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उद्योग पर्व · अध्याय 173

भीष्म द्वारा काशिराज की कन्याओं का हरण

दुर्योधन पूछता है कि शस्त्र उठाकर सामने आने पर भी भीष्म शिखण्डी को क्यों नहीं मारेंगे। भीष्म अम्बा की कथा आरम्भ करते हैं — शान्तनु की मृत्यु के बाद उन्होंने चित्राङ्गद को और फिर विचित्रवीर्य को राजसिंहासन पर बिठाया, और भाई के लिए वधू की खोज में अकेले रथ पर काशिराज की तीनों कन्याओं — अम्बा, अम्बिका और अम्बालिका — के स्वयंवर में गए। एकत्र राजाओं को ललकारकर वे राजकुमारियों को हर ले गए, पीछा करने वाले सब राजाओं को परास्त किया और उन्हें भाई के लिए हस्तिनापुर ले आए, तथा सत्यवती को सब बता दिया।

अध्याय 172अध्याय-सूचीअध्याय 174

दुर्योधन उवाच

श्लोक 1 (5.173.1)

किमर्थं भरतश्रेष्ठ नैव हन्याः शिखण्डिनम् । उद्यतेषुमथो दृष्ट्वा समरेष्वाततायिनम् ॥

kimarthaṃ bharataśreṣṭha naiva hanyāḥ śikhaṇḍinam | udyateṣumatho dṛṣṭvā samareṣvātatāyinam

हे भरतश्रेष्ठ, आप शिखण्डी को क्यों नहीं मारेंगे, चाहे युद्ध में उसे बाण उठाए आततायी के रूप में अपनी ओर आते देखें,

श्लोक 2 (5.173.2)

पूर्वमुक्त्वा महाबाहो पाञ्चालान्सह सोमकैः । हनिष्यामीति गाङ्गेय तन्मे ब्रूहि पितामह ॥

pūrvamuktvā mahābāho pāñcālānsaha somakaiḥ | haniṣyāmīti gāṅgeya tanme brūhi pitāmaha

जबकि हे महाबाहो, आपने पहले कहा था कि "मैं सोमकों सहित पाञ्चालों को मारूँगा"? हे गङ्गानन्दन पितामह, यह मुझे बताइए।

भीष्म उवाच

श्लोक 3 (5.173.3)

शृणु दुर्योधन कथां सहैभिर्वसुधाधिपैः । यदर्थं युधि संप्रेक्ष्य नाहं हन्यां शिखण्डिनम् ॥

śṛṇu duryodhana kathāṃ sahaibhirvasudhādhipaiḥ | yadarthaṃ yudhi saṃprekṣya nāhaṃ hanyāṃ śikhaṇḍinam

हे दुर्योधन, इन राजाओं के साथ वह कथा सुनो कि युद्ध में शिखण्डी को देखकर भी मैं उसे क्यों नहीं मारूँगा।

श्लोक 4 (5.173.4)

महाराजो मम पिता शान्तनुर्लोकविश्रुतः । दिष्टान्तमाप धर्मात्मा समये भरतर्षभ ॥

mahārājo mama pitā śāntanurlokaviśrutaḥ | diṣṭāntamāpa dharmātmā samaye bharatarṣabha

हे भरतश्रेष्ठ, मेरे पिता, लोकविख्यात धर्मात्मा महाराज शान्तनु, समय आने पर दिवंगत हो गए।

श्लोक 5 (5.173.5)

ततोऽहं भरतश्रेष्ठ प्रतिज्ञां परिपालयन् । चित्राङ्गदं भ्रातरं वै महाराज्येऽभ्यषेचयम् ॥

tato'haṃ bharataśreṣṭha pratijñāṃ paripālayan | citrāṅgadaṃ bhrātaraṃ vai mahārājye'bhyaṣecayam

तब, हे भरतश्रेष्ठ, अपनी प्रतिज्ञा का पालन करते हुए मैंने अपने भाई चित्राङ्गद को महाराज्य पर अभिषिक्त किया।

श्लोक 6 (5.173.6)

तस्मिंश्च निधनं प्राप्ते सत्यवत्या मते स्थितः । विचित्रवीर्यं राजानमभ्यषिञ्चं यथाविधि ॥

tasmiṃśca nidhanaṃ prāpte satyavatyā mate sthitaḥ | vicitravīryaṃ rājānamabhyaṣiñcaṃ yathāvidhi

उसकी मृत्यु हो जाने पर सत्यवती की सम्मति के अनुसार मैंने विधिपूर्वक विचित्रवीर्य को राजा के पद पर अभिषिक्त किया।

श्लोक 7 (5.173.7)

मयाऽभिषिक्तो राजेन्द्र यवीयानपि धर्मतः । विचित्रवीर्यो धर्मात्मा मामेव समुदैक्षत ॥

mayā'bhiṣikto rājendra yavīyānapi dharmataḥ | vicitravīryo dharmātmā māmeva samudaikṣata

हे राजेन्द्र, छोटा होने पर भी धर्मानुसार मेरे द्वारा अभिषिक्त धर्मात्मा विचित्रवीर्य मेरी ओर ही देखता था।

