उद्योग पर्व · अध्याय 137
कुन्ती का पुत्रों को सन्देश और श्रीकृष्ण का प्रस्थान
कुन्ती श्रीकृष्ण से कहती हैं कि वे अर्जुन को उसके जन्म के समय हुई आकाशवाणी का स्मरण कराएँ, जिसने कहा था कि वह इन्द्र के समान होगा, कुरुओं को जीतेगा और पिता का अंश फिर पाएगा; वे भीम, द्रौपदी और माद्री के पुत्रों के लिए भी सन्देश देती हैं, और कहती हैं कि उन्हें सबसे अधिक दुःख राज्य छिनने या वनवास का नहीं, बल्कि सभा में द्रौपदी द्वारा सुने गए कटु वचनों का है। श्रीकृष्ण उन्हें प्रणाम करके निकलते हैं, कर्ण को रथ पर बिठाकर नगर के बाहर देर तक उससे मन्त्रणा करते हैं, फिर उसे विदा करके तीव्र वेग से उपप्लव्य पहुँचते हैं; इधर कुरुवंशी उनके विषय में आश्चर्य करते हैं और दुर्योधन की मूर्खता से विनाश निश्चित मानते हैं।
कुन्त्युवाच
श्लोक 1 (5.137.1)
अर्जुनं केशव ब्रूयास्त्वयि जाते स्म सूतके । उपोपविष्टा नारीभिराश्रमे परिवारिता ॥
arjunaṃ keśava brūyāstvayi jāte sma sūtake | upopaviṣṭā nārībhirāśrame parivāritā
केशव, अर्जुन से कहना — जब तुम्हारा जन्म हुआ और मैं आश्रम में सूतिका-गृह में स्त्रियों से घिरी बैठी थी,
श्लोक 2 (5.137.2)
अथान्तरिक्षे वागासीद्दिव्यरूपा मनोरमा । सहस्राक्षसमः कुन्ति भविष्यत्येष ते सुतः ॥
athāntarikṣe vāgāsīddivyarūpā manoramā | sahasrākṣasamaḥ kunti bhaviṣyatyeṣa te sutaḥ
तब आकाश में दिव्य और मनोहर वाणी हुई — 'कुन्ती, तुम्हारा यह पुत्र सहस्र नेत्रों वाले इन्द्र के समान होगा।
श्लोक 3 (5.137.3)
एष जेष्यति सङ्ग्रामे कुरून्सर्वान्समागतान् । भीमसेनद्वितीयश्च लोकमुद्वर्तयिष्यति ॥
eṣa jeṣyati saṅgrāme kurūnsarvānsamāgatān | bhīmasenadvitīyaśca lokamudvartayiṣyati
यह युद्ध में एकत्र हुए सभी कुरुओं को जीतेगा, और भीमसेन के साथ मिलकर संसार को उलट-पुलट कर देगा।
श्लोक 4 (5.137.4)
पुत्रस्ते पृथिवीं जेता यशश्चास्य दिवं स्पृशेत् । हत्वा कुरूंश्च सङ्ग्रामे वासुदेवसहायवान् ॥
putraste pṛthivīṃ jetā yaśaścāsya divaṃ spṛśet | hatvā kurūṃśca saṅgrāme vāsudevasahāyavān
तुम्हारा पुत्र पृथ्वी को जीतेगा और उसका यश स्वर्ग को छुएगा; वासुदेव की सहायता पाकर वह युद्ध में कुरुओं को मारेगा,
श्लोक 5 (5.137.5)
पित्र्यमंशं प्रनष्टं च पुनरप्युद्धरिष्यति । भ्रातृभिः सहितः श्रीमांस्त्रीन्मेधानाहरिष्यति ॥
pitryamaṃśaṃ pranaṣṭaṃ ca punarapyuddhariṣyati | bhrātṛbhiḥ sahitaḥ śrīmāṃstrīnmedhānāhariṣyati
