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उद्योग पर्व · अध्याय 168

भीष्म द्वारा कर्ण को अर्धरथी कहना और भीष्म के जीते-जी न लड़ने की कर्ण की प्रतिज्ञा

भीष्म गान्धार के दो भाइयों अचल और वृषक को रथी बताते हैं, फिर कहते हैं कि सहज कवच-कुण्डलों से वंचित और परशुराम तथा एक ब्राह्मण के शाप से ग्रस्त कर्ण केवल अर्धरथी है; द्रोण भी इससे सहमत होते हैं। आहत कर्ण भीष्म पर द्वेषवश फूट डालने का आरोप लगाता है, उन्हें सठियाया हुआ अर्धरथी कहता है और प्रतिज्ञा करता है कि भीष्म के जीते-जी वह युद्ध नहीं करेगा। भीष्म उत्तर देते हैं कि युद्ध की घड़ी में कलह से बचने के लिए ही वे कर्ण को छोड़ रहे हैं, अपने पराक्रम का स्मरण कराते हैं और उसे अर्जुन से लड़ने की चुनौती देते हैं। दुर्योधन दोनों को शान्त करता है और भीष्म से अनुरोध करता है कि प्रातःकाल युद्ध आरम्भ होने से पहले वे पाण्डव-पक्ष के योद्धाओं का मूल्यांकन सुनाएँ।

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भीष्म उवाच

श्लोक 1 (5.168.1)

अचलो वृषकश्चैव सहितौ भ्रातरावुभौ । रथौ तव दुराधर्षौ शत्रून्विध्वंसयिष्यतः ॥

acalo vṛṣakaścaiva sahitau bhrātarāvubhau | rathau tava durādharṣau śatrūnvidhvaṃsayiṣyataḥ

"अचल और वृषक, ये दोनों भाई साथ-साथ लड़ने वाले, तुम्हारे दो दुर्जेय रथी हैं; ये शत्रुओं का विध्वंस कर डालेंगे।

श्लोक 2 (5.168.2)

बलवन्तौ नरव्याघ्रौ दृढक्रोधौ प्रहारिणौ । गान्धारमुख्यौ तरुणौ दर्शनीयौ महाबलौ ॥

balavantau naravyāghrau dṛḍhakrodhau prahāriṇau | gāndhāramukhyau taruṇau darśanīyau mahābalau

ये बलवान, नरश्रेष्ठ, दृढ़ क्रोध वाले और प्रबल प्रहार करने वाले हैं; गान्धारों में प्रमुख, तरुण, दर्शनीय और महाबली हैं।

श्लोक 3 (5.168.3)

सखा ते दयितो नित्यं य एष रणकर्कशः । उत्साहयति राजंस्त्वां विग्रहे पाण्डवैः सह ॥

sakhā te dayito nityaṃ ya eṣa raṇakarkaśaḥ | utsāhayati rājaṃstvāṃ vigrahe pāṇḍavaiḥ saha

हे राजन्, तुम्हारा यह सदा का प्रिय मित्र, जो युद्ध में कठोर है और तुम्हें पाण्डवों से विग्रह करने के लिए उकसाता रहता है,

श्लोक 4 (5.168.4)

परुषः कत्थनो नीचः कर्णो वैकर्तनस्तव । मन्त्री नेता च बन्धुश्च मानी चात्यन्तमुच्छ्रितः ॥

paruṣaḥ katthano nīcaḥ karṇo vaikartanastava | mantrī netā ca bandhuśca mānī cātyantamucchritaḥ

कठोर बोलने वाला, डींग हाँकने वाला और नीच वैकर्तन कर्ण, जो तुम्हारा मन्त्री, नेता और बन्धु है, अभिमानी और अत्यन्त घमण्डी है,

श्लोक 5 (5.168.5)

एष नैव रथः पूर्णो न चाप्यतिरथो रणे । वियुक्तः कवचेनैष सहजेन विचेतनः ॥

eṣa naiva rathaḥ pūrṇo na cāpyatiratho raṇe | viyuktaḥ kavacenaiṣa sahajena vicetanaḥ

वह युद्ध में न पूरा रथी है, न अतिरथी। यह मूर्ख अपने जन्मजात कवच से वंचित हो चुका है,

श्लोक 6 (5.168.6)

