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उद्योग पर्व · अध्याय 172

शिखण्डी से न लड़ने की भीष्म की प्रतिज्ञा

भीष्म रोचमान, पुरुजित् कुन्तिभोज और भीम के पुत्र घटोत्कच के साथ पाण्डव योद्धाओं की गणना पूरी करते हैं और कहते हैं कि वे विजय या मृत्यु की कामना से उन सबका, श्रीकृष्ण और अर्जुन का भी, सामना करेंगे। परन्तु वे शिखण्डी पर प्रहार नहीं करेंगे — पिता के प्रिय के लिए राज्य त्यागकर आजीवन ब्रह्मचर्य का व्रत लेने वाले भीष्म कभी स्त्री को या पहले स्त्री रहे व्यक्ति को नहीं मारेंगे, और शिखण्डी कन्या के रूप में जन्मा था। इसी के साथ रथातिरथसंख्यान पर्व समाप्त होता है।

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भीष्म उवाच

श्लोक 1 (5.172.1)

रोचमानो महाराज पाण्डवानां महारथः । योत्स्यतेऽमरवत्संख्ये परसैन्येषु भारत ॥

rocamāno mahārāja pāṇḍavānāṃ mahārathaḥ | yotsyate'maravatsaṃkhye parasainyeṣu bhārata

हे महाराज, पाण्डवों का महारथी रोचमान, हे भारत, युद्ध में शत्रुसेनाओं से देवता के समान लड़ेगा।

श्लोक 2 (5.172.2)

पुरुजित्कुन्तिभोजश्च महेष्वासो महाबलः । मातुलो भीमसेनस्य स च मेऽतिरथो मतः ॥

purujitkuntibhojaśca maheṣvāso mahābalaḥ | mātulo bhīmasenasya sa ca me'tiratho mataḥ

महाबली महाधनुर्धर पुरुजित् कुन्तिभोज, जो भीमसेन का मामा है — उसे भी मैं अतिरथी मानता हूँ।

श्लोक 3 (5.172.3)

एष वीरो महेष्वासः कृती च निपुणश्च ह । चित्रयोधी च शक्तश्च मतो मे रथपुङ्गवः ॥

eṣa vīro maheṣvāsaḥ kṛtī ca nipuṇaśca ha | citrayodhī ca śaktaśca mato me rathapuṅgavaḥ

यह वीर महाधनुर्धर, कुशल और निपुण है, विचित्र युद्ध करने वाला और समर्थ है; मैं उसे रथियों में श्रेष्ठ मानता हूँ।

श्लोक 4 (5.172.4)

स योत्स्यति हि विक्रम्य मघवानिव दानवैः । योधा ये चास्य विख्याताः सर्वे युद्धविशारदाः ॥

sa yotsyati hi vikramya maghavāniva dānavaiḥ | yodhā ye cāsya vikhyātāḥ sarve yuddhaviśāradāḥ

वह दानवों से लड़ते इन्द्र के समान पराक्रम दिखाकर लड़ेगा, और उसके प्रसिद्ध योद्धा भी, जो सब युद्ध में निपुण हैं।

श्लोक 5 (5.172.5)

भागिनेयकृते वीरः स करिष्यति संगरे । सुमहत्कर्म पाण्डूनां स्थितः प्रियहिते रतः ॥

bhāgineyakṛte vīraḥ sa kariṣyati saṃgare | sumahatkarma pāṇḍūnāṃ sthitaḥ priyahite rataḥ

वह वीर अपने भानजों के लिए युद्ध में महान् पराक्रम करेगा, पाण्डवों के पक्ष में डटा रहकर और उनके प्रिय और हित में लगा रहकर।

श्लोक 6 (5.172.6)

भैमसेनिर्महाराज हैडिम्बो राक्षसेश्वरः । मतो मे बहुमायावी रथयूथपयूथपः ॥

bhaimasenirmahārāja haiḍimbo rākṣaseśvaraḥ | mato me bahumāyāvī rathayūthapayūthapaḥ

हे महाराज, भीमसेन का पुत्र, हिडिम्बा से उत्पन्न राक्षसराज घटोत्कच, जो अनेक मायाओं का ज्ञाता है, मेरे मत में रथसमूहों के नायकों का भी नायक है।

श्लोक 7 (5.172.7)

योत्स्यते समरे तात मायावी समरप्रियः । ये चास्य राक्षसा वीराः सचिवा वशवर्तिनः ॥

yotsyate samare tāta māyāvī samarapriyaḥ | ye cāsya rākṣasā vīrāḥ sacivā vaśavartinaḥ

