasaindhavān | ahaṃ paśyāmi vijayaṃ kṛcchrabhāvinameva te

जब तुम सारे सिन्धुदेशीयों को मार डालोगे, तब मैं तुम्हारा सम्मान करूँगी। मैं तुम्हारी विजय होती देख रही हूँ, भले ही वह कठिनाई से मिले।

पुत्र उवाच

श्लोक 22 (5.135.22)

अकोशस्यासहायस्य कुतः सिद्धिर्जयो मम । इत्यवस्थां विदित्वैतामात्मनात्मनि दारुणाम् ॥

akośasyāsahāyasya kutaḥ siddhirjayo mama | ityavasthāṃ viditvaitāmātmanātmani dāruṇām

न मेरे पास कोष है, न सहायक — मुझे सिद्धि और विजय कहाँ से मिलेगी? अपनी इस भयंकर दशा को स्वयं जानकर

श्लोक 23 (5.135.23)

राज्याद्भावो निवृत्तो मे त्रिदिवादिव दुष्कृतः । ईदृशं भवती कंचिदुपायमनुपश्यति ॥

rājyādbhāvo nivṛtto me tridivādiva duṣkṛtaḥ | īdṛśaṃ bhavatī kaṃcidupāyamanupaśyati

मेरा मन राज्य से वैसे ही हट गया है जैसे पापी का (मन) स्वर्ग से। यदि तुम ऐसा कोई उपाय देखती हो,

श्लोक 24 (5.135.24)

तन्मे परिणतप्रज्ञे सम्यक्प्रब्रूहि पृच्छते । करिष्यामि हि तत्सर्वं यथावदनुशासनम् ॥

tanme pariṇataprajñe samyakprabrūhi pṛcchate | kariṣyāmi hi tatsarvaṃ yathāvadanuśāsanam

तो हे परिपक्व बुद्धि वाली माँ, मैं पूछ रहा हूँ, मुझे भली-भाँति बताओ। तुम्हारे आदेश के अनुसार मैं सब कुछ ठीक-ठीक करूँगा।

मातोवाच

श्लोक 25 (5.135.25)

पुत्र नात्मावमन्तव्यः पूर्वाभिरसमृद्धिभिः । अभूत्वा हि भवन्त्यर्था भूत्वा नश्यन्ति चापरे । अमर्षेणैव चाप्यर्था नारब्धव्याः सुबालिशैः ॥

putra nātmāvamantavyaḥ pūrvābhirasamṛddhibhiḥ | abhūtvā hi bhavantyarthā bhūtvā naśyanti cāpare | amarṣeṇaiva cāpyarthā nārabdhavyāḥ subāliśaiḥ

पुत्र, पहले की असफलताओं के कारण अपने को हीन मत समझो। जो धन नहीं था वह हो जाता है, और जो था वह नष्ट हो जाता है। किन्तु मूर्खों को केवल क्रोध के आवेश में कोई कार्य आरम्भ नहीं करना चाहिए।

श्लोक 26 (5.135.26)

सर्वेषां कर्मणां तात फले नित्यमनित्यता । अनित्यमिति जानन्तो न भवन्ति भवन्ति च ॥

sarveṣāṃ karmaṇāṃ tāta phale nityamanityatā | anityamiti jānanto na bhavanti bhavanti ca

बेटा, सभी कर्मों के फल में सदा अनिश्चितता रहती है। यह जानते हुए कि फल अनिश्चित है, लोग कभी सफल होते हैं और कभी नहीं।

श्लोक 27 (5.135.27)

अथ ये नैव कुर्वन्ति नैव जातु भवन्ति ते । ऐकगुण्यमनीहायामभावः कर्मणां फलम् ॥

atha ye naiva kurvanti naiva jātu bhavanti te | aikaguṇyamanīhāyāmabhāvaḥ karmaṇāṃ phalam

पर जो कुछ करते ही नहीं, वे कभी सफल नहीं होते। उद्यम न करने का एक ही परिणाम है — कर्मफल का अभाव।

श्लोक 28 (5.135.28)

