उद्योग पर्व · अध्याय 167
भीष्म द्वारा अश्वत्थामा, द्रोण तथा अन्य कौरव योद्धाओं का मूल्यांकन
भीष्म दुर्योधन की सेना के योद्धाओं का मूल्यांकन जारी रखते हैं। शकुनि एक रथी है; अश्वत्थामा अद्वितीय योद्धा होकर भी अपने प्राणों से अत्यधिक प्रेम के कारण न रथी गिना जाता है न अतिरथी; द्रोण महान पराक्रम करेंगे, पर अर्जुन को कभी नहीं मारेंगे, जिसे वे पुत्र से भी बढ़कर मानते हैं। फिर भीष्म पौरव, सत्यश्रवा, वृषसेन, जलसन्ध, बाह्लीक, सेनापति सत्यवान्, राक्षस अलम्बुस और प्राग्ज्योतिष के राजा भगदत्त का मूल्यांकन करते हैं।
भीष्म उवाच
श्लोक 1 (5.167.1)
शकुनिर्मातुलस्तेऽसौ रथ एको नराधिप । प्रयुज्य पाण्डवैर्वैरं योत्स्यते नात्र संशयः ॥
śakunirmātulaste'sau ratha eko narādhipa | prayujya pāṇḍavairvairaṃ yotsyate nātra saṃśayaḥ
"हे नरेश, तुम्हारे मामा ये शकुनि एक रथी हैं। पाण्डवों से वैर ठानकर ये युद्ध करेंगे, इसमें कोई संदेह नहीं।
श्लोक 2 (5.167.2)
एतस्य सेना दुर्धर्षा समरे प्रतियायिनः । विकृतायुधभूयिष्ठा वायुवेगसमा जवे ॥
etasya senā durdharṣā samare pratiyāyinaḥ | vikṛtāyudhabhūyiṣṭhā vāyuvegasamā jave
शत्रु पर चढ़ाई करने वाले इस योद्धा की सेना युद्ध में दुर्जेय है; उसमें विचित्र अस्त्र-शस्त्रों की भरमार है और वह वायु के वेग के समान तीव्र चलती है।
श्लोक 3 (5.167.3)
द्रोणपुत्रो महेष्वासः सर्वानेवातिधन्विनः । समरे चित्रयोधी च दृढास्त्रश्च महारथः ॥
droṇaputro maheṣvāsaḥ sarvānevātidhanvinaḥ | samare citrayodhī ca dṛḍhāstraśca mahārathaḥ
द्रोणपुत्र अश्वत्थामा महान धनुर्धर है, सब धनुर्धारियों से बढ़कर है; वह युद्ध में विचित्र ढंग से लड़ने वाला, अस्त्रों में दृढ़ और महारथी है।
श्लोक 4 (5.167.4)
एतस्य हि महाराज यथा गाण्डीवधन्वनः । शरासनविनिर्मुक्ताः संसक्ता यान्ति सायकाः ॥
etasya hi mahārāja yathā gāṇḍīvadhanvanaḥ | śarāsanavinirmuktāḥ saṃsaktā yānti sāyakāḥ
हे महाराज, गाण्डीवधारी अर्जुन की भाँति इसके धनुष से छूटे बाण भी एक-दूसरे से सटे हुए लगातार चलते हैं।
श्लोक 5 (5.167.5)
नैष शक्यो मया वीरः संख्यातुं रथसत्तमः । निर्दहेदपि लोकांस्त्रीनिच्छन्नेष महारथः ॥
naiṣa śakyo mayā vīraḥ saṃkhyātuṃ rathasattamaḥ | nirdahedapi lokāṃstrīnicchanneṣa mahārathaḥ
इस वीर, रथियों में श्रेष्ठ योद्धा की गणना मैं नहीं कर सकता; यह महारथी चाहे तो तीनों लोकों को भी भस्म कर दे।
श्लोक 6 (5.167.6)
क्रोधस्तेजश्च तपसा संभृतोऽऽश्रमवासिनाम् । द्रोणेनानुगृहीतश्च दिव्यैरस्त्रैरुदारधीः ॥
krodhastejaśca tapasā saṃbhṛto''śramavāsinām | droṇenānugṛhītaśca divyairastrairudāradhīḥ
आश्रमवासी ऋषियों का क्रोध और तेज तपस्या के द्वारा इसमें संचित है; और यह उदार बुद्धि वाला वीर द्रोण से दिव्य अस्त्रों का अनुग्रह पा चुका है।
श्लोक 7 (5.167.7)