कुण्डलाभ्यां च दिव्याभ्यां वियुक्तः सततं घृणी । अभिशापाच्च रामस्य ब्राह्मणस्य च भाषणात् ॥

kuṇḍalābhyāṃ ca divyābhyāṃ viyuktaḥ satataṃ ghṛṇī | abhiśāpācca rāmasya brāhmaṇasya ca bhāṣaṇāt

और दिव्य कुण्डलों से भी वंचित है, तथा सदा दूसरों की निन्दा करता है। परशुराम के शाप और ब्राह्मण के वचन के कारण,

श्लोक 7 (5.168.7)

करणानां वियोगाच्च तेन मेऽर्धरथो मतः । नैष फाल्गुनमासाद्य पुनर्जीवन्विमोक्ष्यते ॥

karaṇānāṃ viyogācca tena me'rdharatho mataḥ | naiṣa phālgunamāsādya punarjīvanvimokṣyate

तथा अपने सहज साधनों के छिन जाने के कारण मैं उसे अर्धरथी मानता हूँ। अर्जुन से भिड़कर वह जीवित नहीं छूटेगा।"

सञ्जय उवाच

श्लोक 8 (5.168.8)

ततोऽब्रवीत्पुनर्द्रोणः सर्वशस्त्रभृतां वरः । एवमेतद्यथाऽऽत्थ त्वं न मिथ्यास्ति कदाचन ॥

tato'bravītpunardroṇaḥ sarvaśastrabhṛtāṃ varaḥ | evametadyathā''ttha tvaṃ na mithyāsti kadācana

तब समस्त शस्त्रधारियों में श्रेष्ठ द्रोण ने फिर कहा — "आप जैसा कहते हैं, वैसा ही है; इसमें कुछ भी असत्य नहीं।

द्रोण उवाच

श्लोक 9 (5.168.9)

रणेरणेऽभिमानी च विमुखश्चापि दृश्यते । घृणी कर्णः प्रमादी च तेन मेऽर्धरथो मतः ॥

raṇeraṇe'bhimānī ca vimukhaścāpi dṛśyate | ghṛṇī karṇaḥ pramādī ca tena me'rdharatho mataḥ

वह हर युद्ध में अभिमान करता है, फिर भी पीठ दिखाता देखा जाता है; कर्ण निन्दक और प्रमादी है। इसीलिए मैं भी उसे अर्धरथी मानता हूँ।"

सञ्जय उवाच

श्लोक 10 (5.168.10)

एतच्छ्रुत्वा तु राधेयः क्रोधादुत्फाल्य लोचने । उवाच भीष्मं राधेयस्तुदन्वाग्भिः प्रतोदवत् ॥

etacchrutvā tu rādheyaḥ krodhādutphālya locane | uvāca bhīṣmaṃ rādheyastudanvāgbhiḥ pratodavat

यह सुनकर राधापुत्र कर्ण ने क्रोध से आँखें फाड़कर, अंकुश के समान वचनों से बेधते हुए भीष्म से कहा —

कर्ण उवाच

श्लोक 11 (5.168.11)

पितामह यथेष्टं मां वाक्शरैरुपकृन्तसि । अनागसं सदा द्वेषादेवमेव पदेपदे ॥

pitāmaha yatheṣṭaṃ māṃ vākśarairupakṛntasi | anāgasaṃ sadā dveṣādevameva padepade

"पितामह, आप द्वेषवश मुझ निरपराध को सदा, पग-पग पर इसी प्रकार मनमाने ढंग से वचन-रूपी बाणों से काटते रहते हैं।

श्लोक 12 (5.168.12)

मर्षयामि च तत्सर्वं दुर्योधनकृतेन वै । त्वं तु मां मन्यसे मन्दं यथा कापुरुषं तथा ॥

marṣayāmi ca tatsarvaṃ duryodhanakṛtena vai | tvaṃ tu māṃ manyase mandaṃ yathā kāpuruṣaṃ tathā

दुर्योधन के कार्य के लिए मैं यह सब सह लेता हूँ; पर आप मुझे कायर पुरुष की भाँति मन्द समझते हैं।

श्लोक 13 (5.168.13)

भवानर्धरथो मह्यं मतो वै नात्र संशयः । सर्वस्य जगतश्चैव गाङ्गेयो न मृषा वदेत् ॥

bhavānardharatho mahyaṃ mato vai nātra saṃśayaḥ | sarvasya jagataścaiva gāṅgeyo na mṛṣā vadet