अथ द्वैगुण्यमीहायां फलं भवति वा नवा । यस्य प्रागेव विदिता सर्वार्थानामनित्यता ॥

atha dvaiguṇyamīhāyāṃ phalaṃ bhavati vā navā | yasya prāgeva viditā sarvārthānāmanityatā

उद्यम करने पर दो परिणाम सम्भव हैं — फल मिले या न मिले। जिसे पहले से ही सभी पदार्थों की अनित्यता ज्ञात है,

श्लोक 29 (5.135.29)

नुदेद्वृद्धिसमृद्धी स प्रतिकूले नृपात्मज । उत्थातव्यं जागृतव्यं योक्तव्यं भूतिकर्मसु ॥

nudedvṛddhisamṛddhī sa pratikūle nṛpātmaja | utthātavyaṃ jāgṛtavyaṃ yoktavyaṃ bhūtikarmasu

हे राजपुत्र, वह विपरीत परिस्थिति में अपने कष्ट और शत्रु की समृद्धि — दोनों को दूर हटा दे। उठना चाहिए, जागते रहना चाहिए और कल्याणकारी कार्यों में लगना चाहिए,

श्लोक 30 (5.135.30)

भविष्यतीत्येव मनः कृत्वा सततमव्यथैः । मङ्गलानि पुरस्कृत्य ब्राह्मणांश्चेश्वरैः सह ॥

bhaviṣyatītyeva manaḥ kṛtvā satatamavyathaiḥ | maṅgalāni puraskṛtya brāhmaṇāṃśceśvaraiḥ saha

सदा निर्भय रहकर, 'यह अवश्य होगा' — ऐसा मन में ठानकर, मंगल-कर्मों को आगे रखकर, ब्राह्मणों और सामर्थ्यवान पुरुषों के साथ।

श्लोक 31 (5.135.31)

प्राज्ञस्य नृपतेराशु वृद्धिर्भवति पुत्रक । अभिवर्तति लक्ष्मीस्तं प्राचीमिव दिवाकरः ॥

prājñasya nṛpaterāśu vṛddhirbhavati putraka | abhivartati lakṣmīstaṃ prācīmiva divākaraḥ

बेटा, बुद्धिमान राजा की उन्नति शीघ्र होती है; लक्ष्मी उसकी ओर वैसे ही बढ़ती है जैसे सूर्य पूर्व दिशा की ओर।

श्लोक 32 (5.135.32)

निदर्शनान्युपायांश्च बहून्युद्धर्षणानि च । अनुदर्शितरूपोऽसि पश्यामि कुरु पौरुषम् ॥

nidarśanānyupāyāṃśca bahūnyuddharṣaṇāni ca | anudarśitarūpo'si paśyāmi kuru pauruṣam

तुम्हें उदाहरण, उपाय और उत्साह बढ़ाने वाली बहुत-सी बातें दिखा दी गई हैं; तुम्हें मार्ग दिखाया जा चुका है। मैं देख रही हूँ — अब पौरुष दिखाओ।

श्लोक 33 (5.135.33)

पुरुषार्थमभिप्रेतं समाहर्तुमिहार्हसि । क्रुद्धान्लुब्धान्परिक्षीणानवलिप्तान्विमानितान् ॥

puruṣārthamabhipretaṃ samāhartumihārhasi | kruddhānlubdhānparikṣīṇānavaliptānvimānitān

यहाँ तुम्हें अपना अभीष्ट पुरुषार्थ सिद्ध करना चाहिए। जो क्रुद्ध हैं, लोभी हैं, दरिद्र हो गए हैं, घमण्डी हैं या अपमानित हैं,

श्लोक 34 (5.135.34)

स्पर्धिनश्चैव ये केचित्तान्युक्त उपधारय । एतेन त्वं प्रकारेण महतो भेत्स्यसे गणान् । महावेग इवोद्धूतो मातरिश्वा बलाहकान् ॥

spardhinaścaiva ye kecittānyukta upadhāraya | etena tvaṃ prakāreṇa mahato bhetsyase gaṇān | mahāvega ivoddhūto mātariśvā balāhakān