दोषस्त्वस्य महानेको येनैव भरतर्षभ । न मे रथो नातिरथो मतः पार्थिवसत्तम ॥
doṣastvasya mahāneko yenaiva bharatarṣabha | na me ratho nātiratho mataḥ pārthivasattama
परन्तु हे भरतश्रेष्ठ, इसमें एक बड़ा दोष है, जिसके कारण हे राजश्रेष्ठ, मैं इसे न रथी मानता हूँ, न अतिरथी —
श्लोक 8 (5.167.8)
जीवितं प्रियमत्यर्थमायुष्कामः सदा द्विजः । न ह्यस्य सदृशः कश्चिदुभयोः सेनयोरपि ॥
jīvitaṃ priyamatyarthamāyuṣkāmaḥ sadā dvijaḥ | na hyasya sadṛśaḥ kaścidubhayoḥ senayorapi
यह ब्राह्मण अपने जीवन को अत्यन्त प्रिय मानता है और सदा दीर्घायु चाहता है। फिर भी दोनों सेनाओं में इसके समान कोई नहीं है।
श्लोक 9 (5.167.9)
हन्यादेकरथेनैव देवानामपि वाहिनीम् । वपुष्मांस्तलघोषेण स्फोटयेदपि पर्वतान् ॥
hanyādekarathenaiva devānāmapi vāhinīm | vapuṣmāṃstalaghoṣeṇa sphoṭayedapi parvatān
वह अकेले रथ से देवताओं की सेना का भी संहार कर सकता है; यह विशालकाय वीर हथेली की थाप के शब्द से पर्वतों को भी फोड़ सकता है।
श्लोक 10 (5.167.10)
असंख्येयगुणो वीरः प्रहन्ता दारुणद्युतिः । दण्डपाणिरिवासह्यः कालवत्प्रचरिष्यति ॥
asaṃkhyeyaguṇo vīraḥ prahantā dāruṇadyutiḥ | daṇḍapāṇirivāsahyaḥ kālavatpracariṣyati
असंख्य गुणों वाला यह वीर, भयंकर तेज से युक्त प्रहार करने वाला, दण्डधारी यम के समान असह्य है; यह काल के समान रणभूमि में विचरेगा।
श्लोक 11 (5.167.11)
युगान्ताग्निसमः क्रोधात्सिंहग्रीवो महाद्युतिः । एष भारत युद्धस्य पृष्ठं संशमयिष्यति ॥
yugāntāgnisamaḥ krodhātsiṃhagrīvo mahādyutiḥ | eṣa bhārata yuddhasya pṛṣṭhaṃ saṃśamayiṣyati
क्रोध में यह प्रलयकाल की अग्नि के समान है, सिंह जैसी ग्रीवा वाला और महातेजस्वी है; हे भारत, यह युद्ध के शेष भाग को समाप्त कर देगा।
श्लोक 12 (5.167.12)
पिता त्वस्य महातेजा वृद्धोऽपि युवभिर्वरः । रणे कर्म महत्कर्ता अत्र मे नास्ति संशयः ॥
pitā tvasya mahātejā vṛddho'pi yuvabhirvaraḥ | raṇe karma mahatkartā atra me nāsti saṃśayaḥ
इसके पिता महातेजस्वी हैं; वृद्ध होकर भी वे युवकों से श्रेष्ठ हैं। वे युद्ध में महान कर्म करेंगे, इसमें मुझे कोई संदेह नहीं।
श्लोक 13 (5.167.13)
अस्त्रवेगानिलोद्भूतः सेनाकक्षेन्धनोत्थितः । पाण्डुपुत्रस्य सैन्यानि प्रधक्ष्यति रणे धृतः ॥
astravegānilodbhūtaḥ senākakṣendhanotthitaḥ | pāṇḍuputrasya sainyāni pradhakṣyati raṇe dhṛtaḥ
अस्त्रों के वेग रूपी वायु से भड़की और सेना रूपी सूखी घास-लकड़ी से उठी अग्नि के समान, रण में डटे हुए वे पाण्डुपुत्र की सेनाओं को जला डालेंगे।
श्लोक 14 (5.167.14)
रथयूथपयूथानां यूथपोऽयं नरर्षभः । भरद्वाजात्मजः कर्ता कर्म तीव्रं हितं तव ॥
rathayūthapayūthānāṃ yūthapo'yaṃ nararṣabhaḥ | bharadvājātmajaḥ kartā karma tīvraṃ hitaṃ tava
रथ-समूहों के नायकों के भी नायक, ये नरश्रेष्ठ भरद्वाजपुत्र द्रोण तुम्हारे हित के लिए उग्र कर्म करेंगे।