"मेरे मत में तुम अर्धरथी हो, इसमें संदेह नहीं" — जब गंगापुत्र ऐसा कहेंगे, तो सारा संसार भी यही मानेगा कि वे झूठ नहीं बोलते।

श्लोक 14 (5.168.14)

कुरूणामहितो नित्यं न च राजाऽवबुध्यते । को हि नाम समानेषु राजसूदारकर्मसु ॥

kurūṇāmahito nityaṃ na ca rājā'vabudhyate | ko hi nāma samāneṣu rājasūdārakarmasu

आप सदा से कौरवों के अहितकारी हैं, और राजा यह समझ नहीं पाते। भला समान पद वाले, उदार कर्म करने वाले राजाओं में कौन ऐसा होगा

श्लोक 15 (5.168.15)

तेजोवधमिमं कुर्याद्विभेदयिषुराहवे । यथा त्वं गुणविद्वेषादपरागं चिकीर्षसि ॥

tejovadhamimaṃ kuryādvibhedayiṣurāhave | yathā tvaṃ guṇavidveṣādaparāgaṃ cikīrṣasi

जो युद्ध के समय फूट डालने की इच्छा से इस प्रकार योद्धाओं का तेज नष्ट करे, जैसे आप गुणों से द्वेष के कारण उनमें विरक्ति उत्पन्न करना चाहते हैं?

श्लोक 16 (5.168.16)

न हायनैर्न पलितैर्न वित्तैर्न च बन्धुभिः । महारथत्वं संख्यातुं शक्यं क्षत्रस्य कौरव ॥

na hāyanairna palitairna vittairna ca bandhubhiḥ | mahārathatvaṃ saṃkhyātuṃ śakyaṃ kṣatrasya kaurava

हे कौरव, क्षत्रिय का महारथी होना न आयु से, न पके बालों से, न धन से और न बन्धु-बान्धवों से आँका जा सकता है।

श्लोक 17 (5.168.17)

बलज्येष्ठं स्मृतं क्षत्रं मन्त्रज्येष्ठा द्विजातयः । धनज्येष्ठाः स्मृता वैश्याः शूद्रास्तु वयसाऽधिकाः ॥

balajyeṣṭhaṃ smṛtaṃ kṣatraṃ mantrajyeṣṭhā dvijātayaḥ | dhanajyeṣṭhāḥ smṛtā vaiśyāḥ śūdrāstu vayasā'dhikāḥ

क्षत्रियों में बल से, ब्राह्मणों में मन्त्र-ज्ञान से, वैश्यों में धन से और शूद्रों में आयु से बड़प्पन माना जाता है।

श्लोक 18 (5.168.18)

यथेच्छकं स्वयं ब्रूया रथानतिरथांस्तथा । कामद्वेषसमायुक्तो मोहात्प्रकुरुते भवान् ॥

yathecchakaṃ svayaṃ brūyā rathānatirathāṃstathā | kāmadveṣasamāyukto mohātprakurute bhavān

आप मनमाने ढंग से स्वयं ही रथियों और अतिरथियों का नाम ले लेते हैं; राग और द्वेष से भरे हुए आप मोहवश भेद करते हैं।

श्लोक 19 (5.168.19)

दुर्योधन महाबाहो साधु सम्यगवेक्ष्यताम् । त्यज्यतां दुष्टभावोऽयं भीष्मः किल्बिषकृत्तव ॥

duryodhana mahābāho sādhu samyagavekṣyatām | tyajyatāṃ duṣṭabhāvo'yaṃ bhīṣmaḥ kilbiṣakṛttava

हे महाबाहु दुर्योधन, इस पर भली-भाँति ठीक से विचार करो; दुष्ट भाव रखने वाले, तुम्हारा अनिष्ट करने वाले इस भीष्म को त्याग दो।

श्लोक 20 (5.168.20)

भिन्ना हि सेना नृपते दुःसन्धेया भवत्युत । मौला हि पुरुषव्याघ्र किमु नानासमुत्थिताः ॥

bhinnā hi senā nṛpate duḥsandheyā bhavatyuta | maulā hi puruṣavyāghra kimu nānāsamutthitāḥ