और जो कोई प्रतिस्पर्धी हैं — उन पर सावधानी से दृष्टि रखो। इसी प्रकार तुम बड़े-बड़े दलों में फूट डाल दोगे, जैसे प्रचण्ड वेग से उठी वायु बादलों को छिन्न-भिन्न कर देती है।

श्लोक 35 (5.135.35)

तेषामग्रप्रदायी स्याः कल्योत्थायी प्रियंवदः । ते त्वां प्रियं करिष्यन्ति पुरोधास्यन्ति च ध्रुवम् ॥

teṣāmagrapradāyī syāḥ kalyotthāyī priyaṃvadaḥ | te tvāṃ priyaṃ kariṣyanti purodhāsyanti ca dhruvam

उन्हें सबसे पहले देने वाले बनो, प्रातः जल्दी उठो और मधुर बोलो। तब वे तुम्हारा प्रिय करेंगे और निश्चय ही तुम्हें अपना अगुआ बनाएँगे।

श्लोक 36 (5.135.36)

यदैव शत्रुर्जानीयात्सपत्नं त्यक्तजीवितम् । तदैवास्मादुद्विजेत सर्पाद्वेश्मगतादिव ॥

yadaiva śatrurjānīyātsapatnaṃ tyaktajīvitam | tadaivāsmādudvijeta sarpādveśmagatādiva

जैसे ही शत्रु जान लेता है कि उसका प्रतिद्वन्द्वी प्राणों का मोह छोड़ चुका है, वह उससे वैसे ही डरने लगता है जैसे घर में घुसे साँप से।

श्लोक 37 (5.135.37)

तं विदित्वा पराक्रान्तं वशे न कुरुते यदि । निर्वादैर्निर्वदेदेनमन्ततस्तद्भविष्यति ॥

taṃ viditvā parākrāntaṃ vaśe na kurute yadi | nirvādairnirvadedenamantatastadbhaviṣyati

उसे पराक्रमी जानकर यदि उसे वश में न कर सके, तो दूतों के द्वारा उससे समझौता कर ले; अन्त में वह (वशीकरण) हो ही जाएगा।

श्लोक 38 (5.135.38)

निर्वादादास्पदं लब्ध्वा धनवृद्धिर्भविष्यति । धनवन्तं हि मित्राणि भजन्ते चाश्रयन्ति च ॥

nirvādādāspadaṃ labdhvā dhanavṛddhirbhaviṣyati | dhanavantaṃ hi mitrāṇi bhajante cāśrayanti ca

ऐसे समझौते से पैर जमाने का स्थान मिल जाने पर धन की वृद्धि होगी; और धनवान की सेवा मित्र करते हैं और उसी का आश्रय लेते हैं।

श्लोक 39 (5.135.39)

स्खलितार्थं पुनस्तानि सन्त्यजन्ति च बान्धवाः । नह्यस्मिन्नाश्रयन्ते च जुगुप्सन्ते च तादृशम् ॥

skhalitārthaṃ punastāni santyajanti ca bāndhavāḥ | nahyasminnāśrayante ca jugupsante ca tādṛśam

किन्तु जब किसी का धन नष्ट हो जाता है, तब वे मित्र और बन्धु-बान्धव भी उसे छोड़ देते हैं; वे ऐसे व्यक्ति का आश्रय नहीं लेते और उससे घृणा करते हैं।

श्लोक 40 (5.135.40)

शत्रुं कृत्वा यः सहायं विश्वासमुपगच्छति । स न संभाव्यमेवैतद्यद्राज्यं प्राप्नुयादिति ॥

śatruṃ kṛtvā yaḥ sahāyaṃ viśvāsamupagacchati | sa na saṃbhāvyamevaitadyadrājyaṃ prāpnuyāditi

जो शत्रु को सहायक बनाकर उस पर विश्वास कर बैठता है, उससे यह आशा नहीं की जा सकती कि वह राज्य प्राप्त करेगा।

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