श्लोक 15 (5.167.15)
सर्वमूर्धाभिषिक्तानामाचार्यः स्थविरो गुरुः । गच्छेदन्तं सृञ्जयानां प्रियस्त्वस्य धनञ्जयः ॥
sarvamūrdhābhiṣiktānāmācāryaḥ sthaviro guruḥ | gacchedantaṃ sṛñjayānāṃ priyastvasya dhanañjayaḥ
सभी अभिषिक्त राजाओं के आचार्य, ये वृद्ध गुरु सृंजयों का अन्त कर सकते हैं; परन्तु धनञ्जय इन्हें प्रिय है।
श्लोक 16 (5.167.16)
नैष जातु महेष्वासः पार्थमक्लिष्टकारिणम् । हन्यादाचार्यकं दीप्तं संस्मृत्य गुणनिर्जितम् ॥
naiṣa jātu maheṣvāsaḥ pārthamakliṣṭakāriṇam | hanyādācāryakaṃ dīptaṃ saṃsmṛtya guṇanirjitam
अपने उज्ज्वल आचार्यत्व का स्मरण करके, अर्जुन के गुणों से वशीभूत ये महाधनुर्धर अनथक पराक्रमी पार्थ को कभी नहीं मारेंगे।
श्लोक 17 (5.167.17)
श्लाघते यं सदा वीर पार्थस्य गुणविस्तरैः । पुत्रादभ्यधिकं चैनं भारद्वाजोऽनुपश्यति ॥
ślāghate yaṃ sadā vīra pārthasya guṇavistaraiḥ | putrādabhyadhikaṃ cainaṃ bhāradvājo'nupaśyati
हे वीर, वे सदा पार्थ के विस्तृत गुणों के कारण उसकी प्रशंसा करते हैं, और भरद्वाजपुत्र उसे अपने पुत्र से भी बढ़कर मानते हैं।
श्लोक 18 (5.167.18)
हन्यादेकरथेनैव देवगन्धर्वमानुषान् । एकीभूतानपि रणे दिव्यैरस्त्रैः प्रतापवान् ॥
hanyādekarathenaiva devagandharvamānuṣān | ekībhūtānapi raṇe divyairastraiḥ pratāpavān
यह प्रतापी वीर अकेले रथ से, दिव्य अस्त्रों द्वारा, एकत्र होकर आए देवताओं, गन्धर्वों और मनुष्यों का भी रण में संहार कर सकता है।
श्लोक 19 (5.167.19)
पौरवो राजशार्दूलस्तव राजन्महारथः । मतो मम रथोदारः परवीररथारुजः ॥
pauravo rājaśārdūlastava rājanmahārathaḥ | mato mama rathodāraḥ paravīrarathārujaḥ
हे राजन्, राजाओं में सिंह के समान पौरव तुम्हारा महारथी है; मैं उसे श्रेष्ठ रथी मानता हूँ, जो शत्रु वीरों के रथों को तोड़ डालता है।
श्लोक 20 (5.167.20)
स्वेन सैन्येन महता प्रतपञ्शत्रुवाहिनीम् । प्रधक्ष्यति स पाञ्चालान्कक्षमग्निगतिर्यथा ॥
svena sainyena mahatā pratapañśatruvāhinīm | pradhakṣyati sa pāñcālānkakṣamagnigatiryathā
अपनी विशाल सेना से शत्रु-सेना को संतप्त करता हुआ वह पांचालों को वैसे ही जला डालेगा जैसे सूखे घास-फूस में फैलती आग।
श्लोक 21 (5.167.21)
सत्यश्रवा रथस्त्वेको राजपुत्रो बृहद्बलः । तव राजन्रिपुबले कालवत्प्रचरिष्यति ॥
satyaśravā rathastveko rājaputro bṛhadbalaḥ | tava rājanripubale kālavatpracariṣyati
महाबली राजकुमार सत्यश्रवा एक रथी है; हे राजन्, वह तुम्हारे शत्रुओं की सेना में काल के समान विचरेगा।
श्लोक 22 (5.167.22)
एतस्य योधा राजेन्द्र विचित्रकवचायुधाः । विचरिष्यन्ति सङ्ग्रामे निघ्नन्तः शात्रवांस्तव ॥
etasya yodhā rājendra vicitrakavacāyudhāḥ | vicariṣyanti saṅgrāme nighnantaḥ śātravāṃstava
हे राजेन्द्र, विचित्र कवच और आयुध धारण करने वाले उसके योद्धा तुम्हारे शत्रुओं का संहार करते हुए संग्राम में विचरेंगे।