हे नरेश, एक बार फूटी हुई सेना फिर से जुड़ नहीं पाती; हे पुरुषसिंह, पीढ़ियों से सेवा करते आए सैनिक भी नहीं जुड़ते, फिर नाना स्थानों से जुटे सैनिकों का तो कहना ही क्या।

श्लोक 21 (5.168.21)

एषां द्वैधं समुत्पन्नं योधानां युधि भारत । तेजोवधो नः क्रियते प्रत्यक्षेण विशेषतः ॥

eṣāṃ dvaidhaṃ samutpannaṃ yodhānāṃ yudhi bhārata | tejovadho naḥ kriyate pratyakṣeṇa viśeṣataḥ

हे भारत, युद्ध के समय इन योद्धाओं में फूट पैदा हो गई है; और विशेष रूप से हमारा तेज खुले रूप में नष्ट किया जा रहा है।

श्लोक 22 (5.168.22)

रथानां क्वच विज्ञानं क्वच भीष्मोऽल्पचेतनः । अहमावारयिष्यामि पाण्डवानामनीकिनीम् ॥

rathānāṃ kvaca vijñānaṃ kvaca bhīṣmo'lpacetanaḥ | ahamāvārayiṣyāmi pāṇḍavānāmanīkinīm

कहाँ रथियों का ज्ञान और कहाँ यह मन्दबुद्धि भीष्म! पाण्डवों की सेना को मैं रोकूँगा।

श्लोक 23 (5.168.23)

आसाद्य माममोघेषुं गमिष्यन्ति दिशो दश । पाण्डवाः सहपञ्चालाः शार्दूलं वृषभा इव ॥

āsādya māmamogheṣuṃ gamiṣyanti diśo daśa | pāṇḍavāḥ sahapañcālāḥ śārdūlaṃ vṛṣabhā iva

मुझ अमोघ बाणों वाले से भिड़कर पांचालों सहित पाण्डव दसों दिशाओं में भाग जाएँगे, जैसे बाघ से सामना होने पर बैल भागते हैं।

श्लोक 24 (5.168.24)

क्वच युद्धं विमर्दो वा मन्त्रे सुव्याहृतानि च । क्वचभीष्मो गतवयामन्दात्मा कालचोदितः ॥

kvaca yuddhaṃ vimardo vā mantre suvyāhṛtāni ca | kvacabhīṣmo gatavayāmandātmā kālacoditaḥ

कहाँ युद्ध और घमासान, कहाँ मन्त्रणा के सुविचारित वचन, और कहाँ यह ढलती आयु वाला, मन्दबुद्धि, काल का प्रेरित भीष्म!

श्लोक 25 (5.168.25)

एकाकी स्पर्धति नित्यं सर्वेण जगता सह । न चान्यं पुरुषं कंचिन्मन्यते मोघदर्शनः ॥

ekākī spardhati nityaṃ sarveṇa jagatā saha | na cānyaṃ puruṣaṃ kaṃcinmanyate moghadarśanaḥ

यह अकेला ही सदा सारे संसार से होड़ करता है और किसी दूसरे पुरुष को कुछ नहीं समझता; इसकी दृष्टि ही मिथ्या है।

श्लोक 26 (5.168.26)

श्रोतव्यं खलु वृद्धानामिति शास्त्रनिदर्शनम् । न त्वेव ह्यतिवृद्धानां पुनर्बालाहि ते मताः ॥

śrotavyaṃ khalu vṛddhānāmiti śāstranidarśanam | na tveva hyativṛddhānāṃ punarbālāhi te matāḥ

शास्त्र का उपदेश है कि वृद्धों की बात सुननी चाहिए; पर अति-वृद्धों की नहीं, क्योंकि वे फिर से बालक के समान माने जाते हैं।

श्लोक 27 (5.168.27)

अहमेको हनिष्यामि पाण्डवानामनीकिनीम् । सुयुद्धे राजशार्दूल यशो भीष्मं गमिष्यति ॥

ahameko haniṣyāmi pāṇḍavānāmanīkinīm | suyuddhe rājaśārdūla yaśo bhīṣmaṃ gamiṣyati

मैं अकेला ही पाण्डवों की सेना का संहार कर दूँगा। पर हे राजसिंह, युद्ध अच्छा होने पर भी यश भीष्म को ही मिलेगा।

श्लोक 28 (5.168.28)