श्लोक 8 (5.173.8)

तस्य दारक्रियां तात चिकीर्षुरहमप्युत । अनुरूपादिव कुलादित्येव च मनो दधे ॥

tasya dārakriyāṃ tāta cikīrṣurahamapyuta | anurūpādiva kulādityeva ca mano dadhe

हे तात, उसका विवाह कराने की इच्छा से मैंने यह निश्चय किया कि वधू किसी अनुरूप कुल से ही हो।

श्लोक 9 (5.173.9)

तथाऽश्रौषं महाबाहो तिस्रः कन्याः स्वयंवरे । रूपेणाप्रतिमाः सर्वाः काशिराजसुतास्तदा । अम्बां चैवाम्बिकां चैव तथैवाम्बालिकामपि ॥

tathā'śrauṣaṃ mahābāho tisraḥ kanyāḥ svayaṃvare | rūpeṇāpratimāḥ sarvāḥ kāśirājasutāstadā | ambāṃ caivāmbikāṃ caiva tathaivāmbālikāmapi

तब, हे महाबाहो, मैंने सुना कि स्वयंवर में तीन कन्याएँ हैं, सभी अनुपम रूपवती, काशिराज की पुत्रियाँ — अम्बा, अम्बिका और अम्बालिका।

श्लोक 10 (5.173.10)

राजानश्च समाहूताः पृथिव्यां भरतर्षभ । अम्बा ज्येष्ठाभवत्तासामम्बिका त्वथ मध्यमा ॥

rājānaśca samāhūtāḥ pṛthivyāṃ bharatarṣabha | ambā jyeṣṭhābhavattāsāmambikā tvatha madhyamā

हे भरतश्रेष्ठ, पृथ्वी भर के राजा बुलाए गए थे। उनमें अम्बा सबसे बड़ी थी और अम्बिका मँझली,

श्लोक 11 (5.173.11)

अम्बालिका च राजेन्द्र राजकन्या यवीयसी । सोऽहमेकरथेनैव गतः काशिपतेः पुरीम् ॥

ambālikā ca rājendra rājakanyā yavīyasī | so'hamekarathenaiva gataḥ kāśipateḥ purīm

और हे राजेन्द्र, राजकुमारी अम्बालिका सबसे छोटी थी। मैं केवल एक रथ लेकर काशिराज की नगरी में गया।

श्लोक 12 (5.173.12)

अपश्यं ता महाबाहो तिस्रः कन्याः स्वलङ्कृताः । राज्ञश्चैव समाहूतान्पार्थिवान्पृथिवीपते ॥

apaśyaṃ tā mahābāho tisraḥ kanyāḥ svalaṅkṛtāḥ | rājñaścaiva samāhūtānpārthivānpṛthivīpate

हे महाबाहो, वहाँ मैंने सुन्दर अलंकारों से सजी उन तीनों कन्याओं को और, हे पृथ्वीपति, आमन्त्रित राजाओं को देखा।

श्लोक 13 (5.173.13)

ततोऽहं तान्नृपान्सर्वानाहूय समरे स्थितान् । रथमारोपयाञ्चक्रे कन्यास्ता भरतर्षभ ॥

tato'haṃ tānnṛpānsarvānāhūya samare sthitān | rathamāropayāñcakre kanyāstā bharatarṣabha

तब, हे भरतश्रेष्ठ, युद्ध के लिए खड़े उन सब राजाओं को ललकारकर मैंने उन कन्याओं को अपने रथ पर चढ़ा लिया।

श्लोक 14 (5.173.14)

वीर्यशुल्काश्च ता ज्ञात्वा समारोप्य रथं तदा । अवोचं पार्थिवान्सर्वानहं तत्र समागतान् । भीष्मः शान्तनवः कन्या हरतीति पुनःपुनः ॥

vīryaśulkāśca tā jñātvā samāropya rathaṃ tadā | avocaṃ pārthivānsarvānahaṃ tatra samāgatān | bhīṣmaḥ śāntanavaḥ kanyā haratīti punaḥpunaḥ

यह जानकर कि उनका शुल्क पराक्रम है, मैंने उन्हें रथ पर बिठाया और वहाँ एकत्र सब राजाओं से बार-बार कहा — "शान्तनुपुत्र भीष्म कन्याओं को हरकर ले जा रहा है!

श्लोक 15 (5.173.15)

ते यतध्वं परं शक्त्या सर्वे मोक्षाय पार्थिवाः । प्रसह्य हि हराम्येष मिषतां वो नरर्षभाः ॥

te yatadhvaṃ paraṃ śaktyā sarve mokṣāya pārthivāḥ | prasahya hi harāmyeṣa miṣatāṃ vo nararṣabhāḥ

हे राजाओं, तुम सब पूरी शक्ति से इन्हें छुड़ाने का प्रयत्न करो; क्योंकि हे नरश्रेष्ठो, मैं तुम्हारे देखते-देखते इन्हें बलपूर्वक हरकर ले जा रहा हूँ!"