अपने पिता का खोया हुआ अंश फिर से प्राप्त करेगा; और भाइयों सहित वह श्रीमान् तीन अश्वमेध यज्ञ करेगा।'
श्लोक 6 (5.137.6)
स सत्यसन्धो बीभत्सुः सव्यसाची यथाच्युत । तथा त्वमेव जानासि बलवन्तं दुरासदम् ॥
sa satyasandho bībhatsuḥ savyasācī yathācyuta | tathā tvameva jānāsi balavantaṃ durāsadam
हे अच्युत, वह सत्यप्रतिज्ञ बीभत्सु सव्यसाची जैसा है, उसे तुम स्वयं ही बलवान और दुर्जेय जानते हो।
श्लोक 7 (5.137.7)
तथा तदस्तु दाशार्ह यथा वागभ्यभाषत । धर्मश्चेदस्ति वार्ष्णेय तथा सत्यं भविष्यति ॥
tathā tadastu dāśārha yathā vāgabhyabhāṣata | dharmaścedasti vārṣṇeya tathā satyaṃ bhaviṣyati
हे दाशार्ह, जैसा उस वाणी ने कहा था, वैसा ही हो। हे वार्ष्णेय, यदि धर्म है तो वह अवश्य सत्य होगा।
श्लोक 8 (5.137.8)
त्वं चापि तत्तथा कृष्ण सर्वं संपादयिष्यसि । नाहं तदभ्यसूयामि यथा वागभ्यभाषत ॥
tvaṃ cāpi tattathā kṛṣṇa sarvaṃ saṃpādayiṣyasi | nāhaṃ tadabhyasūyāmi yathā vāgabhyabhāṣata
और कृष्ण, तुम भी वह सब वैसा ही सम्पन्न करोगे। उस वाणी ने जो कहा, उसमें मुझे कोई सन्देह नहीं।
श्लोक 9 (5.137.9)
नमो धर्माय महते धर्मो धारयति प्रजाः । एतद्धनञ्जयो वाच्यो नित्योद्युक्तो वृकोदरः ॥
namo dharmāya mahate dharmo dhārayati prajāḥ | etaddhanañjayo vācyo nityodyukto vṛkodaraḥ
महान धर्म को नमस्कार है; धर्म ही प्रजाओं को धारण करता है। यह बात धनंजय से कहना, और सदा उद्यत रहने वाले वृकोदर से भी —
श्लोक 10 (5.137.10)
यदर्थं क्षत्रिया सूते तस्य कालोऽयमागतः । न हि वैरं समासाद्य सीदन्ति पुरुषर्षभाः ॥
yadarthaṃ kṣatriyā sūte tasya kālo'yamāgataḥ | na hi vairaṃ samāsādya sīdanti puruṣarṣabhāḥ
'जिस उद्देश्य के लिए क्षत्राणी पुत्र को जन्म देती है, उसका समय आ गया है। श्रेष्ठ पुरुष वैर ठान लेने पर हताश नहीं होते।'
श्लोक 11 (5.137.11)
विदिता ते सदा बुद्धिर्भीमस्य न स शाम्यति । यावदन्तं न कुरुते शत्रूणां शत्रुकर्शनः ॥
viditā te sadā buddhirbhīmasya na sa śāmyati | yāvadantaṃ na kurute śatrūṇāṃ śatrukarśanaḥ
भीम का स्वभाव तुम सदा से जानते हो — वह शत्रुनाशक तब तक शान्त नहीं होता जब तक शत्रुओं का अन्त न कर दे।
श्लोक 12 (5.137.12)
तावदेव महाबाहुर्निशासु न सुखं लभेत् । सर्वधर्मविशेषज्ञां स्नुषां पाण्डोर्महात्मनः । ब्रूया माधव कल्याणीं कृष्ण कृष्णां यशस्विनीम् ॥
tāvadeva mahābāhurniśāsu na sukhaṃ labhet | sarvadharmaviśeṣajñāṃ snuṣāṃ pāṇḍormahātmanaḥ | brūyā mādhava kalyāṇīṃ kṛṣṇa kṛṣṇāṃ yaśasvinīm