कृतः सेनापतिस्त्वेष त्वया भीष्मो नराधिप । सेनापतौ यशो गन्ता न तु योधान्कथञ्चन ॥

kṛtaḥ senāpatistveṣa tvayā bhīṣmo narādhipa | senāpatau yaśo gantā na tu yodhānkathañcana

हे नरेश, तुमने इसी भीष्म को सेनापति बनाया है; यश सेनापति को मिलता है, योद्धाओं को कभी नहीं।

श्लोक 29 (5.168.29)

नाहं जीवति गाङ्गेये योत्स्ये राजन्कथञ्चन । हते भीष्मे तु योद्धाऽस्मि सर्वैरेव महारथैः ॥

nāhaṃ jīvati gāṅgeye yotsye rājankathañcana | hate bhīṣme tu yoddhā'smi sarvaireva mahārathaiḥ

हे राजन्, गंगापुत्र के जीते-जी मैं किसी भी प्रकार युद्ध नहीं करूँगा; भीष्म के मारे जाने पर ही मैं सब महारथियों के साथ युद्ध करूँगा।"

भीष्म उवाच

श्लोक 30 (5.168.30)

समुद्यतोऽयं भारो मे सुमहान्सागरोपमः । धार्तराष्ट्रस्य संग्रामे वर्षपूगाभिचिन्तितः ॥

samudyato'yaṃ bhāro me sumahānsāgaropamaḥ | dhārtarāṣṭrasya saṃgrāme varṣapūgābhicintitaḥ

"सागर के समान यह विशाल भार मैंने उठाया है — धृतराष्ट्रपुत्र का यह युद्ध, जिस पर मैं वर्षों से विचार करता आया हूँ।

श्लोक 31 (5.168.31)

तस्मिन्नभ्यागते काले प्रतप्ते रोमहर्षणे । मिथो भेदो न मे कार्यस्तेन जीवसि सूतज ॥

tasminnabhyāgate kāle pratapte romaharṣaṇe | mitho bhedo na me kāryastena jīvasi sūtaja

अब जब वह भयंकर, रोमांचकारी घड़ी आ पहुँची है, तब मुझे आपस में फूट नहीं डालनी है; इसीलिए, हे सूतपुत्र, तू जीवित है।

श्लोक 32 (5.168.32)

न ह्यहं त्वद्य विक्रम्य स्थविरोऽपि शिशोस्तव । युद्धश्रद्धामहं छिन्द्यां जीवितस्य च सूतज ॥

na hyahaṃ tvadya vikramya sthaviro'pi śiśostava | yuddhaśraddhāmahaṃ chindyāṃ jīvitasya ca sūtaja

इसी कारण, हे सूतपुत्र, वृद्ध होते हुए भी मैं आज पराक्रम करके तुझ बालक की युद्ध की लालसा और साथ ही तेरा जीवन नहीं काट डालता।

श्लोक 33 (5.168.33)

जामदग्न्येन रामेण महास्त्राणि विमुञ्चता । न मे व्यथा कृता काचित्त्वं तु मे किं करिष्यसि ॥

jāmadagnyena rāmeṇa mahāstrāṇi vimuñcatā | na me vyathā kṛtā kācittvaṃ tu me kiṃ kariṣyasi

जमदग्निपुत्र परशुराम ने महान अस्त्र छोड़कर भी मुझे कोई व्यथा नहीं पहुँचाई; फिर तू मेरा क्या कर लेगा?

श्लोक 34 (5.168.34)

कामं नैतत्प्रशंसन्ति सन्तः स्वबलसंस्तवम् । वक्ष्यामि तु त्वां सन्तप्तो निहीन कुलपांसन ॥

kāmaṃ naitatpraśaṃsanti santaḥ svabalasaṃstavam | vakṣyāmi tu tvāṃ santapto nihīna kulapāṃsana

यह सच है कि सज्जन अपने बल की प्रशंसा को अच्छा नहीं मानते; फिर भी, हे नीच कुलकलंक, क्रोध से संतप्त होकर मैं तुझसे कहूँगा।

श्लोक 35 (5.168.35)

समेतं पार्थिवं क्षत्रं काशिराजस्वयंवरे । निर्जित्यैकरथेनैव याः कन्यास्तरसाहृताः ॥

sametaṃ pārthivaṃ kṣatraṃ kāśirājasvayaṃvare | nirjityaikarathenaiva yāḥ kanyāstarasāhṛtāḥ