हे तात, युद्धप्रिय और मायावी वह युद्ध में लड़ेगा, और उसके वे वीर राक्षस मन्त्री भी, जो उसके वश में रहते हैं।

श्लोक 8 (5.172.8)

एते चान्ये च बहवो नानाजनपदेश्वराः । समेताः पाण्डवस्यार्थे वासुदेवपुरोगमाः ॥

ete cānye ca bahavo nānājanapadeśvarāḥ | sametāḥ pāṇḍavasyārthe vāsudevapurogamāḥ

ये और अन्य अनेक जनपदों के स्वामी वासुदेव को आगे करके पाण्डव के लिए एकत्र हुए हैं।

श्लोक 9 (5.172.9)

एते प्राधान्यतो राजन्पाण्डवस्य महात्मनः । रथाश्चातिरथाश्चैव ये चान्येऽर्धरथा नृप ॥

ete prādhānyato rājanpāṇḍavasya mahātmanaḥ | rathāścātirathāścaiva ye cānye'rdharathā nṛpa

हे राजन्, ये महात्मा पाण्डव के प्रमुख रथी और अतिरथी हैं, और हे नृप, अन्य जो अर्धरथी हैं।

श्लोक 10 (5.172.10)

नेष्यन्ति समरे सेनां भीमां यौधिष्ठिरीं नृप । महेन्द्रेणेव वीरेण पाल्यमानां किरीटिना ॥

neṣyanti samare senāṃ bhīmāṃ yaudhiṣṭhirīṃ nṛpa | mahendreṇeva vīreṇa pālyamānāṃ kirīṭinā

हे राजन्, वे युधिष्ठिर की उस भयंकर सेना को युद्ध में ले चलेंगे, जिसकी रक्षा महेन्द्र के समान वीर किरीटी अर्जुन कर रहा है।

श्लोक 11 (5.172.11)

तैरहं समरे वीर मायाविद्भिर्जयैषिभिः । योत्स्यामि जयमाकाङ्क्षन्नथ वा निधनं रणे ॥

tairahaṃ samare vīra māyāvidbhirjayaiṣibhiḥ | yotsyāmi jayamākāṅkṣannatha vā nidhanaṃ raṇe

हे वीर, मायाविद्या जानने वाले और विजय चाहने वाले उन योद्धाओं से मैं युद्ध में विजय की कामना करता हुआ लड़ूँगा, अथवा रणभूमि में मृत्यु पाऊँगा।

श्लोक 12 (5.172.12)

वासुदेवं च पार्थं च चक्रगाण्डीवधारिणौ । सन्ध्यागताविवार्केन्दू समेष्येते रथोत्तमौ ॥

vāsudevaṃ ca pārthaṃ ca cakragāṇḍīvadhāriṇau | sandhyāgatāvivārkendū sameṣyete rathottamau

चक्र और गाण्डीव धारण करने वाले वासुदेव और पार्थ — सन्ध्या के समय के सूर्य और चन्द्रमा के समान उन दोनों श्रेष्ठ रथियों का मैं तुम्हारे लिए सामना करूँगा।

श्लोक 13 (5.172.13)

ये चैव ते रथोदाराः पाण्डुपुत्रस्य सैनिकाः । सह सैन्यानहं तांश्च प्रतीयां रणमूर्धनि ॥

ye caiva te rathodārāḥ pāṇḍuputrasya sainikāḥ | saha sainyānahaṃ tāṃśca pratīyāṃ raṇamūrdhani

और पाण्डुपुत्र के जो वे उत्तम रथी सैनिक हैं, उनका मैं सेनासहित युद्ध के अग्रभाग में सामना करूँगा।

श्लोक 14 (5.172.14)

एते रथाश्चातिरथाश्च तुभ्यं । यथाप्रधानं नृप कीर्तिता मया । तथा परे येऽर्धरथाश्च केचि- । त्तथैव तेषामपि कौरवेन्द्र ॥

ete rathāścātirathāśca tubhyaṃ | yathāpradhānaṃ nṛpa kīrtitā mayā | tathā pare ye'rdharathāśca keci- | ttathaiva teṣāmapi kauravendra

हे राजन्, मैंने तुम्हें ये रथी और अतिरथी उनकी प्रधानता के क्रम से बताए हैं, और हे कौरवेन्द्र, उनमें जो कुछ अन्य अर्धरथी हैं, उन्हें भी उसी प्रकार।