श्लोक 23 (5.167.23)
वृषसेनो रथस्तेऽग्र्यः कर्णपुत्रो महारथः । प्रधक्ष्यति रिपूणां ते बलं तु बलिनां वरः ॥
vṛṣaseno rathaste'gryaḥ karṇaputro mahārathaḥ | pradhakṣyati ripūṇāṃ te balaṃ tu balināṃ varaḥ
कर्णपुत्र वृषसेन तुम्हारा अग्रगण्य रथी और महारथी है; बलवानों में श्रेष्ठ वह तुम्हारे शत्रुओं की शक्ति को भस्म कर देगा।
श्लोक 24 (5.167.24)
जलसन्धो महातेजा राजन्रथवरस्तव । त्यक्ष्यते समरे प्राणान्माधवः परवीरहा ॥
jalasandho mahātejā rājanrathavarastava | tyakṣyate samare prāṇānmādhavaḥ paravīrahā
हे राजन्, महातेजस्वी जलसन्ध तुम्हारा श्रेष्ठ रथी है; शत्रु-वीरों का नाश करने वाला यह माधव युद्ध में अपने प्राण न्योछावर कर देगा।
श्लोक 25 (5.167.25)
एष योत्स्यति सङ्ग्रामे गजस्कन्धविशारदः । रथेन वा महाबाहुः क्षपयञ्शत्रुवाहिनीम् ॥
eṣa yotsyati saṅgrāme gajaskandhaviśāradaḥ | rathena vā mahābāhuḥ kṣapayañśatruvāhinīm
हाथी की पीठ पर से युद्ध करने में निपुण यह महाबाहु वीर संग्राम में लड़ेगा, अथवा रथ से लड़ते हुए शत्रु-सेना का नाश करेगा।
श्लोक 26 (5.167.26)
रथ एष महाराज मतो मे राजसत्तम । त्वदर्थे त्यक्ष्यते प्राणान्सहसैन्यो महारणे ॥
ratha eṣa mahārāja mato me rājasattama | tvadarthe tyakṣyate prāṇānsahasainyo mahāraṇe
हे महाराज, हे राजश्रेष्ठ, मैं इसे रथी मानता हूँ; तुम्हारे लिए यह अपनी सेना सहित महासमर में प्राण त्याग देगा।
श्लोक 27 (5.167.27)
एष विक्रान्तयोधी च चित्रयोधी च संगरे । वीतभीश्चापि ते राजञ्शत्रुभिः सह योत्स्यते ॥
eṣa vikrāntayodhī ca citrayodhī ca saṃgare | vītabhīścāpi te rājañśatrubhiḥ saha yotsyate
यह पराक्रम से लड़ने वाला और युद्ध में विचित्र रीति से लड़ने वाला है; हे राजन्, यह निर्भय होकर तुम्हारे शत्रुओं से युद्ध करेगा।
श्लोक 28 (5.167.28)
बाह्लीकोऽतिरथश्चैव समरे चानिवर्तनः । मम राजन्मतो युद्धे शूरो वैवस्वतोपमः ॥
bāhlīko'tirathaścaiva samare cānivartanaḥ | mama rājanmato yuddhe śūro vaivasvatopamaḥ
बाह्लीक अतिरथी है और युद्ध में कभी पीछे नहीं हटता; हे राजन्, मेरे मत में वह युद्ध में यमराज के समान शूरवीर है।
श्लोक 29 (5.167.29)
न ह्येष समरं प्राप्य निवर्तेत कथञ्चन । यथा सततगो राजन्स हि हन्यात्परान्रणे ॥
na hyeṣa samaraṃ prāpya nivarteta kathañcana | yathā satatago rājansa hi hanyātparānraṇe
युद्ध में उतरकर वह किसी भी प्रकार पीछे नहीं लौटेगा; हे राजन्, निरन्तर बहने वाली वायु के समान वह रण में शत्रुओं का संहार करेगा।
श्लोक 30 (5.167.30)
सेनापतिर्महाराज सत्यवांस्ते महारथः । रणेष्वद्भुतकर्मा च रथी पररथारुजः ॥
senāpatirmahārāja satyavāṃste mahārathaḥ | raṇeṣvadbhutakarmā ca rathī pararathārujaḥ
हे महाराज, तुम्हारा सेनापति सत्यवान् महारथी है; वह युद्धों में अद्भुत कर्म करने वाला और शत्रुओं के रथों को तोड़ने वाला रथी है।
