उद्योग पर्व · अध्याय 166
भीष्म की रथी-गणना जारी: सुदक्षिण से कृप तक
भीष्म दुर्योधन के पक्ष के रथियों की गणना आगे बढ़ाते हैं — काम्बोजराज सुदक्षिण, माहिष्मती का नील, अवन्ती के विन्द और अनुविन्द, अर्जुन से वैर रखने वाले सत्यरथ के नेतृत्व में पाँचों त्रिगर्त भाई, तरुण लक्ष्मण और दुःशासन का पुत्र, दण्डधार, कोसल का बृहद्बल, और सरकण्डों से उत्पन्न कृप, जो अग्नि की भाँति शत्रुसेना में विचरेंगे।
भीष्म उवाच
श्लोक 1 (5.166.1)
सुदक्षिणस्तु काम्भोजो रथ एकगुणो मतः । तवार्थसिद्धिमाकाङ्क्षन्योत्स्यते समरे परैः ॥
sudakṣiṇastu kāmbhojo ratha ekaguṇo mataḥ | tavārthasiddhimākāṅkṣanyotsyate samare paraiḥ
काम्बोजराज सुदक्षिण एक रथी के बराबर माना गया है। तुम्हारे प्रयोजन की सिद्धि चाहते हुए वह संग्राम में शत्रुओं से लड़ेगा।
श्लोक 2 (5.166.2)
एतस्य रथसिंहस्य तवार्थे राजसत्तम । पराक्रमं यथेन्द्रस्य द्रक्ष्यन्ति कुरवो युधि ॥
etasya rathasiṃhasya tavārthe rājasattama | parākramaṃ yathendrasya drakṣyanti kuravo yudhi
हे राजश्रेष्ठ, कौरव युद्ध में तुम्हारे लिए इस रथियों में सिंह के समान वीर का इन्द्र-जैसा पराक्रम देखेंगे।
श्लोक 3 (5.166.3)
एतस्य रथवंशे हि तिग्मवेगप्रहारिणः । काम्भोजानां महाराज शलभानामिवायतिः ॥
etasya rathavaṃśe hi tigmavegaprahāriṇaḥ | kāmbhojānāṃ mahārāja śalabhānāmivāyatiḥ
महाराज, उसकी रथसेना में प्रचण्ड वेग से प्रहार करने वाले काम्बोज टिड्डियों के दल की भाँति उमड़ पड़ेंगे।
श्लोक 4 (5.166.4)
नीलो माहिष्मतीवासी नीलवर्मा रथस्तव । रथवंशेन कदनं शत्रूणां वै करिष्यति ॥
nīlo māhiṣmatīvāsī nīlavarmā rathastava | rathavaṃśena kadanaṃ śatrūṇāṃ vai kariṣyati
माहिष्मती का निवासी, नीला कवच धारण करने वाला नील तुम्हारा रथी है; वह अपनी रथसेना से शत्रुओं का संहार करेगा।
श्लोक 5 (5.166.5)
कृतवैरः पुरा चैव सहदेवेन मारिष । योत्स्यते सततं राजंस्तवार्थे कुरुनन्दन ॥
kṛtavairaḥ purā caiva sahadevena māriṣa | yotsyate satataṃ rājaṃstavārthe kurunandana
मान्यवर, सहदेव से उसका पुराना वैर है; हे कुरुनन्दन राजन्, वह तुम्हारे लिए निरन्तर लड़ेगा।
श्लोक 6 (5.166.6)
विन्दानुविन्दावावन्त्यौ संमतौ रथसत्तमौ । कृतिनौ समरे तात दृढवीर्यपराक्रमौ ॥
vindānuvindāvāvantyau saṃmatau rathasattamau | kṛtinau samare tāta dṛḍhavīryaparākramau
तात, अवन्ती के विन्द और अनुविन्द श्रेष्ठ रथी माने जाते हैं; वे युद्ध में कुशल और दृढ़ बल-पराक्रम वाले हैं।
श्लोक 7 (5.166.7)
एतौ तौ पुरुषव्याघ्रौ रिपुसैन्यं प्रधक्ष्यतः । गदाप्रासासिनाराचैस्तोमरैश्च करच्युतैः ॥
etau tau puruṣavyāghrau ripusainyaṃ pradhakṣyataḥ | gadāprāsāsinārācaistomaraiśca karacyutaiḥ