श्लोक 15 (5.172.15)

अर्जुनं वासुदेवं च ये चान्ये तत्र पार्थिवाः । सर्वांस्तान्वारयिष्यामि यावद्द्रक्ष्यामि भारत ॥

arjunaṃ vāsudevaṃ ca ye cānye tatra pārthivāḥ | sarvāṃstānvārayiṣyāmi yāvaddrakṣyāmi bhārata

हे भारत, अर्जुन, वासुदेव और वहाँ जो अन्य राजा हैं — जब तक वे मुझे दिखाई देंगे, मैं उन सबको रोकता रहूँगा।

श्लोक 16 (5.172.16)

पाञ्चाल्यं तु महाबाहो नाहं हन्यां शिखण्डिनम् । उद्यतेषुमथो दृष्ट्वा प्रतियुध्यन्तमाहवे ॥

pāñcālyaṃ tu mahābāho nāhaṃ hanyāṃ śikhaṇḍinam | udyateṣumatho dṛṣṭvā pratiyudhyantamāhave

परन्तु हे महाबाहो, पाञ्चाल शिखण्डी को मैं नहीं मारूँगा, चाहे उसे बाण उठाए युद्ध में अपने विरुद्ध लड़ते हुए ही क्यों न देखूँ।

श्लोक 17 (5.172.17)

लोकस्तद्वेद यदहं पितुः प्रियचिकीर्षया । प्राप्तं राज्यं परित्यज्य ब्रह्मचर्यव्रते स्थितः ॥

lokastadveda yadahaṃ pituḥ priyacikīrṣayā | prāptaṃ rājyaṃ parityajya brahmacaryavrate sthitaḥ

संसार जानता है कि पिता का प्रिय करने की इच्छा से मैंने प्राप्त राज्य त्याग दिया और ब्रह्मचर्य के व्रत में स्थित रहा।

श्लोक 18 (5.172.18)

चित्राङ्गदं कौरवाणामाधिपत्येऽभ्यषेचयम् । विचित्रवीर्यं च शिशुं यौवराज्येऽभ्यषेचयम् ॥

citrāṅgadaṃ kauravāṇāmādhipatye'bhyaṣecayam | vicitravīryaṃ ca śiśuṃ yauvarājye'bhyaṣecayam

मैंने चित्राङ्गद को कौरवों के आधिपत्य पर अभिषिक्त किया और बालक विचित्रवीर्य को युवराज पद पर अभिषिक्त किया।

श्लोक 19 (5.172.19)

देवव्रतत्वं विज्ञाप्य पृथिवीं सर्वराजसु । नैव हन्यां स्त्रियं जातु न स्त्रीपूर्वं कदाचन ॥

devavratatvaṃ vijñāpya pṛthivīṃ sarvarājasu | naiva hanyāṃ striyaṃ jātu na strīpūrvaṃ kadācana

सब राजाओं के बीच संसार में अपने देवव्रत (ब्रह्मचर्य-व्रत) की घोषणा करके मैं कभी किसी स्त्री को, या जो पहले स्त्री रहा हो उसे, किसी भी दशा में नहीं मारूँगा।

श्लोक 20 (5.172.20)

स हि स्त्रीपूर्वको राजञ्शिखण्डी यदि ते श्रुतः । कन्या भूत्वा पुमाञ्जातो न योत्स्ये तेन भारत ॥

sa hi strīpūrvako rājañśikhaṇḍī yadi te śrutaḥ | kanyā bhūtvā pumāñjāto na yotsye tena bhārata

हे राजन्, शिखण्डी पहले स्त्री था, यह तुमने सुना होगा; वह कन्या के रूप में जन्म लेकर पुरुष बना। हे भारत, मैं उससे नहीं लड़ूँगा।

श्लोक 21 (5.172.21)

सर्वांस्त्वन्यान्हनिष्यामि पार्थिवान्भरतर्षभ । यान्समेष्यामि समरे न तु कुन्तीसुतान्नृप ॥

sarvāṃstvanyānhaniṣyāmi pārthivānbharatarṣabha | yānsameṣyāmi samare na tu kuntīsutānnṛpa

हे भरतश्रेष्ठ, अन्य सभी राजाओं को, जिनसे भी युद्ध में मेरा सामना होगा, मैं मारूँगा — परन्तु हे राजन्, कुन्ती के पुत्रों को नहीं।

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