श्लोक 31 (5.167.31)
एतस्य समरं दृष्ट्वा न व्यथास्ति कथञ्चन । उत्स्मयन्नुत्पतत्येष परान्रथपथे स्थितान् ॥
etasya samaraṃ dṛṣṭvā na vyathāsti kathañcana | utsmayannutpatatyeṣa parānrathapathe sthitān
युद्ध को देखकर उसे किसी प्रकार की व्यथा नहीं होती; वह हर्ष से मुस्कराता हुआ अपने रथ के मार्ग में खड़े शत्रुओं पर टूट पड़ता है।
श्लोक 32 (5.167.32)
एष चारिषु विक्रान्तः कर्म सत्पुरुषोचितम् । कर्ता विमर्दे सुमहत्त्वदर्थे पुरुषोत्तमः ॥
eṣa cāriṣu vikrāntaḥ karma satpuruṣocitam | kartā vimarde sumahattvadarthe puruṣottamaḥ
शत्रुओं के बीच पराक्रम दिखाने वाला यह पुरुषश्रेष्ठ तुम्हारे लिए युद्ध के घमासान में सत्पुरुषों के योग्य महान कर्म करेगा।
श्लोक 33 (5.167.33)
अलम्बुसो राक्षसेन्द्रः क्रूरकर्मा महारथः । हनिष्यति परान्राजन्पूर्ववैरमनुस्मरन् ॥
alambuso rākṣasendraḥ krūrakarmā mahārathaḥ | haniṣyati parānrājanpūrvavairamanusmaran
राक्षसराज अलम्बुस, क्रूर कर्म करने वाला महारथी, हे राजन्, अपने पुराने वैर को स्मरण करता हुआ शत्रुओं का वध करेगा।
श्लोक 34 (5.167.34)
एष राक्षससैन्यानां सर्वेषां रथसत्तमः । मायावी दृढवैरश्च समरे विचरिष्यति ॥
eṣa rākṣasasainyānāṃ sarveṣāṃ rathasattamaḥ | māyāvī dṛḍhavairaśca samare vicariṣyati
वह समस्त राक्षस-सेनाओं में श्रेष्ठ रथी है; मायावी और दृढ़ वैर रखने वाला वह युद्ध में विचरेगा।
श्लोक 35 (5.167.35)
प्राग्ज्योतिषाधिपो वीरो भगदत्तः प्रतापवान् । गजाङ्कुशधरश्रेष्ठो रथे चैव विशारदः ॥
prāgjyotiṣādhipo vīro bhagadattaḥ pratāpavān | gajāṅkuśadharaśreṣṭho rathe caiva viśāradaḥ
प्राग्ज्योतिष का स्वामी वीर और प्रतापी भगदत्त अंकुश धारण करने वालों में श्रेष्ठ है और रथ-युद्ध में भी निपुण है।
श्लोक 36 (5.167.36)
एतेन युद्धमभवत्पुरा गाण्डीवधन्वनः । दिवसान्सुबहून्राजन्नुभयोर्जयगृद्धिनोः ॥
etena yuddhamabhavatpurā gāṇḍīvadhanvanaḥ | divasānsubahūnrājannubhayorjayagṛddhinoḥ
हे राजन्, पूर्वकाल में इसका गाण्डीवधारी अर्जुन से युद्ध हुआ था, जो बहुत दिनों तक चला; दोनों ही विजय के इच्छुक थे।
श्लोक 37 (5.167.37)
ततः सखायं गान्धारे मानयन्पाकशासनम् । अकरोत्संविदं तेन पाण्डवेन महात्मना ॥
tataḥ sakhāyaṃ gāndhāre mānayanpākaśāsanam | akarotsaṃvidaṃ tena pāṇḍavena mahātmanā
हे गान्धारीपुत्र, तब अपने मित्र पाकशासन इन्द्र का मान रखते हुए उसने उस महात्मा पाण्डव से मैत्री की संधि कर ली।
श्लोक 38 (5.167.38)
एष योत्स्यति सङ्ग्रामे गजस्कन्धविशारदः । ऐरावतगतो राजा देवानामिव वासवः ॥
eṣa yotsyati saṅgrāme gajaskandhaviśāradaḥ | airāvatagato rājā devānāmiva vāsavaḥ
हाथी की पीठ से युद्ध करने में निपुण यह राजा संग्राम में वैसे ही लड़ेगा जैसे देवताओं में ऐरावत पर आरूढ़ इन्द्र।"