ये दोनों पुरुषसिंह गदा, प्रास, तलवार, नाराच और हाथ से फेंके गए तोमरों से शत्रुसेना को भस्म कर देंगे,
श्लोक 8 (5.166.8)
युद्धाभिकामौ समरे क्रीडन्ताविव यूथपौ । यूथमध्ये महाराज विचरन्तौ कृतान्तवत् ॥
yuddhābhikāmau samare krīḍantāviva yūthapau | yūthamadhye mahārāja vicarantau kṛtāntavat
महाराज, युद्ध के इच्छुक वे दोनों रणभूमि में दो यूथपति गजराजों की भाँति क्रीड़ा करते हुए सेना के बीच यमराज के समान विचरेंगे।
श्लोक 9 (5.166.9)
त्रिगर्ता भ्रातरः पञ्च रथोदारा मता मम । कृतवैराश्च पार्थैस्ते विराटनगरे तदा ॥
trigartā bhrātaraḥ pañca rathodārā matā mama | kṛtavairāśca pārthaiste virāṭanagare tadā
त्रिगर्तों के पाँचों भाइयों को मैं श्रेष्ठ रथी मानता हूँ; उस समय विराटनगर में पार्थों से उनका वैर हो गया था।
श्लोक 10 (5.166.10)
मकरा इव राजेन्द्र समुद्धततरङ्गिणीम् । गङ्गां विक्षोभयिष्यन्ति पार्थानां युधि वाहिनीम् ॥
makarā iva rājendra samuddhatataraṅgiṇīm | gaṅgāṃ vikṣobhayiṣyanti pārthānāṃ yudhi vāhinīm
हे राजेन्द्र, जैसे मगरमच्छ ऊँची लहरों वाली गंगा को मथ डालते हैं, वैसे ही वे युद्ध में पार्थों की सेना को क्षुब्ध कर देंगे।
श्लोक 11 (5.166.11)
ते रथाः पञ्च राजेन्द्र येषां सत्यरथो मुखम् । एते योत्स्यन्ति सङ्ग्रामे संस्मरन्तः पुराकृतम् ॥
te rathāḥ pañca rājendra yeṣāṃ satyaratho mukham | ete yotsyanti saṅgrāme saṃsmarantaḥ purākṛtam
हे राजेन्द्र, सत्यरथ जिनका अगुआ है, वे पाँचों रथी पहले किए गए अपकार को याद करते हुए संग्राम में लड़ेंगे —
श्लोक 12 (5.166.12)
व्यलीकं पाण्डवेयेन भीमसेनानुजेन ह । दिशो विजयता राजञ्श्वेतवाहेन भारत ॥
vyalīkaṃ pāṇḍaveyena bhīmasenānujena ha | diśo vijayatā rājañśvetavāhena bhārata
हे भारत राजन्, वह अपकार जो दिग्विजय करते समय भीमसेन के छोटे भाई, श्वेत घोड़ों वाले पाण्डुपुत्र (अर्जुन) ने उनके साथ किया था।
श्लोक 13 (5.166.13)
ते हनिष्यन्ति पार्थानां तानासाद्य महारथान् । वरान्वरान्महेष्वासान्क्षत्रियाणां धुरंधरान् ॥
te haniṣyanti pārthānāṃ tānāsādya mahārathān | varānvarānmaheṣvāsānkṣatriyāṇāṃ dhuraṃdharān
वे पार्थों के महारथियों से भिड़कर उनके श्रेष्ठ से श्रेष्ठ महाधनुर्धरों को, जो क्षत्रियों में धुरन्धर हैं, मार डालेंगे।
श्लोक 14 (5.166.14)
लक्ष्मणस्तव पुत्रश्च तथा दुःशासनस्य च । उभौ तौ पुरुषव्याघ्रौ संग्रामेष्वपलायिनौ ॥
lakṣmaṇastava putraśca tathā duḥśāsanasya ca | ubhau tau puruṣavyāghrau saṃgrāmeṣvapalāyinau
तुम्हारा पुत्र लक्ष्मण और दुःशासन का पुत्र — दोनों पुरुषसिंह युद्ध में कभी पीठ नहीं दिखाते।
श्लोक 15 (5.166.15)
तरुणौ सुकुमारौ च राजपुत्रौ तरस्विनौ । युद्धानां च विशेषज्ञौ प्रणेतारौ च सर्वशः ॥