श्लोक 16 (5.173.16)

ततस्ते पृथिवीपालाः समुत्पेतुरुदायुधाः । योगो योग इति क्रुद्धाः सारथीनभ्यचोदयन् ॥

tataste pṛthivīpālāḥ samutpeturudāyudhāḥ | yogo yoga iti kruddhāḥ sārathīnabhyacodayan

तब वे राजा शस्त्र उठाकर उछल पड़े और क्रोध में "जोतो! जोतो!" कहते हुए अपने सारथियों को प्रेरित करने लगे।

श्लोक 17 (5.173.17)

ते रथैर्मेघसङ्काशैर्गजैश्च गजयोधिनः । पुष्टैश्चाश्वैर्महीपालाः समुत्पेतुरुदायुधाः ॥

te rathairmeghasaṅkāśairgajaiśca gajayodhinaḥ | puṣṭaiścāśvairmahīpālāḥ samutpeturudāyudhāḥ

मेघ के समान रथों, हाथियों पर लड़ने वाले योद्धाओं के हाथियों और हृष्ट-पुष्ट घोड़ों के साथ वे राजा शस्त्र उठाए टूट पड़े।

श्लोक 18 (5.173.18)

ततस्ते मां महीपालाः सर्व एव विशां पते । रथव्रातेन महता सर्वतः पर्यवारयन् ॥

tataste māṃ mahīpālāḥ sarva eva viśāṃ pate | rathavrātena mahatā sarvataḥ paryavārayan

हे प्रजापालक, तब उन सब राजाओं ने रथों के विशाल समूह से मुझे चारों ओर से घेर लिया।

श्लोक 19 (5.173.19)

तानहं शरवर्षेण समन्तात्पर्यवारयम् । सर्वान्नृपांश्चाप्यजयं देवराडिव दानवान् ॥

tānahaṃ śaravarṣeṇa samantātparyavārayam | sarvānnṛpāṃścāpyajayaṃ devarāḍiva dānavān

मैंने भी बाणों की वर्षा से उन्हें चारों ओर से घेर लिया और सब राजाओं को वैसे ही जीत लिया जैसे देवराज इन्द्र दानवों को जीतते हैं।

श्लोक 20 (5.173.20)

अपातयं शरैर्दीप्तैः प्रहसन्भरतर्षभ । तेषामापततां चित्रान्ध्वजान्हेमपरिष्कृतान् ॥

apātayaṃ śarairdīptaiḥ prahasanbharatarṣabha | teṣāmāpatatāṃ citrāndhvajānhemapariṣkṛtān

हे भरतश्रेष्ठ, मैंने हँसते हुए प्रज्वलित बाणों से अपनी ओर झपटते उन राजाओं के सुवर्णभूषित रंग-बिरंगे ध्वजों को गिरा दिया —

श्लोक 21 (5.173.21)

एकैकेन हि बाणेन भूमौ पातितवानहम् । हयांस्तेषां गजांश्चैव सारथींश्चाप्यहं रणे ॥

ekaikena hi bāṇena bhūmau pātitavānaham | hayāṃsteṣāṃ gajāṃścaiva sārathīṃścāpyahaṃ raṇe

एक-एक बाण से मैंने उन्हें भूमि पर गिरा दिया; और उनके घोड़ों, हाथियों तथा सारथियों को भी मैंने युद्ध में मार गिराया।

श्लोक 22 (5.173.22)

ते निवृत्ताश्च भग्नाश्च दृष्ट्वा तल्लाघवं मम । प्रणिपेतुश्च सर्वे वै प्रशशंसुश्च पार्थिवाः ॥

te nivṛttāśca bhagnāśca dṛṣṭvā tallāghavaṃ mama | praṇipetuśca sarve vai praśaśaṃsuśca pārthivāḥ

मेरी वह फुर्ती देखकर वे टूटकर पीछे लौट गए, और सब राजाओं ने मुझे प्रणाम किया तथा मेरी प्रशंसा की।

श्लोक 23 (5.173.23)

तत आदाय ताः कन्या नृपतींश्च विसृज्य तान् । अथाऽहं हास्तिनपुरमायां जित्वा महीक्षितः ॥

tata ādāya tāḥ kanyā nṛpatīṃśca visṛjya tān | athā'haṃ hāstinapuramāyāṃ jitvā mahīkṣitaḥ

तब उन कन्याओं को लेकर और उन राजाओं को विदा करके, पृथ्वी के शासकों को जीतकर मैं हस्तिनापुर आ गया।

श्लोक 24 (5.173.24)

ततोऽहं ताश्च कन्या वै भ्रातुरर्थाय भारत । तच्च कर्म महाबाहो सत्यवत्यै न्यवेदयम् ॥

tato'haṃ tāśca kanyā vai bhrāturarthāya bhārata | tacca karma mahābāho satyavatyai nyavedayam

तब, हे भारत, मैंने वे कन्याएँ अपने भाई के लिए सौंप दीं, और हे महाबाहो, वह सारा कार्य सत्यवती को बताया।

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