तब तक वह महाबाहु रातों में चैन नहीं पाता। और हे माधव, हे कृष्ण, महात्मा पाण्डु की पुत्रवधू, सब धर्मों की सूक्ष्म बातें जानने वाली, कल्याणी और यशस्विनी कृष्णा से कहना —
श्लोक 13 (5.137.13)
युक्तमेतन्महाभागे कुले जाते यशस्विनि । यन्मे पुत्रेषु सर्वेषु यथावत्त्वमवर्तिथाः ॥
yuktametanmahābhāge kule jāte yaśasvini | yanme putreṣu sarveṣu yathāvattvamavartithāḥ
'हे महाभागे, कुलीन वंश में जन्मी यशस्विनी, यह तुम्हारे योग्य ही है कि तुमने मेरे सभी पुत्रों के साथ उचित व्यवहार किया है।'
श्लोक 14 (5.137.14)
माद्रीपुत्रौ च वक्तव्यौ क्षत्रधर्मरतावुभौ । विक्रमेणार्जितान्भोगान्वृणीतं जीवितादपि ॥
mādrīputrau ca vaktavyau kṣatradharmaratāvubhau | vikrameṇārjitānbhogānvṛṇītaṃ jīvitādapi
और क्षत्रधर्म में रत माद्री के दोनों पुत्रों से कहना — 'पराक्रम से अर्जित भोगों को प्राणों से भी बढ़कर मानो।
श्लोक 15 (5.137.15)
विक्रमाधिगता ह्यर्थाः क्षत्रधर्मेण जीवतः । मनो मनुष्यस्य सदा प्रीणन्ति पुरुषोत्तम ॥
vikramādhigatā hyarthāḥ kṣatradharmeṇa jīvataḥ | mano manuṣyasya sadā prīṇanti puruṣottama
क्योंकि क्षत्रधर्म से जीवन जीने वाले मनुष्य के मन को पराक्रम से प्राप्त धन सदा प्रसन्न करता है।' हे पुरुषोत्तम, (यह उनसे कहना।)
श्लोक 16 (5.137.16)
यच्च वः प्रेक्षमाणानां सर्वधर्मोपचायिनाम् । पाञ्चाली परुषाण्युक्ता को नु तत्क्षन्तुमर्हति ॥
yacca vaḥ prekṣamāṇānāṃ sarvadharmopacāyinām | pāñcālī paruṣāṇyuktā ko nu tatkṣantumarhati
और सब धर्मों को बढ़ाने वाले तुम सबके देखते-देखते पांचाली से जो कठोर वचन कहे गए — उन्हें कौन क्षमा कर सकता है?
श्लोक 17 (5.137.17)
न राज्यहरणं दुःखं द्यूते चापि पराजयः । प्रव्राजनं सुतानां वा न मे तद्दुःखकारणम् ॥
na rājyaharaṇaṃ duḥkhaṃ dyūte cāpi parājayaḥ | pravrājanaṃ sutānāṃ vā na me tadduḥkhakāraṇam
राज्य का छिन जाना मुझे दुःख नहीं देता, न जुए में हार; न ही पुत्रों का निर्वासन मेरे दुःख का कारण है।
श्लोक 18 (5.137.18)
यत्र सा बृहती श्यामा सभायां रुदती तदा । अश्रौषीत्परुषा वाचस्तन्मे दुःखतरं महत् ॥
yatra sā bṛhatī śyāmā sabhāyāṃ rudatī tadā | aśrauṣītparuṣā vācastanme duḥkhataraṃ mahat
उस समय सभा में रोती हुई उस ऊँची-पूरी श्यामा ने जो कठोर वचन सुने — वही मेरे लिए सबसे बड़ा दुःख है।
श्लोक 19 (5.137.19)