taruṇau sukumārau ca rājaputrau tarasvinau | yuddhānāṃ ca viśeṣajñau praṇetārau ca sarvaśaḥ
वे दोनों राजकुमार तरुण और सुकुमार होते हुए भी वेगशाली हैं; युद्धों की बारीकियाँ जानते हैं और सब प्रकार से नेतृत्व करने में समर्थ हैं।
श्लोक 16 (5.166.16)
रथौ तौ कुरुशार्दूल मतौ मे रथसत्तमौ । क्षत्रधर्मरतौ वीरौ महत्कर्म करिष्यतः ॥
rathau tau kuruśārdūla matau me rathasattamau | kṣatradharmaratau vīrau mahatkarma kariṣyataḥ
हे कुरुसिंह, उन दोनों को मैं श्रेष्ठ रथी मानता हूँ; क्षत्रियधर्म में रत वे वीर महान् पराक्रम करेंगे।
श्लोक 17 (5.166.17)
दण्डधारो महाराज रथ एको नरर्षभ । योत्स्यते तव सङ्ग्रामे स्वेन सैन्येन पालितः ॥
daṇḍadhāro mahārāja ratha eko nararṣabha | yotsyate tava saṅgrāme svena sainyena pālitaḥ
हे नरश्रेष्ठ महाराज, दण्डधार अकेला एक रथी है; वह अपनी सेना से सुरक्षित होकर तुम्हारे लिए संग्राम में लड़ेगा।
श्लोक 18 (5.166.18)
बृहद्बलस्तथा राजा कौसल्यो रथसत्तमः । रथो मम मतस्तात महावेगपराक्रमः ॥
bṛhadbalastathā rājā kausalyo rathasattamaḥ | ratho mama matastāta mahāvegaparākramaḥ
तात, कोसल के राजा बृहद्बल को, जो श्रेष्ठ रथी है, मैं भी रथी मानता हूँ; वह महान् वेग और पराक्रम वाला है।
श्लोक 19 (5.166.19)
एष योत्स्यति सङ्ग्रामे स्वान्बन्धून्संप्रहर्षयन् । उग्रायुधो महेष्वासो धार्तराष्ट्रहिते रतः ॥
eṣa yotsyati saṅgrāme svānbandhūnsaṃpraharṣayan | ugrāyudho maheṣvāso dhārtarāṣṭrahite rataḥ
उग्र आयुधों वाला, धृतराष्ट्रपुत्र के हित में लगा वह महाधनुर्धर अपने बन्धुओं को हर्षित करता हुआ संग्राम में लड़ेगा।
श्लोक 20 (5.166.20)
कृपः शारद्वतो राजन्रथयूथपयूथपः । प्रियान्प्राणान्परित्यज्य प्रधक्ष्यति रिपूंस्तव ॥
kṛpaḥ śāradvato rājanrathayūthapayūthapaḥ | priyānprāṇānparityajya pradhakṣyati ripūṃstava
राजन्, रथसमूहों के नायकों का नायक, शरद्वान् का पुत्र कृप अपने प्रिय प्राणों की परवाह छोड़कर तुम्हारे शत्रुओं को भस्म कर देगा।
श्लोक 21 (5.166.21)
गौतमस्य महर्षेर्य आचार्यस्य शरद्वतः । कार्तिकेय इवाजेयः शरस्तम्बात्सुतोऽभवत् ॥
gautamasya maharṣerya ācāryasya śaradvataḥ | kārtikeya ivājeyaḥ śarastambātsuto'bhavat
वह महर्षि आचार्य गौतम शरद्वान् का पुत्र है, जो कार्तिकेय की भाँति अजेय है और सरकण्डों के झुरमुट से उत्पन्न हुआ था।
श्लोक 22 (5.166.22)
एष सेनाः सुबहुला विविधायुधकार्मुकाः । अग्निवत्समरे तात चरिष्यति विनिर्दहन् ॥
eṣa senāḥ subahulā vividhāyudhakārmukāḥ | agnivatsamare tāta cariṣyati vinirdahan
तात, वह अग्नि की भाँति रणभूमि में विचरता हुआ नाना प्रकार के आयुधों और धनुषों से युक्त बहुसंख्यक सेनाओं को जला डालेगा।