काशिराज के स्वयंवर में एकत्र हुए सारे क्षत्रिय राजाओं को मैंने अकेले रथ से जीतकर कन्याओं का बलपूर्वक हरण किया था।

श्लोक 36 (5.168.36)

ईदृशानां सहस्राणि विशिष्टानामथो पुनः । मयैकेन निरस्तानि ससैन्यानि रणाजिरे ॥

īdṛśānāṃ sahasrāṇi viśiṣṭānāmatho punaḥ | mayaikena nirastāni sasainyāni raṇājire

ऐसे और इनसे भी श्रेष्ठ हजारों योद्धाओं को मैंने अकेले ही उनकी सेनाओं सहित रणभूमि से खदेड़ दिया था।

श्लोक 37 (5.168.37)

त्वां प्राप्य वैरपुरुषं कुरूणामनयो महान् । उपस्थितो विनाशाय यतस्व पुरुषो भव ॥

tvāṃ prāpya vairapuruṣaṃ kurūṇāmanayo mahān | upasthito vināśāya yatasva puruṣo bhava

तुझ जैसे वैर के मूल पुरुष को पाकर कौरवों पर उनके विनाश के लिए बड़ा अनर्थ आ खड़ा हुआ है। अब प्रयत्न कर और पुरुष बन!

श्लोक 38 (5.168.38)

युध्यस्व समरे पार्थं येन विस्पर्धसे सह । द्रक्ष्यामि त्वां विनिर्मुक्तमस्माद्युद्धात्सुदुर्मते ॥

yudhyasva samare pārthaṃ yena vispardhase saha | drakṣyāmi tvāṃ vinirmuktamasmādyuddhātsudurmate

जिस पार्थ से तू होड़ करता है, उससे युद्ध में लड़; हे दुर्बुद्धि, मैं देखूँगा कि तू उस युद्ध से बचकर निकलता है या नहीं।"

सञ्जय उवाच

श्लोक 39 (5.168.39)

तमुवाच ततो राजा धार्तराष्ट्रः प्रतापवान् । मां समीक्षस्व गाङ्गेय कार्यं हि महदुद्यतम् ॥

tamuvāca tato rājā dhārtarāṣṭraḥ pratāpavān | māṃ samīkṣasva gāṅgeya kāryaṃ hi mahadudyatam

तब प्रतापी राजा धृतराष्ट्रपुत्र दुर्योधन ने उनसे कहा — "हे गंगापुत्र, मेरी ओर देखिए; एक महान कार्य सामने उपस्थित है।

दुर्योधन उवाच

श्लोक 40 (5.168.40)

चिन्त्यतामिदमेकाग्रं मम निःश्रेयसं परम् । उभावपि भवन्तौ मे महत्कर्म करिष्यतः ॥

cintyatāmidamekāgraṃ mama niḥśreyasaṃ param | ubhāvapi bhavantau me mahatkarma kariṣyataḥ

एकाग्र होकर केवल इसी पर विचार कीजिए कि मेरा परम कल्याण किसमें है। आप दोनों ही मेरे लिए महान कार्य करेंगे।

श्लोक 41 (5.168.41)

भूयश्च श्रोतुमिच्छामि परेषां रथसत्तमान् । ये चैवातिरथास्तत्र ये चैव रथयूथपाः ॥

bhūyaśca śrotumicchāmi pareṣāṃ rathasattamān | ye caivātirathāstatra ye caiva rathayūthapāḥ

और मैं शत्रुओं के श्रेष्ठ रथियों के विषय में भी सुनना चाहता हूँ — उनमें कौन अतिरथी हैं और कौन रथ-समूहों के नायक हैं।

श्लोक 42 (5.168.42)

बलाबलममित्राणां श्रोतुमिच्छामि कौरव । प्रभातायां रजन्यां वै इदं युद्धं भविष्यति ॥

balābalamamitrāṇāṃ śrotumicchāmi kaurava | prabhātāyāṃ rajanyāṃ vai idaṃ yuddhaṃ bhaviṣyati

हे कौरव, मैं शत्रुओं का बलाबल सुनना चाहता हूँ; क्योंकि इस रात के बीतते ही प्रभात में यह युद्ध आरम्भ होगा।"

अध्याय 167अध्याय-सूचीअध्याय 169