स्त्रीधर्मिणी वरारोहा क्षत्रधर्मरता सदा । नाध्यगच्छत्तदा नाथं कृष्णा नाथवती सती ॥
strīdharmiṇī varārohā kṣatradharmaratā sadā | nādhyagacchattadā nāthaṃ kṛṣṇā nāthavatī satī
सदा क्षत्रधर्म में रत वह सुन्दरी कृष्णा, जो उस समय रजस्वला थी, नाथों के रहते हुए भी तब कोई रक्षक न पा सकी।
श्लोक 20 (5.137.20)
तं वै ब्रूहि महाबाहो सर्वशस्त्रभृतां वरम् । अर्जुनं पुरुषव्याघ्रं द्रौपद्याः पदवीं चर ॥
taṃ vai brūhi mahābāho sarvaśastrabhṛtāṃ varam | arjunaṃ puruṣavyāghraṃ draupadyāḥ padavīṃ cara
हे महाबाहु, सब शस्त्रधारियों में श्रेष्ठ पुरुषसिंह अर्जुन से कहना — 'द्रौपदी के बताए मार्ग पर चलो।'
श्लोक 21 (5.137.21)
विदितं हि तवात्यन्तं क्रुद्धाविव यमान्तकौ । भीमार्जुनौ नयेतां हि देवानपि परां गतिम् ॥
viditaṃ hi tavātyantaṃ kruddhāviva yamāntakau | bhīmārjunau nayetāṃ hi devānapi parāṃ gatim
तुम भली-भाँति जानते हो कि क्रुद्ध होने पर भीम और अर्जुन यम और अन्तक के समान हैं, और देवताओं को भी परलोक पहुँचा सकते हैं।
श्लोक 22 (5.137.22)
तयोश्चैतदवज्ञानं यत्सा कृष्णा सभागता । दुःशासनश्च यद्भीमं कटुकान्यभ्यभाषत ॥
tayoścaitadavajñānaṃ yatsā kṛṣṇā sabhāgatā | duḥśāsanaśca yadbhīmaṃ kaṭukānyabhyabhāṣata
उन दोनों का यह अपमान था कि कृष्णा को सभा में लाया गया, और दुःशासन ने भीम से कटु वचन कहे
श्लोक 23 (5.137.23)
पश्यतां कुरुवीराणां तच्च संस्मारयेः पुनः । पाण्डवान्कुशलं पृच्छेः सपुत्रान्कृष्णया सह ॥
paśyatāṃ kuruvīrāṇāṃ tacca saṃsmārayeḥ punaḥ | pāṇḍavānkuśalaṃ pṛccheḥ saputrānkṛṣṇayā saha
कुरुवीरों के देखते-देखते। वह बात उन्हें फिर से याद दिलाना। पुत्रों सहित पाण्डवों और कृष्णा का कुशल-समाचार पूछना।
श्लोक 24 (5.137.24)
मां वै कुशलिनीं ब्रूयास्तेषु भूयो जनार्दन । अरिष्टं गच्छ पन्थानं पुत्रान्मे प्रतिपालय ॥
māṃ vai kuśalinīṃ brūyāsteṣu bhūyo janārdana | ariṣṭaṃ gaccha panthānaṃ putrānme pratipālaya
और जनार्दन, उनसे फिर कहना कि मैं सकुशल हूँ। तुम्हारी यात्रा मंगलमय हो; मेरे पुत्रों की रक्षा करना।
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 25 (5.137.25)
अभिवाद्याथ तां कृष्णः कृत्वा चापि प्रदक्षिणम् । निश्चक्राम महाबाहुः सिंहखेलगतिस्ततः ॥
abhivādyātha tāṃ kṛṣṇaḥ kṛtvā cāpi pradakṣiṇam | niścakrāma mahābāhuḥ siṃhakhelagatistataḥ
तब श्रीकृष्ण ने उन्हें प्रणाम करके उनकी प्रदक्षिणा की, और वे महाबाहु सिंह की-सी लीलापूर्ण चाल से बाहर निकले।
श्लोक 26 (5.137.26)
ततो विसर्जयामास भीष्मादीन्कुरुपुङ्गवान् । आरोप्याथ रथे कर्णं प्रायात्सात्यकिना सह ॥
tato visarjayāmāsa bhīṣmādīnkurupuṅgavān | āropyātha rathe karṇaṃ prāyātsātyakinā saha
फिर उन्होंने भीष्म आदि कुरुश्रेष्ठों को विदा किया, और कर्ण को अपने रथ पर बिठाकर सात्यकि के साथ चल पड़े।
श्लोक 27 (5.137.27)
ततः प्रयाते दाशार्हे कुरवः सङ्गता मिथः । जजल्पुर्महदाश्चर्यं केशवे परमाद्भुतम् ॥
tataḥ prayāte dāśārhe kuravaḥ saṅgatā mithaḥ | jajalpurmahadāścaryaṃ keśave paramādbhutam
दाशार्ह के चले जाने पर कुरुवंशी आपस में मिलकर केशव के विषय में उन्हें महान आश्चर्य और परम अद्भुत बताते हुए चर्चा करने लगे।
श्लोक 28 (5.137.28)
प्रमूढा पृथिवी सर्वा मृत्युपाशवशीकृता । दुर्योधनस्य बालिश्यान्नैतदस्तीति चाब्रुवन् ॥
pramūḍhā pṛthivī sarvā mṛtyupāśavaśīkṛtā | duryodhanasya bāliśyānnaitadastīti cābruvan
वे कहने लगे — 'सारी पृथ्वी मोहग्रस्त होकर मृत्यु के पाश में बँध गई है; दुर्योधन की मूर्खता से यह (राष्ट्र) नहीं बचेगा।'
श्लोक 29 (5.137.29)
ततो निर्याय नगरात्प्रययौ पुरुषोत्तमः । मन्त्रयामास च तदा कर्णेन सुचिरं सह ॥
tato niryāya nagarātprayayau puruṣottamaḥ | mantrayāmāsa ca tadā karṇena suciraṃ saha
तब पुरुषोत्तम नगर से निकलकर आगे बढ़े, और उस समय बहुत देर तक कर्ण के साथ मन्त्रणा करते रहे।
श्लोक 30 (5.137.30)
विसर्जयित्वा राधेयं सर्वयादवनन्दनः । ततो जवेन महता तूर्णमश्वानचोदयत् ॥
visarjayitvā rādheyaṃ sarvayādavanandanaḥ | tato javena mahatā tūrṇamaśvānacodayat
फिर राधेय को विदा करके समस्त यादवों को आनन्द देने वाले श्रीकृष्ण ने बड़े वेग से घोड़ों को तेज़ी से हाँका।
श्लोक 31 (5.137.31)
ते पिबन्त इवाकाशं दारुकेण प्रचोदिताः । हया जग्मुर्महावेगा मनोमारुतरंहसः ॥
te pibanta ivākāśaṃ dārukeṇa pracoditāḥ | hayā jagmurmahāvegā manomārutaraṃhasaḥ
दारुक द्वारा हाँके गए वे घोड़े मन और वायु के समान वेग से, मानो आकाश को पीते हुए, बड़ी तेज़ी से दौड़े।
श्लोक 32 (5.137.32)
ते व्यतीत्य महाध्वानं क्षिप्रं श्येना इवाशुगाः । उच्चैर्जग्मुरुपप्लाव्यं शार्ङ्गधन्वानमावहन् ॥
te vyatītya mahādhvānaṃ kṣipraṃ śyenā ivāśugāḥ | uccairjagmurupaplāvyaṃ śārṅgadhanvānamāvahan
तेज़ उड़ने वाले बाज़ों की भाँति उस लम्बे मार्ग को शीघ्र पार करके वे घोड़े शार्ङ्गधनुषधारी श्रीकृष्ण को ऊँचे उपप्लव्य नगर तक ले आए।